संबंधात्मक समानता (Relational Equality) समकालीन राजनीतिक दर्शन में समानता और सामाजिक न्याय का एक महत्त्वपूर्ण दृष्टिकोण है। इसके अनुसार, समानता का अर्थ केवल व्यक्तियों के बीच आय, संपत्ति, संसाधनों या अवसरों का समान वितरण करना नहीं है, बल्कि ऐसा समाज स्थापित करना है, जिसमें सभी व्यक्ति एक-दूसरे के साथ समान सामाजिक दर्जे, परस्पर सम्मान और स्वतंत्र नागरिकों के रूप में व्यवहार कर सकें।
इस दृष्टिकोण का प्रमुख प्रश्न है ‘समाज में लोग एक-दूसरे के साथ किस प्रकार के संबंध रखते हैं? क्या कुछ व्यक्ति दूसरों पर प्रभुत्व स्थापित करते हैं?’ क्या किसी व्यक्ति को उसकी जाति, वर्ग, लिंग, नस्ल, धर्म या आर्थिक स्थिति के कारण हीन समझा जाता है? क्या सभी व्यक्तियों को समान नागरिक सम्मान और सामाजिक सहभागिता प्राप्त है?
संबंधात्मक समानता का तर्क है कि एक न्यायपूर्ण समाज में किसी व्यक्ति को दूसरे के अधीन, सामाजिक रूप से हीन या प्रभुत्वशाली वर्ग पर निर्भर होकर जीवन जीने के लिए बाध्य नहीं होना चाहिए।
इस प्रकार, संबंधात्मक समानता का केंद्रीय विचार है कि न्यायपूर्ण समाज वह है, जिसमें व्यक्ति केवल संसाधनों के स्तर पर नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों, अधिकारों, सम्मान और शक्ति के स्तर पर भी बराबर हों।
एलिजाबेथ एंडरसन: जीवन परिचय एवं बौद्धिक योगदान
- एंडरसन समानता, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, श्रम-संबंधों, लैंगिक न्याय और नैतिक दर्शन पर अपने महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने समानता को केवल वितरण की समस्या मानने के बजाय सामाजिक संबंधों और लोकतांत्रिक नागरिकता के संदर्भ में समझने पर बल दिया।
- एलिजाबेथ एंडरसन का संबंध समकालीन राजनीतिक दर्शन की उस परंपरा से है, जो यह प्रश्न उठाती है कि समानता का वास्तविक उद्देश्य क्या होना चाहिए। उनके अनुसार, समानता का लक्ष्य सभी व्यक्तियों को बिल्कुल समान मात्रा में संसाधन उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि ऐसी सामाजिक व्यवस्था स्थापित करना है, जिसमें कोई व्यक्ति दूसरे के सामने हीन, अधीनस्थ या अपमानित स्थिति में न रहे।
- उनका प्रसिद्ध शोधपत्र What Is the Point of Equality? (1999) संबंधात्मक समानता के अध्ययन में विशेष महत्त्व रखता है। इसमें उन्होंने वितरण-केंद्रित समतावादी सिद्धांतों की आलोचना करते हुए लोकतांत्रिक समानता (Democratic Equality) की अवधारणा प्रस्तुत की।
- उनकी अन्य महत्त्वपूर्ण कृति The Imperative of Integration (2010) है, जिसमें उन्होंने नस्लीय अलगाव, सामाजिक विभाजन और लोकतांत्रिक समाज में एकीकरण के महत्त्व पर विचार किया।
एंडरसन के दृष्टिकोण को समझने के लिए तीन विचार विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है: लोकतांत्रिक समानता, समान सामाजिक दर्जा और प्रभुत्व एवं अपमान से मुक्ति।
संबंधात्मक समानता की प्रमुख विशेषताएँ
(क) समान सामाजिक दर्जा (Equal Social Status)
