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भारत की China+1 रणनीति से मिलने वाले सबक

राज्यों की भूमिका क्यों महत्त्वपूर्ण है?

वैश्विक स्तर पर चीन+1 रणनीति (China+1 Strategy) के अंतर्गत कंपनियाँ चीन के अतिरिक्त अन्य देशों में भी अपने विनिर्माण (Manufacturing) कार्यों का विस्तार कर रही हैं। इससे भारत को विदेशी निवेश आकर्षित करने, रोजगार के अवसर पैदा करने और अपने औद्योगिक आधार को मजबूत करने का महत्त्वपूर्ण अवसर प्राप्त हुआ है।

हालाँकि, इस अवसर का लाभ उठाने में केवल केंद्र सरकार की प्रोत्साहन योजनाएँ पर्याप्त नहीं हैं। इसकी सफलता विभिन्न राज्यों की क्षमताओं पर भी निर्भर करती है।

तमिलनाडु और कर्नाटक इसके प्रमुख उदाहरण हैं। ये राज्य दिखाते हैं कि बेहतर आधारभूत संरचना, कुशल श्रमशक्ति, आपूर्तिकर्ताओं के नेटवर्क, प्रशासनिक दक्षता और नीतिगत निरंतरता निवेश के निर्णयों को किस प्रकार प्रभावित करते हैं।

दो राज्य, दो अलग–अलग विकास मॉडल

  1. तमिलनाडु: दशकों के औद्योगिक विकास का परिणाम

तमिलनाडु भारत के प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण केंद्रों में उभरा है।

  • फॉक्सकॉन (Foxconn) श्रीपेरंबुदूर में आईफोन के निर्माण और संयोजन से जुड़ी इकाइयों में हजारों श्रमिकों को रोजगार देता है।
  • टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स (Tata Electronics) ने होसुर में अपनी विनिर्माण गतिविधियों का विस्तार किया है।
  • जनवरी 2026 में केंद्र सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (Electronics Components Manufacturing Scheme- ECMS) के अंतर्गत परियोजनाओं को मंजूरी दी। इनमें युज़ान टेक्नोलॉजी और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स की प्रस्तावित मोबाइल फोन एनक्लोजर निर्माण इकाइयाँ शामिल थीं।

तमिलनाडु की सफलता केवल चीन+1 रणनीति से उत्पन्न अवसरों का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे दीर्घकालीन औद्योगिक नियोजन की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।

राज्य ने तकनीकी शिक्षा, ऑटोमोबाइल उद्योग और स्थानीय आपूर्तिकर्ता नेटवर्क के विकास में निवेश किया है। इससे एक ऐसा औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र (Industrial Ecosystem) विकसित हुआ है, जो नई कंपनियों को उत्पादन शुरू करने और अपने कारोबार का विस्तार करने में सहायता करता है।

निवेशक नीतिगत निरंतरता को भी महत्त्व देते हैं। सरकारों में परिवर्तन होने के बावजूद पूर्व में किए गए वादों और प्रतिबद्धताओं को पूरा करना निवेशकों का विश्वास बढ़ाता है।

तमिलनाडु के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ

  • औद्योगिक भूमि की उपलब्धता और लागत।
  • बिजली की विश्वसनीय आपूर्ति।
  • श्रमशक्ति से संबंधित चुनौतियाँ और प्रवासी श्रमिकों पर निर्भरता।

भविष्य में विकास को बनाए रखने के लिए तमिलनाडु को अधिक पूँजी-प्रधान विनिर्माण, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक घटकों और नवाचार-आधारित निर्यात की दिशा में आगे बढ़ना होगा।

  1. कर्नाटक: प्रौद्योगिकी और इंजीनियरिंग प्रतिभा का लाभ

कर्नाटक ने बेंगलुरु की सॉफ्टवेयर, इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षा संबंधी क्षमताओं के आधार पर अपना औद्योगिक विकास मॉडल विकसित किया है।

  • फॉक्सकॉन का देवनहल्ली में प्रस्तावित 300 एकड़ का परिसर लगभग 50,000 रोजगार के अवसर पैदा करने के उद्देश्य से तैयार किया जा रहा है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, इसमें लगभग 80% कार्यबल महिलाओं का होने का अनुमान व्यक्त किया गया है।
  • टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स ने नरसापुरा में आईफोन विनिर्माण संबंधी अपनी गतिविधियों का विस्तार किया है।

