राजनीतिक विज्ञान (Political Science) के विकास को समझने के लिए पारंपरिक उपागम (Traditional Approach) से लेकर व्यवहारवाद (Behaviouralism) और फिर उत्तर–व्यवहारवाद (Post-Behaviouralism) तक के बौद्धिक विकास को समझना आवश्यक है। यह विकास केवल शोध-पद्धति (Methodology) में परिवर्तन नहीं था, बल्कि इसने राजनीतिक विज्ञान की विषय–वस्तु, अध्ययन की पद्धति, ज्ञान की प्रकृति, मूल्य (Values) और राजनीतिक ज्ञान के उद्देश्य को भी पुनर्परिभाषित किया।
पारंपरिक राजनीतिक विज्ञान मुख्यतः राज्य, सरकार, संविधान, कानून, राजनीतिक संस्थाओं, इतिहास और राजनीतिक दर्शन पर केंद्रित था। इसके विपरीत, व्यवहारवाद ने ध्यान को औपचारिक संस्थाओं से हटाकर व्यक्ति एवं समूह के वास्तविक राजनीतिक व्यवहार की ओर स्थानांतरित किया। व्यवहारवाद ने राजनीतिक विज्ञान को अधिक वैज्ञानिक, अनुभवजन्य और व्यवस्थित बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया, लेकिन इसकी अत्यधिक मूल्य–निरपेक्षता (Value Neutrality), परिमाणीकरण (Quantification) और पद्धतिगत आग्रह (Methodological Emphasis) की आलोचना भी हुई।
1960 के दशक के सामाजिक-राजनीतिक संकटों की पृष्ठभूमि में उत्तर–व्यवहारवाद का विकास हुआ। इसने राजनीतिक विज्ञान को फिर से मूल्य, प्रासंगिकता (Relevance) और कार्रवाई (Action) से जोड़ने का प्रयास किया। इस प्रकार राजनीतिक विज्ञान की यह यात्रा केवल “संस्थाओं से व्यवहार” की यात्रा नहीं है, बल्कि “संस्थाओं → व्यवहार → सामाजिक प्रासंगिकता और कार्रवाई” की व्यापक बौद्धिक यात्रा है।
पारंपरिक उपागम (Traditional Approach)
- राजनीतिक विज्ञान में पारंपरिक उपागम वह दृष्टिकोण था जिसमें राजनीति को मुख्यतः राज्य, सरकार, संविधान, कानून, राजनीतिक संस्थाओं, इतिहास और राजनीतिक दर्शन के माध्यम से समझा जाता था। इसका प्रभाव विशेष रूप से द्वितीय विश्व युद्ध से पहले तक बहुत अधिक था।
- पारंपरिक दृष्टिकोण के अनुसार राजनीतिक विज्ञान का प्रमुख कार्य राजनीतिक संस्थाओं की प्रकृति, संरचना, शक्तियों और विकास को समझना था। इसलिए संसद, कार्यपालिका, न्यायपालिका, राजनीतिक दल, संविधान और राज्य जैसी संस्थाएँ अध्ययन के केंद्र में थीं।
पारंपरिक उपागम की प्रमुख विशेषताएँ
राज्य–केंद्रितता (State-Centred Approach): राज्य को राजनीतिक जीवन की सबसे महत्वपूर्ण इकाई माना जाता था। राज्य की उत्पत्ति, प्रकृति, संप्रभुता, उद्देश्य और कार्यों का अध्ययन किया जाता था।
संस्थागत दृष्टिकोण (Institutional Approach): संसद, कार्यपालिका, न्यायपालिका, राजनीतिक दल और अन्य राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन प्रमुख था।
कानूनी–वैधानिक दृष्टिकोण (Legal-Institutional Approach): संविधान और कानूनों द्वारा संस्थाओं को प्राप्त औपचारिक शक्तियों का अध्ययन किया जाता था।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण (Historical Approach): राजनीतिक संस्थाओं और विचारों को उनके ऐतिहासिक विकास के संदर्भ में समझा जाता था।
दार्शनिक एवं मानकात्मक दृष्टिकोण (Philosophical and Normative Approach): यह दृष्टिकोण केवल यह नहीं पूछता था कि राजनीति क्या है, बल्कि यह भी पूछता था कि राजनीति क्या होनी चाहिए।