- संबंधात्मक समानता का पहला आधार यह है कि समाज के सभी व्यक्तियों को समान नैतिक और सामाजिक सम्मान प्राप्त होना चाहिए। किसी व्यक्ति की सामाजिक स्थिति का निर्धारण उसकी जाति, लिंग, नस्ल, वर्ग, धर्म या पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए।
- एंडरसन के अनुसार, लोकतांत्रिक समाज का लक्ष्य ऐसी परिस्थितियाँ बनाना है, जिनमें व्यक्ति एक-दूसरे के साथ बराबरी के आधार पर संबंध स्थापित कर सकें।
(ख) प्रभुत्व से मुक्ति (Freedom from Domination)
- प्रभुत्व उस स्थिति को कहते हैं, जिसमें कोई व्यक्ति या समूह दूसरे व्यक्ति के जीवन, निर्णयों और अवसरों पर अनुचित नियंत्रण रखता है। संबंधात्मक समानता ऐसे सामाजिक संबंधों का विरोध करती है, जिनमें एक पक्ष को दूसरे पर मनमाना अधिकार प्राप्त हो।
- इसलिए समानता के लिए केवल आर्थिक संसाधन ही नहीं, बल्कि अधिकारों की सुरक्षा, शिकायत निवारण, सामूहिक संगठन और मनमानी शक्ति पर नियंत्रण भी आवश्यक हैं।
(ग) अपमान एवं सामाजिक कलंक से मुक्ति (Freedom from Stigma)
- संबंधात्मक समानता उन सामाजिक मान्यताओं और प्रथाओं का विरोध करती है, जिनके माध्यम से कुछ समूहों को हीन या कम योग्य माना जाता है।
- जातिगत भेदभाव, लैंगिक रूढ़ियाँ, नस्लीय पूर्वाग्रह और दिव्यांग व्यक्तियों के प्रति अपमानजनक व्यवहार इसके उदाहरण हैं। ऐसी स्थितियों में समस्या केवल संसाधनों की कमी नहीं होती, बल्कि समाज में व्यक्ति की पहचान और सम्मान को भी नुकसान पहुँचता है।
- एंडरसन का दृष्टिकोण इस बात पर बल देता है कि न्यायपूर्ण व्यवस्था में किसी व्यक्ति को अपनी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपमानजनक शर्तें स्वीकार करने या अपनी सामाजिक हीनता सिद्ध करने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।
(घ) लोकतांत्रिक नागरिकता (Democratic Citizenship)
- एंडरसन की लोकतांत्रिक समानता का उद्देश्य ऐसा समाज बनाना है, जिसमें सभी नागरिक एक-दूसरे के बराबर हों और सार्वजनिक जीवन में भाग लेने की वास्तविक स्वतंत्रता रखते हों।
- नागरिकों को राजनीतिक निर्णयों में भाग लेने, अपनी बात रखने, दूसरों की आलोचना करने और सार्वजनिक संस्थाओं से जवाबदेही माँगने का अवसर मिलना चाहिए। यदि कुछ समूहों की आवाज को उनकी सामाजिक पहचान के कारण कम महत्त्व दिया जाता है, तो लोकतांत्रिक समानता कमजोर होती है।
- इस प्रकार, संबंधात्मक समानता राजनीतिक समानता को केवल मतदान के अधिकार तक सीमित नहीं रखती, बल्कि सामाजिक सम्मान और प्रभावी नागरिक सहभागिता से भी जोड़ती है।
(ङ) पारस्परिक सम्मान (Mutual Respect)
- समानता का अर्थ यह नहीं है कि सभी व्यक्तियों की क्षमताएँ, उपलब्धियाँ, आवश्यकताएँ या जीवनशैली एक जैसी हों। इसका अर्थ यह है कि इन भिन्नताओं के बावजूद प्रत्येक व्यक्ति को समान नैतिक सम्मान प्राप्त हो।
- उदाहरण के लिए, डॉक्टर, शिक्षक, सफाई कर्मचारी और घरेलू कामगार अलग-अलग कार्य करते हैं, लेकिन किसी के व्यवसाय के आधार पर उसे कम मानवीय सम्मान देना संबंधात्मक असमानता का उदाहरण होगा।
एंडरसन की लोकतांत्रिक समानता (Democratic Equality)
