भूमिका
आधुनिक राजनीतिक चिंतन प्रायः यह मानकर चलता है कि राज्य का मूल कार्य जीवन की रक्षा करना है। हॉब्स के लिए राज्य का जन्म ही इसलिए होता है कि प्राकृतिक अवस्था के “हिंसक मृत्यु के भय” से मनुष्य को मुक्ति मिले। लॉक के लिए जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति की रक्षा सरकार का प्रयोजन है। बीसवीं शताब्दी में मिशेल फूको ने बताया कि आधुनिक शक्ति जनसंख्या के स्वास्थ्य, जन्म-दर, आयु और कल्याण का प्रबंधन करती है, यानी वह “जीवन की शक्ति” (Biopower) है।
किंतु इतिहास का एक दूसरा पक्ष भी है: दास-व्यापार, बागान, उपनिवेश, नरसंहार, रंगभेद, शरणार्थी शिविर और सैन्य कब्ज़े। इन स्थानों पर राज्य और शक्ति का चेहरा जीवन की रक्षा करने वाला नहीं, बल्कि मृत्यु का वितरण करने वाला दिखाई देता है। कैमरून में जन्मे राजनीतिक दार्शनिक अशील म्बेम्बे (Achille Mbembe) ने इसी पक्ष को एक सैद्धांतिक नाम दिया: नेक्रोपॉलिटिक्स (Necropolitics), अर्थात् मृत्यु-राजनीति। यूनानी शब्द “नेक्रोस” (Nekros) का अर्थ है शव या मृत। इस सिद्धांत का केंद्रीय प्रश्न है: समकालीन विश्व में किसे जीने दिया जाता है और किसे मरने के लिए छोड़ दिया जाता है, और यह निर्णय कौन करता है?
समकालीन राजनीतिक सिद्धांत, उत्तर-औपनिवेशिक चिंतन (Postcolonial Thought) और शक्ति के सिद्धांतों के अध्ययन में यह अवधारणा तेज़ी से महत्वपूर्ण हुई है। UGC NET की दृष्टि से फूको की जैव-शक्ति, अगाम्बेन की “अपवाद की स्थिति” और म्बेम्बे की नेक्रोपॉलिटिक्स को एक साथ समझना आवश्यक है।
अशील म्बेम्बे: परिचय
जन्म: 1957, कैमरून।
शिक्षा: 1989 में पेरिस-1 (पैंथियॉन सोरबोन) विश्वविद्यालय से इतिहास में पीएच.डी.; उनका शोध कैमरून में उपनिवेशवाद-विरोधी प्रतिरोध के इतिहास पर था। उन्होंने पेरिस के राजनीति विज्ञान संस्थान (Sciences Po) से भी अध्ययन किया।
कार्यक्षेत्र: जोहान्सबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) के विटवॉटर्सरैंड विश्वविद्यालय के “विट्स सामाजिक एवं आर्थिक अनुसंधान संस्थान” (WiSER) में इतिहास और राजनीति के शोध-प्रोफ़ेसर।
सम्मान: 2024 का होलबर्ग पुरस्कार (Holberg Prize), जो मानविकी, सामाजिक विज्ञान, विधि और धर्मशास्त्र के क्षेत्र का प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार है।
प्रमुख कृतियाँ: “On the Postcolony” (फ़्रेंच 2000, अंग्रेज़ी 2001), “Critique of Black Reason” (फ़्रेंच 2013, अंग्रेज़ी 2017), “Necropolitics” (फ़्रेंच 2016, अंग्रेज़ी 2019), “Out of the Dark Night” (फ़्रेंच 2010, अंग्रेज़ी 2021), “Brutalism” (फ़्रेंच 2020, अंग्रेज़ी 2024) और “The Earthly Community” (2022)।
म्बेम्बे के चिंतन की विशेषता यह है कि वे यूरोपीय दर्शन (हेगेल, बताई, फूको, अगाम्बेन) के उपकरणों का प्रयोग करते हुए उसे अफ्रीका और उपनिवेशित विश्व के अनुभव से परखते हैं। उनका तर्क है कि आधुनिकता को केवल यूरोप के भीतर से नहीं समझा जा सकता; उसके निर्माण में उपनिवेश और दासता की केंद्रीय भूमिका रही है।
मूल निबंध (2003) और पुस्तक (2019)
2003 का निबंध
