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भारत के लिए विश्व व्यापार संगठन में निर्णायक पहल का समय

वैश्विक अर्थव्यवस्था में व्यापार केवल वस्तुओं और सेवाओं के आदान-प्रदान का माध्यम नहीं है, बल्कि यह आर्थिक शक्ति, तकनीकी क्षमता, रोजगार, खाद्य सुरक्षा और भू-राजनीतिक प्रभाव का भी महत्वपूर्ण आधार है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विकसित बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था का उद्देश्य देशों के बीच व्यापारिक विवादों को नियमों के आधार पर सुलझाना, संरक्षणवाद को नियंत्रित करना और आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देना था। वर्ष 1995 में स्थापित विश्व व्यापार संगठन इसी व्यवस्था का केंद्रीय संस्थान है।

हालांकि, बदलती वैश्विक शक्ति-संरचना, विकसित और विकासशील देशों के बीच असमानताओं, बढ़ते संरक्षणवाद तथा संगठन की निर्णय प्रक्रिया में गतिरोध ने इसकी प्रासंगिकता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। भारत सहित अनेक मध्यम शक्तियों और वैश्विक दक्षिण के देशों के सामने अब चुनौती केवल मौजूदा व्यापार नियमों का पालन करने की नहीं, बल्कि उन्हें अधिक न्यायसंगत, समावेशी और विकासोन्मुख बनाने की भी है।

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अंतरराष्ट्रीय व्यापार अनेक विरोधाभासों से गुजर रहा है। एक ओर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल सेवाओं, अर्धचालकों और नई तकनीकों से संबंधित व्यापार का विस्तार हो रहा है, वहीं दूसरी ओर भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति शृंखला में व्यवधान, आर्थिक प्रतिबंध और संरक्षणवादी नीतियां व्यापार की संभावनाओं को प्रभावित कर रही हैं। ऐसी स्थिति में भारत के लिए विश्व व्यापार संगठन में सक्रिय भूमिका निभाना अपने आर्थिक हितों की रक्षा करने के साथ-साथ वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने का अवसर भी है।

1. वैश्विक व्यापार की बदलती तस्वीर और विश्व व्यापार संगठन की प्रासंगिकता

विश्व व्यापार संगठन की भूमिका आज पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में व्यापारिक संबंधों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। पारंपरिक वस्तु व्यापार के साथ-साथ डिजिटल सेवाएं, उच्च तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक वाणिज्य और रणनीतिक उत्पादों का महत्व बढ़ा है।

वैश्विक व्यापार में इन परिवर्तनों के बावजूद सभी देशों को समान लाभ नहीं मिल रहा है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं के पास पूंजी, तकनीक, अनुसंधान और संस्थागत क्षमता अधिक है, जबकि अनेक विकासशील देश अब भी सीमित औद्योगिक आधार, कमजोर बुनियादी ढांचे और तकनीकी निर्भरता से जूझ रहे हैं।

इस संदर्भ में चार प्रमुख प्रवृत्तियां विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।

  • व्यापार और भू-राजनीति का बढ़ता संबंध: देशों के व्यापारिक निर्णय अब केवल लागत और दक्षता पर आधारित नहीं हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा, रणनीतिक निर्भरता और राजनीतिक गठबंधन भी इन निर्णयों को प्रभावित कर रहे हैं।

  • तकनीकी लाभों का असमान वितरण: कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उच्च तकनीक से जुड़े उत्पादों की मांग बढ़ रही है, लेकिन इनके उत्पादन, पूंजी और तकनीकी ज्ञान का संकेंद्रण कुछ अर्थव्यवस्थाओं में अधिक है।

  • क्षेत्रीय असमानताएं: समग्र व्यापार वृद्धि के बावजूद संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों और पारंपरिक सेवाओं पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं को अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

  • नियम आधारित व्यवस्था पर दबाव: एकतरफा शुल्क, व्यापार प्रतिबंध और औद्योगिक सब्सिडी की प्रतिस्पर्धा बहुपक्षीय व्यापार नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन को चुनौती दे रही है।

इस प्रकार, विश्व व्यापार संगठन की आवश्यकता समाप्त नहीं हुई है। इसके विपरीत, वैश्विक व्यापार में बढ़ती अनिश्चितता के बीच एक विश्वसनीय, पारदर्शी और प्रभावी बहुपक्षीय संस्था की जरूरत और अधिक बढ़ गई है।

