सितंबर 2026 के अंतिम सप्ताह में दिल्ली विश्वविद्यालय के उत्तरी परिसर की सड़कों पर कुछ ऐसा दिखा जो नारों से कहीं आगे की बात कह रहा था। बारिश के बीच लेडी श्रीराम, मिरांडा हाउस, गार्गी और कमला नेहरू जैसे महिला महाविद्यालयों की सैकड़ों छात्राएँ मार्च करती हुई निकलीं। उनकी नाराज़गी दिल्ली के एक पार्क में एक सत्रह वर्षीय किशोरी के साथ हुए कथित सामूहिक दुष्कर्म से थी। यह घटना ऐसे समय आई जब बिहार के जमुई और समस्तीपुर से नाबालिगों के साथ छेड़छाड़ की खबरें भी आ रही थीं। पर आक्रोश केवल एक अपराध तक सीमित नहीं था। छात्राएँ उस पूरे तर्क पर सवाल उठा रही थीं जिसमें हिंसा का भय दिखाकर स्त्री को घर में बंद रहने, जल्दी लौटने और अपनी आवाजाही सीमित करने की सलाह दी जाती है।
“हम औरतें आज़ाद हैं” नाम के इस मार्च में आयोजकों के आग्रह पर केवल महिलाएँ और क्वीयर विद्यार्थी शामिल हुए। तख्तियों पर लिखा था: “Abort Patriarchy”, “बस बहुत हो गया”, “My favourite season is the fall of patriarchy”, और “बड़े बड़े शहरों में ऐसी छोटी सोच नहीं चलेगी”। इन प्रदर्शनों की एक विशेषता यह रही कि उनमें व्यंग्य, हास्य और रोज़मर्रा की दिल्ली की बोली खुलकर इस्तेमाल हुई। रिपोर्टों के अनुसार यह हाल के वर्षों में दिल्ली विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी छात्र-नेतृत्व वाली लामबंदियों में से एक बन गया।
एक समाजशास्त्री के लिए इन तख्तियों में दो बातें दिलचस्प हैं। पहली, इनकी भाषा। पितृसत्ता को मिटाने, तोड़ने, उसका गर्भपात करने जैसे शब्द एक पीढ़ी के गुस्से और आत्मविश्वास दोनों को दिखाते हैं। दूसरी बात यह कि यह भाषा नई होते हुए भी पुरानी है। गेल ऑमवेट ने 1980 में भारतीय स्त्रियों के संघर्ष पर जो पुस्तक लिखी, उसका शीर्षक ही था “हम इस कारागार को तोड़ डालेंगे”। यानी नारा चार दशक पहले भी लग रहा था। आज उसका फिर से लगना बताता है कि सड़क पर उतरी स्त्री पीढ़ियों के संघर्ष की उत्तराधिकारी भी है और उसकी अधूरी लड़ाई की वारिस भी।
आँकड़े इस बेचैनी की गवाही देते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की ‘क्राइम इन इंडिया 2023’ रिपोर्ट के अनुसार उस वर्ष देश में महिलाओं के विरुद्ध अपराध के 4,48,211 मामले दर्ज हुए, जो 2022 के 4,45,256 और 2021 के 4,28,278 से अधिक थे। इनमें पति या ससुराल पक्ष की क्रूरता के मामले सबसे अधिक थे (1,33,676), फिर अपहरण (88,605) और लज्जा भंग के इरादे से हमले (83,891)। बलात्कार के 29,670 मामले दर्ज हुए। यह भी याद रखना चाहिए कि ये केवल पंजीकृत मामले हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019-21) में लगभग 29 प्रतिशत विवाहित महिलाओं ने जीवन में कभी न कभी पति या ससुराल पक्ष की हिंसा झेलने की बात बताई, और सर्वेक्षण यह भी दिखाते रहे हैं कि हिंसा झेलने वाली अधिकांश महिलाएँ किसी से मदद तक नहीं माँगतीं। चुप्पी ही इस पूरी व्यवस्था की सबसे बड़ी सहयोगी है।
यह लेख दो भागों में है। इस पहले भाग में हम पितृसत्ता की अवधारणा को समझेंगे और देखेंगे कि भारत में स्त्री प्रश्न उन्नीसवीं सदी के सुधार आंदोलनों से कैसे उठा, राष्ट्रीय आंदोलन में उसने क्या रूप लिया, स्वतंत्रता के बाद संविधान ने क्या वादा किया, और 1970 तथा 1980 के दशकों में स्वायत्त महिला आंदोलन ने उस वादे और यथार्थ के बीच की खाई को कैसे चुनौती दी। दूसरे भाग में हम 1990 के बाद के भारत, दलित और बहुजन स्त्रीवाद की चुनौती, निर्भया से #MeToo तक के आंदोलनों, डिजिटल युग, और स्त्रियों तथा पुरुषों दोनों के भीतर बैठी पितृसत्तात्मक सोच के प्रतिरोध पर बात करेंगे। इस भाग के अंत में जो प्रश्न अधूरे रह जाएँगे, वे ही अगले भाग का आरंभ बनेंगे।
पितृसत्ता: शब्द नहीं, एक संरचना