- एलिजाबेथ एंडरसन के सिद्धांत का केंद्रीय भाग लोकतांत्रिक समानता है। उनके शोधपत्र What Is the Point of Equality? (1999) में यह तर्क दिया गया है कि समतावादी न्याय का मुख्य उद्देश्य व्यक्तियों को समान सामाजिक संबंधों में रहने योग्य बनाना है।
- एंडरसन के अनुसार, समानता का उद्देश्य लोगों को एक-दूसरे के बराबर बनाना नहीं, बल्कि उन्हें एक-दूसरे के बराबर के रूप में व्यवहार करने में सक्षम बनाना है।
उनके दृष्टिकोण में लोकतांत्रिक समानता के प्रमुख आयाम निम्नलिखित हैं:
- उत्पीड़न से मुक्ति: किसी भी व्यक्ति को सामाजिक समूह की सदस्यता के कारण भेदभाव, उत्पीड़न या अपमान का सामना नहीं करना चाहिए।
- नागरिक समानता: प्रत्येक व्यक्ति को समान बुनियादी अधिकार, स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक संस्थाओं में भागीदारी का अवसर मिलना चाहिए।
- सामाजिक सहभागिता: व्यक्तियों को शिक्षा, रोजगार, सामाजिक जीवन और सार्वजनिक संस्थाओं में सम्मानपूर्वक भाग लेने की वास्तविक परिस्थितियाँ उपलब्ध होनी चाहिए।
- आर्थिक स्वतंत्रता: आर्थिक संसाधनों की कमी के कारण किसी व्यक्ति को दूसरे की मनमानी पर निर्भर नहीं होना चाहिए। इसलिए सामाजिक सुरक्षा, उचित कार्य-स्थितियाँ और आर्थिक अवसर भी महत्त्वपूर्ण हैं।
- जवाबदेह संस्थाएँ: सामाजिक और आर्थिक शक्ति का उपयोग इस प्रकार नियंत्रित होना चाहिए कि कोई समूह दूसरे समूह पर मनमाना प्रभुत्व स्थापित न कर सके।
इस प्रकार, लोकतांत्रिक समानता वितरण, अधिकारों और सामाजिक संबंधों को जोड़ती है। यह आर्थिक असमानताओं को अप्रासंगिक नहीं मानती, बल्कि उनका मूल्यांकन इस आधार पर करती है कि वे लोगों के बीच किस प्रकार के संबंध पैदा करती हैं।
संबंधात्मक समानता और वितरणात्मक समानता में अंतर
वितरणात्मक समानता (Distributive Equality) इस बात पर ध्यान देती है कि आय, संपत्ति, अवसर या अन्य लाभ किस प्रकार वितरित किए जाने चाहिए। इसके विपरीत, संबंधात्मक समानता इस बात पर विशेष बल देती है कि वितरण की व्यवस्था व्यक्तियों के बीच समानता या अधीनता के किस प्रकार के संबंध पैदा करती है।
| आधार | वितरणात्मक समानता | संबंधात्मक समानता |
| मुख्य प्रश्न | संसाधनों और लाभों का वितरण कैसा है? | लोग एक-दूसरे के साथ किस प्रकार के संबंध रखते हैं? |
| प्रमुख लक्ष्य | उचित एवं न्यायपूर्ण वितरण | समान सामाजिक दर्जा और सम्मान |
| असमानता का आकलन | आय, संपत्ति, अवसर और अन्य लाभों में अंतर | प्रभुत्व, भेदभाव, अपमान और सामाजिक अधीनता |
| समानता का अर्थ | संसाधनों या अवसरों का न्यायपूर्ण वितरण | व्यक्तियों का बराबर के रूप में व्यवहार करना |
| प्रमुख समस्या | संसाधनों का अनुचित वितरण | असमान शक्ति-संबंध और सामाजिक पदानुक्रम |
| समाधान | पुनर्वितरण, कराधान, सामाजिक सहायता | अधिकारों की सुरक्षा, भेदभाव का अंत, शक्ति पर नियंत्रण और समावेशन |
| प्रमुख विचारक | जॉन रॉल्स सहित विभिन्न समतावादी विचारक | एलिजाबेथ एंडरसन |
यह अंतर पूर्णतः विरोधात्मक नहीं है। संबंधात्मक समानता संसाधनों के उचित वितरण का विरोध नहीं करती। इसके बजाय वह यह समझने का आग्रह करती है कि वितरणात्मक व्यवस्थाएँ सामाजिक संबंधों को किस प्रकार प्रभावित करती हैं।
\संबंधात्मक समानता और जॉन रॉल्स का न्याय सिद्धांत
