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भारत में नारीवादी आंदोलन : भाग 2

1990 के दशक से वर्तमान तक

इस लेख के पहले भाग (भारत में नारीवादी आंदोलन : भाग 1) का अंत एक असुविधाजनक प्रश्न पर हुआ था: कौन-सी स्त्री, और किसका नारीवाद? 1980 के दशक तक आंदोलन ने कानून बदलवाए, संगठन खड़े किए और स्त्री के प्रश्न को सार्वजनिक बहस का हिस्सा बना दिया। पर शाह बानो, रूप कँवर और मथुरा जैसे मामलों ने यह भी दिखा दिया था कि स्त्रियों के अनुभव एक-से नहीं हैं। जाति, धर्म, वर्ग और क्षेत्र हर स्त्री की लड़ाई का रूप बदल देते हैं। इस भाग में हम उसी सूत्र को आगे बढ़ाएँगे: 1990 के बाद का भारत, जहाँ आंदोलन को राज्य, बाज़ार और संयुक्त राष्ट्र जैसे नए साझेदार और नए प्रतिद्वंद्वी मिले, और जहाँ निर्भया से #MeToo तक की सड़कों ने एक नई पीढ़ी को आवाज़ दी।

पर इस भाग का केंद्रीय प्रश्न कुछ और है। जिस पितृसत्ता से लड़ाई है, वह केवल कानून की किताबों या पुरुषों के व्यवहार में नहीं बैठी। वह घर की रसोई में, माँ की सीख में, बेटे की परवरिश में, सास और बहू के रिश्ते में और हमारी अपनी अपेक्षाओं में भी बैठी है। इसलिए इस भाग के उत्तरार्ध में हम देखेंगे कि प्रतिरोध की लड़ाई स्त्रियों और पुरुषों दोनों के भीतर कैसे लड़ी जानी है।

1990 का मोड़: राज्य, बाज़ार और वैश्विक मंच

1990 का दशक आंदोलन के लिए तीन बड़े बदलाव लेकर आया:

  1. राज्य के साथ नया रिश्ता: 1990 में राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम बना और 1992 में आयोग का गठन हुआ। 1989 में शुरू हुए महिला समाख्या कार्यक्रम ने ग्रामीण स्त्रियों की शिक्षा को सशक्तिकरण से जोड़ा। 1993 में भारत ने महिलाओं के प्रति सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन (CEDAW) की पुष्टि की। राज्य अब केवल विरोध का लक्ष्य नहीं, साझेदार और मंच भी बना।
  2. अर्थव्यवस्था का उदारीकरण: 1991 के आर्थिक सुधारों ने सूचना प्रौद्योगिकी, बीपीओ और सेवा क्षेत्र में स्त्रियों के लिए नए रोज़गार खोले। शहरी मध्यवर्ग की एक नई “आत्मनिर्भर स्त्री” की छवि बनी। पर इसी दौर में कृषि और असंगठित क्षेत्र की बहुसंख्यक स्त्रियाँ और हाशिये पर चली गईं, और बाज़ार ने “सशक्त स्त्री” को एक उपभोक्ता छवि बनाकर बेचना शुरू कर दिया।
  3. वैश्विक मंच और एनजीओ-करण: 1995 में बीजिंग के चौथे विश्व महिला सम्मेलन ने “जेंडर मुख्यधारा” की भाषा दी, और भारत में महिला संगठनों का बड़ा हिस्सा परियोजना-आधारित, अनुदान-आश्रित संस्थाओं में बदल गया। इससे संसाधन और पेशेवर क्षमता बढ़ी, पर आलोचकों का कहना है कि आंदोलन की धार भी कुंद हुई। जो कभी सड़कों की राजनीति थी, वह धीरे-धीरे रिपोर्टों और कार्यशालाओं की भाषा में सिमटने लगी।

स्वयं सहायता समूहों का आंदोलन भी इसी दशक में फैला। 1992 में नाबार्ड ने बैंक-समूह जुड़ाव की शुरुआत की, और 1998 में केरल में “कुटुंबश्री” बनी, जो ग्रामीण और शहरी गरीब स्त्रियों का विशाल सामुदायिक नेटवर्क बन गया। इन्होंने स्त्री को ऋण, बचत और सामूहिक निर्णय की ताकत दी, जो पहले उसके लिए अकल्पनीय थी।

भँवरी देवी से विशाखा तक: एक स्त्री का साहस, एक देश का कानून

इस दौर की सबसे निर्णायक घटना राजस्थान के एक छोटे से गाँव से आई। भँवरी देवी राजस्थान सरकार के महिला विकास कार्यक्रम में “साथिन” थीं। 1992 में उन्होंने गाँव में एक बाल विवाह रोकने का प्रयास किया। इसका बदला लेने के लिए प्रभावशाली समुदाय के कुछ पुरुषों ने उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया। 1995 में निचली अदालत ने आरोपियों को बरी कर दिया, और उसके तर्कों की महिला संगठनों ने तीखी आलोचना की: कि अलग-अलग जाति और उम्र के पुरुष एक साथ ऐसा अपराध क्यों करेंगे, या कि पुरुष अपने परिवार के सामने किसी का बलात्कार नहीं करेंगे। ये तर्क इस बात का प्रमाण थे कि न्याय की संस्था भी पितृसत्ता की सोच से मुक्त नहीं है। भँवरी देवी का मुकदमा दशकों तक खिंचता रहा।

पर इस घटना के बाद विशाखा और अन्य महिला संगठनों ने सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की। 1997 में विशाखा बनाम राजस्थान राज्य के निर्णय ने भारत में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की पहली परिभाषा और दिशानिर्देश तय किए। इनमें नियोक्ता की जवाबदेही, शिकायत समिति का गठन (जिसकी अध्यक्ष महिला हो और आधे से अधिक सदस्य महिलाएँ हों) और बाहरी संगठन की भागीदारी जैसे प्रावधान थे। न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के साथ CEDAW को भी आधार बनाया। इसी निर्णय का परिष्कृत रूप 2013 में कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम बना। एक दलित-पिछड़े समुदाय की ग्रामीण स्त्री के साहस ने देश के हर दफ़्तर के लिए कानून की नींव रखी।