आंदोलन की यात्रा समझने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि वह किसके विरुद्ध है। पितृसत्ता का शाब्दिक अर्थ है पिता का शासन, पर समाजशास्त्र में यह शब्द कहीं गहरा है। इसे किसी व्यक्ति, परिवार या पुरुष वर्ग से जोड़ देना भूल होगी। गर्डा लर्नर ने ऐतिहासिक शोध से दिखाया कि पितृसत्ता कोई शाश्वत या प्राकृतिक व्यवस्था नहीं है। यह हज़ारों वर्षों में, संपत्ति, विवाह, श्रम और यौनिकता पर नियंत्रण के सहारे गढ़ी गई है। जो गढ़ा गया है, उसे बदला भी जा सकता है, और नारीवादी राजनीति की पूरी संभावना इसी एक बात पर टिकी है।
केट मिलेट ने 1970 में इसी ओर ध्यान दिलाया कि स्त्री-पुरुष संबंध केवल निजी या भावनात्मक नहीं, मूलतः राजनीतिक हैं, क्योंकि उनमें सत्ता का असमान बँटवारा होता है। सिल्विया वॉल्बी ने इसे और व्यवस्थित किया और पितृसत्ता की छह परस्पर जुड़ी संरचनाएँ गिनाईं: घरेलू उत्पादन, वेतन आधारित श्रम, राज्य, पुरुषों की हिंसा, यौनिकता और संस्कृति। इस दृष्टि से पितृसत्ता कोई एक कानून या एक रिवाज़ नहीं है, कई खंभों पर टिका एक ढाँचा है। अगर एक खंभा गिरे तो दूसरा बोझ संभाल लेता है, इसीलिए कानून बदलने से सामाजिक व्यवहार तुरंत नहीं बदल जाता।
भारतीय संदर्भ में इस विमर्श में दो और आयाम जुड़ते हैं। पहला है उमा चक्रवर्ती की “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” की अवधारणा। उनका तर्क है कि भारत में जाति की व्यवस्था स्त्री की यौनिकता और विवाह पर नियंत्रण के बिना टिक ही नहीं सकती। सजातीय विवाह, अंतरजातीय संबंधों का कठोर दंड, विधवा के लिए कठिन नियम और “इज़्ज़त” की पूरी धारणा, ये सब जाति की शुद्धता बचाने के उपकरण हैं।
डॉ. आंबेडकर ने 1916 में कोलंबिया विश्वविद्यालय में पढ़े अपने शोधपत्र में लगभग यही कहा था कि जाति का तंत्र सजातीय विवाह पर टिका है और उसे बनाए रखने के लिए स्त्री पर नियंत्रण अनिवार्य है। इसलिए भारत में जाति और जेंडर को अलग-अलग देखना अधूरी दृष्टि है। यही बात आगे चलकर दलित नारीवादी आलोचना का आधार बनी।
दूसरा आयाम यह प्रश्न है कि स्त्रियाँ स्वयं इस व्यवस्था में सहभागी क्यों दिखती हैं। देनिज़ कंदियोटी ने इसे “पितृसत्तात्मक सौदा” कहा। दक्षिण एशिया जैसे समाजों में स्त्री को सुरक्षा, भरण-पोषण और सामाजिक मान्यता का आश्वासन मिलता है, और उसके बदले आज्ञाकारिता, सेवा और परिवार की मर्यादा निभाने की अपेक्षा रहती है। इस सौदे का सबसे पेचीदा पहलू यह है कि जो स्त्री युवावस्था में बहू बनकर दबी रही, वही आगे चलकर सास बनकर सत्ता पाती है। इसलिए वह सौदे को बदलने के बजाय निभाने में अपना हित देखने लगती है। पियरे बूर्दियो इसे “प्रतीकात्मक हिंसा” कहते हैं, जहाँ शोषित व्यक्ति उसी दृष्टि को अपना लेता है जो उसे कमतर ठहराती है, और उसे यह अन्याय नहीं, स्वाभाविक व्यवस्था लगने लगती है। कमला भसीन ने भारतीय संदर्भ में बार-बार यही समझाया कि पितृसत्ता पुरुष नहीं, एक विचारधारा और व्यवस्था है। उसमें पुरुष भी अपनी तरह से कसे जाते हैं: कमाने का दबाव, भावनाएँ दबाने की अपेक्षा, मर्दानगी साबित करने की होड़। यह समझ हमें लेख के दूसरे भाग में बहुत काम आएगी, क्योंकि पितृसत्ता का प्रतिरोध केवल पुरुष के विरुद्ध नहीं, पुरुष और स्त्री दोनों के साथ मिलकर किया जाने वाला काम है।
परंपराओं में दोहरी विरासत
भारतीय इतिहास को देखें तो स्त्री के सवाल पर दोनों तरह की परंपराएँ मिलती हैं। एक ओर मनुस्मृति का वह प्रसिद्ध सूत्र है जो कहता है कि स्त्री बचपन में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र के संरक्षण में रहे और स्वतंत्रता की अधिकारी नहीं है। दूसरी ओर वैदिक काल की गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियाँ हैं जो शास्त्रार्थ में बैठती थीं, बौद्ध भिक्षुणियों की रचनाओं का संग्रह थेरीगाथा है जिसमें स्त्रियाँ अपने मुक्ति के अनुभव को स्वर देती हैं, और भक्ति आंदोलन की वे स्त्री कवयित्रियाँ हैं जिन्होंने परिवार, जाति और समाज की सीमाओं को तोड़ा: कश्मीर की ललद्यद, कर्नाटक की अक्क महादेवी, महाराष्ट्र की मुक्ताबाई और जनाबाई, राजस्थान की मीराबाई। मीरा का गृहत्याग और अक्क महादेवी का वस्त्र त्यागकर शिव की खोज में निकल जाना, दोनों अपने समय की पितृसत्तात्मक मर्यादाओं के विरुद्ध सीधे विद्रोह थे, भले ही उन्होंने उसे भक्ति की भाषा में कहा।