कर्नाटक का अनुभव दर्शाता है कि तकनीकी विशेषज्ञता, इंजीनियरिंग प्रतिभा और स्थापित प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र वैश्विक विनिर्माण कंपनियों को आकर्षित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

तमिलनाडु और कर्नाटक दोनों की विकास यात्राएँ यह स्पष्ट करती हैं कि औद्योगिक सफलता प्राप्त करने के लिए कोई एक अनिवार्य मॉडल नहीं है। अलग-अलग राज्यों की क्षमताओं और परिस्थितियों के अनुरूप विकसित रणनीतियाँ भी सफल हो सकती हैं।

राष्ट्रीय नीतियाँ और राज्य–स्तरीय क्रियान्वयन

  1. केंद्र सरकार के प्रोत्साहनों की भूमिका

केंद्र सरकार उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजनाओं (Production Linked Incentive—PLI), सीमा शुल्क और नियामक सुधारों के माध्यम से घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित कर रही है।

  • बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के लिए शुरू की गई PLI योजना 31 मार्च 2026 को समाप्त हुई और 15 जुलाई 2026 को इसकी उत्तरवर्ती योजना को मंजूरी दी गई।
  • जनवरी 2026 में केंद्र सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (ECMS) के अंतर्गत ₹41,863 करोड़ के निवेश वाली 22 परियोजनाओं को मंजूरी दी। इनसे आठ राज्यों में 33,791 प्रत्यक्ष रोजगार पैदा होने की अपेक्षा व्यक्त की गई।
  • मार्च 2026 में केंद्र सरकार ने भारत के साथ स्थलीय सीमा साझा करने वाले देशों से निवेश के संबंध में प्रेस नोट 3 (Press Note 3) के प्रतिबंधों में ढील देने को भी मंजूरी दी।

इन नीतियों का उद्देश्य भारत में विनिर्माण को बढ़ावा देना, घरेलू उत्पादन क्षमता विकसित करना और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में भारत की भागीदारी बढ़ाना है।

हालाँकि, केवल वित्तीय प्रोत्साहन और नीतिगत घोषणाएँ औद्योगिक सफलता सुनिश्चित नहीं कर सकतीं। राज्यों को निम्नलिखित सुविधाएँ उपलब्ध करानी होंगी:

  • उद्योगों के लिए पर्याप्त भूमि।
  • विश्वसनीय और निर्बाध बिजली आपूर्ति।
  • अनुमतियों एवं स्वीकृतियों की सरल और समयबद्ध प्रक्रिया।
  • प्रशिक्षित एवं कुशल श्रमिक।
  • स्थानीय स्तर पर विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता नेटवर्क।

इस प्रकार, केंद्र सरकार की नीतियाँ निवेश के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ तैयार करती हैं, जबकि राज्यों की प्रशासनिक और औद्योगिक क्षमताएँ इन अवसरों को वास्तविक निवेश एवं रोजगार में बदलती हैं।

  1. विदेशी निवेश के आँकड़ों को समझना

अक्टूबर 2019 से मार्च 2026 के बीच प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (Foreign Direct Investment—FDI) के इक्विटी प्रवाह में विभिन्न राज्यों की हिस्सेदारी का विवरण निम्नलिखित है।

राज्य/केंद्रशासित प्रदेशFDI इक्विटी प्रवाह में हिस्सेदारी
महाराष्ट्रलगभग 31%
कर्नाटकलगभग 21%
गुजरातलगभग 15%
दिल्लीलगभग 13%
तमिलनाडुलगभग 6%

इन आँकड़ों की व्याख्या करते समय एक महत्त्वपूर्ण सीमा को ध्यान में रखना आवश्यक है। उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) सामान्यतः FDI को उस राज्य के आधार पर दर्ज करता है, जहाँ निवेश प्राप्त करने वाली कंपनी का मुख्यालय स्थित है। इसका अर्थ यह नहीं है कि निवेश से संबंधित वास्तविक कारखाना भी उसी राज्य में स्थापित हुआ हो।

उदाहरण के लिए, किसी कंपनी का मुख्यालय एक राज्य में हो सकता है, जबकि उसकी विनिर्माण इकाई दूसरे राज्य में स्थित हो।