“Necropolitics” शीर्षक का मूल निबंध 2003 में अमेरिकी पत्रिका “Public Culture” (खंड 15, अंक 1, पृष्ठ 11-40) में प्रकाशित हुआ। इसका फ़्रेंच से अंग्रेज़ी अनुवाद लिबी माइंटजीज़ (Libby Meintjes) ने किया। यह निबंध लगभग तीस पृष्ठों का है, किंतु बीसवीं शताब्दी के अंत और इक्कीसवीं शताब्दी के आरंभ के सबसे अधिक उद्धृत राजनीतिक-दार्शनिक निबंधों में गिना जाता है।
निबंध का क्रम मोटे तौर पर इस प्रकार है:
- राजनीति, संप्रभुता और मृत्यु का संबंध; हेगेल और जॉर्ज बताई (Georges Bataille) के दर्शन में मृत्यु।
- फूको की जैव-शक्ति और नस्लवाद का विवेचन।
- बागान, उपनिवेश और रंगभेद के रूप में आधुनिकता के “अपवाद क्षेत्र”।
- समकालीन औपनिवेशिक कब्ज़ा, बुनियादी ढाँचे का युद्ध और “युद्ध मशीनें” (War Machines)।
- आत्मघाती हमलावर, शहादत और प्रतिरोध में मृत्यु का प्रश्न।
- निष्कर्ष: “मृत्यु-लोक” और “जीवित मृत” की अवधारणाएँ।
2019 की पुस्तक
2016 में म्बेम्बे की फ़्रेंच पुस्तक “Politiques de l’inimitié” (शत्रुता की राजनीति) प्रकाशित हुई। इसका अंग्रेज़ी अनुवाद स्टीवन कोरकोरन (Steven Corcoran) ने किया और 2019 में ड्यूक यूनिवर्सिटी प्रेस ने इसे “Necropolitics” शीर्षक से प्रकाशित किया। पुस्तक में 2003 के निबंध का संशोधित रूप एक अध्याय के रूप में सम्मिलित है।
पुस्तक के अध्याय:
- भूमिका: विश्व की अग्निपरीक्षा (The Ordeal of the World)
- लोकतंत्र से निकास (Exit from Democracy)
- शत्रुता का समाज (The Society of Enmity)
- नेक्रोपॉलिटिक्स (Necropolitics)
- नकारात्मक मसीहावाद (Negative Messianism)
- फैनन की औषधशाला (Fanon’s Pharmacy)
- यह दमघोंटू दोपहर (This Stifling Noonday)
- निष्कर्ष: राहगीर की नैतिकता (Ethics of the Passerby)
पुस्तक का दायरा निबंध से व्यापक है। इसमें म्बेम्बे तर्क देते हैं कि उदार लोकतंत्र का एक “रात्रिकालीन पक्ष” (Nocturnal Body) भी रहा है: लोकतंत्र अपने भीतर समानता और स्वतंत्रता का वादा करता है, पर उपनिवेशों, सीमाओं और “शत्रु” घोषित समूहों के प्रति वही लोकतंत्र असाधारण हिंसा को वैध ठहराता रहा है। आज “शत्रुता का समाज” बन रहा है, जिसमें सुरक्षा, आतंकवाद-विरोध और सीमा-नियंत्रण के नाम पर अलगाव, दीवारें और शिविर सामान्य होते जा रहे हैं। पुस्तक का समापन फ्रांत्ज़ फैनन (Frantz Fanon) के चिंतन और एक “राहगीर की नैतिकता” की खोज पर होता है, जो साझा मानवता और विश्व के प्रति उत्तरदायित्व पर बल देती है।
स्मरणीय: निबंध 2003 (Public Culture), फ़्रेंच पुस्तक 2016 (Politiques de l’inimitié), अंग्रेज़ी पुस्तक 2019 (Necropolitics, ड्यूक यूनिवर्सिटी प्रेस)।
सैद्धांतिक पृष्ठभूमि: फूको से म्बेम्बे तक
नेक्रोपॉलिटिक्स को समझने के लिए उन अवधारणाओं को जानना आवश्यक है जिनसे म्बेम्बे संवाद करते हैं।
फूको की जैव-शक्ति (Biopower)
मिशेल फूको ने अपने व्याख्यानों (“Society Must Be Defended”, 1975-76) और “The History of Sexuality, Vol. 1” (1976) में दो प्रकार की शक्ति में अंतर किया:
- संप्रभु शक्ति (Sovereign Power): परंपरागत राजा की शक्ति, जिसका सार था “मारने या जीने देने” का अधिकार (Right to take life or let live)। इसे “तलवार का अधिकार” (Droit de glaive) भी कहा गया।
- जैव-शक्ति (Biopower): आधुनिक राज्य की शक्ति, जिसका सार है “जीवित रखना और मरने देना” (Make live and let die)। यह जनसंख्या के जीवन का प्रबंधन करती है।