इसका अर्थ यह नहीं कि आधुनिक नारीवाद पश्चिम से आयातित नहीं है, या पूरी तरह भारतीय परंपरा से निकला है। सच यह है कि भारत में स्त्री-चेतना की जड़ें दोनों स्थानों से पोषण लेती रही हैं: स्थानीय विद्रोह की परंपरा से भी और औपनिवेशिक आधुनिकता के साथ आए समानता के विचार से भी। जब आज आंदोलन पर “पश्चिमी” होने का आरोप लगता है, तो इतिहास का यह तथ्य एक सटीक उत्तर है।
सुधार युग: स्त्री प्रश्न का जन्म
उन्नीसवीं सदी में स्त्री का प्रश्न पहली बार व्यापक सार्वजनिक बहस बना। राजा राममोहन राय के लंबे अभियान के बाद 1829 में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगा, और ईश्वरचंद्र विद्यासागर के प्रयासों से 1856 में हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित हुआ। ये बड़े कदम थे, पर इस दौर की एक सीमा को भी समझना चाहिए। लता मणि ने सती पर बहस के औपनिवेशिक अभिलेखों का अध्ययन करके दिखाया कि इस पूरे विमर्श में स्वयं स्त्री की आवाज़ लगभग अनुपस्थित थी। बहस इस पर चल रही थी कि शास्त्र क्या कहते हैं और सुधारक क्या चाहते हैं। स्त्री एक विचार का मैदान बन गई थी, एक व्यक्ति के रूप में उसकी पीड़ा गौण हो गई थी। गायत्री स्पिवाक ने इसी संदर्भ में तीखा निष्कर्ष निकाला था कि औपनिवेशिक शासन ने अपने को भूरे पुरुषों से भूरी स्त्रियों को बचाने वाला उद्धारक बना लिया। यह टिप्पणी हमें सतर्क करती है कि स्त्री के अधिकार की भाषा का इस्तेमाल सत्ता अपने हित में भी कर सकती है।
फिर भी इसी युग में स्त्रियाँ स्वयं बोलने लगीं और उनकी आवाज़ बहुत प्रखर थी। ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले ने 1848 में पुणे में लड़कियों के लिए स्कूल खोला। सावित्रीबाई भारत की पहली महिला शिक्षिकाओं में गिनी जाती हैं, और इस काम में फ़ातिमा शेख़ उनकी निकट सहयोगी रहीं। कहा जाता है कि सावित्रीबाई स्कूल जाते समय अपने साथ एक अतिरिक्त साड़ी रखती थीं, क्योंकि रास्ते में उन पर कीचड़ और गोबर फेंका जाता था। एक स्त्री का पढ़ना-पढ़ाना ही उस समय का सबसे बड़ा विद्रोह था। फुले दंपति के लिए शिक्षा केवल स्त्री का सवाल नहीं थी, यह जाति और जेंडर दोनों के बंधन तोड़ने का साझा औज़ार थी।
ताराबाई शिंदे की पुस्तिका “स्त्री पुरुष तुलना” (1882) पितृसत्तात्मक पाखंड पर सीधा प्रहार थी। एक विधवा, विजयलक्ष्मी, पर शिशु हत्या के आरोप में चले मुकदमे और उस पर पुरुष समाज की प्रतिक्रिया ने उन्हें लिखने के लिए प्रेरित किया। ताराबाई ने सवाल उठाया कि जब पुरुष विवाहेतर संबंध बनाए तो समाज चुप रहता है, पर जब स्त्री वही करे तो उसे कलंकित और दंडित किया जाता है। इसे प्रायः भारत का पहला नारीवादी पाठ माना जाता है, और उसकी भाषा आज भी तीखेपन में सहज पढ़ी जा सकती है।
पंडिता रमाबाई ने द हाई-कास्ट हिंदू वुमन (1887) में उच्च जाति की विधवाओं और बाल वधुओं की स्थिति का तीखा चित्र खींचा और 1889 में शारदा सदन की स्थापना की, जहाँ विधवाओं और संकटग्रस्त स्त्रियों को शिक्षा और आश्रय मिला। उनके ईसाई धर्म अपनाने ने विवाद भी खड़ा किया, पर उनके काम की ऐतिहासिक महत्ता असंदिग्ध है। बंगाल में कादंबिनी बसु और चंद्रमुखी बसु ने 1883 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री पाई और वे ब्रिटिश साम्राज्य की पहली महिला स्नातकों में गिनी जाती हैं। आनंदीबाई जोशी ने 1886 में अमेरिका से चिकित्सा की डिग्री पाई। और बेगम रोकेया सखावत हुसैन ने 1905 में सुल्ताना का सपना लिखा, जिसमें एक ऐसी काल्पनिक दुनिया रची गई है जहाँ स्त्री-पुरुष की भूमिकाएँ उलट जाती हैं: स्त्रियाँ विज्ञान और शासन चलाती हैं और पुरुष घर में रहते हैं। उन्होंने 1909 में कलकत्ता में बालिकाओं का स्कूल भी शुरू किया। उस समय इस रचना को पढ़कर समझना कठिन नहीं कि पर्दा, शिक्षा और स्त्री के आत्मसम्मान पर उनकी सोच अपने युग से कितनी आगे थी।
इस युग की दो घटनाएँ बहुत कुछ बता देती हैं:
- पहली रुख़माबाई की कहानी है। उनका विवाह बचपन में हुआ था और वयस्क होने पर उन्होंने पति के साथ रहने से इनकार कर दिया। पति दादाजी भीकाजी ने “दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना” के लिए अदालत में मुकदमा किया (1884 से 1888)। अदालत ने उन्हें पति के साथ जाने या जेल भुगतने का विकल्प दिया, पर रुख़माबाई झुकीं नहीं। अंततः मामला समझौते से सुलझा, और वे आगे चलकर चिकित्सक बनीं।
- दूसरी घटना 1889 की है, जब दस वर्ष की बालिका फुलमोनी दासी की पति द्वारा ज़बरदस्ती संबंध बनाने से मृत्यु हो गई। इन घटनाओं के दबाव में 1891 में “सहमति की आयु अधिनियम” बना, जिसने सहमति की आयु दस से बढ़ाकर बारह वर्ष कर दी। सुधार का यह कदम भी बहुत छोटा था, और तब इसका विरोध बाल गंगाधर तिलक सहित कई नेताओं ने “धर्म में हस्तक्षेप” कहकर किया। यह द्वंद्व कि स्त्री का अधिकार बड़ा है या समाज की “परंपरा”, आज भी जीवित है।
राष्ट्रवाद और स्त्री: सम्मान भी, सीमा भी
बीसवीं सदी में स्त्री का प्रश्न राष्ट्रवाद के साथ जुड़ गया। पार्थ चटर्जी ने इस पर एक प्रभावशाली विश्लेषण दिया। उनके अनुसार राष्ट्रवादी विचारकों ने जीवन को दो क्षेत्रों में बाँट दिया: बाहरी, भौतिक, राजनीतिक जगत जहाँ औपनिवेशिक सत्ता से मुक़ाबला करने के लिए पश्चिमी तरीक़े अपनाए जा सकते थे, और भीतरी, आध्यात्मिक जगत जो घर, संस्कृति और परंपरा का था और उस पर अपना नियंत्रण बनाए रखना था।
स्त्री को इसी भीतरी क्षेत्र की रक्षक घोषित किया गया। इसने उसे सम्मान और प्रतिष्ठा तो दी, पर उसकी भूमिका को “संस्कृति की संरक्षिका” और “आदर्श गृहिणी” के दायरे में बाँध भी दिया। “नई स्त्री” पढ़ी-लिखी हो सकती थी, पर वह घर की मर्यादा के भीतर पढ़ी-लिखी होनी चाहिए थी।
इसके बावजूद इसी दौर में स्त्रियों के अपने संगठन खड़े हुए साथ ही महिलाएं कई संगठनों में शीर्ष भूमिका में थीं,जोकि निम्नलिखित हैं:
- 1917 में मद्रास में एनी बेसेंट, मार्गरेट कज़िन्स और डोरोथी जिनराजदासा ने महिला भारतीय संघ (WIA) की स्थापना की।
- 1925 में राष्ट्रीय महिला परिषद (NCWI) बनी और 1927 में पुणे में अखिल भारतीय महिला सम्मेलन (AIWC) का गठन हुआ। इनका एजेंडा शुरू में शिक्षा तक सीमित था, पर जल्द ही बाल विवाह, पर्दा, विधवा पुनर्विवाह और मताधिकार जैसे प्रश्नों तक फैल गया।
- 1917 में सरोजिनी नायडू और एनी बेसेंट के नेतृत्व में महिलाओं के प्रतिनिधिमंडल ने भारत मंत्री मांटेग्यू से मिलकर मताधिकार की माँग रखी।
- 1921 में मद्रास ने सबसे पहले संपत्तिधारक महिलाओं को मताधिकार दिया।
- 1925 में सरोजिनी नायडू कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष बनीं।
- 1929 का शारदा अधिनियम बाल विवाह पर रोक की दिशा में एक पड़ाव था, और 1937 के हिंदू महिला संपत्ति अधिकार अधिनियम (देशमुख अधिनियम) ने विधवाओं को संपत्ति में सीमित अधिकार दिए।
- 1931 के कराची अधिवेशन के मौलिक अधिकार प्रस्ताव में पहली बार स्पष्ट कहा गया कि जाति, पंथ और लिंग के भेद के बिना सब नागरिक कानून के सामने समान होंगे और वयस्क मताधिकार दिया जाएगा।
स्वतंत्रता संघर्ष में स्त्रियों की भागीदारी:
- प्रीतिलता वड्डेदार ने 1932 में चटगाँव में क्रांतिकारी कार्रवाई में प्राण दिए
- कल्पना दत्त चटगाँव शस्त्रागार कांड से जुड़ीं
- भीकाजी कामा ने विदेश में भारत का तिरंगा लहराया
- 1942 में अरुणा आसफ़ अली ने बंबई में तिरंगा फहराया और उषा मेहता ने भूमिगत रेडियो चलाया।
- आज़ाद हिंद फ़ौज में कैप्टन लक्ष्मी सहगल के नेतृत्व में रानी झाँसी रेजिमेंट बनी।
- बंगाल का तेभागा आंदोलन (1946-47) और तेलंगाना संघर्ष (1946-51) किसान स्त्रियों की भागीदारी के उदाहरण हैं। इला मित्रा जैसी महिलाएँ तेभागा की नेता बनकर उभरीं, और 1942 में बंगाल में महिला आत्मरक्षा समिति बनी।
महिलाओं के सशक्तिकरण में गांधी की भूमिका:
गांधी की भूमिका पर आज भी नारीवादी विद्वानों में मतभेद हैं। उन्होंने स्त्री को “अबला” कहे जाने का विरोध किया, कहा कि स्त्री को कमज़ोर कहना पुरुष का स्त्री के प्रति अन्याय है। नमक सत्याग्रह, शराब की दुकानों पर धरनों और असहयोग आंदोलन में उन्होंने लाखों स्त्रियों को पहली बार सार्वजनिक जीवन में उतारा। मधु किश्वर जैसी विद्वान इसे स्त्री के लिए सार्वजनिक वैधता के द्वार खुलने की तरह देखती हैं। दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि गांधी ने स्त्री की शक्ति को त्याग, सहनशीलता और मातृत्व के गुणों में ही परिभाषित किया और इस तरह परंपरागत छवि को ही नई वैधता दे दी। दोनों बातें सच हैं: दरवाज़ा खुला भी और चौखट पर शर्तें भी रहीं।
विभाजन के समय स्त्री की देह सांप्रदायिक “सम्मान” का मैदान बन गई। उर्वशी बुटालिया की द अदर साइड ऑफ़ साइलेंस और कमला भसीन तथा ऋतु मेनन की बॉर्डर्स एंड बाउंड्रीज़ ने दर्ज किया कि हज़ारों स्त्रियों का अपहरण और बलात्कार हुआ, और बाद में “बरामदगी” के नाम पर राज्य ने उन्हें उनकी इच्छा के बिना परिवारों में लौटाया, कई बार तब जब वे नए जीवन में बस चुकी थीं। जिन परिवारों ने “इज़्ज़त” के नाम पर अपनी ही बेटियों और बहनों की जान ले ली, उनके किस्से भी सामने आए।
यह उदाहरण दिखाता है कि पितृसत्ता का सबसे क्रूर रूप तब सामने आता है जब स्त्री की देह पर पूरे समुदाय का दावा हो जाए और उसकी अपनी इच्छा कोई मायने न रखे।
संविधान: समानता का वादा, यथार्थ की दूरी
स्वतंत्र भारत में स्त्रियों को पहले ही दिन से सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार मिला। यह उस समय के लिए असाधारण था, क्योंकि कई पश्चिमी लोकतंत्रों में स्त्रियों को मताधिकार दशकों के संघर्ष के बाद मिला था।
संविधान सभा में पंद्रह महिला सदस्य थीं, जिनमें हंसा मेहता, दुर्गाबाई देशमुख, राजकुमारी अमृत कौर, अम्मू स्वामीनाथन, रेणुका राय, बेगम ऐज़ाज़ रसूल और सुचेता कृपलानी जैसे नाम थे।
संविधान ने अनुच्छेद 14 में कानून के सामने समानता, अनुच्छेद 15(1) में लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध और अनुच्छेद 15(3) में स्त्रियों और बच्चों के लिए विशेष प्रावधानों की छूट दी। अनुच्छेद 16 ने सार्वजनिक रोज़गार में अवसर की समानता दी, अनुच्छेद 39 ने समान कार्य के लिए समान वेतन का निर्देश दिया और अनुच्छेद 42 ने मातृत्व सहायता का।
हिंदू कोड बिल की यात्रा ने शुरू में ही दिखा दिया कि कानूनी समानता की राह कितनी कठिन है। डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में तैयार इस विधेयक का संसद और बाहर तीव्र विरोध हुआ, और 1951 में आंबेडकर ने इसी मुद्दे पर मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। बाद में विधेयक कई टुकड़ों में आया: हिंदू विवाह अधिनियम 1955, और 1956 के हिंदू उत्तराधिकार, अल्पवयस्कता एवं संरक्षकता, तथा दत्तक एवं भरण-पोषण कानून। 1961 में दहेज निषेध अधिनियम बना।
सरकार ने 1953 में केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड बनाया, जिसकी अध्यक्ष दुर्गाबाई देशमुख रहीं। इस दौर को कुछ विद्वान “राज्य संचालित नारीवाद” भी कहते हैं, यानी स्त्री के उत्थान का एजेंडा मुख्यतः राज्य और उसकी संस्थाओं ने चलाया, और स्वतंत्र आंदोलन कुछ धीमा रहा। इसके पीछे एक भावना भी थी कि जब संविधान ने समानता दे दी है तो लड़ाई ख़त्म हो गई है।
पर यह धारणा जल्द ही टूट गई। 1971 में गठित और 1974 में प्रस्तुत “टुवर्ड्स इक्वालिटी” रिपोर्ट (समिति की अध्यक्ष फुलरेणु गुहा) ने देश को झटका दिया। रिपोर्ट के अनुसार प्रति हज़ार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या 1901 में 972 थी, जो 1971 तक गिरकर 930 रह गई थी।
स्त्री साक्षरता में सुधार तो हुआ था, पर पुरुषों से बहुत पीछे थी: 1951 में लगभग 9 प्रतिशत से बढ़कर 1971 में लगभग 22 प्रतिशत। महिलाओं की कार्य-सहभागिता घट रही थी और विकास की प्रक्रिया में उन्हें लगभग अनदेखा किया गया था। रिपोर्ट का निष्कर्ष था कि संवैधानिक समानता और व्यावहारिक यथार्थ के बीच की दूरी बहुत बड़ी है।