सत्ता के गलियारों में स्त्री: पंचायत से संसद तक

1992-93 के 73वें और 74वें संविधान संशोधनों ने पंचायतों और नगरपालिकाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कीं। बाद में कई राज्यों ने इसे बढ़ाकर पचास प्रतिशत किया, जिसमें बिहार 2006 में अग्रणी रहा। इसका परिणाम यह हुआ कि लाखों स्त्रियाँ पहली बार सार्वजनिक सत्ता की भूमिका में आईं।

इस प्रयोग पर शोध बहुत दिलचस्प रहा है। एस्थर डुफ्लो और उनके साथियों के अध्ययनों में पाया गया कि महिला-आरक्षित पंचायतों में पेयजल जैसी जनसुविधाओं पर निवेश अधिक हुआ और समय के साथ स्त्री नेतृत्व के प्रति समाज का पूर्वाग्रह घटा। पर इसका एक स्याह पहलू भी था: “सरपंच पति” या “प्रधान पति” की घटना, जिसमें निर्वाचित स्त्री केवल नाम की प्रतिनिधि रहती है और असली सत्ता उसके पति या रिश्तेदार के हाथ में चलती है। यह प्रथा इतनी व्यापक रही कि उसके लिए एक शब्द ही चल पड़ा, और नीति-निर्माताओं ने भी इस पर चिंता जताई। यहाँ फिर वही सबक है: आरक्षण दरवाज़ा खोलता है, पर कमरे के भीतर की सत्ता-संरचना को बदलने के लिए अलग प्रयास चाहिए।

संसद और विधानसभाओं में आरक्षण की कहानी और लंबी है:

  • 1996 में पहली बार विधेयक पेश हुआ और बार-बार लोकसभा के भंग होने से निरस्त होता रहा।
  • 2010 में राज्यसभा से पारित हुआ, पर लोकसभा में अटका रहा। “कोटे के भीतर कोटे” यानी पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक स्त्रियों के लिए अलग प्रावधान की माँग प्रमुख विवाद रही।
  • सितंबर 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वाँ संविधान संशोधन) लगभग सर्वसम्मति से पारित हुआ, पर इसे जनगणना और परिसीमन के बाद लागू होना था।

अप्रैल 2026 में अधिनियम अधिसूचित हुआ, पर परिसीमन को जल्दी करने वाला 131वाँ संशोधन विधेयक 17 अप्रैल को लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत न मिलने से गिर गया (298 पक्ष में, 230 विपक्ष में)। विपक्ष का तर्क था कि परिसीमन के बहाने राज्यों के प्रतिनिधित्व का संतुलन बदलने की कोशिश हो रही है। सरकार का कहना था कि विपक्ष ने स्त्रियों के साथ अन्याय किया। जो भी सही हो, नतीजा यह है कि आरक्षण कानून बन चुका है, पर सीटें अभी तय नहीं हुईं, और लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग चौदह प्रतिशत पर टिकी है। राजनीतिक प्रतिनिधित्व के पैमाने पर विश्व आर्थिक मंच की 2026 की सूची में भारत का स्थान 67वाँ रहा, पर वह अपने ही अंतराल का केवल एक-चौथाई हिस्सा पाट पाया है।

इस प्रकरण का समाजशास्त्रीय पाठ यह है कि स्त्री के अधिकार की माँग भी अक्सर दूसरी राजनीतिक खींचतान में उलझ जाती है, और स्त्रियों की प्रतीक्षा लंबी होती जाती है।

कानून का विस्तार: उपलब्धियाँ और अधूरापन

1990 के बाद के दशकों में स्त्री-अधिकारों से जुड़े कानूनी बदलाव गिने-चुने नहीं, बल्कि व्यापक रहे:

  • 1994: प्रसव-पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) कानून, कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए। फिर भी 2011 की जनगणना में बाल लिंगानुपात 927 से गिरकर 919 रहा।
  • 2005: घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम (लागू 2006), जिसने “घर के भीतर की हिंसा” को पहली बार कानूनी पहचान दी और निवास का अधिकार जोड़ा। उसी वर्ष हिंदू उत्तराधिकार संशोधन से बेटियों को पैतृक संपत्ति में बेटों के समान सहभागीदारी का अधिकार मिला। 2020 के विनीता शर्मा निर्णय ने इसे और स्पष्ट करते हुए कहा कि बेटी का यह अधिकार जन्म से है, चाहे पिता 2005 में जीवित रहे हों या नहीं।
  • 2013: आपराधिक विधि संशोधन (बलात्कार की व्यापक परिभाषा, स्टॉकिंग, ताक-झाँक, एसिड हमले जैसे अपराध) और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का कानून।
  • 2017: मातृत्व लाभ संशोधन, जिसमें सवेतन मातृत्व अवकाश बारह सप्ताह से बढ़कर छब्बीस सप्ताह हुआ। इसी वर्ष शायरा बानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने एक साथ तीन तलाक़ को असंवैधानिक ठहराया (3:2 के बहुमत से), और 2019 में इसे अपराध बनाने वाला कानून आया।
  • 2018: जोसेफ़ शाइन निर्णय ने व्यभिचार संबंधी धारा 497 को रद्द किया, जो पत्नी को पति की “संपत्ति” की तरह देखती थी। उसी वर्ष नवतेज जौहर निर्णय ने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से हटाया।

फिर भी कई बुनियादी प्रश्न अनसुलझे हैं। सबसे बड़ा है वैवाहिक बलात्कार। भारतीय न्याय संहिता की धारा 63 का अपवाद अब भी अठारह वर्ष से अधिक आयु की पत्नी के साथ पति के बलात्कार को अपराध नहीं मानता। 2013 की वर्मा समिति ने इस अपवाद को हटाने की सिफारिश की थी, पर संसद ने उसे नहीं माना। 2022 में दिल्ली उच्च न्यायालय के दोनों न्यायाधीशों ने इस पर बँटा हुआ निर्णय दिया। सितंबर 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रश्न पर अंतिम सुनवाई के लिए मामले को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है, और सुनवाई के दौरान कहा कि विवाह का अर्थ स्त्री की व्यक्तिगत स्वायत्तता का अंत नहीं है। केंद्र सरकार का तर्क रहा है कि इससे विवाह संस्था पर असर पड़ेगा। यह तर्क अपने आप में एक पितृसत्तात्मक धारणा को उजागर करता है: कि विवाह में स्त्री की सहमति की जगह पति का अधिकार प्राथमिक है।

