आधुनिक युग में प्रतिनिधिमूलक लोकतंत्र (Representative Democracy) का संपूर्ण ढाँचा राजनीतिक दलों के इर्द-गिर्द संचालित होता है। प्रत्यक्ष लोकतंत्र के यूनानी नगर-राज्यों (City-States) के पतन और आधुनिक विशाल राष्ट्र-राज्यों (Nation-States) के उदय ने यह अनिवार्य कर दिया कि जन-इच्छा को सुगठित करने, सत्ता का संस्थागत हस्तांतरण सुनिश्चित करने तथा नागरिकों और राज्य के मध्य संचरण-कड़ी (Transmission Link) स्थापित करने के लिए एक सुव्यवस्थित माध्यम हो। राजनीति विज्ञान में इसी संगठनात्मक तंत्र को ‘राजनीतिक दल’ कहा जाता है।
व्यवहारवादी क्रांति और तुलनात्मक राजनीति के आधुनिक विकास ने यह सिद्ध किया कि संविधानों के औपचारिक कानून और सांविधिक धाराएं तब तक निष्प्राण रहती हैं, जब तक कि राजनीतिक दल उन्हें गतिशीलता प्रदान न करें। जेम्स ब्राइस (James Bryce) ने अपनी कृति मॉडर्न डेमोक्रेसीज में ठीक ही लिखा है कि “दलीय व्यवस्था अनिवार्य है; किसी भी बड़े स्वतंत्र देश में इसके बिना शासन का संचालन संभव नहीं हुआ है।” आधुनिक राजनीति में दल केवल सरकारों का निर्माण ही नहीं करते, बल्कि वे जनमत का निर्माण, राजनीतिक समाजीकरण, हितों का समुच्चय और व्यवस्था की वैधता को बनाए रखने वाले प्रमुख कारक हैं।
- राजनीतिक दल का अर्थ एवं प्रमुख परिभाषाएँ (Meaning and Definitions)
(क) सामान्य एवं व्यावहारिक अर्थ
राजनीतिक दल समान राजनीतिक विचारों, लक्ष्यों अथवा सामाजिक-आर्थिक दर्शन वाले नागरिकों का ऐसा स्वैच्छिक एवं स्थायी संगठन है, जो संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण साधनों (चुनावों) के माध्यम से राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने और अपनी घोषित नीतियों व कार्यक्रमों को लागू करने का प्रयास करता है।
(ख) शास्त्रीय एवं आधुनिक परिभाषाएँ
तुलनात्मक राजनीति के विभिन्न विद्वानों ने राजनीतिक दलों को अलग-अलग दृष्टिकोणों से परिभाषित किया है:
- एडमंड बर्क (Edmund Burke): “राजनीतिक दल उन व्यक्तियों का एक समूह है जो किसी ऐसे निश्चित सिद्धांत के आधार पर, जिस पर वे सब एकमत हों, अपने संयुक्त प्रयासों द्वारा राष्ट्रीय हित को आगे बढ़ाने के लिए संगठित होते हैं।” बर्क की परिभाषा में राष्ट्रीय हित और सैद्धांतिक एकता को प्रमुख स्थान दिया गया है।
- मैक्स वेबर (Max Weber): वेबर ने दलों को औपचारिक सत्ता-प्राप्ति के साधन के रूप में देखा। उनके अनुसार, “राजनीतिक दल वे स्वैच्छिक संगठन हैं जिनका उद्देश्य अपने नेताओं को सत्ता दिलाना और अपने सक्रिय सदस्यों को वस्तुनिष्ठ लाभ या व्यक्तिगत लाभ प्रदान करना होता है।”
- जोसेफ लापालोम्बारा और माइरन वीनर (Joseph LaPalombara & Myron Weiner): तुलनात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए इन्होंने दल को एक ऐसी स्थायी संस्था बताया जिसका एक स्पष्ट संगठन हो, जिसकी स्थानीय शाखाएं हों, जो स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर निरंतर कार्य करे, और जिसका नेतृत्व जनसमर्थन जुटाकर शासन की बागडोर संभालना चाहता हो।
