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एक्ट ईस्ट, 2026: उथल-पुथल भरी विश्व व्यवस्था में भारत की सामरिक पुनर्संरचना (Strategic Rejig)

‘Act East 2026’: India’s Strategic Rejig in a Turbulent World Order- THE ASIAN AGE

21वीं सदी का तीसरा दशक वैश्विक राजनीति (Global Politics) में गहरे परिवर्तन का काल है। यदि शीत युद्ध (Cold War) के बाद का युग वैश्वीकरण (Globalisation) और मुक्त व्यापार (Free Trade) का युग माना जाता था, तो वर्तमान समय भूराजनीतिक प्रतिस्पर्धा (Geopolitical Competition), भूअर्थशास्त्र (Geoeconomics), तकनीकी प्रतिद्वंद्विता (Tech Rivalry), आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा (Supply Chain Security) तथा समुद्री शक्ति (Maritime Power) का युग बन चुका है।

  • कोविड-19 महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में संघर्ष, चीन की आक्रामक विदेश नीति तथा अमेरिका-चीन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा ने वैश्विक शक्ति संतुलन को पुनर्परिभाषित कर दिया है।
  • ऐसे परिवेश में भारत की एक्ट ईस्ट नीति (Act East Policy)’ केवल दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ संबंध बढ़ाने की नीति नहीं रह गई है, बल्कि यह भारत की इंडोपैसिफिक रणनीति (Indo-Pacific Strategy), आर्थिक सुरक्षा (Economic Security), समुद्री हित (Maritime Interests), ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) और वैश्विक नेतृत्व (Global Leadership) की आधारशिला बन चुकी है।
  • पूर्व राजनयिक गुरजीत सिंह अपने लेख में तर्क देते हैं कि वर्ष 2026 भारत की एक्ट ईस्ट नीति के लिए एक निर्णायक मोड़ (Strategic Inflection Point) सिद्ध हो सकता है। उनके अनुसार, यदि भारत बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप अपनी नीति का पुनर्गठन नहीं करता, तो वह एशिया की बदलती भू-राजनीति में अपनी रणनीतिक बढ़त खो सकता है।

एक्ट ईस्ट नीति : आर्थिक कूटनीति से सामरिक रणनीति तक की यात्रा

भारत की पूर्वमुखी विदेश नीति का प्रारंभ 1991 में प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव द्वारा प्रारंभ की गई लुक ईस्ट नीति (Look East Policy)’ से हुआ। उस समय भारत आर्थिक उदारीकरण के दौर से गुजर रहा था और दक्षिण-पूर्व एशिया की तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्थाओं विशेषकर ASEAN के साथ व्यापार एवं निवेश बढ़ाना उसकी प्राथमिकता थी।

उस समय का उद्देश्य मुख्यतः आर्थिक था-

  • व्यापार बढ़ाना,
  • विदेशी निवेश आकर्षित करना,
  • भारतीय अर्थव्यवस्था को एशियाई बाज़ारों से जोड़ना।

किन्तु वर्ष 2014 के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस नीति को ‘Act East Policy’ का रूप दिया। यह केवल नाम का परिवर्तन नहीं था, बल्कि भारत की विदेश नीति की सोच में एक मौलिक परिवर्तन था। अब उद्देश्य केवल व्यापार नहीं, बल्कि सक्रिय रणनीतिक भागीदारी (Active Strategic Engagement) बन गया।

इस नई नीति के अंतर्गत भारत ने समुद्री सुरक्षा, रक्षा सहयोग, इंडो-पैसिफिक साझेदारी, डिजिटल संपर्क, कनेक्टिविटी, आपूर्ति श्रृंखला, ब्लू इकोनॉमी, उभरती प्रौद्योगिकियों को भी अपनी पूर्वी नीति का हिस्सा बनाया।

वर्ष 2026 क्यों महत्वपूर्ण माना जा रहा है?