इसलिए न्याय (Justice), स्वतंत्रता (Liberty), समानता (Equality), अधिकार (Rights), आदर्श राज्य (Ideal State) और अच्छे शासन (Good Government) जैसे प्रश्न महत्वपूर्ण थे।
प्रमुख चिंतक
इस परंपरा में प्लेटो, अरस्त, मैकियावेली, हॉब्स, लॉक, रूसो, हेगेल और जे.एस. मिल जैसे विचारकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। आधुनिक संस्थागत अध्ययन में Walter Bagehot, A.V. Dicey और James Bryce भी महत्वपूर्ण हैं।
पारंपरिक उपागम की सीमाएँ और व्यवहारवादी मोड़ की पृष्ठभूमि
- समय के साथ यह महसूस किया गया कि केवल औपचारिक राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन वास्तविक राजनीति को पूरी तरह नहीं समझा सकता।
- उदाहरण के लिए, संविधान यह बता सकता है कि संसद के पास कौन-सी शक्तियाँ हैं, लेकिन यह नहीं बताता कि वास्तविक राजनीति में सांसद किस प्रकार निर्णय लेते हैं, राजनीतिक दल किस तरह दबाव डालते हैं या मतदाता किस आधार पर मतदान करते हैं।
इसलिए राजनीतिक वैज्ञानिकों के सामने एक नया प्रश्न आया-
क्या राजनीतिक विज्ञान को केवल राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन करना चाहिए या वास्तविक राजनीतिक व्यवहार का भी अध्ययन करना चाहिए?
इसी प्रश्न ने व्यवहारवादी मोड़ (Behavioural Turn) को जन्म दिया।
व्यवहारवादी मोड़ (Behavioural Turn)
व्यवहारवादी मोड़ राजनीतिक विज्ञान में उस परिवर्तन को दर्शाता है जिसमें अध्ययन का केंद्र औपचारिक संस्थाओं से वास्तविक राजनीतिक व्यवहार की ओर स्थानांतरित हुआ।
- पहले राजनीतिक वैज्ञानिक मुख्यतः यह देखते थे कि संस्था के पास कौन–सी शक्ति है?
- व्यवहारवादी दृष्टिकोण ने पूछा वास्तविक राजनीति में व्यक्ति और संस्था उस शक्ति का प्रयोग कैसे करते हैं?
- अब मतदाता, राजनीतिक दल, दबाव समूह, अभिजात वर्ग (Elite), जनमत (Public Opinion), राजनीतिक संस्कृति (Political Culture), नेतृत्व और राजनीतिक भागीदारी (Political Participation) जैसे विषय महत्वपूर्ण हो गए।
इस परिवर्तन को अक्सर Behavioural Revolution कहा जाता है।
व्यवहारवाद (Behaviouralism)
- व्यवहारवाद 20वीं शताब्दी के मध्य में राजनीतिक विज्ञान का एक प्रभावशाली बौद्धिक आंदोलन बना। इसका उद्देश्य राजनीतिक विज्ञान को अधिक वैज्ञानिक (Scientific), अनुभवजन्य (Empirical), व्यवस्थित (Systematic) और परीक्षण योग्य (Testable) बनाना था।
- व्यवहारवादियों का मानना था कि राजनीतिक विज्ञान को केवल संविधान और राजनीतिक दर्शन तक सीमित नहीं रखा जा सकता। राजनीति में वास्तविक रूप से लोगों और समूहों का व्यवहार भी अध्ययन का विषय होना चाहिए।
इसलिए व्यवहारवाद का केंद्रीय प्रश्न था राजनीतिक अभिनेता वास्तव में कैसे व्यवहार करते हैं?
व्यवहारवाद की प्रमुख विशेषताएँ
राजनीतिक व्यवहार पर जोर
व्यवहारवाद का केंद्र व्यक्ति और समूह का वास्तविक राजनीतिक व्यवहार था।
उदाहरण के लिए;
- लोग मतदान क्यों करते हैं?
- लोग किसी विशेष राजनीतिक दल का समर्थन क्यों करते हैं?
- राजनीतिक भागीदारी किन कारकों से प्रभावित होती है?