- आर. जी. गेटेल (R. G. Gettel): “राजनीतिक दल नागरिकों का एक कम या अधिक संगठित समूह है जो एक राजनीतिक इकाई के रूप में कार्य करता है और जिसका उद्देश्य अपने मतदान की शक्ति के प्रयोग द्वारा सरकार पर नियंत्रण स्थापित करना और अपनी सामान्य नीतियों को क्रियान्वित करना होता है।”
- गैब्रियल आमण्ड (Gabriel Almond): व्यवस्था उपागम (System Approach) के अंतर्गत आमण्ड राजनीतिक दल को ‘हित समूहन‘ (Interest Aggregation) का प्रमुख साधन मानते हैं। दल समाज की असंबद्ध एवं बिखरी हुई मांगों को संकलित कर उन्हें नीतिगत विकल्पों में परिवर्तित करते हैं।
- राजनीतिक दल के आवश्यक तत्व (Essential Elements of a Political Party)
किसी भी सामाजिक समूह या जन-संगठन को राजनीतिक दल कहलाने के लिए निम्नलिखित अनिवार्य तत्वों की आवश्यकता होती है:
- सुदृढ़ एवं स्थायी संगठन (Sound and Stable Organization): मात्र लोगों की भीड़ दल नहीं बन सकती। एक निश्चित संगठनात्मक ढांचा, स्पष्ट पदानुक्रम (Hierarchy), आंतरिक नियम, सदस्यता प्रक्रिया और केंद्र से लेकर स्थानीय स्तर तक फैली प्रशासनिक संरचना दल का मूल आधार है।
- समान मूलभूत सिद्धांतों पर सहमति (Consensus on Fundamental Principles): दल के सदस्यों में कम से कम कुछ मूलभूत राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दर्शनों एवं प्राथमिकताओं पर सैद्धांतिक सहमति होना आवश्यक है। इसी के आधार पर दल अपना चुनावी घोषणापत्र (Election Manifesto) तैयार करता है।
- संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण साधनों में आस्था (Faith in Constitutional Means): राजनीतिक दल अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए संवैधानिक मार्गों, जैसे आवधिक चुनाव, जनमत निर्माण, रैलियां और विधायी बहस पर निर्भर करते हैं। जो समूह सत्ता परिवर्तन के लिए हिंसा, विद्रोह या आतंकवाद का आश्रय लेते हैं, उन्हें राजनीति विज्ञान में दल नहीं, बल्कि विद्रोही या क्रांतिकारी गुट माना जाता है।
- शासन–सत्ता की प्राप्ति का प्रत्यक्ष लक्ष्य (Objective of Capturing Power): यह राजनीतिक दल का सबसे निर्णायक लक्षण है। दल का अंतिम लक्ष्य सरकार बनाना, निर्णय-निर्माण केंद्रों पर अधिकार करना और राजकीय नीतियों को निर्धारित करना होता है।
- राष्ट्रीय हित का दृष्टिकोण (Orientation towards National Interest): दल को किसी एक वर्ग, जाति, संप्रदाय या परिवार के संकीर्ण स्वार्थों तक सीमित होने के बजाय समग्र राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान का दावा प्रस्तुत करना होता है।
- राजनीतिक दल और दबाव समूह में मूलभूत अंतर (Differences: Political Parties vs. Pressure Groups)
तुलनात्मक राजनीति में इन दोनों गैर-शासकीय अभिकरणों के मध्य स्पष्ट अंतर रेखा खींची जाती है:
| विश्लेषण का आधार | राजनीतिक दल (Political Parties) | दबाव समूह (Pressure Groups) |
| सत्ता प्राप्ति का लक्ष्य | चुनावों में भाग लेकर प्रत्यक्ष रूप से शासन सत्ता प्राप्त करना और मंत्री पद धारण करना। | कभी भी सत्ता प्राप्त करने या सरकार में प्रत्यक्ष रूप से शामिल होने का प्रयास नहीं करते। |