इसी रिपोर्ट ने महिला अध्ययन की नींव भी रखी, और छठी पंचवर्षीय योजना (1980-85) में पहली बार महिलाओं पर अलग अध्याय जुड़ा। यही रिपोर्ट आगे आने वाले आंदोलन की वैचारिक ज़मीन बनी।
1970 का दशक: स्वायत्त आंदोलन का उदय
राधा कुमार जैसी इतिहासकार 1970 के दशक को स्वायत्त महिला आंदोलन का आरंभिक काल मानती हैं। “स्वायत्त” का अर्थ यह था कि ये समूह किसी राजनीतिक दल की महिला शाखा नहीं थे। वे अपनी प्राथमिकताएँ स्वयं तय करते थे और अपना नेतृत्व स्वयं चुनते थे। इस दशक में कई धाराएँ एक साथ बहीं, जिनमें कुछ आर्थिक, कुछ पर्यावरणीय, कुछ हिंसा के प्रश्न से जुड़ी थीं:
- महाराष्ट्र के धुले ज़िले के शहादा में भील आदिवासी स्त्रियों ने शराब और उससे जुड़ी पारिवारिक हिंसा के विरुद्ध संगठित मोर्चा खोला।
- 1973 में बंबई में मृणाल गोरे और अहिल्या रंगनेकर जैसी नेताओं की अगुवाई में महँगाई विरोधी आंदोलन चला, जिसमें हज़ारों गृहिणियाँ बेलन और थाली लेकर सड़क पर उतरीं।
- 1972 में इला भट्ट ने अहमदाबाद में सेवा (SEWA) की नींव रखी, जिसने बीड़ी बनाने वाली, सब्ज़ी बेचने वाली, कपड़ा सिलने वाली और कचरा चुनने वाली स्त्रियों को पहली बार संगठित श्रमिक के रूप में पहचान और अधिकार की भाषा दी। यह आंदोलन इस बात का प्रमाण था कि अनौपचारिक क्षेत्र की स्त्री का श्रम भी “काम” है, चाहे उसे आँकड़ों में न गिना जाए।
- हैदराबाद में प्रोग्रेसिव ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ वीमेन (POW) जैसे समूहों ने पितृसत्ता को वर्ग संघर्ष के साथ जोड़कर देखा।
इन्हीं वर्षों में चिपको आंदोलन उभरा। उत्तराखंड के चमोली में 1973 में शुरू हुए इस आंदोलन में 1974 में रेनी गाँव की गौरा देवी के नेतृत्व में स्त्रियाँ पेड़ों से लिपट गईं और ठेकेदारों को लौटना पड़ा। इस पर नारीवादी विद्वानों में रोचक बहस हुई। वंदना शिवा ने इसे स्त्री और प्रकृति के साझे पोषण-संबंध का प्रमाण माना और पारिस्थितिक नारीवाद (इकोफ़ेमिनिज़्म) की धारणा विकसित की।
बीना अग्रवाल ने 1992 के अपने शोध में इससे असहमति जताई और कहा कि स्त्री का पर्यावरण से जुड़ाव उसके किसी जन्मजात “प्राकृतिक” गुण से नहीं, भौतिक निर्भरता से निकलता है। ईंधन, चारा और पानी के लिए सबसे अधिक वही जंगल पर आश्रित है, इसलिए जंगल के विनाश की मार सबसे पहले उसी पर पड़ती है। उन्होंने इसे “नारीवादी पर्यावरणवाद” कहा।
इसी समय 1975 में संयुक्त राष्ट्र का अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष मनाया गया और आपातकाल (1975 से 1977) ने नागरिक स्वतंत्रताओं के साथ-साथ स्त्रियों के शरीर पर राज्य की पहुँच, विशेषकर नसबंदी अभियानों के माध्यम से, को भी उजागर किया।
- पुणे और बंबई में पुरोगामी महिला संगठन और स्त्री मुक्ति संगठन जैसे समूह बने, और दिल्ली में महिला दक्षता समिति जैसे दहेज विरोधी मंच सामने आए।
- 1978 में मधु किश्वर और रुथ वनिता ने मानुषी पत्रिका निकाली, 1981 में दिल्ली में सहेली बनी, और 1984 में उर्वशी बुटालिया और ऋतु मेनन ने भारत की पहली नारीवादी प्रकाशन संस्था “काली फ़ॉर वीमेन” शुरू की।
- इन सबने स्त्री की आवाज़ को बैठकों से निकालकर पुस्तक, पत्रिका और परामर्श केंद्र के रूप में स्थायी मंच दिया।
हिंसा का प्रश्न: मथुरा और उसके बाद
इस दशक में सबसे निर्णायक मोड़ हिंसा के प्रश्न पर आया। 1978 में हैदराबाद में रमीज़ा बी के साथ पुलिस हिरासत में बलात्कार और उसके पति की हत्या के बाद शहर में भारी आक्रोश उभरा। पर देश की चेतना को सबसे गहरा झटका मथुरा मामले ने दिया। 1972 में महाराष्ट्र के देसाईगंज थाने में एक आदिवासी किशोरी के साथ दो पुलिसकर्मियों ने बलात्कार किया। सत्र न्यायालय ने आरोपियों को बरी कर दिया, उच्च न्यायालय ने उन्हें दोषी ठहराया, पर सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें फिर बरी कर दिया। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि शरीर पर चोटों के निशान नहीं थे और उसने शोर नहीं मचाया, इसलिए इसे “सहमति” माना जाए। यानी हिरासत में, दो वर्दीधारी पुरुषों के सामने एक किशोरी की चुप्पी को सहमति ठहरा दिया गया।