- राजनीतिक नेतृत्व के प्रति लोगों का व्यवहार कैसा होता है?
अनुभवजन्यता (Empiricism)
व्यवहारवादी राजनीतिक दावों को वास्तविक तथ्यों और प्रमाणों से जोड़ना चाहते थे।
केवल यह कहना पर्याप्त नहीं था कि “लोग लोकतंत्र का समर्थन करते हैं।” इसके बजाय यह जानने का प्रयास किया जाता था कि कितने लोग लोकतंत्र का समर्थन करते हैं, क्यों करते हैं और किन सामाजिक परिस्थितियों में उनका दृष्टिकोण बदलता है।
वैज्ञानिक पद्धति (Scientific Method)
व्यवहारवाद ने राजनीतिक विज्ञान में वैज्ञानिक शोध-पद्धति को महत्व दिया।
इसमें शामिल थे Hypothesis → Observation → Data Collection → Measurement → Analysis → Verification
परिमाणीकरण (Quantification)
राजनीतिक व्यवहार को संख्यात्मक रूप में मापने पर जोर दिया गया।
उदाहरण;
- मतदान प्रतिशत
- पार्टी समर्थन
- राजनीतिक भागीदारी
- जनमत
- चुनावी व्यवहार
- सामाजिक-आर्थिक चर
इससे Survey Research, Sampling और Statistical Analysis का महत्व बढ़ा।
मूल्य–निरपेक्षता (Value Neutrality)
व्यवहारवादियों ने शोधकर्ता के व्यक्तिगत मूल्यों और राजनीतिक पूर्वाग्रहों को वैज्ञानिक अध्ययन से अलग रखने का प्रयास किया।
उनका विश्वास था कि राजनीतिक विज्ञान को पहले यह समझना चाहिए कि क्या है, न कि तुरंत यह तय करना चाहिए कि क्या होना चाहिए।
नियमितताओं की खोज (Search for Regularities)
व्यवहारवादियों का मानना था कि राजनीतिक व्यवहार पूरी तरह अनियमित नहीं है। उसमें कुछ ऐसे पैटर्न या नियमितताएँ हो सकती हैं जिन्हें वैज्ञानिक रूप से खोजा और समझा जा सकता है।
अंतर्विषयकता (Interdisciplinary Approach)
व्यवहारवादी राजनीतिक विज्ञान को अन्य सामाजिक विज्ञानों से जोड़ना चाहते थे।
इसलिए Political Science + Sociology + Psychology + Economics + Anthropology के बीच संबंध मजबूत हुए।
व्यवहारवादी आंदोलन के प्रमुख चिंतक
चार्ल्स मेरियम (Charles Merriam)
Charles Merriam को व्यवहारवादी आंदोलन के प्रारंभिक प्रमुख प्रेरकों में माना जाता है। उन्होंने राजनीतिक विज्ञान को अधिक अनुभवजन्य और वैज्ञानिक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
Chicago School के माध्यम से राजनीतिक व्यवहार के अध्ययन को बढ़ावा मिला।
हेरोल्ड लैसवेल (Harold D. Lasswell)
लैसवेल ने राजनीति को Power, Personality, Propaganda और Political Behaviour के संदर्भ में समझने का प्रयास किया।
उनका प्रसिद्ध प्रश्न था “Who gets what, when, how?”
अर्थात् राजनीति में किसे क्या मिलता है, कब मिलता है और कैसे मिलता है?