| हितों का स्वरूप | व्यापक, समग्र और राष्ट्रीय हित; ताकि सम्पूर्ण समाज से अधिकतम जनसमर्थन प्राप्त हो सके। | संकीर्ण, विशिष्ट, एकांगी और वर्गीय हित (जैसे केवल श्रमिक, किसान, उद्योगपति या शिक्षक)। |
| चुनाव में सहभागिता | अपने अधिकृत चुनाव चिन्ह और घोषणापत्र के साथ सीधे प्रत्याशी उतारते हैं। | सीधे चुनाव नहीं लड़ते; केवल अपनी पसंद के दलों या प्रत्याशियों को समर्थन और चंदा देते हैं। |
| उत्तरदायित्व एवं जवाबदेही | संपूर्ण देश के मतदाताओं और जनता के प्रति सार्वजनिक रूप से उत्तरदायी होते हैं। | केवल अपने संगठन के पंजीकृत सदस्यों के प्रति जवाबदेह होते हैं, आम जनता के प्रति नहीं। |
| कार्यप्रणाली एवं साधन | संवैधानिक प्रचार, मतदान, जनमत संग्रह, संसदीय बहस और विमर्श। | लॉबिंग, हड़ताल, धरना, जनहित याचिकाएं, चक्का-जाम और पर्दे के पीछे से सौदेबाजी। |
- लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों के प्रकार्य (Functions of Political Parties)
राजनीतिक दल लोकतांत्रिक समाज को सक्रिय और संगठित रखने के लिए निम्नलिखित बहुआयामी कार्य करते हैं:
- जनमत का निर्माण और सुदृढ़ीकरण (Formulation of Public Opinion): आधुनिक समाजों में जटिल आर्थिक और विदेश नीति संबंधी मुद्दों पर सामान्य जनता की राय स्पष्ट नहीं होती। राजनीतिक दल भाषणों, पत्रिकाओं, सम्मेलनों और डिजिटल मीडिया के माध्यम से विभिन्न समस्याओं के पक्ष और विपक्ष प्रस्तुत करते हैं, जिससे आम नागरिक जागरूक होकर अपनी राय बना पाते हैं।
- हित समूहन (Interest Aggregation): गैब्रियल आमण्ड के अनुसार, समाज में विभिन्न दबाव समूह अलग-अलग मांगें रखते हैं। राजनीतिक दल इन परस्पर विरोधी और विविध मांगों के बीच समझौता कराकर उन्हें कुछ स्पष्ट राष्ट्रीय नीतियों और प्राथमिकताओं में ढालते हैं।
- चुनावों का संचालन एवं प्रत्याशियों का चयन (Nomination and Conducting Elections): दल योग्य उम्मीदवारों की खोज करते हैं, उन्हें चुनाव चिन्ह और वित्तीय संसाधन प्रदान करते हैं तथा जनता के बीच सघन प्रचार अभियान चलाकर मतदान की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करते हैं।
- सरकार का गठन एवं संचालन (Formation and Running of Government): चुनाव में स्पष्ट बहुमत प्राप्त करने वाला दल कार्यपालिका और मंत्रिमंडल का गठन करता है। दलीय अनुशासन के बल पर वह विधायिका में आवश्यक कानूनों को पारित कराता है और शासन का स्थायित्व सुनिश्चित करता है।
- सार्थक विपक्ष की भूमिका (Role of Constructive Opposition): चुनाव में पराजित होने वाले दल सत्ताधारी दल की निरंकुशता पर अंकुश लगाते हैं। वे सरकार की त्रुटिपूर्ण नीतियों की आलोचना करते हैं, भ्रष्टाचार को उजागर करते हैं और वैकल्पिक नीतियों का मसौदा प्रस्तुत कर देश को एक उत्तरदायी विकल्प प्रदान करते हैं।