हाशिये से उठी आवाज़ें: दलित, बहुजन, आदिवासी, मुस्लिम, क्वीयर

1990 के दशक की सबसे बड़ी बौद्धिक उपलब्धि शायद वह थी जब हाशिये की स्त्रियों ने अपने लिए अलग मंच और भाषा की माँग की। इस माँग के पीछे किम्बर्ले क्रेनशॉ की “अंतरसंबद्धता” (इंटरसेक्शनैलिटी) की समझ थी, कि जाति, वर्ग, धर्म और जेंडर की उत्पीड़न-परतें एक-दूसरे को काटती और गहरा करती हैं।

  • दलित और बहुजन स्त्रीवाद: 1995 में रूथ मनोरमा के नेतृत्व में राष्ट्रीय दलित महिला महासंघ बना। बेबी कांबळे और उर्मिला पवार जैसी लेखिकाओं ने अपनी आत्मकथाओं में दिखाया कि दलित स्त्री दोहरी गुलामी झेलती है: बाहर जाति के कारण और घर के भीतर लिंग के कारण। उनके अनुभव यह भी बताते हैं कि “सवर्ण पितृसत्ता” और “दलित पितृसत्ता” एक जैसी नहीं हैं, और सार्वभौमिक स्त्री का सिद्धांत उनके लिए अपर्याप्त है। 2006 का खैरलांजी कांड (एक दलित परिवार की स्त्रियों के साथ यौन हिंसा और हत्या के आरोप) और 2020 का हाथरस कांड, जिसमें एक दलित युवती की मृत्यु के बाद रात में पुलिस द्वारा अंतिम संस्कार पर देशभर में आक्रोश उभरा, दिखाते हैं कि जाति और जेंडर आज भी एक साथ घातक हो सकते हैं।
  • मुस्लिम स्त्री आंदोलन: 2007 में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (ज़किया सोमन और नूरजहाँ साफ़िया नियाज़) बना, जिसने कुरान की स्त्री-पक्षीय व्याख्या के आधार पर तीन तलाक़ के विरुद्ध अभियान चलाया। इस मामले में नारीवादी दृष्टिकोण दो तरह का रहा। कुछ ने तीन तलाक़ को अपराध बनाने का समर्थन किया, कुछ ने कहा कि आपराधिक दंड स्त्री के हित में नहीं और उसके बजाय नागरिक उपचार और सामाजिक सुधार पर ज़ोर होना चाहिए। साथ ही 2002 के गुजरात दंगों में बिलकीस बानो के साथ हुई क्रूरता और अगस्त 2022 में दोषियों की समय पूर्व रिहाई, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने जनवरी 2024 में रद्द किया, इस बात का उदाहरण है कि सांप्रदायिक हिंसा में स्त्री की देह कैसे हिंसा का मैदान बन जाती है।
  • आदिवासी और संघर्ष-क्षेत्र की स्त्रियाँ: 1991 में कश्मीर के कुनन पोशपोरा में सैनिकों पर सामूहिक बलात्कार के आरोप, 2004 में मणिपुर में मनोरमा देवी की हत्या के बाद इम्फाल में असम राइफल्स के मुख्यालय के सामने “मीरा पाइबी” स्त्रियों का निर्वस्त्र प्रदर्शन (जिसमें उन्होंने कहा, “भारतीय सेना हमारा बलात्कार करो”), इरोम शर्मिला का सोलह वर्षों का उपवास (2000 से 2016) और 2023 में मणिपुर की हिंसा के दौरान दो स्त्रियों को निर्वस्त्र घुमाए जाने का वीडियो, इन सबने दिखाया कि सशस्त्र संघर्ष में पितृसत्ता और राज्य-शक्ति एक साथ काम करते हैं। बीना अग्रवाल के शोध ने भूमि अधिकार के प्रश्न को भी नारीवादी विमर्श में केंद्र में रखा: जिसके पास ज़मीन पर अधिकार नहीं, उसकी सौदेबाज़ी की ताकत भी कम है।
  • क्वीयर और ट्रांस अधिकार: 2014 में नालसा निर्णय ने तीसरे लिंग को कानूनी मान्यता दी, 2018 में समलैंगिकता का अपराधीकरण समाप्त हुआ और 2019 में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम बना, जिसकी कई समुदायों ने आलोचना भी की। इससे यह सवाल उठा कि जेंडर की श्रेणी स्त्री और पुरुष के द्विआधारी ढाँचे से आगे कैसे समझी जाए।

इन आवाज़ों का साझा संदेश यह रहा कि नारीवाद का दावा सार्वभौमिक नहीं, बल्कि बहुवचन होना चाहिए। निवेदिता मेनन ने इसी बात को “एक नारीवादी की तरह देखना” कहा: यानी हर आंदोलन को उसके भीतर की शक्ति-संरचनाओं के सवाल के साथ देखना।

निर्भया से #MeToo तक: 

16 दिसंबर 2012 की रात दिल्ली में एक तेईस वर्षीय फिज़ियोथेरेपी छात्रा के साथ चलती बस में हुई सामूहिक दरिंदगी और 29 दिसंबर को उसकी मृत्यु ने देश को हिला दिया। इंडिया गेट और रायसीना की पहाड़ियों पर बिना किसी संगठित नेतृत्व के हज़ारों युवा, स्त्री और पुरुष, उतरे। उनका नारा सत्ता से सवाल था, पर उसके भीतर यह माँग भी थी कि स्त्रियों को घर में बंद करने के बजाय सार्वजनिक स्थान सुरक्षित बनाए जाएँ।

न्यायमूर्ति जे. एस. वर्मा की अध्यक्षता में बनी समिति ने (जिसमें न्यायमूर्ति लीला सेठ और गोपाल सुब्रमण्यम थे) मात्र उनतीस दिनों में रिपोर्ट दे दी। उसने मृत्युदंड की सिफारिश नहीं की, पर वैवाहिक बलात्कार अपवाद हटाने, पुलिस सुधार और समाज के पुरुषवादी मानसिकता में बदलाव की बात कही। 2013 के संशोधन में बलात्कार की परिभाषा तो विस्तृत हुई और नए अपराध (पीछा करना, ताक-झाँक, एसिड हमला) जुड़े, पर साथ ही कुछ मामलों में मृत्युदंड भी जोड़ा गया और वैवाहिक बलात्कार अपवाद जस का तस रहा। 2018 में कठुआ और उन्नाव की घटनाओं के बाद बारह वर्ष से कम की बच्ची के बलात्कार पर मृत्युदंड का प्रावधान आया।