लैसवेल ने सत्ता और संसाधनों के वितरण के अध्ययन को महत्वपूर्ण बनाया।
डेविड ईस्टन (David Easton)
David Easton व्यवहारवाद के सबसे महत्वपूर्ण चिंतकों में से एक थे।
उन्होंने राजनीति को Political System के रूप में समझने का प्रयास किया।
उनका प्रसिद्ध मॉडल है Input → Conversion → Output → Feedback
समाज से आने वाली Demands और Supports राजनीतिक व्यवस्था में Input के रूप में प्रवेश करती हैं। राजनीतिक व्यवस्था इन्हें निर्णयों और नीतियों में परिवर्तित करती है। इसके परिणाम Outputs के रूप में सामने आते हैं और फिर समाज की प्रतिक्रिया Feedback के रूप में राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करती है।
ईस्टन आगे चलकर Post-Behaviouralism के प्रमुख प्रवक्ता भी बने।
गैब्रियल आल्मंड (Gabriel Almond)
Gabriel Almond ने Structural-Functional Approach के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
उन्होंने राजनीतिक व्यवस्थाओं को केवल उनके औपचारिक संस्थानों के आधार पर समझने के बजाय यह देखने पर जोर दिया कि राजनीतिक व्यवस्था कौन-कौन से Functions करती है।
इससे Comparative Politics का अध्ययन अधिक व्यवस्थित हुआ।
व्यवहारवाद का महत्व
व्यवहारवाद ने राजनीतिक विज्ञान में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए।
- सबसे पहले, इसने Political Behaviour को अध्ययन का केंद्रीय विषय बनाया। इसके कारण मतदान, राजनीतिक भागीदारी, जनमत, राजनीतिक दल, दबाव समूह और राजनीतिक संस्कृति का अध्ययन बढ़ा।
- दूसरे, इसने राजनीतिक विज्ञान को अधिक Empirical बनाया। Survey, Interview, Sampling और Statistical Analysis जैसी तकनीकों का व्यापक उपयोग होने लगा।
- तीसरे, व्यवहारवाद ने Comparative Politics को नई दिशा दी। अब विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं का तुलनात्मक अध्ययन अधिक व्यवस्थित तरीके से किया जाने लगा।
- चौथे, राजनीतिक विज्ञान अधिक Interdisciplinary बना।
इस प्रकार व्यवहारवाद ने राजनीतिक विज्ञान को केवल संविधान और संस्थाओं के वर्णनात्मक अध्ययन से निकालकर व्यवहार और अनुभवजन्य शोध की ओर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
व्यवहारवाद की सीमाएँ और आलोचना
व्यवहारवाद ने राजनीतिक विज्ञान को वैज्ञानिक बनाने में योगदान दिया, लेकिन समय के साथ इसके विरुद्ध गंभीर आलोचनाएँ सामने आईं।
मूल्य–निरपेक्षता की समस्या
व्यवहारवाद ने Value Neutrality पर जोर दिया, लेकिन आलोचकों के अनुसार राजनीति स्वयं मूल्यों से जुड़ी है।
न्याय, स्वतंत्रता, समानता और मानवाधिकार जैसे प्रश्नों को केवल तथ्यों और आँकड़ों के आधार पर हल नहीं किया जा सकता।
इसलिए राजनीतिक विज्ञान को पूरी तरह मूल्य-निरपेक्ष बनाना कठिन है।
“क्या है” पर अत्यधिक जोर
व्यवहारवाद मुख्यतः What is? का उत्तर खोजता था।
लेकिन राजनीतिक दर्शन और मानकात्मक राजनीतिक सिद्धांत यह भी पूछते हैं—
What ought to be? अर्थात् समाज कैसा होना चाहिए?
व्यवहारवाद में इस दूसरे प्रश्न की उपेक्षा की आलोचना हुई।
तकनीक का अतिरेक
व्यवहारवाद में कभी-कभी Methodology, Quantification और Statistical Techniques स्वयं अत्यधिक महत्वपूर्ण हो गए।
आलोचना यह थी कि राजनीतिक वैज्ञानिक इस बात पर अधिक ध्यान देने लगे कि किसी घटना को कैसे मापा जाए, जबकि यह प्रश्न पीछे छूटने लगा कि किस समस्या का अध्ययन किया जाए और क्यों?
सामाजिक समस्याओं से दूरी
1960 के दशक में दुनिया गंभीर राजनीतिक और सामाजिक संकटों से गुजर रही थी—
- Vietnam War
- Civil Rights Movement
- नस्लीय संघर्ष
- गरीबी
- असमानता
- राजनीतिक हिंसा
- सामाजिक अशांति
ऐसी परिस्थितियों में यह सवाल उठा कि राजनीतिक विज्ञान यदि केवल तथ्य और आँकड़ों का अध्ययन करता रहे तथा वास्तविक सामाजिक समस्याओं पर कोई स्पष्ट दृष्टिकोण न रखे, तो उसकी सामाजिक उपयोगिता क्या है?