- राजनीतिक समाजीकरण और प्रशिक्षण (Political Socialization and Recruitment): राजनीतिक दल नागरिकों को राजनीतिक व्यवस्था के मूल्यों, संविधान और नागरिक अधिकारों के प्रति शिक्षित करते हैं। साथ ही, वे युवा कार्यकर्ताओं को नेतृत्व, वाद-विवाद और शासन की बारीकियों का प्रशिक्षण देकर भविष्य के शासक वर्ग तैयार करते हैं।
- नागरिक समाज और शासन के मध्य संपर्क–सेतु (Bridge between State and Society): दल के स्थानीय कार्यकर्ता जनता के कष्टों, अभावों और शिकायतों को प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुँचाते हैं और सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी आम जनता को देते हैं।
- दलीय व्यवस्थाओं का वर्गीकरण (Classification of Party Systems)
विश्व की विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं में दलों की संख्या, उनकी शक्ति संतुलन और विचारधारा के आधार पर दलीय प्रणालियों का विस्तृत वर्गीकरण किया गया है:
(क) मॉरिस डुवर्जर का वर्गीकरण (Maurice Duverger’s Classification – Political Parties, 1951)
फ्रांसीसी राजनीतिक वैज्ञानिक मॉरिस डुवर्जर ने दलीय व्यवस्था को दो प्रमुख पैमानों पर वर्गीकृत किया:
- संरचना के आधार पर (Internal Structure):
- कॉक्कस पार्टियाँ (Caucus Parties): ये सीमित, उच्च-वर्गीय और कुलीन नेताओं की छोटी टोलियां होती हैं। इनका आधार व्यापक जनसमर्थन नहीं होता; इनका ध्यान केवल चुनाव जीतने पर होता है (जैसे 19वीं सदी के फ्रांसीसी या ब्रिटिश दल)।
- शाखा पार्टियाँ (Branch Parties): ये लोकतांत्रिक और केंद्रीकृत दल होते हैं जिनमें विशाल जन-सदस्यता होती है और जिनका ढांचा पूरे देश में शाखाओं (branches) के रूप में फैला होता है (जैसे पश्चिमी यूरोप के समाजवादी व लेबर दल)।
- सेल पार्टियाँ (Cell Parties): ये साम्यवादी (कम्युनिस्ट) दलों की विशेषता हैं। इनका आधार कार्यस्थल (फैक्ट्री, कार्यालय) पर स्थित 3 से 10 सदस्यों की गुप्त ‘सेल’ होती है। इनमें कठोर लेनिनवादी अनुशासन और गोपनीयता होती है।
- मिलिशिया पार्टियाँ (Militia Parties): ये फासीवादी और नाजी दलों का स्वरूप थीं। इनका ढांचा अर्ध-सैनिक (Paramilitary) होता है, जिनमें वर्दीधारी सशस्त्र दस्ते होते हैं और जो हिंसा तथा शक्ति के बल पर काम करते हैं।
- डुवर्जर का नियम (Duverger’s Law):
- डुवर्जर ने चुनावी प्रणाली और दलीय व्यवस्था के संबंधों का गणितीय विश्लेषण किया।
- नियम: ‘फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट’ (FPTP / एकल सदस्यीय बहुमत प्रणाली) स्वाभाविक रूप से द्विदलीय व्यवस्था (Two-Party System) को जन्म देती है (जैसे यूके और यूएसए)।
- इसके विपरीत, आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation) स्वाभाविक रूप से बहुदलीय व्यवस्था (Multi-Party System) और गठबंधन सरकारों को बढ़ावा देता है (जैसे फ्रांस, इटली, नीदरलैंड्स)।
(ख) जियोवानी सारतोरी का वर्गीकरण (Giovanni Sartori’s Typology)
सारतोरी ने केवल दलों की संख्या नहीं, बल्कि दलों के बीच ‘वैचारिक ध्रुवीकरण‘ (Ideological Polarization) और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के स्तर को आधार बनाया:
- एकदलीय व्यवस्था (One-Party System): जहाँ कानूनी तौर पर केवल एक ही दल का अस्तित्व स्वीकार्य होता है और किसी विरोध की अनुमति नहीं होती (जैसे पूर्व सोवियत संघ या उत्तर कोरिया)।
- आधिपत्य दल व्यवस्था (Hegemonic Party System): जहाँ दिखावे के लिए कुछ छोटे दल होते हैं, परंतु व्यवस्था इस प्रकार नियंत्रित होती है कि वास्तविक प्रतिस्पर्धा असंभव होती है।
- प्रधान दल व्यवस्था (Predominant Party System): जहाँ बहुदलीय लोकतंत्र और स्वतंत्र चुनाव होते हैं, परंतु एक ही दल लंबे समय तक लगातार भारी बहुमत से जीतता रहता है (जैसे 1952 से 1967 तक भारत में कांग्रेस व्यवस्था, अथवा जापान में LDP)।
- द्विदलीय व्यवस्था (Two-Party System): जहाँ दो बड़े दलों के बीच सत्ता का नियमित चक्रीय परिवर्तन होता है।
- मध्यम बहुदलीय व्यवस्था (Moderate Pluralism): जहाँ 3 से 5 दल होते हैं और वे केंद्रगामी (Centripetal) राजनीति करते हैं; सरकारें गठबंधन द्वारा स्थिर रहती हैं (जैसे जर्मनी)।
- ध्रुवीकृत बहुदलीय व्यवस्था (Polarized Pluralism): जहाँ 5-6 से अधिक दल होते हैं और धुर-वामपंथी तथा धुर-दक्षिणपंथी दलों के बीच गहरा वैचारिक मतभेद होता है; केंद्र का दल कमजोर होता है जिससे राजनीतिक अस्थिरता बनी रहती है।
(ग) संख्या के आधार पर पारंपरिक वर्गीकरण
- एकदलीय व्यवस्था (Single-Party System):
- लक्षण: संविधान द्वारा केवल एक ही सत्तारूढ़ दल को मान्यता दी जाती है। विपक्ष को गैर-कानूनी और देशद्रोही घोषित कर दिया जाता है। मीडिया, नौकरशाही और न्यायपालिका पर पार्टी का पूर्ण एकाधिकार होता है।
- उदाहरण: चीन में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CPC), पूर्व सोवियत संघ, क्यूबा।
- गुण: निर्णयों में तीव्र गति, नीतिगत निरंतरता, राजनीतिक स्थिरता और अनुशासन।
- दोष: अधिनायकवाद, व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं और मानवाधिकारों का हनन, आंतरिक लोकतंत्र का अभाव।
- द्विदलीय व्यवस्था (Two-Party System):
- लक्षण: देश में अनेक छोटे-मोटे दल हो सकते हैं, परंतु सत्ता की वास्तविक दौड़ मुख्य रूप से दो प्रमुख राष्ट्रीय दलों के बीच ही सीमित रहती है।
- उदाहरण:
- यूनाइटेड किंगडम (UK): कंजर्वेटिव पार्टी और लेबर पार्टी।
- संयुक्त राज्य अमेरिका (USA): डेमोक्रेटिक पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी।
- गुण: सरकार की स्पष्ट स्थिरता, मतदाता के समक्ष सीधा व सुस्पष्ट विकल्प, कड़ा दलीय अनुशासन और उत्तरदायी विपक्ष।
- दोष: मतदाताओं का विकल्प सीमित हो जाता है; अल्पसंख्यक वर्गों और नए विचारों को विधायी मंच पर स्थान नहीं मिल पाता।
- बहुदलीय व्यवस्था (Multi-Party System):
- लक्षण: राजनीतिक व्यवस्था में तीन या उससे अधिक दल सक्रिय होते हैं और किसी भी एक दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति में गठबंधन सरकारों (Coalition Governments) का निर्माण होता है।
- उदाहरण: भारत, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, इटली, जर्मनी।
- गुण: समाज के सभी वर्गों, जातियों, क्षेत्रों और विचारधाराओं को प्रतिनिधित्व प्राप्त होता है; तानाशाही की संभावना नगण्य रहती है।
