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वॉशिंगटन कंसेंसस के मूल सिद्धांत और पोस्ट-वॉशिंगटन कंसेंसस का उदय

The Core Principles of the Washington Consensus and the Rise of the Post-Washington Consensus

बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में वॉशिंगटन कंसेंसस (Washington Consensus) विकासशील देशों में आर्थिक सुधारों का मार्गदर्शन करने वाला एक प्रमुख ढांचा बनकर उभरा।

  • इसका उद्देश्य उन दस आर्थिक नीतियों को वर्णित करना था जिन्हें वॉशिंगटन स्थित संस्थाओं ने आर्थिक संकट से जूझ रहे देशों के लिए समाधान के रूप में समर्थन दिया था।
  • आज वॉशिंगटन कंसेंसस को एक सार्वभौमिक विकास मॉडल के बजाय एक ऐतिहासिक रूप से विशिष्ट नीति ढांचे के रूप में देखा जाता है, जिसका प्रभाव अभी भी विकास और वैश्विक आर्थिक शासन से जुड़े विमर्शों में दिखाई देता है।

वॉशिंगटन सहमति क्या है?

  • यह शब्द 1989 में जॉन विलियमसन नामक एक ब्रिटिश अर्थशास्त्री द्वारा गढ़ा गया था , जिसमें आर्थिक संकट का सामना कर रहे विकासशील देशों की मदद करने के लिए नीतियों का एक समूह शामिल था ।
  • इन सुधारों का उद्देश्य तत्काल वित्तीय सहायता के बदले बाजार शक्तियों की भूमिका बढ़ाना था। वाशिंगटन सहमति का सुझाव वाशिंगटन, डीसी स्थित संस्थानों जैसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ), विश्व बैंक और अमेरिकी वित्त विभाग द्वारा दिया गया था।
  • इसमें एक “मानक” सुधार पैकेज के हिस्से के रूप में 10 आर्थिक नीतिगत सुझावों का एक समूह शामिल है।

वॉशिंगटन कंसेंसस की उत्पत्ति और मूल सिद्धांत

  • वॉशिंगटन कंसेंसस उस समय उभरा जब लैटिन अमेरिका और अन्य विकासशील क्षेत्रों में गंभीर ऋण संकट पैदा हो गया था।
  • अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक (World Bank) ने आर्थिक स्थिरता बहाल करने और बाजार आधारित विकास को बढ़ावा देने के लिए कई सुधारों की सिफारिश की।
  • इन सुधारों के अंतर्गत दस प्रमुख नीतिगत सुझाव शामिल थे: राजकोषीय अनुशासन (Fiscal Discipline), सार्वजनिक व्यय का पुनर्गठन, कर सुधार, ब्याज दरों का उदारीकरण, प्रतिस्पर्धी विनिमय दर, व्यापार उदारीकरण, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का उदारीकरण, सरकारी उपक्रमों का निजीकरण, विनियमन में ढील (Deregulation) और संपत्ति अधिकारों की सुरक्षा आदि।
  • इन सभी सुधारों को संक्षेप में “उदारीकरण, निजीकरण और विनियमन में कमी” की नीति के रूप में समझा जाता है।

कार्यान्वयन और वैश्विक प्रभाव

  • वॉशिंगटन कंसेंसस मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं द्वारा दिए गए ऋणों की शर्तों के माध्यम से लागू किया गया।
  • जो देश राजकोषीय संकट या भुगतान संतुलन संकट का सामना कर रहे थे, उन्हें IMF या विश्व बैंक से वित्तीय सहायता प्राप्त करने के बदले संरचनात्मक सुधार (Structural Reforms) अपनाने पड़ते थे।

इन सुधारों के कारण राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं में कई परिवर्तन हुए, जैसे:

  • व्यापार में खुलापन
  • वित्तीय उदारीकरण
  • निजी क्षेत्र का विस्तार

कुछ देशों में इन नीतियों से आर्थिक स्थिरता और विकास को बढ़ावा मिला, लेकिन विभिन्न क्षेत्रों में इसके परिणाम अलग-अलग रहे।

आलोचनाएँ और संरचनात्मक सीमाएँ

  • वॉशिंगटन कंसेंसस की एक बड़ी आलोचना यह थी कि उसने औद्योगिक नीति (Industrial Policy) को महत्व नहीं दिया।
  • औद्योगिक नीति का अर्थ है कि सरकार रणनीतिक रूप से कुछ घरेलू उद्योगों को समर्थन देती है।
  • विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के तहत सब्सिडी और निवेश नियमों जैसे कई नीति उपकरणों पर प्रतिबंध लगाया गया, जिससे विकासशील देशों के लिए नए उद्योगों को विकसित करना कठिन हो गया।
  • यह स्थिति उन देशों के ऐतिहासिक अनुभव से बिल्कुल अलग थी जो सफल औद्योगिक अर्थव्यवस्था बने।

उदाहरण के लिए दक्षिण कोरिया, ताइवान जापान आदि

  • इन देशों ने अपने शुरुआती विकास काल में राज्य-नेतृत्व वाले विकास, संरक्षणवादी नीतियों और लक्षित औद्योगीकरण का व्यापक उपयोग किया था।

संरचनात्मक समायोजन नीतियों के सामाजिक प्रभाव भी गंभीर रहे।

राजनीतिक प्रतिक्रिया और वॉशिंगटन कंसेंसस का पतन

  • 1990 के दशक के अंत तक वॉशिंगटन कंसेंसस के खिलाफ असंतोष बढ़ने लगा।
  • वैश्वीकरण और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कई विकासशील देशों में देखने को मिले।
  • यह विभाजन वैश्विक व्यापार वार्ताओं में भी दिखाई दिया, जैसे: 1999 का सिएटल WTO विरोध प्रदर्शन और 2003 का कैंकून WTO सम्मेलन में।
  • इन घटनाओं ने विकसित और विकासशील देशों के बीच व्यापार नियमों और विकास प्राथमिकताओं को लेकर गहरे मतभेदों को उजागर किया।
  • 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद विकसित देशों में भी उदारीकरण के प्रति संदेह बढ़ गया।