1979 में उपेंद्र बख़्शी, लोतिका सरकार, रघुनाथ केलकर और वसुधा धागमवार, इन चार विधि प्राध्यापकों ने मुख्य न्यायाधीश को खुला पत्र लिखकर इस निर्णय की आलोचना की। देश के कई शहरों में विरोध हुए और 1980 में बंबई में फ़ोरम अगेंस्ट रेप बना, जो बाद में फ़ोरम अगेंस्ट ऑप्रेशन ऑफ़ वीमेन कहलाया। दबाव का नतीजा 1983 के आपराधिक विधि (संशोधन) अधिनियम में निकला। हिरासत में बलात्कार को विशेष गंभीर अपराध माना गया और कठोर न्यूनतम सज़ा रखी गई, साक्ष्य अधिनियम में धारा 114A जोड़ी गई जिसके तहत कुछ मामलों में सहमति न होने की धारणा पीड़िता के पक्ष में मान ली गई, पीड़िता की पहचान गुप्त रखने का प्रावधान आया और सुनवाई बंद कमरे में कराने की व्यवस्था हुई।
इस अध्याय का समाजशास्त्रीय महत्त्व यह है कि पहली बार बलात्कार को “इज़्ज़त लुटने” की जगह “शरीर की स्वायत्तता पर हमला” कहने की माँग गंभीरता से उठी। इसी विमर्श ने आगे चलकर 2012 के निर्भया आंदोलन और 2013 के कानूनी संशोधनों की ज़मीन तैयार की, जिन पर हम दूसरे भाग में लौटेंगे।
1980 का दशक: कानून, पहचान और कठिन सवाल
उसी दशक में दहेज हत्याओं के विरुद्ध दिल्ली और अन्य शहरों में चले अभियानों ने कानून को बदलने के लिए बाध्य किया।
1983 में भारतीय दंड संहिता में धारा 498A (पति या उसके संबंधियों द्वारा क्रूरता) जुड़ी, और 1986 में धारा 304B (दहेज मृत्यु) और साक्ष्य अधिनियम की धारा 113B आई। आज इन प्रावधानों के प्रयोग और कथित दुरुपयोग पर लंबी बहस है और “पुरुष आयोग” जैसी माँगें भी इसी बहस से जुड़ती हैं। इस पर हम दूसरे भाग में संतुलित रूप से चर्चा करेंगे।
पर इसी दशक ने आंदोलन को सबसे कठिन प्रश्न भी दिए:
- 1985 में शाह बानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इंदौर की एक बुज़ुर्ग तलाक़शुदा मुस्लिम महिला के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत गुज़ारा भत्ते का अधिकार बरकरार रखा।
- पर उसके बाद उठे विवाद में सरकार ने 1986 में मुस्लिम महिला (तलाक़ पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम पारित करके उस निर्णय के प्रभाव को सीमित कर दिया।
नारीवादी आंदोलन के सामने कठिन दुविधा खड़ी हुई। अगर वह स्त्री के अधिकार का समर्थन करे, तो इस बात का जोखिम था कि अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाने की राजनीति को बल मिल जाए। अगर वह समुदाय की पहचान की रक्षा के तर्क को माने, तो स्त्री के अधिकार से समझौता होता था। फ़्लाविया एग्नेस जैसी विद्वानों ने इस दुविधा से निकलने का रास्ता बताया कि समुदाय के भीतर से स्त्री-न्याय की माँग उठे और राज्य की जवाबदेही भी तय हो। इस मामले का मूल सबक यह था कि “सब स्त्रियों के हित एक जैसे हैं” मान लेना एक सुविधाजनक मान्यता है, पूरी सच्चाई नहीं।
1987 में राजस्थान के देवराला में अठारह वर्षीय रूप कँवर की पति की चिता पर सती होने की घटना ने फिर एक कठिन प्रश्न सामने रखा।
महिला संगठनों ने इसका तीव्र विरोध किया और जाँच की माँग की, पर दूसरी ओर इसे “परंपरा” और “गौरव” बताकर बड़ी रैलियाँ भी निकलीं, जिनमें अनेक स्त्रियाँ भी शामिल थीं। परिणामस्वरूप सती (निवारण) अधिनियम 1987 बना। देवराला ने समाजशास्त्रियों को सोचने पर विवश किया कि पितृसत्ता को अक्सर परिवार, समुदाय, धर्म और बाज़ार, चारों का समर्थन क्यों मिल जाता है, और स्त्रियाँ स्वयं भी उसकी रक्षा में क्यों खड़ी दिखती हैं। यह वही “पितृसत्तात्मक सौदा” है जिसकी चर्चा हमने ऊपर की थी।
इस दशक में महिला अध्ययन भी संस्थागत हुआ। 1974 में एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय में महिला अध्ययन का शोध केंद्र बना, आगे ICSSR ने महिला अध्ययन के कार्यक्रम को बढ़ावा दिया, और 1980 के दशक के आरंभ में भारतीय महिला अध्ययन संघ (IAWS) अस्तित्व में आया। अब नारीवाद केवल आंदोलन नहीं रहा, एक ज्ञान-परंपरा भी बन गया, जिसमें विश्वविद्यालयों, शोध और प्रकाशन की भूमिका बढ़ी।
अधूरे प्रश्न: कौन-सी स्त्री, किसका नारीवाद?