यहाँ नारीवादी हलकों में एक गंभीर बहस छिड़ी, जिसे “दंडवादी नारीवाद” की आलोचना कहा जाता है। उसका तर्क यह है कि कठोर सज़ाएँ बढ़ाने से अपराध घटते नहीं, बल्कि कई बार वे रिपोर्टिंग को हतोत्साहित करती हैं (क्योंकि अपराधी के परिवार का ही सदस्य होने पर पीड़िता पर दबाव बढ़ता है) और राज्य को और अधिक नियंत्रणकारी बनाती हैं। साथ ही यह सुरक्षा के नाम पर स्त्रियों की आवाजाही पर और रोक लगाने के तर्क को बल दे सकता है। न्याय की गति, पुलिस और अभियोजन की गुणवत्ता और पीड़िता के लिए सहयोगी प्रणाली, ये सब कठोर दंड से अधिक निर्णायक हैं।

2018 में #MeToo ने यह बहस और आगे बढ़ाई। अक्टूबर 2017 में एक विधि छात्रा की बनाई “यौन उत्पीड़कों की सूची” ने शैक्षणिक जगत में नामकरण की प्रक्रिया पर बहस छेड़ी: क्या संस्थागत व्यवस्था के विफल होने पर सार्वजनिक रूप से नाम लेना उचित है, या यह बिना उचित प्रक्रिया के सज़ा है? 2018 में तनुश्री दत्ता के आरोपों से शुरू होकर पत्रकारिता, फ़िल्म और अकादमिक जगत की अनेक स्त्रियों ने अपने अनुभव साझा किए। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री एम. जे. अकबर को अक्टूबर 2018 में इस्तीफ़ा देना पड़ा। उन्होंने पत्रकार प्रिया रमानी पर मानहानि का मुकदमा किया, जिसमें अदालत ने फरवरी 2021 में रमानी को बरी करते हुए यह स्वीकार किया कि यौन उत्पीड़न की पीड़िताओं को अपनी बात कहने का अधिकार है, भले वह वर्षों बाद क्यों न हो। #MeToo ने एक बड़ी बात दिखाई कि चुप्पी की संस्कृति टूट सकती है। पर उसकी सीमा भी स्पष्ट थी: उसमें मुखर होने की सुविधा मुख्यतः शहरी, शिक्षित और अंग्रेज़ी बोलने वाली स्त्रियों के पास थी, और अनौपचारिक क्षेत्र की स्त्रियों तक उसकी पहुँच कम रही।

इसके बाद के वर्षों में शक्ति और जवाबदेही के प्रश्न और तीखे हुए। 2023 में महिला पहलवानों ने भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष पर यौन उत्पीड़न के आरोपों को लेकर जंतर मंतर पर धरना दिया, और उनके मार्च के दौरान पुलिस के व्यवहार ने भी सवाल खड़े किए। अगस्त 2024 में कोलकाता के आर. जी. कर मेडिकल कॉलेज में एक प्रशिक्षु महिला चिकित्सक की बलात्कार और हत्या के बाद “रात को वापस लो” के नाम से लाखों स्त्रियाँ रात में सड़कों पर उतरीं। जनवरी 2025 में अदालत ने मुख्य आरोपी को आजीवन कारावास की सज़ा दी, और सर्वोच्च न्यायालय ने चिकित्सा कर्मियों की सुरक्षा के लिए एक राष्ट्रीय कार्यबल भी बनाया। इन सभी मामलों में एक समान सूत्र यह रहा कि जब आरोपी शक्तिशाली हो, तो न्याय की राह और कठिन हो जाती है।

सड़क, शहर और देह: “सार्वजनिक स्थान” पर अधिकार की माँग

नारीवादी आंदोलन का एक महत्त्वपूर्ण नया आयाम यह रहा कि उसने स्त्री की सुरक्षा के विचार को ही बदलने की कोशिश की। परंपरागत सोच कहती है कि स्त्री खतरे में है, इसलिए उसे बचाना है, और बचाने का अर्थ है उसे घर में रखना। नया तर्क कहता है कि स्त्री को जोखिम उठाने और आनंद लेने का अधिकार है, और शहर को उसके लिए सुरक्षित बनाना राज्य की ज़िम्मेदारी है।

  1. पिंक चड्डी अभियान (2009): मंगलुरु के एक पब में स्त्रियों पर हमले के विरोध में हज़ारों गुलाबी अंतःवस्त्र भेजकर विरोध किया गया। यह नैतिक पहरेदारी के प्रति हास्य और चुनौती का स्वर था।
  2. बेशर्मी मोर्चा (2011): “स्लटवॉक” की तर्ज़ पर दिल्ली में निकला मार्च, जिसका संदेश था कि स्त्री का पहनावा हिंसा का बहाना नहीं हो सकता।
  3. “घूमने का अधिकार”: शिल्पा फड़के और उनके साथियों के शोध ने तर्क दिया कि स्त्रियों को सार्वजनिक जगह पर बेवजह घूमने, बैठने और समय बिताने का भी अधिकार है, केवल “काम से आने-जाने” का नहीं।
  4. पिंजरा तोड़ (2015) और हैप्पी टू ब्लीड (2015): छात्रावासों के भेदभावपूर्ण कर्फ़्यू और मासिक धर्म के कारण मंदिर प्रवेश पर रोक के विरुद्ध अभियान।

सबरीमला (2018): सर्वोच्च न्यायालय ने 4:1 के बहुमत से सभी आयु की स्त्रियों को प्रवेश का अधिकार दिया। पर इस निर्णय का विरोध केवल पुरुषों ने नहीं किया, बड़ी संख्या में स्त्री श्रद्धालु भी सड़कों पर उतरीं। जनवरी 2019 में केरल में लाखों स्त्रियों की “महिला दीवार” बनी, जो समानता के पक्ष में थी। यह प्रकरण याद दिलाता है कि स्त्रियाँ एकरूप समूह नहीं हैं, और पितृसत्ता से लड़ाई में स्त्रियों के बीच भी वैचारिक मतभेद होंगे। 2019 में समीक्षा याचिकाएँ बड़ी पीठ को सौंपी गईं।