2. विश्व व्यापार संगठन के संस्थापक सिद्धांतों की पुनर्समीक्षा

विश्व व्यापार संगठन की स्थापना के पीछे कुछ बुनियादी सिद्धांत थे, जिनमें भेदभावरहित व्यापार, विकासशील देशों के प्रति विशेष संवेदनशीलता, सहमति आधारित निर्णय और व्यापारिक विवादों का नियमसम्मत समाधान प्रमुख हैं। बदलती आर्थिक परिस्थितियों में इन सिद्धांतों को त्यागने के बजाय उनकी व्याख्या और क्रियान्वयन की समीक्षा आवश्यक है।

2.1 सर्वाधिक वरीयता प्राप्त राष्ट्र का सिद्धांत

सर्वाधिक वरीयता प्राप्त राष्ट्र का सिद्धांत सामान्यतः यह अपेक्षा करता है कि किसी सदस्य देश को व्यापार में दी गई अनुकूलता अन्य सदस्य देशों को भी समान परिस्थितियों में उपलब्ध कराई जाए, जब तक संबंधित नियमों के अंतर्गत कोई वैध अपवाद लागू न हो।

इसका उद्देश्य व्यापारिक भेदभाव को सीमित करना और देशों के बीच प्रतिस्पर्धा के लिए समान आधार तैयार करना है। किंतु द्विपक्षीय और क्षेत्रीय व्यापार समझौतों, अलग-अलग शुल्क व्यवस्थाओं तथा एकतरफा व्यापारिक उपायों के विस्तार ने इस सिद्धांत के व्यावहारिक प्रभाव को चुनौती दी है।

भारत के लिए आवश्यक है कि वह इस सिद्धांत की रक्षा करते हुए ऐसे व्यापारिक उपायों की समीक्षा का समर्थन करे, जो नियमों के नाम पर विकासशील देशों की नीतिगत स्वतंत्रता को सीमित करते हैं। साथ ही, वैध अपवादों और नियमों से इतर भेदभावपूर्ण व्यवहार के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना भी जरूरी है।

2.2 सहमति आधारित निर्णय प्रक्रिया

विश्व व्यापार संगठन में सहमति आधारित निर्णय प्रक्रिया उसकी संस्थागत वैधता का महत्वपूर्ण आधार है। इसका आशय यह है कि किसी निर्णय को अपनाने के समय उपस्थित सदस्यों में कोई औपचारिक आपत्ति न हो। इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक सदस्य को हर परिस्थिति में अलग से हस्ताक्षर करना अनिवार्य है।

इस व्यवस्था से छोटे और विकासशील देशों को भी अपनी बात रखने का अवसर मिलता है। यदि निर्णय प्रक्रिया को केवल बहुमत के आधार पर संचालित किया जाए, तो आर्थिक और राजनीतिक रूप से शक्तिशाली देश कमजोर अर्थव्यवस्थाओं पर अपने हितों के अनुरूप नियम थोपने की स्थिति में आ सकते हैं।

हालांकि, सर्वसम्मति की आवश्यकता कई बार निर्णयों को लंबे समय तक रोक भी देती है। इसलिए सुधार का उद्देश्य सहमति को समाप्त करना नहीं, बल्कि संवाद को अधिक प्रभावी बनाना, समयबद्ध वार्ता को प्रोत्साहित करना और छोटे देशों की भागीदारी को वास्तविक अर्थ प्रदान करना होना चाहिए।

2.3 पारदर्शिता और सदस्य देशों की समान भागीदारी

व्यापार नियमों का निर्माण पारदर्शी और सदस्य संचालित प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए। नियमों की तैयारी में सीमित देशों की भूमिका बढ़ने तथा छोटे देशों की तकनीकी और वार्तागत क्षमता कमजोर होने से निर्णय प्रक्रिया में असंतुलन पैदा हो सकता है।

भारत को ऐसी व्यवस्था का समर्थन करना चाहिए, जिसमें सभी सदस्यों को प्रस्तावों पर विचार करने, उनके प्रभावों का आकलन करने और अपनी चिंताएं दर्ज कराने का पर्याप्त अवसर मिले।

3. विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का उदय और विशेष एवं विभेदक व्यवहार की चुनौती