उत्तर–व्यवहारवाद (Post-Behaviouralism)
- व्यवहारवाद की इन सीमाओं की पृष्ठभूमि में 1960 के दशक के अंत में Post-Behaviouralism का विकास हुआ।
- इसके प्रमुख प्रवक्ता David Easton थे।
- उत्तर-व्यवहारवाद व्यवहारवाद को पूरी तरह अस्वीकार नहीं करता था। इसके बजाय उसने व्यवहारवादी आंदोलन की वैज्ञानिक उपलब्धियों को बनाए रखते हुए राजनीतिक विज्ञान में Values, Relevance और Action को पुनः केंद्रीय महत्व देने का प्रयास किया।
- उत्तर-व्यवहारवाद का मुख्य संदेश था कि राजनीतिक विज्ञान को केवल वैज्ञानिक होने की चिंता नहीं करनी चाहिए, बल्कि उसे सामाजिक रूप से उपयोगी और प्रासंगिक भी होना चाहिए।
उत्तर–व्यवहारवाद की पृष्ठभूमि
उत्तर-व्यवहारवाद का विकास अचानक नहीं हुआ। इसके पीछे 1960 के दशक की व्यापक सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियाँ थीं।
- वियतनाम युद्ध ने अमेरिकी समाज में राजनीतिक और नैतिक संकट को गहरा किया।
- नागरिक अधिकार आंदोलन ने समानता, नस्लीय न्याय और लोकतांत्रिक अधिकारों को केंद्रीय मुद्दा बनाया।
- गरीबी और असमानता ने राजनीतिक विज्ञान के सामाजिक उद्देश्य पर गंभीर प्रश्न खड़े किए।
- विश्वविद्यालयों और समाज में बढ़ते राजनीतिक आंदोलनों ने यह प्रश्न उठाया कि राजनीतिक वैज्ञानिकों को वास्तविक सामाजिक समस्याओं से किस हद तक जुड़ना चाहिए।
उत्तर–व्यवहारवाद में मूल्यों की भूमिका
- उत्तर-व्यवहारवाद ने यह स्वीकार किया कि राजनीतिक विज्ञान में मूल्यों को पूरी तरह बाहर नहीं किया जा सकता।
- राजनीतिक वैज्ञानिक जब किसी विषय को शोध के लिए चुनता है, तब भी किसी न किसी स्तर पर मूल्य और सामाजिक प्राथमिकताएँ उसके चयन को प्रभावित कर सकती हैं।
उदाहरण के लिए, यदि कोई शोधकर्ता गरीबी, लैंगिक समानता, लोकतंत्र या मानवाधिकार पर शोध करता है, तो उसके शोध का चयन स्वयं सामाजिक महत्व की धारणा से जुड़ा हो सकता है।
इसलिए उत्तर-व्यवहारवाद ने Facts और Values के बीच संबंध को पुनः महत्वपूर्ण बनाया।
व्यवहारवाद और उत्तर–व्यवहारवाद का संबंध
यह समझना महत्वपूर्ण है कि Post-Behaviouralism, Behaviouralism का पूर्ण निषेध नहीं है।
उत्तर-व्यवहारवाद ने व्यवहारवाद की वैज्ञानिक उपलब्धियों को स्वीकार किया, लेकिन उसके दायरे को विस्तृत करने का प्रयास किया।
अर्थात् Behaviouralism: Scientificity + Empirical Research + Quantification
Post-Behaviouralism:
Scientificity + Empirical Research + Values + Relevance + Action
इसलिए उत्तर-व्यवहारवाद को व्यवहारवाद के Correction और Extension के रूप में समझना अधिक उचित है।
व्यवहारवाद और उत्तर–व्यवहारवाद में अंतर
| आधार | व्यवहारवाद | उत्तर–व्यवहारवाद |
| मुख्य केंद्र | राजनीतिक व्यवहार | राजनीतिक व्यवहार + सामाजिक समस्याएँ |
| प्रमुख प्रश्न | क्या है? | क्या है और क्या होना चाहिए? |
| शोध | अनुभवजन्य | अनुभवजन्य + मानकात्मक |
