स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) द्वारा प्रकाशित SIPRI Yearbook 2026 वैश्विक हथियारों, परमाणु शस्त्रों, सैन्य व्यय, निरस्त्रीकरण और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण वार्षिक रिपोर्टों में से एक है। यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब विश्व एक नए सामरिक संक्रमण काल से गुजर रहा है, जिसमें रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में संघर्ष, चीन की बढ़ती सैन्य शक्ति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित युद्ध प्रणाली, साइबर हमले और ड्रोन युद्ध जैसी नई चुनौतियाँ पारंपरिक सुरक्षा अवधारणाओं को बदल रही हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने न केवल अपने परमाणु शस्त्रागार का विस्तार किया है, बल्कि पहली बार अपने कुछ परमाणु वारहेड्स को परिचालन रूप से “तैनात (deployed)” स्थिति में भी रखा है। यह परिवर्तन भारत की सुरक्षा रणनीति और क्षेत्रीय प्रतिरोधक क्षमता (deterrence) के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
SIPRI क्या है?
- पूरा नाम: Stockholm International Peace Research Institute (SIPRI)
- स्थापना: 1966
- मुख्यालय: स्टॉकहोम, स्वीडन
- प्रकृति: स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थान
- कार्य क्षेत्र:
- वैश्विक सैन्य व्यय का अध्ययन
- हथियारों के व्यापार का विश्लेषण
- परमाणु शस्त्रागार का आकलन
- निरस्त्रीकरण और हथियार नियंत्रण
- अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा पर शोध
SIPRI की रिपोर्टों का उपयोग सरकारें, शोधकर्ता, नीति-निर्माता और अंतरराष्ट्रीय संगठन व्यापक रूप से करते हैं।

भारत की रक्षा एवं सामरिक स्थिति
SIPRI Yearbook 2026 के अनुसार भारत वर्ष 2025 में विश्व का पाँचवाँ सबसे बड़ा सैन्य व्यय करने वाला देश रहा। भारत का कुल रक्षा व्यय 92.1 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 8.9% अधिक है। इससे स्पष्ट है कि भारत अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं और सैन्य आधुनिकीकरण को प्राथमिकता दे रहा है।
भारत का रणनीतिक वातावरण कई चुनौतियों से प्रभावित है:
- पाकिस्तान के साथ परमाणु एवं पारंपरिक प्रतिद्वंद्विता,
- चीन के साथ सीमा विवाद और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा,
- बहुपक्षीय सुरक्षा व्यवस्थाओं का कमजोर होना,
- तथा नई तकनीकों पर आधारित युद्ध का उभरता स्वरूप।
इन परिस्थितियों में भारत रक्षा अवसंरचना, स्वदेशी उत्पादन और सामरिक तैयारी को सुदृढ़ करने का प्रयास कर रहा है।
भारत: प्रमुख हथियार आयातक
- 2021–2025 की अवधि में भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्रमुख हथियार आयातक रहा। वैश्विक हथियार आयात में उसकी हिस्सेदारी 2% रही, जबकि पहला स्थान यूक्रेन का था।
- हालाँकि भारत आत्मनिर्भरता की दिशा में “आत्मनिर्भर भारत” और “मेक इन इंडिया” जैसी पहलों के माध्यम से रक्षा उत्पादन बढ़ा रहा है, फिर भी उन्नत लड़ाकू विमान, वायु रक्षा प्रणाली, पनडुब्बियाँ और अन्य उच्च-प्रौद्योगिकी सैन्य उपकरणों के लिए आयात पर कुछ निर्भरता बनी हुई है।
भारत का परमाणु शस्त्रागार
SIPRI के अनुसार जनवरी 2026 तक भारत के पास अनुमानतः 190 परमाणु वारहेड हैं:
- 12 तैनात (Deployed)
- 178 भंडारण या रिज़र्व में
तुलनात्मक रूप से:
- चीन: लगभग 620 वारहेड
- पाकिस्तान: लगभग 170 वारहेड
रिपोर्ट का सबसे उल्लेखनीय निष्कर्ष यह है कि भारत ने पहली बार अपने कुछ परमाणु हथियारों को परिचालन रूप से तैनात किया है। इससे संकेत मिलता है कि भारत अपनी प्रतिरोधक क्षमता को अधिक विश्वसनीय और तत्पर बनाना चाहता है, यद्यपि उसकी घोषित नीति अब भी विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध (Credible Minimum Deterrence) पर आधारित है।