शाहीन बाग़ (दिसंबर 2019 से मार्च 2020): नागरिकता कानून के विरुद्ध दिल्ली में महीनों चले इस धरने की अगुआई बुज़ुर्ग मुस्लिम स्त्रियों ने की, जिन्हें लोग “दादियाँ” कहने लगे। यह इस बात का प्रमाण था कि “घर की चारदीवारी” में कैद मानी जाने वाली स्त्रियाँ लोकतांत्रिक विरोध की अग्रिम पंक्ति में खड़ी हो सकती हैं।

और अब दिल्ली विश्वविद्यालय की वे छात्राएँ, जिनसे यह लेख शुरू हुआ था। वे इसी परंपरा की अगली कड़ी हैं। उनका सवाल कि सुरक्षा के नाम पर पाबंदी स्त्री पर ही क्यों, पिंजरा तोड़ से लेकर “रात को वापस लो” तक की ही आवाज़ है।

डिजिटल युग: नई जगह, नई चुनौती

सोशल मीडिया ने आंदोलनों के लिए एक नया मंच दिया। निर्भया के समय से लेकर #MeToo और आज के प्रदर्शनों तक, हैशटैग, लाइव वीडियो और ऑनलाइन याचिकाओं ने स्थानीय घटनाओं को राष्ट्रीय बहस बनाया। हाशिये की स्त्रियों को भी, जिन्हें मुख्यधारा का मीडिया जगह नहीं देता, अपनी बात कहने का रास्ता मिला।

पर यही मंच हिंसा का नया क्षेत्र भी बना:

ऑनलाइन ट्रोलिंग, धमकी, निजी तस्वीरों का दुरुपयोग और पीछा करना।

2021 के “सुल्ली डील्स” और 2022 के “बुल्ली बाई” जैसे ऐप, जिनमें मुस्लिम स्त्रियों की तस्वीरें उनकी सहमति के बिना “नीलामी” के लिए डाली गईं। यह स्त्री-विरोध और सांप्रदायिक घृणा का मिलाजुला रूप था।

कृत्रिम बुद्धि से बनी फ़र्ज़ी (डीपफ़ेक) तस्वीरें और वीडियो, जो स्त्रियों की छवि और प्रतिष्ठा को निशाना बनाते हैं।

सोशल मीडिया पर “मर्दानगी” की विषैली संस्कृति बेचने वाले प्रभावशाली व्यक्तियों का उभार, जो नारीवाद को पुरुष-विरोधी साज़िश बताते हैं और युवाओं में स्त्री-द्वेष को लोकप्रिय बनाते हैं।

इसलिए आज का नारीवादी संघर्ष केवल सड़क और अदालत का नहीं, डिजिटल सुरक्षा, डेटा गोपनीयता और प्लेटफ़ॉर्म की जवाबदेही का भी है।

आज की तस्वीर: आँकड़ों में आईना

इन सब उपलब्धियों के बाद भी आँकड़े अलग तस्वीर दिखाते हैं:

विश्व आर्थिक मंच की 2026 की वैश्विक लैंगिक अंतराल रिपोर्ट में भारत 145 देशों में 131वें स्थान पर रहा और उसने अपने लैंगिक अंतराल का लगभग 64.5 प्रतिशत हिस्सा पाटा है। आर्थिक भागीदारी और अवसर में यह स्कोर केवल 41.2 प्रतिशत है, जबकि शिक्षा में 96.6 प्रतिशत। यानी लड़कियाँ पढ़ तो रही हैं, पर शिक्षा रोज़गार और नेतृत्व में नहीं बदल रही। पेशेवर पदों पर समानता लगभग आधी है, पर वरिष्ठ पदों पर मात्र 13.1 प्रतिशत।

आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण 2025 में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर 40.0 प्रतिशत रही, जबकि पुरुषों की 79.1 प्रतिशत। इसमें ग्रामीण स्त्रियों की भागीदारी अधिक है, पर कई विश्लेषक इसे सशक्तिकरण से ज़्यादा घरेलू आय की मजबूरी का संकेत मानते हैं।

समय उपयोग सर्वेक्षण (2019) में स्त्रियाँ प्रतिदिन औसतन लगभग 299 मिनट अवैतनिक घरेलू काम में लगाती थीं, जबकि पुरुष लगभग 97 मिनट। यह वह श्रम है जिसे अर्थव्यवस्था “काम” नहीं गिनती।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2023 में महिलाओं के विरुद्ध अपराध के 4,48,211 मामले दर्ज हुए। अदालतों में लंबित मामलों और कम दोषसिद्धि दर का मतलब यह है कि कानून होने के बावजूद न्याय की राह लंबी है।

लोकसभा में महिलाएँ लगभग चौदह प्रतिशत हैं।

पितृसत्ता का दोहरा चेहरा: स्त्रियों के संबंध में

अब हम उस प्रश्न पर आते हैं जो इस पूरे लेख का केंद्र है: पितृसत्ता केवल पुरुषों की नहीं है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019-21) में लगभग 45 प्रतिशत स्त्रियों और 44 प्रतिशत पुरुषों ने कहा कि पति का पत्नी को पीटना कम से कम एक कारण से उचित है, जैसे घर से बिना बताए निकलना, घर या बच्चों की उपेक्षा, बहस करना, सास-ससुर का अनादर, खाना ठीक से न बनाना या बेवफ़ाई का संदेह। पिछले सर्वेक्षण में यह आँकड़ा स्त्रियों में 52 प्रतिशत और पुरुषों में 42 प्रतिशत था।

यानी स्त्रियों में स्वीकार्यता घटी है, पर पुरुषों में थोड़ी बढ़ी है। सर्वेक्षण में एक और बात दिखी कि स्त्रियों में यह सोच उम्र के साथ बढ़ती है, जबकि पुरुषों में थोड़ी कम होती है।