पश्चिमी देशों में वैश्वीकरण से असंतोष व्यक्त करने वाले कई राजनीतिक आंदोलन उभरे, जैसे:

  • Make America Great Again आंदोलन
  • ब्रेक्सिट जनमत संग्रह

इन घटनाओं ने वैश्वीकरण के सामाजिक प्रभावों के प्रति व्यापक असंतोष को उजागर किया।

पोस्टवॉशिंगटन कंसेंसस का उदय

  • इक्कीसवीं सदी में धीरे-धीरे पोस्ट-वॉशिंगटन कंसेंसस की अवधारणा उभरने लगी।
  • इस नई सोच के अनुसार केवल बाजार शक्तियाँ ही समावेशी विकास सुनिश्चित नहीं कर सकतीं।

आधुनिक आर्थिक नीतियाँ अब मजबूत संस्था, सार्वजनिक निवेश, सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था और आय का पुनर्वितरण आदि बातों पर जोर देती हैं।

  • पहले जिस औद्योगिक नीति को महत्व नहीं दिया जाता था, वह अब तकनीकी क्षमता और प्रतिस्पर्धी उद्योगों को विकसित करने में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
  • इसके साथ ही वैकल्पिक विकास मॉडल भी उभरे हैं। उदाहरण के लिए चीन का राज्य-नेतृत्व वाला विकास मॉडल यह दिखाता है कि सरकारी हस्तक्षेप, औद्योगिक रणनीति और नियंत्रित उदारीकरण के माध्यम से तेज आर्थिक परिवर्तन संभव है।

भारत का रुख

  • परंपरागत रूप से भारत ने आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए राजकोषीय समेकन (Fiscal Consolidation) की नीति अपनाई है।
  • इसका उद्देश्य सरकारी खर्च और आय के बीच संतुलन बनाए रखना तथा राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करना रहा है। इस दृष्टिकोण को संस्थागत रूप देने के लिए राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम (FRBM Act), 2003 लागू किया गया। इस कानून का मूल उद्देश्य यह था कि सरकार अनावश्यक ऋण लेने से बचे, राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखे और दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता बनाए रखे। इस प्रकार लंबे समय तक भारत की आर्थिक नीति का केंद्र बिंदु वित्तीय अनुशासन और संतुलित बजट रहा।
  • हालांकि, कोविड-19 महामारी के बाद वैश्विक आर्थिक परिस्थितियाँ बदल गईं। महामारी के कारण आर्थिक गतिविधियाँ धीमी पड़ गईं, रोजगार और उत्पादन पर असर पड़ा और मांग में गिरावट आई।
  • इस परिस्थिति में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक जैसे वैश्विक वित्तीय संस्थानों ने कई देशों को सलाह दी कि वे आर्थिक पुनरुद्धार के लिए सरकारी खर्च बढ़ाएँ। उनका तर्क था कि संकट की स्थिति में सरकार को अधिक निवेश और खर्च के माध्यम से अर्थव्यवस्था को गति देनी चाहिए।
  • वर्तमान समय में यह माना जा रहा है कि विस्तारवादी राजकोषीय नीति (Expansionary Fiscal Policy) अर्थात सरकारी खर्च बढ़ाना; आर्थिक विकास को प्रोत्साहित कर सकती है। विशेष रूप से सरकार बुनियादी ढाँचे, परिवहन, ऊर्जा, डिजिटल अवसंरचना और सामाजिक कल्याण योजनाओं में निवेश बढ़ा रही है, जिससे रोजगार सृजन और आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि हो सके।
  • वर्तमान समय में भारत की आर्थिक नीति को एक मिश्रित दृष्टिकोण (Mixed Approach) के रूप में देखा जा सकता है। इसमें एक ओर सरकार आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने के लिए सार्वजनिक निवेश और सामाजिक खर्च बढ़ा रही है, जबकि दूसरी ओर बाजार सुधारों और निजी क्षेत्र की भागीदारी को भी प्रोत्साहित कर रही है। इस प्रकार भारत अब केवल कठोर राजकोषीय अनुशासन पर आधारित नीति के बजाय परिस्थिति के अनुसार लचीली और व्यावहारिक आर्थिक रणनीति अपना रहा है।

निष्कर्ष

  • वॉशिंगटन कंसेंसस ने कभी विकास के लिए एक सार्वभौमिक नीति सूत्र प्रस्तुत किया था, जो उदारीकरण, निजीकरण और विनियमन में ढील पर आधारित था। लेकिन समय के साथ वित्तीय संकट, बढ़ती असमानता, राजनीतिक विरोध ने यह स्पष्ट कर दिया कि एक ही नीति मॉडल सभी देशों के लिए उपयुक्त नहीं हो सकता।
  • आज की वैश्विक आर्थिक व्यवस्था अधिक व्यावहारिक, संदर्भ-संवेदनशील और विविध नीतियों पर आधारित हो गई है। अब सरकारें बाजार तंत्र और सरकारी हस्तक्षेप दोनों को मिलाकर अपनी राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुसार विकास रणनीतियाँ अपनाती हैं।
  • इस प्रकार वॉशिंगटन कंसेंसस का पतन वैश्वीकरण के अंत का संकेत नहीं है, बल्कि यह इस विश्वास के अंत को दर्शाता है कि विकास के लिए केवल एक ही सार्वभौमिक मॉडल हो सकता है।

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