विश्व व्यापार संगठन की स्थापना के समय यह स्वीकार किया गया था कि सभी देशों की आर्थिक क्षमता, तकनीकी दक्षता और संस्थागत तैयारी समान नहीं है। इसी वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए विकासशील तथा अल्पविकसित देशों के लिए विशेष एवं विभेदक व्यवहार के प्रावधान विकसित किए गए।

इन प्रावधानों का उद्देश्य विकासशील देशों को समझौतों के क्रियान्वयन के लिए अतिरिक्त समय, तकनीकी सहायता, कुछ दायित्वों में लचीलापन और अपनी विकास संबंधी प्राथमिकताओं के अनुरूप नीतियां अपनाने की गुंजाइश देना है।

3.1 उभरती अर्थव्यवस्थाओं की बदलती स्थिति

विकासशील देशों की आर्थिक स्थिति में पिछले तीन दशकों के दौरान उल्लेखनीय परिवर्तन हुए हैं। कुछ अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक उत्पादन और निर्यात में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर चुकी हैं, जबकि अनेक देश अब भी गरीबी, खाद्य असुरक्षा, सीमित औद्योगिक आधार और कमजोर तकनीकी क्षमताओं से जूझ रहे हैं।

इसलिए सभी विकासशील देशों को एक ही श्रेणी में रखकर समान दायित्व निर्धारित करना उनकी वास्तविक परिस्थितियों की अनदेखी होगी। दूसरी ओर, केवल विकासशील देश होने के आधार पर प्रत्येक सदस्य को बिना किसी समीक्षा के समान छूट देते रहना भी व्यावहारिक नहीं है।

समाधान यह है कि विशेष व्यवहार के निर्धारण में प्रति व्यक्ति आय, तकनीकी क्षमता, रोजगार संरचना, खाद्य सुरक्षा, संस्थागत संसाधन और संबंधित क्षेत्र की संवेदनशीलता जैसे संकेतकों पर विचार किया जाए।

3.2 कृषि, खाद्य सुरक्षा और रोजगार

भारत के लिए यह मुद्दा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश में कृषि आजीविका का प्रमुख आधार बनी हुई है और छोटे तथा सीमांत किसानों की बड़ी संख्या मौजूद है।

खाद्य सुरक्षा के संदर्भ में सार्वजनिक भंडारण कार्यक्रम, न्यूनतम समर्थन मूल्य और कृषि सहायता जैसे विषय अंतरराष्ट्रीय व्यापार वार्ताओं में महत्वपूर्ण हैं। विकासशील देशों को यह सुनिश्चित करना होगा कि व्यापार अनुशासन के कारण गरीब परिवारों के लिए खाद्य उपलब्धता और किसानों की आजीविका प्रभावित न हो।

भारत की प्रमुख प्राथमिकताओं में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • खाद्य सुरक्षा के लिए सार्वजनिक भंडारण से संबंधित स्थायी समाधान।

  • विशेष सुरक्षा तंत्र के माध्यम से आयात में अचानक वृद्धि या कीमतों में गिरावट से किसानों की रक्षा।

  • कपास सहित कृषि उत्पादों के व्यापार में विकृतियां पैदा करने वाली सब्सिडी पर प्रभावी अनुशासन।

  • कृषि सहायता के निर्धारण में विकसित और विकासशील देशों की ऐतिहासिक तथा वर्तमान परिस्थितियों का ध्यान।

भारत को खाद्य सुरक्षा के लिए आवश्यक नीतिगत गुंजाइश की रक्षा करनी चाहिए। साथ ही, कृषि व्यापार में पारदर्शिता और नियमों के अनुरूप सुधारों पर भी बल देना चाहिए।

4. औद्योगिक विकास, सूक्ष्म उद्यम और हरित परिवर्तन

विशेष एवं विभेदक व्यवहार का प्रश्न केवल कृषि तक सीमित नहीं है। विकासशील देशों को औद्योगीकरण, रोजगार सृजन, तकनीकी उन्नयन और हरित अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण के लिए भी पर्याप्त नीतिगत स्वतंत्रता चाहिए।

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम अनेक विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में रोजगार और स्थानीय उत्पादन के प्रमुख आधार हैं। किंतु सीमित वित्त, कम उत्पादकता, तकनीकी पिछड़ापन और अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करने की लागत उन्हें वैश्विक प्रतिस्पर्धा में कमजोर बनाती है।