1980 के दशक के अंत तक आंदोलन ने कानून, संगठन और चेतना की मज़बूत ज़मीन बना ली थी, पर भीतर से कठिन सवाल उठने लगे थे। आंदोलन का नेतृत्व अधिकतर शहरी, शिक्षित, सवर्ण और अक्सर हिंदू पृष्ठभूमि की स्त्रियों के हाथ में था। दलित, आदिवासी, मुस्लिम, श्रमिक, ग्रामीण और यौन अल्पसंख्यक स्त्रियों के अनुभव इस “सार्वभौमिक स्त्री” की छवि में समाते नहीं थे। गोपाल गुरु ने 1995 में लिखा कि दलित स्त्रियाँ अलग ढंग से बोलती हैं, यानी उनकी पीड़ा केवल जेंडर से नहीं, जाति और ग़रीबी से भी बनी है, और उसे केवल सवर्ण नारीवादी भाषा में नहीं कहा जा सकता। शर्मिला रेगे ने बाद में राइटिंग कास्ट, राइटिंग जेंडर में “सवर्ण नारीवाद” की सीमाओं पर विस्तार से लिखा और दलित स्त्रियों के “अनुभवजन्य ज्ञान” को अकादमिक विमर्श में प्रतिष्ठा देने की माँग की।
इन आलोचनाओं ने आंदोलन को कमज़ोर नहीं किया, उसे ईमानदार बनाया। किसी आंदोलन की परिपक्वता इस बात से परखी जाती है कि वह अपने भीतर के असुविधाजनक प्रश्नों का सामना कैसे करता है।
यहाँ पहले भाग का पड़ाव आता है। एक ओर संवैधानिक अधिकार, कानूनी सुधार और संगठित स्वर हैं, दूसरी ओर पहचान, जाति, धर्म और वर्ग की उलझनें और पितृसत्ता की वे परतें जो कानून से नहीं टूटतीं। 1990 के बाद का भारत, यानी भँवरी देवी का संघर्ष और विशाखा दिशानिर्देश, 73वें और 74वें संशोधन से पंचायतों में स्त्रियों का प्रवेश, दलित नारीवाद का उभार, भूमंडलीकरण, निर्भया और #MeToo, और आज की डिजिटल पीढ़ी, इन्हीं प्रश्नों के उत्तर खोजने की कहानी है। अगले भाग में हम देखेंगे कि यह सफ़र इन दरारों को कैसे भरता है और कहाँ नई दरारें खोलता है, और यह भी कि पितृसत्ता से लड़ाई केवल पुरुषों के विरुद्ध नहीं है। यह उस सोच के विरुद्ध है जो स्त्री के भीतर भी बैठी है और पुरुष के भीतर भी, और जिससे मुक्ति दोनों की साझी ज़रूरत है।
संदर्भ और स्रोत
पुस्तकें और शोधपत्र
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सरकारी रिपोर्टें, कानून और न्यायिक निर्णय
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27. मोहम्मद अहमद ख़ान बनाम शाह बानो बेगम (सर्वोच्च न्यायालय, 1985); आपराधिक विधि (संशोधन) अधिनियम 1983; सती (निवारण) अधिनियम 1987
समाचार रिपोर्टें (दिल्ली विश्वविद्यालय प्रदर्शन, सितंबर 2026)
28. वनइंडिया न्यूज़, 29 सितंबर 2026, “Abort Patriarchy: DU Women Students Turn North Campus Into a March for Freedom and Safety”
29. द स्टेट्समैन (IANS रिपोर्ट), “‘Abort patriarchy’: Delhi university students intensify protests over women’s safety”
30. मकतूब मीडिया, 29-30 सितंबर 2026, “‘Women will change situation’: Delhi students protest recurring rape, gender violence”
31. पीटीआई, 30 सितंबर 2025, क्राइम इन इंडिया 2023 के आँकड़ों पर रिपोर्ट
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