फूको स्वयं प्रश्न उठाते हैं कि यदि आधुनिक शक्ति जीवन की रक्षक है, तो वह मारती कैसे है? उनका उत्तर है: राज्य नस्लवाद (State Racism)। नस्लवाद जनसंख्या को “रक्षणीय” और “खतरनाक” में बाँट देता है, और “दूसरे” की मृत्यु को “हमारे” जीवन की सुरक्षा के रूप में प्रस्तुत करता है।
अगाम्बेन: अपवाद की स्थिति और नग्न जीवन
इतालवी दार्शनिक जॉर्जियो अगाम्बेन ने “Homo Sacer” (1995) और “State of Exception” (2003) में कहा कि संप्रभु वह है जो अपवाद (Exception) का निर्णय करता है; यह विचार कार्ल श्मिट से आता है। अपवाद की स्थिति में कानून निलंबित हो जाता है, और मनुष्य “नग्न जीवन” (Bare Life) बन जाता है: ऐसा जीवन जिसे मारा जा सकता है पर जिसकी हत्या अपराध नहीं मानी जाती। अगाम्बेन के लिए यातना शिविर (Camp) आधुनिक राजनीति का प्रतिमान है।
म्बेम्बे का प्रस्थान-बिंदु
म्बेम्बे इन दोनों से प्रेरणा लेते हैं, पर उनकी सीमा भी बताते हैं:
- जैव-शक्ति की अवधारणा यह पूरी तरह नहीं समझा पाती कि समकालीन विश्व में जीवन किस प्रकार मृत्यु की शक्ति के अधीन किया जाता है।
- अगाम्बेन यातना शिविर को आधुनिक अपवाद का प्रतिमान मानते हैं, जबकि म्बेम्बे के अनुसार अपवाद का मूल प्रयोग-स्थल उससे बहुत पहले बागान और उपनिवेश थे।
- अतः शक्ति के इतिहास को यूरोप के बाहर, दास-जहाज़ों, बागानों और उपनिवेशों से पढ़ना होगा।
संप्रभुता की नई परिभाषा
निबंध का आरंभ ही इस प्रसिद्ध विचार से होता है कि संप्रभुता की अंतिम अभिव्यक्ति बड़ी सीमा तक इस शक्ति और क्षमता में निहित है कि यह निर्धारित किया जाए कि कौन जी सकता है और किसे मरना होगा (Who may live and who must die)।
इस परिभाषा के निहितार्थ:
मारना या जीने देना संप्रभुता की सीमा भी है और उसका मूल गुण भी।
संप्रभु होने का अर्थ है मृत्यु दर पर नियंत्रण रखना और जीवन को शक्ति के प्रदर्शन और प्रयोग के क्षेत्र के रूप में परिभाषित करना।
उदार सिद्धांत संप्रभुता को तर्क, स्वायत्तता और सामाजिक अनुबंध से जोड़ता है। म्बेम्बे के अनुसार आधुनिक संप्रभुता का एक बड़ा भाग इसके विपरीत, मानव अस्तित्व के “सामान्यीकृत साधनीकरण” (Generalized Instrumentalization) और मानव शरीरों तथा जनसंख्याओं के भौतिक विनाश में व्यक्त होता रहा है।
मृत्यु और स्वतंत्रता: हेगेल और बताई
म्बेम्बे इस प्रश्न को दार्शनिक रूप से भी परखते हैं। हेगेल के लिए मनुष्य तभी “वास्तविक मानव” बनता है जब वह मृत्यु का सामना करता है; स्वामी-दास द्वंद्व (Master-Slave Dialectic) में स्वामी वह है जो मृत्यु का जोखिम उठाता है। जॉर्ज बताई के लिए संप्रभुता उपयोगिता के तर्क से परे जाने वाली “पूर्ण व्यय” (Absolute Expenditure) की अवस्था है, जिसमें मृत्यु और अतिरेक केंद्रीय हैं। म्बेम्बे यह दिखाते हैं कि पश्चिमी दर्शन में मृत्यु, संप्रभुता और स्वतंत्रता एक-दूसरे से गहराई से बँधे रहे हैं, और यही संबंध राजनीति में हत्या के अधिकार को वैधता देता है।
नेक्रोपावर (Necropower)
म्बेम्बे “नेक्रोपॉलिटिक्स” और “नेक्रोपावर” (मृत्यु-शक्ति) शब्दों का प्रयोग यह बताने के लिए करते हैं कि समकालीन विश्व में शस्त्रों का प्रयोग व्यक्तियों के अधिकतम विनाश और “मृत्यु-लोकों” के निर्माण के लिए किया जाता है। नेक्रोपावर केवल प्रत्यक्ष हत्या नहीं है; इसमें ये भी शामिल हैं:
- लोगों को मृत्यु के जोखिम के सामने छोड़ देना (Exposure to Death)।
- सामाजिक और नागरिक मृत्यु (Social and Civil Death): अधिकार, पहचान और सदस्यता का छिन जाना।
- दासता, निष्कासन और स्थायी असुरक्षा।
- ऐसी परिस्थितियाँ बनाना जिनमें जीवन धीरे-धीरे क्षीण होता जाए।
- मृत्यु-लोक (Death-worlds) और जीवित मृत (Living Dead)
- निबंध के निष्कर्ष में म्बेम्बे अपनी दो सबसे प्रसिद्ध अवधारणाएँ प्रस्तुत करते हैं।
मृत्यु-लोक
म्बेम्बे के अनुसार समकालीन विश्व में शस्त्र और शक्ति “मृत्यु-लोकों” का निर्माण करते हैं। ये सामाजिक अस्तित्व के नए और अनूठे रूप हैं, जिनमें विशाल जनसंख्याओं को ऐसी जीवन-स्थितियों के अधीन कर दिया जाता है जो उन्हें “जीवित मृत” की स्थिति प्रदान करती हैं।
मृत्यु-लोक की विशेषताएँ:
- यह कोई एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि सामाजिक अस्तित्व की एक अवस्था है।
- यहाँ हिंसा अपवाद नहीं, बल्कि दैनिक जीवन का सामान्य हिस्सा बन जाती है।
- यहाँ के निवासियों का जीवन लगातार निगरानी, घेराबंदी, विस्थापन और अभाव से घिरा रहता है।
- कानून का संरक्षण अनुपस्थित या अत्यंत सीमित रहता है।
जीवित मृत
“जीवित मृत” वे लोग हैं जो जैविक रूप से जीवित हैं, पर राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी रूप से उनका अस्तित्व मृतप्राय है। उनके पास अपने शरीर, अपने स्थान, अपने समय और अपने भविष्य पर नियंत्रण नहीं होता। वे जीवन और मृत्यु के बीच की धूसर अवस्था में रहते हैं। म्बेम्बे की यह अवधारणा अगाम्बेन के “नग्न जीवन” के निकट है, पर इसमें नस्ल और उपनिवेश का आयाम केंद्रीय है।
निष्कर्ष-सूत्र: जैव-शक्ति = जीवन का प्रबंधन; नेक्रोपावर = जीवन को मृत्यु की शक्ति के अधीन करना; मृत्यु-लोक = वह सामाजिक अवस्था जिसमें लोग “जीवित मृत” बन जाते हैं।
नेक्रोपॉलिटिक्स के ऐतिहासिक उदाहरण
म्बेम्बे का प्रमुख तर्क यह है कि आधुनिकता के “अपवाद क्षेत्र” यूरोप के यातना शिविरों से बहुत पहले बागानों और उपनिवेशों में निर्मित हो चुके थे।
1. बागान व्यवस्था (Plantation System)
म्बेम्बे आधुनिक दासता को जैव-राजनीतिक प्रयोग के सबसे आरंभिक उदाहरणों में गिनते हैं। अमेरिका और कैरिबियन के बागानों में अफ्रीकी दासों की स्थिति का विश्लेषण करते हुए वे कहते हैं कि दास की स्थिति एक “त्रिविध हानि” (Triple Loss) का परिणाम है:
- “घर” की हानि (Loss of a Home): अपनी भूमि, समुदाय और परिवार से जबरन विच्छेद।
- अपने शरीर पर अधिकारों की हानि (Loss of Rights over One’s Body): शरीर स्वामी की संपत्ति बन जाता है।
- राजनीतिक दर्जे की हानि (Loss of Political Status): समाज और राज्य में किसी भी प्रकार की सदस्यता से वंचना।
यह त्रिविध हानि पूर्ण प्रभुत्व (Absolute Domination), जन्मजात अलगाव (Natal Alienation) और सामाजिक मृत्यु (Social Death) के समान है। “सामाजिक मृत्यु” की अवधारणा समाजशास्त्री ऑरलैंडो पैटरसन की पुस्तक “Slavery and Social Death” (1982) से आती है, जिसका म्बेम्बे प्रयोग करते हैं। दास जीवित रहता है, पर उसका अस्तित्व एक “छाया” जैसा होता है: उसे जीवित रखा जाता है, पर केवल श्रम के साधन के रूप में। फिर भी म्बेम्बे यह भी रेखांकित करते हैं कि दास संगीत, शरीर-भाषा और कल्पना के माध्यम से जीवन के अर्थ को पुनः रचने की क्षमता भी दिखाता है।