| मूल्य | Value Neutrality | Values की स्वीकार्यता |
| पद्धति | Scientific/Quantitative | बहु-पद्धतिगत |
| मुख्य उद्देश्य | Scientific Knowledge | Relevant Knowledge |
| अंतिम लक्ष्य | Theory/Knowledge | Relevance + Action |
| सामाजिक संबंध | सीमित | प्रत्यक्ष |
| प्रमुख शब्द | Scientificity | Relevance |
| दृष्टिकोण | Descriptive/Empirical | Empirical + Normative + Action-Oriented |
पारंपरिक उपागम, व्यवहारवाद और उत्तर–व्यवहारवाद: एक समग्र तुलना
| आधार | पारंपरिक उपागम | व्यवहारवाद | उत्तर–व्यवहारवाद |
| अध्ययन का केंद्र | राज्य एवं संस्थाएँ | व्यक्ति एवं समूह का व्यवहार | व्यवहार + सामाजिक समस्याएँ |
| मुख्य विषय | संविधान, कानून, संस्थाएँ | मतदान, जनमत, राजनीतिक व्यवहार | सामाजिक न्याय, नीति, लोकतंत्र आदि |
| पद्धति | ऐतिहासिक, दार्शनिक, कानूनी | वैज्ञानिक, अनुभवजन्य, मात्रात्मक | बहु-पद्धतिगत |
| मूल्य | महत्वपूर्ण | मूल्य-निरपेक्षता | मूल्यों की पुनर्स्वीकृति |
| प्रमुख प्रश्न | क्या होना चाहिए? | क्या है? | क्या है + क्या करना चाहिए? |
| उद्देश्य | राजनीतिक समझ | वैज्ञानिक ज्ञान | प्रासंगिक ज्ञान एवं कार्रवाई |
| प्रमुख विशेषता | Normative | Empirical | Relevance & Action |
निष्कर्ष
राजनीतिक विज्ञान में पारंपरिक उपागम से व्यवहारवाद और फिर उत्तर–व्यवहारवाद तक का विकास विषय की निरंतर पुनर्व्याख्या की प्रक्रिया है।
पारंपरिक उपागम ने राजनीतिक विज्ञान को राज्य, संविधान, कानून, संस्थाओं, इतिहास और राजनीतिक दर्शन के माध्यम से समझने का आधार प्रदान किया। इसकी सीमा यह थी कि यह वास्तविक राजनीतिक व्यवहार को पर्याप्त महत्व नहीं देता था। व्यवहारवादी मोड़ ने इस कमी को दूर करते हुए व्यक्ति, समूह, राजनीतिक व्यवहार, अनुभवजन्य शोध, वैज्ञानिक पद्धति और परिमाणीकरण को राजनीतिक अध्ययन के केंद्र में रखा। इससे राजनीतिक विज्ञान अधिक वैज्ञानिक और अनुभवजन्य बना। लेकिन व्यवहारवाद की मूल्य–निरपेक्षता, तकनीक के अतिरेक और सामाजिक समस्याओं से दूरी की आलोचना हुई। 1960 के दशक की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों ने इस आलोचना को और मजबूत किया। इसी संदर्भ में उत्तर-व्यवहारवाद का उदय हुआ। इसने राजनीतिक विज्ञान को केवल “Scientific” होने के बजाय “Relevant” और “Action-Oriented” बनाने पर जोर दिया।
MCQs
- राजनीतिक विज्ञान के पारंपरिक उपागम का मुख्य केंद्र क्या था?
(A) राजनीतिक व्यवहार
(B) राजनीतिक संस्थाएँ
(C) राजनीतिक मनोविज्ञान
(D) जनमत सर्वेक्षण
उत्तर: (B) राजनीतिक संस्थाएँ
- पारंपरिक उपागम मुख्यतः किस प्रकार के अध्ययन पर बल देता था?
(A) अनुभवजन्य एवं मात्रात्मक
(B) सांख्यिकीय एवं व्यवहारवादी
(C) ऐतिहासिक, कानूनी एवं दार्शनिक
(D) प्रयोगात्मक
उत्तर: (C) ऐतिहासिक, कानूनी एवं दार्शनिक
- व्यवहारवादी क्रांति का प्रमुख उद्देश्य क्या था?