4.1 औद्योगिक सब्सिडी और घरेलू क्षमता

विकसित अर्थव्यवस्थाएं भी अपने रणनीतिक उद्योगों को विभिन्न प्रकार की सहायता देती हैं। ऐसे में विकासशील देशों के लिए औद्योगिक नीति की गुंजाइश सीमित कर देना असमान प्रतिस्पर्धा को बढ़ा सकता है।

भारत के लिए उचित दृष्टिकोण यह होगा कि उत्पादकता, अनुसंधान, कौशल, स्वच्छ प्रौद्योगिकी और रोजगार से जुड़ी सहायता को प्रोत्साहित किया जाए, जबकि व्यापार को विकृत करने वाले उपायों पर पारदर्शी और संतुलित अनुशासन लागू हो।

4.2 हरित बॉक्स और कृषि सहायता

विश्व व्यापार संगठन के कृषि समझौते में हरित बॉक्स के अंतर्गत ऐसी कुछ सरकारी सहायता शामिल है, जिसे निर्धारित शर्तों के अधीन व्यापार-विकृतकारी प्रभाव नहीं रखने वाला या न्यूनतम प्रभाव वाला माना जाता है। इसमें सामान्यतः अनुसंधान, प्रशिक्षण, बुनियादी ढांचे और कुछ पर्यावरणीय कार्यक्रमों से संबंधित सहायता शामिल हो सकती है।

भारत के लिए यह अवसर है कि वह कृषि अनुसंधान, सिंचाई दक्षता, मृदा स्वास्थ्य, जलवायु अनुकूल खेती और किसान प्रशिक्षण में निवेश बढ़ाए। इससे किसानों की उत्पादकता बढ़ सकती है और कुछ कार्यक्रमों के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों के अनुरूप सहायता की गुंजाइश भी मिल सकती है।

हालांकि, हरित बॉक्स में किसी कार्यक्रम का शामिल होना उसकी सभी संभावित समस्याओं का स्वतः समाधान नहीं है। कार्यक्रम को संबंधित नियमों और निर्धारित शर्तों के अनुरूप होना आवश्यक है।

4.3 मत्स्य क्षेत्र में सुधार

मत्स्य क्षेत्र में सब्सिडी का प्रश्न आजीविका, समुद्री संसाधनों के संरक्षण और वैश्विक व्यापार के बीच संतुलन की मांग करता है। छोटे मछुआरों और पारंपरिक समुदायों की आवश्यकताओं को औद्योगिक स्तर पर संचालित गतिविधियों से अलग समझना जरूरी है।

भारत को ऐसी व्यवस्था का समर्थन करना चाहिए, जिसमें अवैध, अघोषित और अनियमित मत्स्यन को बढ़ावा देने वाली सहायता पर प्रभावी नियंत्रण हो, लेकिन पारंपरिक मछुआरों की आजीविका और विकासशील देशों की क्षमता संबंधी सीमाओं को भी उचित महत्व दिया जाए।

5. बहुपक्षीय व्यापार बनाम सीमित सदस्य समूहों के समझौते

विश्व व्यापार संगठन में सभी सदस्यों के बीच सहमति बनाना कठिन होने के कारण कुछ सदस्य विशेष विषयों पर अलग समूह बनाकर समझौते करने का प्रयास करते हैं। ऐसे समझौतों को सीमित सदस्य समूहों के समझौते कहा जाता है।

इनसे निवेश सुविधा, डिजिटल व्यापार और नियामकीय सहयोग जैसे विषयों पर तेजी से प्रगति संभव हो सकती है। किंतु प्रश्न यह है कि ऐसे समझौतों को विश्व व्यापार संगठन की संस्थागत व्यवस्था में किस प्रकार शामिल किया जाए और गैर-भागीदार सदस्यों के अधिकारों की रक्षा कैसे हो।

5.1 भारत की चिंताएं

भारत का तर्क है कि सीमित सदस्यों के बीच बने समझौतों को संगठन की व्यवस्था में शामिल करने की प्रक्रिया कहीं ऐसी न बन जाए, जिससे सर्वसम्मति का महत्व कमजोर हो और अन्य सदस्यों पर अप्रत्यक्ष दबाव पड़े।

विशेष रूप से निवेश सुविधा जैसे विषयों पर भारत ने चिंता जताई है कि इनके समावेशन से संगठन की मौजूदा संधियों और संस्थागत अधिकार-सीमाओं पर प्रभाव पड़ सकता है।

दूसरी ओर, ऐसे समझौतों को पूरी तरह नकार देने से डिजिटल अर्थव्यवस्था और नए व्यापारिक क्षेत्रों में नियम निर्माण की प्रक्रिया से भारत की दूरी बढ़ सकती है।