2. उपनिवेश (Colony)
म्बेम्बे के अनुसार उपनिवेश वह क्षेत्र है जहाँ संप्रभुता मूलतः कानून के बाहर (Outside the Law) शक्ति के प्रयोग में व्यक्त होती है:
यूरोपीय राज्यों के बीच युद्ध कुछ नियमों (यूरोपीय सार्वजनिक विधि, Jus Publicum Europaeum) से बँधे थे, पर उपनिवेशों में ये नियम लागू नहीं माने गए।
उपनिवेशित लोगों को “बर्बर” या “असभ्य” मानकर उनके विरुद्ध हिंसा को “सभ्यता” (Civilization) के नाम पर उचित ठहराया गया।
उपनिवेश एक “सीमांत” (Frontier) था, जहाँ शांति और युद्ध का भेद मिट जाता था, और “अपवाद की स्थिति” स्थायी हो जाती थी।
फैनन के विश्लेषण का सहारा लेकर म्बेम्बे बताते हैं कि औपनिवेशिक शक्ति स्थान के विभाजन (Spatialization) के माध्यम से काम करती थी: सीमाएँ, अलग-अलग बस्तियाँ, आवाजाही पर नियंत्रण।
उपनिवेशों में मृत्यु का प्रशासन केवल एक राज्य नहीं करता था; व्यापारिक कंपनियाँ, बागान-स्वामी और निजी सशस्त्र दल भी इसमें भागीदार थे।
म्बेम्बे के लिए यह बात निर्णायक है कि नरसंहार और नस्लीय वर्गीकरण की तकनीकें बीसवीं शताब्दी के यूरोपीय सर्वसत्तावाद में अचानक पैदा नहीं हुईं; उनकी जड़ें औपनिवेशिक व्यापारिक पूंजीवाद और उसके प्रशासन में थीं।
3. रंगभेद (Apartheid)
दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद व्यवस्था (1948-1994) नेक्रोपॉलिटिक्स का एक और उदाहरण है:
नस्ल के आधार पर स्थान का कठोर विभाजन: श्वेत क्षेत्र, अश्वेतों के लिए “टाउनशिप” (Township) और “होमलैंड” या “बंटुस्तान” (Bantustan)।
अश्वेत आबादी की आवाजाही पर “पास कानूनों” द्वारा नियंत्रण।
नस्लीय वर्गीकरण द्वारा नागरिकता, संपत्ति, शिक्षा और विवाह के अधिकारों का निर्धारण।
म्बेम्बे के अनुसार रंगभेद यह दिखाता है कि कैसे नस्ल के आधार पर निर्मित स्थानिक व्यवस्था एक जनसंख्या को स्थायी रूप से नियंत्रित, बहिष्कृत और असुरक्षित बना सकती है।
समकालीन रूप: “देर-आधुनिक औपनिवेशिक कब्ज़ा” और युद्ध मशीनें
म्बेम्बे नेक्रोपॉलिटिक्स को केवल इतिहास तक सीमित नहीं रखते। उनके अनुसार समकालीन विश्व में इसके नए रूप उभरे हैं:
देर-आधुनिक औपनिवेशिक कब्ज़ा (Late-modern Colonial Occupation): म्बेम्बे इसके उदाहरण के रूप में फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों पर कब्ज़े की चर्चा करते हैं और इसे नेक्रोपावर का “सबसे परिपूर्ण रूप” बताते हैं, क्योंकि उनके अनुसार इसमें अनुशासनात्मक, जैव-राजनीतिक और मृत्यु-राजनीतिक, तीनों प्रकार की शक्तियाँ एक साथ काम करती हैं। इस विश्लेषण में वे क्षेत्र के विखंडन (Fragmentation), चौकियों, दीवारों और ऊर्ध्वाधर नियंत्रण (Verticality) जैसी स्थानिक तकनीकों को रेखांकित करते हैं। यह म्बेम्बे का विश्लेषण है; इस्राइल-फ़िलिस्तीन संघर्ष पर विद्वानों और राजनीतिक पक्षों के मत भिन्न हैं, और म्बेम्बे के इस विश्लेषण पर तीखी असहमति भी व्यक्त की गई है।
- बुनियादी ढाँचे का युद्ध (Infrastructural Warfare): आधुनिक युद्धों में बिजली, पानी, सड़क और संचार जैसी नागरिक संरचनाओं को नष्ट करके पूरी आबादी के जीवन को अपंग बना दिया जाता है।