इसलिए केवल FDI के आँकड़ों के आधार पर किसी राज्य की औद्योगिक क्षमता का आकलन करना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए निम्नलिखित संकेतकों का भी अध्ययन करना चाहिए:

  1. वास्तविक पूँजीगत व्यय (Capital Expenditure)।
  2. सृजित रोजगार की संख्या और गुणवत्ता।
  3. घरेलू आपूर्तिकर्ताओं का विकास।
  4. स्थानीय स्तर पर निर्मित घटकों का अनुपात।
  5. उत्पादन क्षमता और निर्यात में वृद्धि।

इससे निवेश के आँकड़ों और वास्तविक औद्योगिक गतिविधियों के बीच अंतर को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।

घरेलू आपूर्ति शृंखलाओं और मूल्य संवर्धन का विकास

भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में निर्यात बढ़ रहा है, लेकिन घरेलू उत्पादन में प्रयुक्त कई महत्त्वपूर्ण घटकों के लिए आयात पर निर्भरता बनी हुई है।

  • वर्ष 2025–26 में भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात लगभग 48 अरब डॉलर रहा।
  • इसी अवधि में इलेक्ट्रॉनिक्स आयात लगभग 116 अरब डॉलर तक पहुँचने का उल्लेख किया गया है।
  • एक विनिर्माता ने घरेलू स्तर पर 1 अरब डॉलर की निर्धारित खरीद के लक्ष्य के मुकाबले 600 मिलियन डॉलर की खरीद की।

ये आँकड़े संकेत देते हैं कि भारत ने इलेक्ट्रॉनिक्स के अंतिम उत्पादों के संयोजन (Assembly) में प्रगति की है, लेकिन घरेलू घटक निर्माण और आपूर्ति शृंखला को और मजबूत करने की आवश्यकता है।

घरेलू आपूर्ति शृंखला क्यों महत्त्वपूर्ण है?

जब कोई कंपनी किसी अंतिम उत्पाद का निर्माण करती है, तो उसे अनेक छोटे-बड़े घटकों, मशीनों, कच्चे माल और तकनीकी सेवाओं की आवश्यकता होती है। यदि ये सभी आवश्यकताएँ विदेशों से पूरी की जाती हैं, तो घरेलू अर्थव्यवस्था में उत्पन्न होने वाला मूल्य सीमित रह सकता है।

इसके विपरीत, यदि स्थानीय कंपनियाँ इलेक्ट्रॉनिक घटक, सर्किट बोर्ड, बैटरी, कनेक्टर और अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराने लगें, तो घरेलू उद्योगों का विस्तार होता है।

इस प्रक्रिया को पश्चगामी संबंध (Backward Linkages) कहा जाता है। इसके माध्यम से अंतिम उत्पाद बनाने वाली कंपनियों का घरेलू आपूर्तिकर्ताओं के साथ आर्थिक और औद्योगिक संबंध विकसित होता है।

घरेलू आपूर्ति शृंखला को मजबूत करने के लिए आवश्यक है:

  • स्थानीय कंपनियों में निवेश बढ़ाना।
  • उन्नत तकनीक और उत्पादन संबंधी ज्ञान का हस्तांतरण।
  • तकनीकी शिक्षा और कौशल विकास।
  • छोटे एवं मध्यम उद्यमों की उत्पादन क्षमता में वृद्धि।
  • गुणवत्ता मानकों और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप उत्पादन।

वास्तविक मूल्य संवर्धन (Value Addition) विकसित होने में समय लगता है। इसके लिए चार से पाँच वर्ष तक की अवधि की आवश्यकता पड़ सकती है।

इसलिए भारत को केवल इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के संयोजन तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि घटक निर्माण, तकनीकी नवाचार और घरेलू सामग्री के अधिक उपयोग की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

चुनौतियाँ और आगे की राह: भारत में औद्योगिक विकास का क्षेत्रीय विभाजन

  1. विनिर्माण का असमान भौगोलिक वितरण

भारत में विनिर्माण गतिविधियों का विकास मुख्यतः दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में केंद्रित है। इसके विपरीत, बिहार, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे अधिक जनसंख्या वाले राज्यों में तुलनात्मक रूप से कम निवेश आकर्षित हो रहा है।

इस असमानता के कई संभावित परिणाम हो सकते हैं:

  • क्षेत्रीय आर्थिक असमानताओं में वृद्धि।
  • पिछड़े क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों की कमी।
  • श्रमिकों का विकसित औद्योगिक राज्यों की ओर पलायन।
  • औद्योगिक विकास और आय के अवसरों में अंतर।
  • राष्ट्रीय विनिर्माण क्षमता का सीमित भौगोलिक विस्तार।

केवल सभी राज्यों में समान रूप से सब्सिडी वितरित करने से औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र विकसित नहीं हो सकता। उद्योगों को आकर्षित करने के लिए आधारभूत संरचना, कुशल श्रमिक, प्रशासनिक क्षमता और विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता नेटवर्क भी आवश्यक हैं।

इसलिए क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने के लिए प्रत्येक राज्य की विशिष्ट परिस्थितियों और विकास संबंधी आवश्यकताओं को ध्यान में रखना होगा।

  1. सफल राज्यों की नीतियों को अपनाना

अन्य राज्यों को तमिलनाडु और कर्नाटक के अनुभवों से सीख लेते हुए अपनी औद्योगिक क्षमताओं का विकास करना चाहिए।

इसके लिए निम्नलिखित उपाय महत्त्वपूर्ण हैं:

  1. औद्योगिक आधारभूत संरचना: औद्योगिक पार्क, बिजली, परिवहन, लॉजिस्टिक्स और डिजिटल कनेक्टिविटी का विकास।
  2. तकनीकी शिक्षा: उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रशिक्षण संस्थानों और कौशल विकास कार्यक्रमों का विस्तार।
  3. सरल प्रशासनिक प्रक्रिया: उद्योगों की स्थापना के लिए समयबद्ध अनुमतियाँ और पारदर्शी नियमन।
  4. निवेशकों के साथ संवाद: निवेशकों की समस्याओं का समाधान तथा सरकार की प्रतिबद्धताओं का समय पर पालन।
  5. स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं का विकास: छोटे एवं मध्यम उद्यमों को वैश्विक उत्पादन नेटवर्क से जोड़ना।
  6. स्थानीय क्षमताओं पर आधारित रणनीति: प्रत्येक राज्य को अपनी उपलब्ध श्रमशक्ति, संसाधनों, तकनीकी क्षमताओं और भौगोलिक स्थिति के अनुसार औद्योगिक नीतियाँ तैयार करनी चाहिए।

केंद्र सरकार भी औद्योगिक गलियारों, आधारभूत संरचना के लिए वित्तीय सहायता, कौशल विकास कार्यक्रमों और मापनीय परिणामों से जुड़े प्रोत्साहनों के माध्यम से राज्यों की सहायता कर सकती है।

इस प्रकार, भारत के औद्योगिक विकास के लिए राष्ट्रीय स्तर पर समन्वय और राज्य स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन के बीच संतुलन आवश्यक है।

निष्कर्ष

भारत के लिए चीन+1 रणनीति अपनी विनिर्माण संरचना को बदलने, रोजगार बढ़ाने और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में अपनी भूमिका मजबूत करने का एक महत्त्वपूर्ण अवसर है।

तमिलनाडु का अनुभव दर्शाता है कि दशकों के औद्योगिक विकास, कुशल श्रमशक्ति और स्थापित आपूर्तिकर्ता नेटवर्क से निवेश आकर्षित करने की क्षमता विकसित होती है। वहीं, कर्नाटक का उदाहरण बताता है कि तकनीकी विशेषज्ञता, इंजीनियरिंग प्रतिभा और प्रौद्योगिकी संबंधी पारिस्थितिकी तंत्र भी वैश्विक विनिर्माण को आकर्षित कर सकते हैं।

भारत को इस अवसर का दीर्घकालीन लाभ उठाने के लिए घरेलू आपूर्ति शृंखलाओं को मजबूत करना, मूल्य संवर्धन बढ़ाना, नीतिगत स्थिरता बनाए रखना और औद्योगिक विकास को विभिन्न क्षेत्रों तक पहुँचाना होगा।

मुख्य निष्कर्ष यह है कि राष्ट्रीय प्रोत्साहन निवेश को आकर्षित कर सकते हैं, लेकिन राज्य स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन ही उसे टिकाऊ औद्योगिक विकास में बदलता है। सफल राज्यों के अनुभवों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अपनाकर भारत प्रतिस्पर्धी, विविधतापूर्ण और समावेशी विनिर्माण अर्थव्यवस्था का निर्माण कर सकता है।


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