इसलिए संतुलित दृष्टिकोण में निम्नलिखित तत्व होने चाहिए:

  • समझौतों में भागीदारी स्वैच्छिक हो।

  • गैर-भागीदार सदस्यों के मौजूदा अधिकार सुरक्षित रहें।

  • संगठन में समझौते को शामिल करने की प्रक्रिया पारदर्शी और नियमसम्मत हो।

  • विकासशील देशों को तकनीकी क्षमता विकसित करने के लिए पर्याप्त समय मिले।

  • किसी समझौते को अपनाने के लिए सहमति संबंधी मौजूदा संस्थागत नियमों का सम्मान किया जाए।

भारत को अपने हितों की रक्षा के साथ-साथ उन क्षेत्रों की पहचान करनी चाहिए, जहां सक्रिय भागीदारी से उसके निर्यात, सेवाओं और तकनीकी क्षमताओं को लाभ मिल सकता है।

6. विश्व व्यापार संगठन की विवाद निपटान व्यवस्था: सुधार की सबसे बड़ी जरूरत

विश्व व्यापार संगठन की विवाद निपटान व्यवस्था का उद्देश्य व्यापारिक विवादों को शक्ति प्रदर्शन के बजाय निर्धारित नियमों के आधार पर सुलझाना है। इसकी दो प्रमुख संस्थागत विशेषताएं पैनल द्वारा विवादों की जांच और अपीलीय समीक्षा की व्यवस्था रही हैं।

दिसंबर 2019 से अपीलीय निकाय नए सदस्यों की नियुक्ति पर सहमति न बन पाने के कारण काम करने में असमर्थ है। इससे विवाद निपटान व्यवस्था की प्रभावशीलता प्रभावित हुई है। अपील के बाद अंतिम निर्णय तक पहुंचने में कठिनाई उत्पन्न होने से व्यापारिक विवादों का समाधान अनिश्चित हो सकता है।

6.1 यूरोपीय संघ का वैकल्पिक दृष्टिकोण

यूरोपीय संघ ने बहुपक्षीय अंतरिम अपीलीय व्यवस्था सहित वैकल्पिक उपायों का समर्थन किया है। ऐसी व्यवस्थाओं का उद्देश्य अपीलीय निकाय के निष्क्रिय रहने के बावजूद भाग लेने वाले सदस्यों के बीच विवादों की समीक्षा के लिए एक संस्थागत रास्ता उपलब्ध कराना है।

हालांकि, किसी वैकल्पिक व्यवस्था से तभी व्यापक लाभ मिलेगा, जब उसमें प्रमुख व्यापारिक अर्थव्यवस्थाओं की भागीदारी हो और उसके निर्णयों को पर्याप्त संस्थागत स्वीकार्यता प्राप्त हो।

6.2 भारत के लिए प्रभावी विवाद निपटान क्यों जरूरी है?

भारत जैसे विकासशील देश के लिए नियम आधारित विवाद निपटान विशेष महत्व रखता है। आर्थिक रूप से शक्तिशाली देश के विरुद्ध व्यापारिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए एक विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय मंच आवश्यक है।

भारत को ऐसे सुधारों का समर्थन करना चाहिए जिनसे:

  • विवादों का समयबद्ध समाधान हो।

  • अपील और समीक्षा की प्रक्रिया स्पष्ट हो।

  • विकासशील देशों को कानूनी विशेषज्ञता और तकनीकी सहायता उपलब्ध हो।

  • किसी सदस्य को एकतरफा आर्थिक दबाव के माध्यम से विवाद का परिणाम निर्धारित करने का अवसर न मिले।

  • व्यवस्था निष्पक्ष, पारदर्शी और सभी सदस्यों के लिए सुलभ बनी रहे।

7. चौदहवां मंत्रिस्तरीय सम्मेलन और सुधार की अधूरी प्रक्रिया

विश्व व्यापार संगठन का चौदहवां मंत्रिस्तरीय सम्मेलन 26 से 30 मार्च 2026 के दौरान याउंडे, कैमरून में आयोजित हुआ। सम्मेलन में संगठन के सुधार, इलेक्ट्रॉनिक वाणिज्य, कृषि, मत्स्य सब्सिडी, निवेश सुविधा और अल्पविकसित देशों से संबंधित मुद्दों पर चर्चा हुई।