- युद्ध मशीनें (War Machines): जील देल्यूज़ और फ़ेलिक्स गुआत्तारी से ली गई यह अवधारणा उन सशस्त्र समूहों के लिए प्रयुक्त है जो राज्य के बाहर या उसके समानांतर काम करते हैं, जैसे मिलिशिया, निजी सेनाएँ और विद्रोही गुट। म्बेम्बे के अनुसार विशेषकर अफ्रीका के कुछ क्षेत्रों में ये युद्ध मशीनें खनिज संसाधनों के दोहन और वैश्विक बाज़ार से जुड़कर मारने के अधिकार का “विकेंद्रीकरण” कर देती हैं। अब संप्रभुता केवल राज्य के पास नहीं रहती।
प्रतिरोध, बलिदान और मृत्यु
निबंध के अंतिम भाग में म्बेम्बे यह प्रश्न उठाते हैं कि जब जीवन स्वयं घेराबंदी में हो, तब प्रतिरोध किस रूप में होता है। वे आत्मघाती हमलावर (Suicide Bomber) और दास-कथाओं में मृत्यु को मुक्ति के रूप में चुनने के उदाहरणों का विश्लेषण करते हैं। उनके अनुसार ऐसी परिस्थितियों में प्रतिरोध और आत्महत्या, बलिदान और मुक्ति, शहादत और स्वतंत्रता के बीच की रेखाएँ धुँधली हो जाती हैं। यह विश्लेषण किसी हिंसा का समर्थन नहीं, बल्कि यह समझने का प्रयास है कि नेक्रोपॉलिटिक्स किस प्रकार मृत्यु को ही राजनीति की भाषा बना देती है। इसी भाग को लेकर म्बेम्बे की सबसे अधिक आलोचना भी हुई है।
तुलनात्मक तालिका

सिद्धांत का प्रभाव और प्रयोग
म्बेम्बे की अवधारणा ने अनेक विषयों में नई शोध-धाराओं को जन्म दिया:
- जसबीर पुआर (Jasbir Puar): “Terrorist Assemblages” (2007) में “क्वीयर नेक्रोपॉलिटिक्स” की चर्चा की और “The Right to Maim” (2017) में “अपंग करने के अधिकार” की अवधारणा दी। पुआर का तर्क है कि जैव-राजनीति और मृत्यु-राजनीति को एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर गुँथे हुए रूप में समझना चाहिए।
- लॉरेन बर्लांट (Lauren Berlant): “धीमी मृत्यु” (Slow Death) की अवधारणा, जिसमें कुछ जनसंख्याएँ धीरे-धीरे “घिसने” के लिए चिह्नित कर दी जाती हैं।
- प्रवासन और शरणार्थी अध्ययन: समुद्री सीमाओं पर मृत्यु, निरोध केंद्र (Detention Centres) और लंबे विस्थापन को समझने में।
- कारागार अध्ययन: जेलों में कुपोषण, उपेक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव का विश्लेषण।
- स्वास्थ्य और महामारी: कोविड-19 के दौरान यह बहस कि संकट में किन जनसंख्याओं को प्राथमिकता मिली और किन्हें जोखिम में छोड़ दिया गया।
- नवउदारवाद की आलोचना: स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा में कटौती को कुछ विद्वानों ने नेक्रोपॉलिटिक्स के आर्थिक रूप के रूप में देखा है।
आलोचनात्मक मूल्यांकन
सिद्धांत की शक्तियाँ
- यूरोकेंद्रीयता से मुक्ति: म्बेम्बे ने शक्ति के सिद्धांत को उपनिवेशित विश्व के अनुभव से पढ़ा और दिखाया कि आधुनिक राज्य की हिंसक तकनीकें उपनिवेशों और बागानों में विकसित हुई थीं।
- नस्ल को केंद्र में लाना: फूको और अगाम्बेन की तुलना में म्बेम्बे नस्ल को शक्ति के विश्लेषण का केंद्रीय तत्व बनाते हैं।
- नई विश्लेषणात्मक शब्दावली: “मृत्यु-लोक” और “जीवित मृत” जैसी अवधारणाएँ उन स्थितियों को नाम देती हैं जिन्हें परंपरागत शब्दावली (युद्ध, शांति, नागरिकता) ठीक से नहीं पकड़ पाती।
- उदार लोकतंत्र का आत्म-परीक्षण: सिद्धांत यह प्रश्न उठाता है कि समानता का वादा करने वाला लोकतंत्र अपनी सीमाओं के बाहर या भीतर के “शत्रु” समूहों के प्रति कैसा व्यवहार करता है।