साइबर युद्ध और आधुनिक सैन्य संघर्ष
रिपोर्ट में मई 2025 के “ऑपरेशन सिंदूर” का उल्लेख किया गया है, जिसमें भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव के दौरान साइबर क्षमताओं का भी उपयोग हुआ। इससे स्पष्ट होता है कि भविष्य के संघर्ष केवल भूमि, वायु और समुद्र तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि साइबर स्पेस भी युद्ध का एक महत्वपूर्ण आयाम बन चुका है।
साइबर हमलों के माध्यम से संचार नेटवर्क, ऊर्जा अवसंरचना, वित्तीय प्रणाली और सैन्य कमांड संरचनाओं को प्रभावित किया जा सकता है, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा की अवधारणा और अधिक जटिल हो जाती है।
वैश्विक परमाणु परिदृश्य
SIPRI के अनुसार विश्व में कुल अनुमानित 12,187 परमाणु वारहेड हैं, जिनमें से लगभग:
- 9,745 सैन्य भंडार में हैं,
- 4,000 से अधिक सक्रिय रूप से तैनात हैं।
विश्व के 9 परमाणु–संपन्न राष्ट्र हैं:
- अमेरिका
- रूस
- चीन
- फ्रांस
- ब्रिटेन
- भारत
- पाकिस्तान
- उत्तर कोरिया
- इज़राइल
रिपोर्ट बताती है कि ये सभी देश अपने परमाणु शस्त्रागार का आधुनिकीकरण कर रहे हैं, जिससे वैश्विक सुरक्षा वातावरण अधिक अस्थिर हो सकता है।
अमेरिका-रूस का प्रभुत्व और हथियार नियंत्रण संकट
- विश्व के लगभग 86% परमाणु हथियार अमेरिका और रूस के पास हैं। दोनों देश अपने परमाणु शस्त्रों के आधुनिकीकरण पर लगातार निवेश कर रहे हैं।
- चिंता का विषय यह है कि New START Treaty, जो रणनीतिक परमाणु हथियारों को सीमित करने का प्रमुख समझौता था, फरवरी 2026 में समाप्त हो गई और उसके स्थान पर कोई नई व्यवस्था नहीं बन सकी। इससे भविष्य में हथियारों की नई प्रतिस्पर्धा (arms race) की आशंका बढ़ सकती है।
NATO और रक्षा व्यय में वृद्धि
जून 2025 में NATO देशों ने रक्षा व्यय का लक्ष्य बढ़ाकर GDP का 5% (2035 तक) करने का निर्णय लिया, जबकि पहले यह लक्ष्य 2% था। यह निर्णय यूरोप में बढ़ती सुरक्षा चिंताओं और बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य को दर्शाता है।
यूक्रेन और सैन्य बोझ
SIPRI के अनुसार यूक्रेन ने 2025 में अपनी GDP का लगभग 40% रक्षा पर खर्च किया, जो विश्व में सबसे अधिक सैन्य बोझ माना गया। यह लंबे समय से चल रहे संघर्ष के आर्थिक प्रभाव को भी दर्शाता है।
AI, ड्रोन और भविष्य का युद्ध
रिपोर्ट में बताया गया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित लक्ष्य निर्धारण और स्वायत्त हथियार प्रणालियाँ (Autonomous Weapon Systems) अब वास्तविक युद्धक्षेत्रों में प्रयुक्त हो रही हैं।
इसके अतिरिक्त:
- ड्रोन स्वार्म (Drone Swarms),
- प्रथम-व्यक्ति दृश्य (FPV) ड्रोन,
- और कम लागत वाले मानव रहित हवाई वाहन (UAVs)
आधुनिक युद्ध की रणनीति को तेजी से बदल रहे हैं।
जून 2025 के Operation Spider’s Web में यूक्रेन द्वारा 100 से अधिक ड्रोन का उपयोग कर रूसी विमानों को क्षति पहुँचाना इसका उल्लेखनीय उदाहरण है।
भारत की परमाणु नीति (Nuclear Doctrine)
भारत ने अपनी आधिकारिक परमाणु नीति 2003 में लागू की। इसके प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं:
- विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध (Credible Minimum Deterrence)
भारत केवल उतनी परमाणु क्षमता बनाए रखने का पक्षधर है जो किसी भी संभावित आक्रमणकारी को परमाणु हमला करने से रोकने के लिए पर्याप्त हो।
- No First Use (NFU)
भारत पहले परमाणु हथियार का प्रयोग नहीं करेगा और केवल परमाणु हमले के प्रतिशोध में उनका उपयोग करेगा।
- Massive Retaliation
यदि भारत पर परमाणु हमला होता है, तो उसकी प्रतिक्रिया इतनी व्यापक होगी कि आक्रमणकारी को अस्वीकार्य क्षति पहुँचे।