- जॉन रॉल्स (John Rawls) ने अपनी पुस्तक A Theory of Justice (1971) में न्याय को निष्पक्षता (Justice as Fairness) के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने समान बुनियादी स्वतंत्रताओं, अवसरों की निष्पक्ष समानता और सामाजिक-आर्थिक असमानताओं के न्यायसंगत नियमन पर बल दिया।
- एंडरसन और रॉल्स दोनों एक न्यायपूर्ण लोकतांत्रिक समाज के समर्थक हैं, लेकिन उनके दृष्टिकोण का केंद्र अलग है। रॉल्स का सिद्धांत सामाजिक संस्थाओं, प्राथमिक सामाजिक वस्तुओं और उनके वितरण पर विशेष ध्यान देता है। एंडरसन इस प्रश्न को आगे बढ़ाती हैं कि क्या इन संस्थाओं के अंतर्गत लोग वास्तव में एक-दूसरे के बराबर के रूप में व्यवहार कर सकते हैं।
इसलिए रॉल्स के सिद्धांत और संबंधात्मक समानता को परस्पर विरोधी मानना उचित नहीं है। उचित वितरण और समान सामाजिक संबंध एक-दूसरे को मजबूत कर सकते हैं।
संबंधात्मक समानता और भाग्य समतावाद (Luck Egalitarianism)
- भाग्य समतावाद एक समतावादी दृष्टिकोण है, जिसके अनुसार उन असमानताओं को विशेष महत्त्व दिया जाना चाहिए, जो व्यक्ति के नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों के कारण उत्पन्न होती हैं। इसके विपरीत, स्वैच्छिक चुनावों के परिणामों और अनैच्छिक परिस्थितियों के बीच अंतर किया जाता है।
- एंडरसन ने अपने शोधपत्र What Is the Point of Equality? (1999) में भाग्य समतावाद की आलोचना की। उनके अनुसार, इस दृष्टिकोण की कुछ व्याख्याएँ उन व्यक्तियों के प्रति कठोर हो सकती हैं, जो गलत चुनाव करते हैं या जिन्हें सहायता की आवश्यकता है।
उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति अपनी आर्थिक कठिनाइयों के कारण सामाजिक सहायता प्राप्त करना चाहता है, तो यह जाँचना कि उसकी गरीबी उसके अपने चुनावों का परिणाम है या दुर्भाग्य का, उसे अपमानजनक स्थिति में डाल सकता है।
एंडरसन के अनुसार, समानता का उद्देश्य लोगों को उनके चुनावों के लिए नैतिक रूप से दंडित करना नहीं, बल्कि उन्हें समान नागरिकों के रूप में जीवन जीने की परिस्थितियाँ प्रदान करना होना चाहिए।
यहाँ ध्यान देना आवश्यक है कि भाग्य समतावाद की सभी व्याख्याएँ एक जैसी नहीं हैं। एंडरसन की आलोचना विशेष रूप से उन रूपों पर केंद्रित है, जो सहायता के पात्र व्यक्तियों के प्रति अपमानजनक या बहिष्कारी दृष्टिकोण पैदा कर सकते हैं।
निष्कर्ष
संबंधात्मक समानता समानता की अवधारणा को केवल संसाधनों के वितरण से आगे बढ़ाकर सामाजिक संबंधों, सम्मान, स्वतंत्रता और शक्ति के प्रश्नों से जोड़ती है। एलिजाबेथ एंडरसन का प्रमुख योगदान यह स्पष्ट करना है कि समानता का उद्देश्य सभी व्यक्तियों को एक-दूसरे के बराबर के रूप में जीवन जीने योग्य बनाना है, न कि केवल उनके पास उपलब्ध वस्तुओं या संसाधनों के अंतर को कम करना।
एक न्यायपूर्ण लोकतांत्रिक समाज में व्यक्तियों को समान नागरिक दर्जा प्राप्त होना चाहिए और किसी को भी जाति, लिंग, वर्ग या सामाजिक पहचान के आधार पर अधीनस्थ अथवा अपमानित स्थिति में नहीं रखा जाना चाहिए।
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