- अंतर्विषयक उपयोगिता: राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र, मानवशास्त्र, भूगोल, लैंगिक अध्ययन और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में यह अवधारणा व्यापक रूप से प्रयुक्त हुई है।
सिद्धांत की सीमाएँ और आलोचनाएँ
- फूको की गलत व्याख्या का आरोप: कुछ विद्वानों का तर्क है कि म्बेम्बे फूको की जैव-शक्ति और संप्रभु शक्ति के संबंध को कम करके आँकते हैं। फूको ने स्वयं “राज्य नस्लवाद” और मृत्यु की राजनीति (Thanatopolitics) की चर्चा की थी, इसलिए “नेक्रोपावर” को एक बिल्कुल अलग प्रकार की शक्ति मानना आवश्यक नहीं।
- अवधारणात्मक अस्पष्टता: नेक्रोपॉलिटिक्स का प्रयोग दासता से लेकर स्वास्थ्य-बजट में कटौती तक इतने व्यापक रूप में होने लगा है कि अवधारणा की विश्लेषणात्मक धार कमजोर पड़ने का खतरा है।
- अत्यधिक सामान्यीकरण: बागान, उपनिवेश, रंगभेद और समकालीन संघर्षों को एक ही ढाँचे में रखने से उनके ऐतिहासिक भेद धुँधले हो सकते हैं।
- पीड़ितों की कर्तृत्व-शक्ति (Agency) की उपेक्षा: आलोचकों के अनुसार “जीवित मृत” जैसी अवधारणाएँ उत्पीड़ित समुदायों को केवल निष्क्रिय पीड़ित के रूप में प्रस्तुत करने का जोखिम रखती हैं, जबकि इतिहास उनके प्रतिरोध, संस्कृति और जिजीविषा से भरा है।
- लिंग और यौनिकता: नारीवादी और क्वीयर विद्वानों का तर्क है कि म्बेम्बे का विश्लेषण नस्ल पर केंद्रित है, पर नस्ल, लिंग, यौनिकता और वर्ग के अंतर्संबंध पर अपेक्षाकृत कम ध्यान देता है।
- दासता के बाद की हिंसा: कुछ अश्वेत अध्ययन (Black Studies) के विद्वानों के अनुसार यह ढाँचा दासता के बाद अश्वेत समुदायों के विरुद्ध जारी हिंसा की पूरी व्याख्या नहीं करता।
- आत्मघाती हमलावर का विश्लेषण: आलोचकों का मत है कि इस भाग में राजनीतिक हिंसा का दार्शनिक विश्लेषण उसकी नैतिक निंदा से अलग रह जाता है, जिससे यह भ्रम पैदा हो सकता है। म्बेम्बे के समर्थक कहते हैं कि यह विश्लेषण समझने का प्रयास है, औचित्य का नहीं।
- विवाद: 2020 में जर्मनी में म्बेम्बे के कुछ लेखों में इस्राइल की नीतियों और रंगभेद की तुलना को लेकर सार्वजनिक विवाद हुआ। आलोचकों ने इसे आपत्तिजनक बताया, जबकि अनेक विद्वानों ने म्बेम्बे के पक्ष में अकादमिक स्वतंत्रता का तर्क दिया।
- यूरोपीय दर्शन पर निर्भरता: उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि होने के बावजूद म्बेम्बे का सैद्धांतिक ढाँचा बड़े पैमाने पर हेगेल, बताई, फूको और अगाम्बेन पर आधारित है।
समकालीन प्रासंगिकता
आज सीमाओं पर दीवारें, शरणार्थी शिविर, निरोध केंद्र, ड्रोन युद्ध, लंबे सशस्त्र संघर्ष और जलवायु संकट से विस्थापन जैसी परिघटनाएँ इस प्रश्न को फिर से केंद्र में ला रही हैं कि किन मनुष्यों के जीवन को “शोक-योग्य” (Grievable) माना जाता है और किनके जीवन को नहीं। इस प्रश्न को जूडिथ बटलर ने भी “Precarious Life” (2004) में उठाया था। म्बेम्बे का सिद्धांत इन परिघटनाओं को अलग-अलग घटनाओं के बजाय शक्ति की एक संरचना के रूप में देखने का उपकरण देता है।