इसे समझाने के लिए कंदियोटी का “पितृसत्तात्मक सौदा” और बूर्दियो की “प्रतीकात्मक हिंसा” याद कीजिए, जिनकी चर्चा हमने पहले भाग में की थी। जब स्त्री को बचपन से सिखाया जाता है कि “अच्छी बेटी, अच्छी बहू” वही है जो सहती है, तो उस सीख को तोड़ना उसके लिए अपनी पूरी पहचान को चुनौती देना बन जाता है। यह सोच अनेक रूपों में दिखती है:

  • बेटे की चाह और बेटी की उपेक्षा: कई परिवारों में दादी, माँ और सास, पुरुषों से भी ज़्यादा, बेटे की चाह और बेटी के भेदभाव को आगे बढ़ाती हैं।
  • सास-बहू का पदानुक्रम: जिस स्त्री ने बहू के रूप में दमन झेला, वह सास बनकर उसी व्यवस्था की संरक्षक बन जाती है, और उसे वह अपनी “कमाई हुई सत्ता” की तरह देखती है।
  • दहेज का समर्थन: अनेक परिवारों में स्त्रियाँ ही दहेज की माँग और लेन-देन की सक्रिय भागीदार हैं।
  • दूसरी स्त्रियों की निगरानी: पहनावे, देर रात बाहर रहने, बाहर काम करने या पति से असहमत होने पर स्त्रियाँ ही स्त्रियों का चरित्र आँकती हैं।
  • “त्याग” का महिमामंडन: स्त्री की अपनी इच्छाओं की अनदेखी को गुण बताना, और सेवा को ही उसका स्वाभाविक धर्म मानना।

यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि ऐसी स्त्रियों को “दोषी” ठहराना समाजशास्त्रीय दृष्टि से ग़लत होगा। वे अक्सर अपने सीमित विकल्पों में सबसे सुरक्षित रास्ता चुन रही होती हैं। इसीलिए इस सोच से लड़ाई दोषारोपण से नहीं, चेतना-निर्माण से जीती जाती है। इसके कुछ व्यावहारिक रास्ते रहे हैं:

  • सामूहिक संवाद: महिला समाख्या, स्वयं सहायता समूह और कुटुंबश्री जैसे मंच जहाँ स्त्रियाँ अपने अनुभव साझा करती हैं। जब एक स्त्री देखती है कि उसकी पीड़ा अकेली नहीं, तो उसके भीतर बदलाव का साहस आता है।
  • आर्थिक स्वतंत्रता: अपने नाम पर संपत्ति, खाता और आय स्त्री की सौदेबाज़ी की क्षमता बढ़ाती है।
  • शिक्षा और रोल मॉडल: लड़कियों को ऐसे उदाहरण देखने को मिलना जो पारंपरिक भूमिकाओं के बाहर सफल हुईं।
  • माताओं के साथ काम: परिवर्तन तब गहरा होता है जब माँ अपनी बेटी और बेटे, दोनों की परवरिश में समानता का भाव लाती है।

पितृसत्ता का दोहरा चेहरा:पुरुषों के संबंध में

पितृसत्ता का दूसरा चेहरा पुरुष की परवरिश और उसकी अपेक्षित भूमिका में है। आर. डब्ल्यू. कॉनेल ने “वर्चस्वशाली पुरुषत्व” की अवधारणा दी, यानी मर्दानगी का वह आदर्श रूप जो समाज में प्रभावी माना जाता है: कठोर, भावनाहीन, कमाने वाला, शक्तिशाली, निर्णय लेने वाला। इस आदर्श पर खरा न उतरने वाला पुरुष स्वयं “कम मर्द” माना जाता है, और इसी डर से वह अपनी असली भावनाओं को दबाता है और कई बार हिंसा से अपनी “मर्दानगी” साबित करता है।

इस सोच की क़ीमत पुरुषों को भी चुकानी पड़ती है:

  • भावनाएँ व्यक्त करने की मनाही (“मर्द को दर्द नहीं होता”), जिससे अकेलापन और मानसिक दबाव बढ़ता है।
  • कमाने वाले की भूमिका का बोझ, जिसमें नौकरी या आय खोना पहचान का संकट बन जाता है।
  • आत्महत्या की ऊँची दर: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़ों में आत्महत्या करने वालों में पुरुषों की हिस्सेदारी सत्तर प्रतिशत से अधिक रहती है। यह एक गंभीर सामाजिक चिंता है।
  • पारिवारिक और भावनात्मक संबंधों में दूरी, क्योंकि “देखभाल” को स्त्री का काम माना गया।

कमला भसीन बार-बार कहती थीं कि पितृसत्ता से मुक्ति पुरुषों की भी ज़रूरत है। बेल हुक्स ने भी नारीवाद को ऐसा आंदोलन कहा जो यौनवाद, यौनवादी शोषण और उत्पीड़न को समाप्त करना चाहता है, और जो सबके लिए है।

भारत में इस दिशा में पहल भी हुई है। “यारी-दोस्ती” जैसे कार्यक्रमों ने युवा पुरुषों के साथ स्वास्थ्य, रिश्तों और हिंसा पर संवाद किया, और विद्यालयों में “जेंडर समानता आंदोलन” जैसे प्रयासों ने लड़कों और लड़कियों को साथ बैठाकर रूढ़ियों पर बात की। इतिहास में भी पुरुष सहयोगी रहे हैं: फुले, आंबेडकर, राममोहन राय, विद्यासागर और पेरियार, जिन्होंने 1929 के सम्मेलन में स्त्रियों के संपत्ति अधिकार और विधवा पुनर्विवाह के प्रस्ताव रखे, और जिन्हें 1938 में महिलाओं के एक सम्मेलन ने “पेरियार” की उपाधि दी।

पुरुषों में बदलाव के कुछ ठोस रास्ते हैं:

  • परवरिश में बदलाव: लड़कों को घर के काम, देखभाल और भावनाओं की भाषा सिखाना।
  • साझा ज़िम्मेदारी: घरेलू श्रम, बच्चों की देखभाल और वृद्धों की सेवा में बराबर हिस्सा।
  • आसपास के व्यवहार को टोकना: दोस्तों के बीच स्त्री-विरोधी चुटकुलों, पीछा करने या छेड़छाड़ पर चुप न रहना।
  • पितृत्व अवकाश और कार्यस्थल की नीतियाँ: जिनसे देखभाल को “सबका काम” माना जाए।