सम्मेलन में कुछ निर्णय स्वीकार किए गए, जिनमें छोटे देशों को बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था में बेहतर ढंग से शामिल करने तथा स्वच्छता एवं पादप स्वच्छता उपायों और व्यापार में तकनीकी बाधाओं से संबंधित समझौतों के कुछ विशेष एवं विभेदक व्यवहार प्रावधानों के क्रियान्वयन को अधिक प्रभावी बनाने के निर्णय शामिल थे।

इसके विपरीत, संगठन में व्यापक सुधार, इलेक्ट्रॉनिक वाणिज्य, बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार संबंधी पहलुओं के अंतर्गत गैर-उल्लंघन एवं परिस्थितिजन्य शिकायतों पर स्थगन तथा अल्पविकसित देशों से संबंधित व्यापक मुद्दों पर सहमति पूरी नहीं हो सकी। इन विषयों पर आगे वार्ता जारी रखने की आवश्यकता बनी रही।

भारत ने सम्मेलन में सहमति आधारित निर्णय प्रक्रिया को संगठन की वैधता का आधार बताया। साथ ही, उसने समयबद्ध सुधार प्रक्रिया, स्पष्ट पड़ावों और सभी सदस्यों की भागीदारी वाली समीक्षा की आवश्यकता पर बल दिया।

यह दृष्टिकोण दर्शाता है कि भारत सुधार का विरोध नहीं करता, बल्कि चाहता है कि सुधार की दिशा और प्रक्रिया ऐसी हो जिसमें सभी सदस्यों की चिंताओं को उचित महत्व मिले।

8. वैश्विक दक्षिण के नेतृत्व में भारत की भूमिका

वैश्विक दक्षिण में एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अनेक विकासशील तथा उभरते देश शामिल हैं। इनकी आर्थिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं, लेकिन व्यापार व्यवस्था में न्यायसंगत अवसर, विकास की गुंजाइश और वैश्विक निर्णयों में प्रभावी भागीदारी जैसी चिंताएं कई देशों में समान हैं।

भारत अपनी बड़ी अर्थव्यवस्था, विशाल घरेलू बाजार, सेवा क्षेत्र, कृषि संबंधी आवश्यकताओं और विकासशील देशों के साथ लंबे सहयोग के कारण इस विमर्श में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

भारत के नेतृत्व के तीन प्रमुख आधार हो सकते हैं।

पहला, साझा हितों की पहचान। खाद्य सुरक्षा, किसानों की आजीविका, तकनीकी हस्तांतरण, डिजिटल व्यापार और औद्योगिक विकास जैसे मुद्दों पर विकासशील देशों के बीच व्यावहारिक सहमति बनाना।

दूसरा, रचनात्मक वार्ता। विकसित देशों की चिंताओं को समझते हुए ऐसे प्रस्ताव तैयार करना जो व्यापार नियमों की विश्वसनीयता बनाए रखें, लेकिन विकासशील देशों पर असमान बोझ न डालें।

तीसरा, संस्थागत सुधार। सहमति आधारित निर्णय, विवाद निपटान, पारदर्शिता और विशेष व्यवहार जैसे विषयों पर स्पष्ट तथा क्रियान्वित किए जा सकने वाले सुझाव देना।

भारत के सामने चुनौती यह भी है कि वह केवल विरोध की राजनीति तक सीमित न रहे। उसे ऐसे ठोस प्रस्ताव रखने होंगे जो कृषि, उद्योग, सेवाओं, डिजिटल अर्थव्यवस्था और पर्यावरण के क्षेत्रों में विकासशील देशों की आवश्यकताओं को संबोधित करें।

9. भारत के लिए आगे की राह

भारत की रणनीति में सिद्धांतों की रक्षा और व्यावहारिक आर्थिक हितों के बीच संतुलन आवश्यक है। इसके लिए निम्नलिखित कदम उपयोगी हो सकते हैं।

1. कृषि और खाद्य सुरक्षा: सार्वजनिक भंडारण, न्यूनतम समर्थन मूल्य से जुड़े प्रश्नों तथा विशेष सुरक्षा तंत्र पर विकासशील देशों के साथ समन्वित वार्ता करना।

2. औद्योगिक क्षमता: घरेलू उद्योग, अनुसंधान, हरित प्रौद्योगिकी और रोजगार सृजन के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों के अनुरूप नीतिगत गुंजाइश सुनिश्चित करना।