- दोष: सरकारों में निरंतर अस्थिरता, नीतिगत पक्षाघात (Policy Paralysis), क्षेत्रीय और संकीर्ण स्वार्थों के आधार पर राजनीतिक सौदेबाजी (Horse Trading)।
- प्रमुख देशों में दलीय व्यवस्था का तुलनात्मक अध्ययन (Comparative Perspective)
पाठ्यक्रम के अनुसार प्रमुख वैश्विक शक्तियों में दलीय व्यवस्था का यथार्थवादी स्वरूप इस प्रकार है:
(क) संयुक्त राज्य अमेरिका (USA)
- शिथिल द्विदलीय व्यवस्था: अमेरिका में डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दलों का ढांचा अत्यधिक विकेंद्रीकृत है।
- व्हिप की अनुपस्थिति: अमेरिकी कांग्रेस में ब्रिटिश संसद की तरह कठोर दलीय व्हिप नहीं होता; सांसद और सीनेटर अपनी पार्टी लाइन से हटकर मतदान करने के लिए स्वतंत्र होते हैं।
- प्राइमरी चुनाव (Direct Primaries): दलों के उम्मीदवारों का चयन दल के आलाकमान द्वारा नहीं, बल्कि पंजीकृत मतदाताओं द्वारा प्राइमरी चुनावों के माध्यम से किया जाता है, जो आंतरिक लोकतंत्र का उत्कृष्ट उदाहरण है।
(ख) यूनाइटेड किंगडम (UK)
- कठोर द्विदलीय एवं संसदीय अनुशासन: ब्रिटेन में संसदीय व्यवस्था के अंतर्गत लेबर और कंजर्वेटिव दलों में अत्यधिक कड़ा अनुशासन होता है।
- सामूहिक उत्तरदायित्व एवं छाया मंत्रिमंडल (Shadow Cabinet): विपक्षी दल सरकार की प्रत्येक नीति पर निगरानी रखने के लिए अपना एक वैकल्पिक ‘छाया मंत्रिमंडल’ गठित करता है, जो सत्ता परिवर्तन की स्थिति में तुरंत कार्यभार संभालने के लिए तैयार रहता है।
(ग) चीन (China)
- एकदलीय आधिपत्य एवं लोकतांत्रिक केंद्रवाद: चीन में सत्ता पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) का एकाधिकार है।
- लेनिनवादी सिद्धांत: पार्टी का संगठन ‘लोकतांत्रिक केंद्रवाद’ (Democratic Centralism) पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि निर्णय लेने से पूर्व निचले स्तर पर विचार-विमर्श की अनुमति होती है, परंतु शीर्ष नेतृत्व द्वारा निर्णय ले लिए जाने के बाद उसका पालन संपूर्ण कैडर के लिए अनिवार्य और निर्विवाद होता है। अन्य आठ छोटे दल केवल सलाहकार की भूमिका में हैं।
(घ) फ्रांस (France)
- पंचम गणतंत्र की बहुदलीय व्यवस्था: फ्रांस की अर्ध-अध्यक्षीय प्रणाली में बहुदलीय संरचना है।
- दोहरे दौर की मतदान प्रणाली (Two-Ballot System): राष्ट्रपति और नेशनल असेंबली के चुनावों में पहले दौर में बहुमत न मिलने पर शीर्ष दो प्रत्याशियों के बीच दूसरा दौर होता है, जिसके कारण छोटे दलों को बड़े दलों के साथ रणनीतिक चुनावी गठबंधन बनाने पड़ते हैं।
(ङ) रूस (Russia)
- प्रभावी दल व्यवस्था (Dominant Party System): सैद्धांतिक रूप से रूस में बहुदलीय संविधान है, परंतु व्यावहारिक रूप से व्लादिमीर पुतिन समर्थित ‘यूनाइटेड रशिया’ (United Russia) का संपूर्ण प्रशासनिक और विधायी तंत्र पर पूर्ण नियंत्रण है।
- समकालीन दलीय राजनीति की प्रमुख चुनौतियाँ एवं विकृतियाँ (Contemporary Challenges)
बीसवीं सदी के उत्तरार्ध और इक्कीसवीं सदी में वैश्विक स्तर पर राजनीतिक दलों के समक्ष गंभीर संकट उभरे हैं:
- आंतरिक लोकतंत्र का अभाव (Lack of Internal Democracy): अधिकांश राजनीतिक दलों में नियमित आंतरिक चुनाव नहीं होते। रॉबर्ट मिशेल्स (Robert Michels) द्वारा प्रतिपादित ‘अल्पतंत्र का लौह नियम‘ (Iron Law of Oligarchy) यहाँ सत्य सिद्ध होता है, जिसके अनुसार प्रत्येक संगठन, चाहे वह कितना भी लोकतांत्रिक क्यों न हो, अंततः कुछ शीर्ष नेताओं के हाथों की कठपुतली बन जाता है।
- वंशवाद और परिवारवाद (Dynastic Politics): विशेषकर दक्षिण एशिया और विकासशील देशों में दलों का नियंत्रण विशिष्ट राजनीतिक परिवारों के हाथों में सिमट कर रह गया है, जिससे योग्य और समर्पित कार्यकर्ताओं का मार्ग अवरुद्ध होता है।
- धनबल और बाहुबल का अत्यधिक प्रभाव (Money and Muscle Power): चुनावों के अत्यधिक खर्चीले होने के कारण दलों की निर्भरता बड़े कॉर्पोरेट चंदे और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों पर बढ़ती जा रही है, जिससे लोकतंत्र के ‘धनतंत्र’ (Plutocracy) में बदलने का खतरा उत्पन्न हो गया है।
- विचारधारा का क्षरण और अवसरवादिता (Decline of Ideology and Opportunism): ओटो किर्चहाइमर (Otto Kirchheimer) ने आधुनिक दलों को ‘कैच–ऑल पार्टीज‘ (Catch-All Parties) कहा है। आज के दल केवल चुनाव जीतने के लिए अपनी मूल विचारधाराओं का त्याग कर हर प्रकार के वर्ग को लुभाने वाले लोकलुभावन (Populist) वादे करने लगे हैं, जिससे दलों के बीच का सैद्धांतिक अंतर समाप्त हो गया है।
- दल–बदल और राजनीतिक अनैतिकता (Defection and Unprincipled Alliances): सत्तालोलुपता के कारण जनप्रतिनिधियों द्वारा बार-बार दल बदलना जनमत के साथ विश्वासघात करता है।
मूल्यांकन एवं निष्कर्ष (Evaluation and Conclusion)
राजनीतिक दल समकालीन प्रतिनिधिमूलक लोकतंत्र की जीवनरेखा हैं। राजनीतिक विकास और आधुनिकीकरण के विश्लेषक सैमुअल पी. हंटिंगटन (Samuel P. Huntington) ने स्पष्ट किया था कि किसी भी संक्रमणकालीन समाज में राजनीतिक स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि वहाँ के राजनीतिक दल कितने संस्थागत और सुदृढ़ हैं। यदि राजनीतिक दल कमजोर होते हैं, तो सेना या नौकरशाही जैसी गैर-निर्वाचित संस्थाएं सत्ता पर काबिज हो जाती हैं।
यद्यपि वर्तमान समय में दलीय व्यवस्था पर भ्रष्टाचार, वैचारिक शून्यता और कुलीनतंत्र के गंभीर आरोप लगते हैं, फिर भी एक बहुलवादी और विविधतापूर्ण राष्ट्र में जन-आकांक्षाओं को स्वर देने के लिए राजनीतिक दलों का कोई व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि दलों के भीतर अनिवार्य आंतरिक चुनाव कराए जाएं, चुनावी वित्तपोषण (Electoral Funding) में पूर्ण पारदर्शिता स्थापित की जाए, कड़े दल-बदल विरोधी कानूनों का पालन हो, और दलों को सूचना के अधिकार तथा जन-जवाबदेही के दायरे में लाया जाए। जब तक दल स्वयं आंतरिक रूप से लोकतांत्रिक नहीं होंगे, तब तक वे राष्ट्र के लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा नहीं कर सकते।
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