“पुरुष आयोग” और धारा 498A: बहस का संतुलित पाठ

इसी संदर्भ में हाल के वर्षों में एक और बहस ज़ोर पकड़ती रही है: क्या स्त्री-संरक्षण के कानूनों का दुरुपयोग होता है, और क्या पुरुषों के लिए भी अलग आयोग होना चाहिए? इस प्रश्न को न तो खारिज किया जाना चाहिए, न ही ज़रूरत से ज़्यादा बड़ा बनाया जाना चाहिए।

दुरुपयोग के पक्ष में दिए जाने वाले तर्क:

  • धारा 498A (अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 और 86) संज्ञेय और गैर-ज़मानती है, इसलिए झूठी शिकायत का असर गंभीर होता है, और कई मामलों में पति के पूरे परिवार को नामजद करने की प्रवृत्ति देखी गई।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने अर्नेश कुमार (2014) में स्वतः गिरफ़्तारी पर रोक लगाई, राजेश शर्मा (2017) में परिवार कल्याण समितियों का सुझाव दिया (जिसे 2018 में संशोधित किया गया), और दिसंबर 2024 में फिर चेताया कि वैवाहिक कलह में सभी रिश्तेदारों को फँसाने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए।
  • पुरुषों की आत्महत्या और मानसिक स्वास्थ्य पर पर्याप्त नीतिगत ध्यान नहीं।

इसके विपरीत तर्क:

कम दोषसिद्धि दर का मतलब अपने आप झूठा मुकदमा नहीं। उसके पीछे समझौते, गवाहों का पलटना, लंबी सुनवाई, कमज़ोर जाँच और सामाजिक दबाव भी कारण होते हैं।

घरेलू हिंसा के अधिकांश मामले दर्ज ही नहीं होते। सर्वेक्षण बताते हैं कि हिंसा झेलने वाली अधिकांश स्त्रियाँ कभी रिपोर्ट नहीं करतीं, इसलिए कानून के दुरुपयोग से बड़ी समस्या उसका अल्प-उपयोग है।

किसी कानून में दुरुपयोग के उदाहरण उसे निरस्त करने का आधार नहीं बनते, जाँच और न्याय-प्रक्रिया में सुधार का आधार बनते हैं।

एक और पहलू को अनदेखा नहीं करना चाहिए:

बलात्कार का कानून लिंग-विशिष्ट है, और नई भारतीय न्याय संहिता में अप्राकृतिक यौन अपराधों की पुरानी धारा 377 जैसा कोई प्रावधान नहीं रखा गया, जिससे पुरुष और ट्रांस पीड़ितों के लिए कानूनी सुरक्षा का खाली स्थान बन गया। यहाँ पुरुषों की एक वास्तविक माँग जायज़ है, और यह नारीवादी दृष्टि के विरुद्ध भी नहीं।

निष्कर्ष यह है कि दुरुपयोग रोकने के लिए जाँच और न्यायिक प्रक्रिया को सुधारना, और सभी पीड़ितों के लिए उपयुक्त सुरक्षा बनाना, दोनों साथ चल सकते हैं। पर स्त्री-संरक्षण के कानूनों को कमज़ोर करने या स्त्री-विरोधी माहौल बनाने के लिए इस बहस का उपयोग करना पितृसत्ता का ही नया रूप होगा।

आलोचनाएँ और आगे की राह

आज का नारीवादी आंदोलन स्वयं कुछ गंभीर आलोचनाओं का सामना कर रहा है, और उसकी परिपक्वता इसी में है कि वह इन्हें सुने:

  1. “पश्चिम से आयातित”: इसका उत्तर इतिहास देता है: भक्ति कवयित्रियों से लेकर ताराबाई शिंदे और रोकेया तक, भारतीय स्त्री-चेतना की अपनी जड़ें हैं।
  2. वर्ग और जाति का पूर्वाग्रह: यह आलोचना सही रही है और दलित-बहुजन तथा श्रमिक वर्ग की स्त्रियों के नेतृत्व ने इसे सुधारा है।
  3. दंडवादी रुझान: केवल कठोर सज़ा पर निर्भरता, और समाज में बदलाव की उपेक्षा।
  4. एनजीओ-करण: आंदोलन का परियोजना-केंद्रित हो जाना।
  5. प्रतिक्रिया (बैकलैश): सोशल मीडिया और राजनीति में नारीवाद को “पारिवारिक मूल्यों” के विरुद्ध दिखाने की कोशिशें।

आगे के लिए कुछ प्राथमिकताएँ स्पष्ट दिखती हैं:

  • वैवाहिक बलात्कार पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय और उसके बाद का विधायी अनुपालन।
  • महिला आरक्षण का वास्तविक क्रियान्वयन, साथ में जाति के आधार पर प्रतिनिधित्व का प्रश्न।
  • देखभाल अर्थव्यवस्था की मान्यता: अवैतनिक घरेलू श्रम को आँकड़ों और नीति में गिनना।
  • सुरक्षित सार्वजनिक स्थान, परिवहन और कार्यस्थल, और डिजिटल सुरक्षा।
  • न्याय व्यवस्था में सुधार: त्वरित सुनवाई, संवेदनशील पुलिस और पीड़ितों के लिए सहायता।
  • शिक्षा में जेंडर संवेदनशीलता, विशेषकर लड़कों के लिए।
  • हाशिये की स्त्रियों, ट्रांस और क्वीयर समुदाय की आवाज़ को केंद्र में रखना।

निष्कर्ष: पितृसत्ता को “तोड़ने” का अर्थ

इस लेख की शुरुआत दिल्ली की उन छात्राओं से हुई थी जिन्होंने तख्तियों पर पितृसत्ता के पतन की बात लिखी। अब हम समझ सकते हैं कि “पितृसत्ता को तोड़ो” का नारा केवल गुस्से की भाषा नहीं है। यह उस लंबे इतिहास का सार है जो सावित्रीबाई के स्कूल से शुरू होकर भँवरी देवी के साहस, मथुरा की लड़ाई, निर्भया के प्रदर्शनों और आज के छात्र-आंदोलनों तक पहुँचा है।