3. डिजिटल व्यापार: इलेक्ट्रॉनिक वाणिज्य और डिजिटल नियमों पर वार्ता में सक्रिय भागीदारी करते हुए विकासशील देशों के नियामकीय हितों तथा डिजिटल क्षमता संबंधी असमानताओं को महत्व देना।

4. विवाद निपटान: अपीलीय व्यवस्था सहित प्रभावी और सुलभ विवाद समाधान तंत्र की बहाली के लिए रचनात्मक पहल करना।

5. सीमित सदस्य समूहों के समझौते: यह सुनिश्चित करना कि ऐसे समझौते संगठन के मूल सिद्धांतों और गैर-भागीदार देशों के अधिकारों को कमजोर न करें।

6. गठबंधन निर्माण: अफ्रीकी, एशियाई और लैटिन अमेरिकी देशों के साथ विषय आधारित सहयोग विकसित करना, ताकि साझा हितों पर प्रभावी प्रस्ताव प्रस्तुत किए जा सकें।

7. तकनीकी तैयारी: भारतीय वार्ताकारों, शोध संस्थानों, उद्योग संगठनों और कृषि विशेषज्ञों के बीच समन्वय बढ़ाकर साक्ष्य आधारित वार्ता को मजबूत करना।

निष्कर्ष

विश्व व्यापार संगठन आज एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। एक ओर तकनीकी परिवर्तन और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं नए व्यापारिक अवसर पैदा कर रही हैं, तो दूसरी ओर संरक्षणवाद, भू-राजनीतिक तनाव और संस्थागत गतिरोध बहुपक्षीय व्यवस्था की विश्वसनीयता को चुनौती दे रहे हैं।

भारत के लिए यह समय केवल अपने तात्कालिक व्यापारिक हितों की रक्षा करने का नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था के निर्माण में योगदान देने का है जिसमें विकासशील देशों को समान अवसर, पर्याप्त नीतिगत स्वतंत्रता और प्रभावी प्रतिनिधित्व मिले।

सफल सुधार वही होगा जो सहमति को निर्णयहीनता में बदलने से रोके, लेकिन शक्तिशाली देशों के प्रभुत्व को भी स्वीकार न करे। भारत यदि साझा हितों पर गठबंधन बनाने, ठोस प्रस्ताव प्रस्तुत करने और नियम आधारित व्यवस्था की विश्वसनीयता बढ़ाने में सफल होता है, तो वह वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने के साथ-साथ अपने दीर्घकालिक आर्थिक हितों की भी रक्षा कर सकेगा।

वन लाइनर रिवीजन फैक्ट्स 

  • डब्ल्यूटीओ की स्थापना: 1 जनवरी 1995।
  • डब्ल्यूटीओ का मुख्यालय: जिनेवा, स्विट्जरलैंड।
  • डब्ल्यूटीओ की स्थापना करने वाला समझौता: माराकेश समझौता, 1994।
  • सर्वाधिक वरीयता प्राप्त राष्ट्र का सिद्धांत: सामान्यतः व्यापारिक लाभों में भेदभाव को सीमित करता है।
  • विशेष एवं विभेदक व्यवहार: विकासशील और अल्पविकसित सदस्यों की विशेष आवश्यकताओं को ध्यान में रखने वाले प्रावधान।
  • सहमति आधारित निर्णय: किसी औपचारिक आपत्ति के अभाव में निर्णय अपनाने की प्रक्रिया।
  • हरित बॉक्स: कृषि सहायता की वह श्रेणी जो निर्धारित शर्तों के अधीन व्यापार-विकृतकारी प्रभाव नहीं रखने वाली या न्यूनतम प्रभाव वाली मानी जाती है।
  • डब्ल्यूटीओ अपीलीय निकाय: दिसंबर 2019 से नए सदस्यों की नियुक्ति पर गतिरोध के कारण कार्य करने में असमर्थ।
  • एमसी14: 26 से 30 मार्च 2026, याउंडे, कैमरून।
  • अक्टूबर 2026 के डब्ल्यूटीओ अनुमान के अनुसार, 2026 में वस्तु व्यापार की मात्रा में 3.9 प्रतिशत वृद्धि संभावित।
  • अक्टूबर 2026 के डब्ल्यूटीओ अनुमान के अनुसार, 2026 में वाणिज्यिक सेवाओं के व्यापार की मात्रा में 3.3 प्रतिशत वृद्धि संभावित।

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