(A) राजनीतिक दर्शन को समाप्त करना
(B) राजनीतिक विज्ञान को अधिक वैज्ञानिक एवं अनुभवजन्य बनाना
(C) केवल संविधान का अध्ययन करना
(D) राज्य की अवधारणा को समाप्त करना
उत्तर: (B) राजनीतिक विज्ञान को अधिक वैज्ञानिक एवं अनुभवजन्य बनाना
- व्यवहारवाद ने राजनीतिक अध्ययन के केंद्र को किस ओर स्थानांतरित किया?
(A) संविधान से कानून की ओर
(B) राज्य से संप्रभुता की ओर
(C) संस्थाओं से राजनीतिक व्यवहार की ओर
(D) इतिहास से दर्शन की ओर
उत्तर: (C) संस्थाओं से राजनीतिक व्यवहार की ओर
- निम्नलिखित में से कौन व्यवहारवादी उपागम की प्रमुख विशेषता है?
(A) मूल्य-निरपेक्षता
(B) केवल ऐतिहासिक अध्ययन
(C) केवल संवैधानिक अध्ययन
(D) आदर्श राज्य का अध्ययन
उत्तर: (A) मूल्य–निरपेक्षता
- व्यवहारवाद में किस पर विशेष जोर दिया गया?
(A) अनुभवजन्य शोध
(B) केवल राजनीतिक दर्शन
(C) धार्मिक संस्थाएँ
(D) केवल संवैधानिक कानून
उत्तर: (A) अनुभवजन्य शोध
- व्यवहारवाद में “परिमाणीकरण” का क्या अर्थ है?
(A) राजनीतिक संस्थाओं को समाप्त करना
(B) राजनीतिक घटनाओं एवं व्यवहार को जहाँ संभव हो, संख्यात्मक रूप में मापना
(C) राजनीतिक दर्शन को गणित में बदलना
(D) संविधान को सांख्यिकीय दस्तावेज बनाना
उत्तर: (B) राजनीतिक घटनाओं एवं व्यवहार को जहाँ संभव हो, संख्यात्मक रूप में मापना
- “Who gets what, when, how?” किससे संबंधित है?
(A) डेविड ईस्टन
(B) गैब्रियल आल्मंड
(C) हेरोल्ड लैसवेल
(D) चार्ल्स मेरियम
उत्तर: (C) हेरोल्ड लैसवेल
- हेरोल्ड लैसवेल का अध्ययन मुख्यतः किस अवधारणा से जुड़ा था?
(A) सत्ता और राजनीतिक व्यवहार
(B) संप्रभुता और कानून
(C) न्याय और आदर्श राज्य
(D) वर्ग संघर्ष और उत्पादन
उत्तर: (A) सत्ता और राजनीतिक व्यवहार
- राजनीतिक व्यवस्था का “Input–Output” मॉडल किससे संबंधित है?
(A) Harold Lasswell
(B) David Easton
(C) Gabriel Almond
(D) Charles Merriam
उत्तर: (B) David Easton
- डेविड ईस्टन के राजनीतिक व्यवस्था मॉडल में निम्न में से कौन–सा Input का उदाहरण है?
(A) कानून
(B) नीतियाँ
(C) माँगें और समर्थन
(D) न्यायिक निर्णय
उत्तर: (C) माँगें और समर्थन
- डेविड ईस्टन के मॉडल में “Feedback” का अर्थ ह
(A) राजनीतिक व्यवस्था का समाप्त होना
(B) Outputs के प्रति समाज की प्रतिक्रिया
(C) संविधान में संशोधन
(D) केवल चुनाव परिणाम
उत्तर: (B) Outputs के प्रति समाज की प्रतिक्रिया
- गैब्रियल आल्मंड मुख्यतः किस उपागम से संबंधित हैं?
(A) वर्ग संघर्ष उपागम
(B) संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक उपागम
(C) कानूनी उपागम
(D) ऐतिहासिक भौतिकवाद
उत्तर: (B) संरचनात्मक–प्रकार्यात्मक उपागम
- चार्ल्स मेरियम का संबंध किससे माना जाता है?
(A) व्यवहारवादी आंदोलन के विकास से
(B) उत्तर-औपनिवेशिक सिद्धांत से
(C) निर्भरता सिद्धांत से
(D) आदर्शवाद से
उत्तर: (A) व्यवहारवादी आंदोलन के विकास से
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