दो भागों में फैली इस यात्रा से तीन निष्कर्ष निकलते हैं। पहला, पितृसत्ता एक व्यवस्था है, इसलिए उसे एक कानून या एक घटना से नहीं तोड़ा जा सकता। वह कानून, अर्थव्यवस्था, संस्कृति, हिंसा और रोज़मर्रा के व्यवहार, सभी स्तरों पर बदलाव माँगती है। दूसरा, यह लड़ाई केवल पुरुष बनाम स्त्री की नहीं है। उसका एक बड़ा हिस्सा हमारे अपने भीतर, माँओं और सासों की सीख में, पिताओं और बेटों की मर्दानगी की धारणाओं में, लड़ा जाना है। तीसरा, इस आंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति उसकी आत्म-आलोचना रही है: दलित, मुस्लिम, आदिवासी और क्वीयर आवाज़ों ने उसे लगातार और ईमानदार बनाया है।

जब तक किसी स्त्री को सुरक्षा के नाम पर घर में कैद रहना पड़े, जब तक विवाह में उसकी सहमति कानून की नज़र में अप्रासंगिक हो, जब तक उसका अनदेखा श्रम “काम” न गिना जाए और जब तक कोई पुरुष अपनी भावनाओं को “कमज़ोरी” समझकर दबाए, यह यात्रा अधूरी है। और शायद इसी अधूरेपन में वह निमंत्रण है जो हर पीढ़ी को मिलता है: इसे आगे बढ़ाने का।

संदर्भ और स्रोत

पुस्तकें, शोध और सैद्धांतिक स्रोत

  1. क्रेनशॉ, “डिमार्जिनलाइज़िंग द इंटरसेक्शन ऑफ़ रेस एंड सेक्स” (1989)
  2. आर. डब्ल्यू. कॉनेल, मैस्क्युलिनिटीज़ (1995)
  3. बेल हुक्स, फ़ेमिनिज़्म इज़ फ़ॉर एवरीबॉडी (2000)
  4. कमला भसीन, व्हाट इज़ पैट्रियार्की? (काली फ़ॉर वीमेन, 1993)
  5. देनिज़ कंदियोटी, “बारगेनिंग विद पैट्रियार्की”, जेंडर एंड सोसाइटी (1988); पियरे बूर्दियो, मैस्क्युलिन डॉमिनेशन (1998)
  6. बीना अग्रवाल, अ फ़ील्ड ऑफ़ वन’स ओन: जेंडर एंड लैंड राइट्स इन साउथ एशिया (1994)
  7. निवेदिता मेनन, सीइंग लाइक अ फ़ेमिनिस्ट (पेंगुइन, 2012)
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  9. शिल्पा फड़के, समीरा खान और शिल्पा रानाडे, व्हाई लॉइटर? वुमन एंड रिस्क ऑन मुंबई स्ट्रीट्स (2011)
  10. राघवेंद्र चट्टोपाध्याय और एस्थर डुफ्लो, “वुमन एज़ पॉलिसी मेकर्स”, इकोनोमेट्रिका (2004); बीमन आदि, “पावरफ़ुल वुमन: डज़ एक्सपोज़र रिड्यूस बायस?”, क्वार्टरली जर्नल ऑफ़ इकोनॉमिक्स (2009)
  11. शर्मिला रेगे, राइटिंग कास्ट, राइटिंग जेंडर (ज़ुबान, 2006); बेबी कांबळे, जीणं आमुचं; उर्मिला पवार, आयदान
  12. राधा कुमार, द हिस्ट्री ऑफ़ डूइंग (काली फ़ॉर वीमेन, 1993) (भाग 1 के संदर्भ भी इसी क्रम में लागू)

कानून, न्यायिक निर्णय और समितियाँ

13. भारत का संविधान (73वाँ, 74वाँ और 106वाँ संशोधन)

14. विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (सर्वोच्च न्यायालय, 1997); कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013

15. घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005; हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005; विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020)

16. वर्मा समिति रिपोर्ट (जनवरी 2013); आपराधिक विधि (संशोधन) अधिनियम, 2013 और 2018

17. शायरा बानो बनाम भारत संघ (2017); मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019

18. जोसेफ़ शाइन बनाम भारत संघ (2018); नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ (2018); नालसा बनाम भारत संघ (2014); इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल राज्य (सबरीमला, 2018)

19. अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014); राजेश शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2017); सोशल एक्शन फ़ोरम फ़ॉर मानव अधिकार बनाम भारत संघ (2018); दारा लक्ष्मी नारायण बनाम तेलंगाना राज्य (दिसंबर 2024)

20. बिलकीस याकूब रसूल बनाम भारत संघ (जनवरी 2024)

21. भारतीय न्याय संहिता, 2023 (धारा 63, 85, 86)

सर्वेक्षण और आँकड़े

22. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 (2015-16) और सर्वेक्षण-5 (2019-21), अंतर्राष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान एवं स्वास्थ्य मंत्रालय

23. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो, क्राइम इन इंडिया 2023

24. विश्व आर्थिक मंच, ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2026 (सितंबर 2026)

25. राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय, आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण, वार्षिक रिपोर्ट 2025; समय उपयोग सर्वेक्षण 2019

26. जनगणना 2011 (बाल लिंगानुपात)

समाचार और विश्लेषण (2026)

27. द वायर, 17 अप्रैल 2026, “Major setback: Modi govt’s constitution amendment bill on delimitation fails in Lok Sabha”

28. साउथ फ़र्स्ट, 17 अप्रैल 2026, “Lok Sabha defeats Constitution (131st Amendment) Bill”

29. डाउन टू अर्थ, “Women’s Reservation Act: How India is amending its own amendment”

30. आउटलुक इंडिया, “Explained: Why Women’s Legislative Reservation Remains Pending Despite Constitutional Approval”

31. बार एंड बेंच तथा द पायनियर, सितंबर 2026, वैवाहिक बलात्कार अपवाद पर सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई की रिपोर्टें

32. द प्रिंट, 16-18 सितंबर 2026, “Global gender gap at its narrowest in 20 years but parity still 120 years away. India in bottom 15”

33. वनइंडिया, स्टेट्समैन और मकतूब मीडिया (29-30 सितंबर 2026), दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्राओं के प्रदर्शन पर रिपोर्टें

34. बूमलाइव, द न्यूज़ मिनट और फ़ैक्टचेकर, NFHS-5 के घरेलू हिंसा संबंधी दृष्टिकोण पर विश्लेषण


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