- नागरिक नियंत्रण
परमाणु हथियारों के उपयोग का अंतिम अधिकार नागरिक नेतृत्व के पास है। Nuclear Command Authority (NCA) के अंतर्गत:
- Political Council की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं और वही अंतिम निर्णय लेती है।
- Executive Council की अध्यक्षता राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) करते हैं और वह तकनीकी व रणनीतिक सलाह प्रदान करती है।
- रासायनिक एवं जैविक हमलों के संदर्भ में
भारत ने यह विकल्प सुरक्षित रखा है कि यदि उस पर बड़े पैमाने पर रासायनिक या जैविक हथियारों से हमला होता है, तो वह परमाणु प्रतिकार पर विचार कर सकता है।
भारत के परमाणु कार्यक्रम का विकास
प्रारंभिक चरण (1947–1974)
स्वतंत्रता के बाद भारत ने होमी जे. भाभा और जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग पर ध्यान केंद्रित किया।
पोखरण–I (Smiling Buddha) – 18 मई 1974
भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण किया और इसे Peaceful Nuclear Explosion (PNE) कहा।
हथियारीकरण का चरण (1974–1998)
चीन के परमाणु कार्यक्रम, पाकिस्तान की प्रगति और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने भारत को अपनी परमाणु क्षमता विकसित करने के लिए प्रेरित किया।
पोखरण–II (Operation Shakti) – मई 1998
भारत ने पाँच भूमिगत परमाणु परीक्षण किए और स्वयं को औपचारिक रूप से परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र घोषित किया। इसी उपलब्धि की स्मृति में 11 मई को राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस मनाया जाता है।
2003 के बाद
भारत ने अपनी परमाणु नीति को औपचारिक रूप दिया और 2008 के भारत–अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के माध्यम से वैश्विक परमाणु व्यापार में विशेष स्थान प्राप्त किया।
वैश्विक परमाणु संधियों पर भारत का दृष्टिकोण
NPT (1968)
भारत इसे भेदभावपूर्ण मानता है क्योंकि यह कुछ देशों को स्थायी रूप से परमाणु शक्ति का दर्जा देता है, जबकि अन्य देशों पर प्रतिबंध लगाता है।
CTBT (1996)
भारत का मत है कि यह संधि सार्वभौमिक और समयबद्ध परमाणु निरस्त्रीकरण की पर्याप्त गारंटी नहीं देती।
TPNW (2017)
भारत ने इस संधि का समर्थन नहीं किया है क्योंकि इसके सत्यापन तंत्र को पर्याप्त नहीं माना जाता।
क्या भारत की परमाणु नीति की समीक्षा आवश्यक है?
समीक्षा के पक्ष में तर्क
- चीन का तेजी से बढ़ता परमाणु शस्त्रागार।
- पाकिस्तान की सामरिक (Tactical) परमाणु क्षमताएँ।
- AI, साइबर युद्ध और ड्रोन आधारित खतरों का उदय।
- दो-मोर्चीय सुरक्षा वातावरण।
- वैश्विक हथियार नियंत्रण व्यवस्थाओं का कमजोर होना।
समीक्षा के विरुद्ध तर्क
- No First Use नीति भारत की जिम्मेदार परमाणु शक्ति की छवि को मजबूत करती है।
- Credible Minimum Deterrence महँगी हथियारों की दौड़ से बचाता है।
- मौजूदा सिद्धांत ने अब तक प्रभावी प्रतिरोध और रणनीतिक स्थिरता बनाए रखने में सहायता की है।
निष्कर्ष
SIPRI Yearbook 2026 यह संकेत देती है कि विश्व तेजी से अधिक सैन्यीकृत और तकनीक-प्रधान सुरक्षा वातावरण की ओर बढ़ रहा है। भारत के लिए चुनौती केवल परमाणु शस्त्रों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि विश्वसनीय प्रतिरोध, जिम्मेदार परमाणु आचरण, तकनीकी आधुनिकीकरण और कूटनीतिक संतुलन के बीच उचित सामंजस्य स्थापित करना है। बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों में भारत की परमाणु नीति और सुरक्षा रणनीति की समय-समय पर समीक्षा राष्ट्रीय हितों की रक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण बनी रहेगी।
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