भारतीय संदर्भ में यह अवधारणा शोध-साहित्य में आपदा प्रबंधन, प्रवासी श्रमिकों के संकट, हाथ से मैला ढोने (Manual Scavenging) और सीवर में होने वाली मौतों, तथा सामाजिक रूप से वंचित समुदायों की असुरक्षा जैसे प्रश्नों पर विचार के लिए प्रयुक्त होती है। साथ ही, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार), जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने “गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार” के रूप में विस्तारित किया है, इस बात का उदाहरण है कि लोकतांत्रिक संवैधानिक व्यवस्थाएँ जीवन को केवल जैविक अस्तित्व नहीं, बल्कि गरिमा के रूप में परिभाषित करके “जीवित मृत” की स्थिति के विरुद्ध मानक प्रस्तुत करती हैं।
निष्कर्ष
अशील म्बेम्बे का नेक्रोपॉलिटिक्स सिद्धांत आधुनिक राजनीतिक चिंतन के उस मौन को तोड़ता है जिसमें राज्य को मुख्यतः जीवन के रक्षक के रूप में देखा गया। उनके अनुसार संप्रभुता का एक केंद्रीय पक्ष यह तय करना है कि कौन जिएगा और किसे मरना होगा। बागान की “त्रिविध हानि”, उपनिवेश का स्थायी अपवाद, रंगभेद का नस्लीय स्थान-विभाजन और समकालीन संघर्षों के “मृत्यु-लोक” इस शक्ति के विभिन्न ऐतिहासिक रूप हैं, जिनमें विशाल जनसंख्याएँ “जीवित मृत” बना दी जाती हैं।
फूको की जैव-शक्ति और अगाम्बेन की अपवाद की स्थिति के साथ संवाद करते हुए म्बेम्बे ने शक्ति के सिद्धांत में नस्ल और उपनिवेश को केंद्रीय स्थान दिया। अवधारणात्मक अस्पष्टता, अति-सामान्यीकरण और फूको की व्याख्या जैसे प्रश्नों पर उनकी आलोचना भी हुई है, फिर भी नेक्रोपॉलिटिक्स इक्कीसवीं शताब्दी के राजनीतिक सिद्धांत की सबसे प्रभावशाली अवधारणाओं में से एक है। परीक्षा की दृष्टि से इसे फूको, अगाम्बेन, फैनन और उत्तर-औपनिवेशिक चिंतन के व्यापक संदर्भ में समझना सबसे उपयोगी रहेगा।
पुस्तक और विचारक

वन लाइनर फैक्ट्स फॉर रिवीजन
- अशील म्बेम्बे का जन्म 1957 में कैमरून में हुआ।
- वे जोहान्सबर्ग स्थित विटवॉटर्सरैंड विश्वविद्यालय के WiSER संस्थान से जुड़े हैं।
- म्बेम्बे को 2024 का होलबर्ग पुरस्कार मिला।
- “Necropolitics” निबंध 2003 में “Public Culture” (खंड 15, अंक 1) में प्रकाशित हुआ; अनुवादक लिबी माइंटजीज़।
- पुस्तक “Necropolitics” (2019, ड्यूक यूनिवर्सिटी प्रेस) फ़्रेंच “Politiques de l’inimitié” (2016) का अनुवाद है; अनुवादक स्टीवन कोरकोरन।
- नेक्रोपॉलिटिक्स का केंद्रीय सूत्र: संप्रभुता यह तय करने की शक्ति है कि कौन जी सकता है और किसे मरना होगा।
- “Death-worlds” और “Living Dead” म्बेम्बे की अवधारणाएँ हैं।
- दास की “त्रिविध हानि”: घर, शरीर पर अधिकार और राजनीतिक दर्जा।
- “Social Death” की अवधारणा ऑरलैंडो पैटरसन (Slavery and Social Death, 1982) से जुड़ी है।
- “Make live and let die” फूको का जैव-शक्ति सूत्र है।
- “Bare Life” और “Homo Sacer” अगाम्बेन की अवधारणाएँ हैं।
- “संप्रभु वह है जो अपवाद का निर्णय करता है” यह कथन कार्ल श्मिट का है।
- “War Machine” की अवधारणा देल्यूज़ और गुआत्तारी से ली गई है।
- म्बेम्बे पर हेगेल, बताई, फूको, अगाम्बेन और फैनन का प्रभाव है।
- “The Right to Maim” (2017) जसबीर पुआर की कृति है।
- “Slow Death” की अवधारणा लॉरेन बर्लांट की है।
- “Precarious Life” (2004) जूडिथ बटलर की कृति है।
- “On the Postcolony” और “Critique of Black Reason” म्बेम्बे की अन्य प्रमुख कृतियाँ हैं।
Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services
Subscribe to get the latest posts sent to your email.