लेखक का मानना है कि वर्ष 2026 केवल कैलेंडर का एक और वर्ष नहीं है, बल्कि भारत की विदेश नीति के लिए रणनीतिक पुनर्संरचना (Strategic Rejig) का अवसर है।

इसके पीछे अनेक कारण हैं।

  • सबसे पहला कारण है अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन का बदलना। पिछले कुछ वर्षों में विश्व एकध्रुवीय (Unipolar) व्यवस्था से बहुध्रुवीय (Multipolar) व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। अमेरिका अब भी सबसे बड़ी शक्ति है, लेकिन चीन का उदय, रूस की सामरिक सक्रियता, यूरोप की सुरक्षा चिंताएँ तथा मध्य शक्तियों (Middle Powers) की बढ़ती भूमिका वैश्विक राजनीति को जटिल बना रही है।
  • दूसरा कारण है अमेरिकाचीन प्रतिद्वंद्विता। आज प्रतिस्पर्धा केवल सैन्य क्षेत्र तक सीमित नहीं है। यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर, 5G, दुर्लभ खनिज (Rare Earths), समुद्री मार्गों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं तक फैल चुकी है। भारत इस प्रतिस्पर्धा का प्रत्यक्ष पक्षकार नहीं है, लेकिन उसका प्रभाव भारत की आर्थिक और सुरक्षा नीतियों पर पड़ता है।
  • तीसरा कारण है वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का पुनर्गठन। कोविड-19 महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी एक देश, विशेषकर चीन, पर अत्यधिक निर्भरता वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए जोखिमपूर्ण है। इसलिए आज विश्व ‘China Plus One Strategy’ अपनाने की दिशा में बढ़ रहा है। भारत के सामने यह अवसर है कि वह वैश्विक विनिर्माण और आपूर्ति श्रृंखला का विश्वसनीय केंद्र बने।

इंडोपैसिफिक : केवल समुद्र नहीं, बल्कि 21वीं सदी का शक्तिकेंद्र

लेख का सबसे महत्वपूर्ण विचार यह है कि आज विश्व की सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा इंडोपैसिफिक क्षेत्र में केंद्रित है।

इंडो-पैसिफिक केवल एक भौगोलिक अवधारणा नहीं है यह वह क्षेत्र है-

  • जहाँ विश्व के अधिकांश समुद्री व्यापार मार्ग (Sea Lanes of Communication) स्थित हैं,
  • जहाँ वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति गुजरती है,
  • जहाँ विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ स्थित हैं,
  • और जहाँ अमेरिका तथा चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा सबसे अधिक दिखाई देती है।

भारत की भौगोलिक स्थिति उसे हिंद महासागर का प्राकृतिक शक्ति केंद्र बनाती है। इसलिए एक्ट ईस्ट नीति वास्तव में भारत की इंडोपैसिफिक रणनीति का पूर्वी आयाम है।

ASEAN : भारत की एक्ट ईस्ट नीति का केंद्रीय स्तंभ

भारत की एक्ट ईस्ट नीति का वास्तविक आधार ASEAN है। ASEAN भारत और प्रशांत महासागर के बीच एक रणनीतिक सेतु (Strategic Bridge) का कार्य करता है।

  • ASEAN देशों के साथ भारत के संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं। वे समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी सहयोग, डिजिटल अर्थव्यवस्था, कनेक्टिविटी, रक्षा सहयोग, ब्लू इकोनॉमी, आपूर्ति श्रृंखला, और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था (Rules-Based International Order) से जुड़े है।
  • लेखक चेतावनी देते हैं कि यदि भारत ASEAN के साथ अपने संबंधों को पर्याप्त गति नहीं देता, तो चीन क्षेत्र में अपनी रणनीतिक बढ़त और मजबूत कर सकता है।

जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड : नए रणनीतिक साझेदार

  • जापान भारत के लिए पूंजी, प्रौद्योगिकी और विश्वसनीय निवेश का स्रोत है। दोनों देश Free and Open Indo-Pacific (FOIP) की अवधारणा को आगे बढ़ाते हैं। मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन, औद्योगिक गलियारे, मेट्रो परियोजनाएँ तथा सेमीकंडक्टर सहयोग इस संबंध को नई दिशा दे रहे हैं।
  • ऑस्ट्रेलिया भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भविष्य की हरित अर्थव्यवस्था (Green Economy) और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए आवश्यक लिथियम, कोबाल्ट और अन्य Critical Minerals का प्रमुख स्रोत वही है। साथ ही, ऑस्ट्रेलिया हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत का रक्षा और समुद्री सुरक्षा साझेदार भी है।
  • न्यूज़ीलैंड अपेक्षाकृत छोटा देश होने के बावजूद कृषि, डेयरी, शिक्षा, हरित प्रौद्योगिकी और प्रशांत द्वीपीय देशों के साथ भारत के संबंधों को मजबूत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। लेखक का संकेत है कि भारत को छोटे लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देशों को भी अपनी एक्ट ईस्ट नीति का अभिन्न अंग बनाना चाहिए।

QUAD : सुरक्षा संवाद से व्यापक रणनीतिक मंच तक

QUAD को केवल चीन-विरोधी सैन्य गठबंधन के रूप में देखना उचित नहीं होगा।

  • भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का यह समूह अब समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला, उभरती प्रौद्योगिकियाँ, स्वास्थ्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, और आपदा प्रबंध जैसे विषयों पर भी सहयोग बढ़ा रहा है।
  • भारत को QUAD को केवल सुरक्षा मंच नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक एवं तकनीकी साझेदारी के रूप में विकसित करना चाहिए।

भूअर्थशास्त्र (Geoeconomics) : नई विदेश नीति का आधार

भविष्य की विदेश नीति केवल सैन्य शक्ति पर आधारित नहीं होगी। आर्थिक शक्ति, प्रौद्योगिकी, आपूर्ति श्रृंखला और महत्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals) किसी भी राष्ट्र की सामरिक क्षमता का आधार बनेंगे।

इसलिए भारत को-

  • विनिर्माण क्षमता बढ़ानी होगी,
  • वैश्विक निवेश आकर्षित करना होगा,
  • सेमीकंडक्टर उद्योग विकसित करना होगा,
  • विश्वसनीय आपूर्ति श्रृंखला का केंद्र बनना होगा,
  • और डिजिटल अर्थव्यवस्था में नेतृत्व स्थापित करना होगा।

कि यदि भारत केवल उच्चस्तरीय यात्राओं और घोषणाओं तक सीमित रहता है, तो एक्ट ईस्ट नीति अपने उद्देश्य प्राप्त नहीं कर सकेगी।

नीति को सफल बनाने के लिए आवश्यक है कि-

  • व्यापार समझौतों को गति मिले,
  • कनेक्टिविटी परियोजनाएँ समय पर पूरी हों,
  • पूर्वोत्तर भारत को ASEAN से जोड़ा जाए,
  • समुद्री अवसंरचना विकसित हो,
  • और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़े।

निष्कर्ष : Look East’ से Lead East’ की ओर

लेख का मूल संदेश यह है कि वर्ष 2026 भारत के लिए केवल एक्ट ईस्ट नीति की समीक्षा का अवसर नहीं, बल्कि उसकी पुनर्परिकल्पना (Reimagination) का समय है। बदलती विश्व व्यवस्था में भारत को केवल पूर्व की ओर देखना (Look East) या सक्रिय होना (Act East) पर्याप्त नहीं होगा; उसे पूर्वी एशिया और इंडोपैसिफिक में एक विश्वसनीय, निर्णायक और नेतृत्वकारी शक्ति (Lead East) के रूप में उभरना होगा।

यदि भारत ASEAN की केंद्रीयता का सम्मान करते हुए जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, QUAD और अन्य इंडो-पैसिफिक साझेदारों के साथ आर्थिक, तकनीकी, समुद्री और रणनीतिक सहयोग को संस्थागत रूप देता है, तो वह न केवल अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास को सुदृढ़ करेगा, बल्कि 21वीं सदी की उभरती वैश्विक व्यवस्था के निर्माण में भी एक प्रमुख भूमिका निभाएगा। यही इस लेख का केंद्रीय संदेश है।


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