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परिसीमन विवाद : उत्तर बनाम दक्षिण

भारत में संसदीय प्रतिनिधित्व और परिसीमन का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आ गया है। यह बहस केवल सीटों की संख्या बढ़ाने या घटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ में एक गहरा सवाल छिपा है, कि आखिर किसी राज्य को संसद में कितनी आवाज़ मिलनी चाहिए, इसका आधार क्या हो।सबसे पहले जानेंगे परिसीमन होता क्या है और परिसीमन आयोग का संवैधानिक पक्ष क्या है?

परिसीमन होता क्या है?

  • परिसीमन का अर्थ है निर्वाचन क्षेत्रों (लोकसभा और विधानसभा सीटों) की सीमाओं का पुनर्निर्धारण, ताकि हर क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या यथासंभव समान रहे और प्रतिनिधित्व संतुलित बना रहे।
  • यह प्रक्रिया जनगणना के आंकड़ों के आधार पर की जाती है, जनसंख्या में बदलाव के अनुसार सीटों की संख्या और उनकी सीमाएं फिर से तय की जाती हैं।
  • इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” का सिद्धांत बना रहे, यानी हर सांसद या विधायक लगभग बराबर संख्या में लोगों का प्रतिनिधित्व करे।
  • भारत में यह कार्य परिसीमन आयोग करता है, जिसका गठन संसद के एक अधिनियम के जरिए होता है। इसके निर्णय सामान्यतः बाध्यकारी होते हैं और इन्हें किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।

भारत में अब तक परिसीमन 1952, 1963, 1973 और 2002 में हुआ है। इनमें भी 1976 में एक संविधान संशोधन के जरिए सीटों की संख्या को 1971 की जनगणना पर स्थिर कर दिया गया था, ताकि जो राज्य जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे, उन्हें सीटें घटने का दंड न मिले।

यह रोक 2026 तक के लिए तय की गई थी, और अब आगे परिसीमन का मुद्दा फिर से चर्चा में है, जो इस लेख का मूल विषय भी है।

परिसीमन का संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद 82: प्रत्येक जनगणना के पश्चात संसद एक परिसीमन अधिनियम बनाती है, जिसके आधार पर लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण और निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण होता है।
  • अनुच्छेद 170: यह अनुच्छेद राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन से संबंधित है, इसके अनुसार भी प्रत्येक जनगणना के बाद विधानसभा क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण किया जाता है।
  • 42वां संविधान संशोधन (1976): इसके द्वारा 1971 की जनगणना तक सीटों की संख्या को स्थिर कर दिया गया, ताकि परिवार नियोजन में सफल राज्यों को सीटें घटने का दंड न भुगतना पड़े।
  • 84वां संविधान संशोधन (2001): इसने इस रोक को 2001 की जनगणना तक बढ़ा दिया, हालांकि सीटों की कुल संख्या 1971 के आधार पर ही स्थिर रखी गई, केवल सीटों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया गया।
  • 87वां संविधान संशोधन (2003): इसके अनुसार परिसीमन 2001 की जनगणना के आधार पर हुआ, परंतु सीटों की कुल संख्या में कोई परिवर्तन नहीं किया गया।

परिसीमन आयोग के बारे में

  • परिसीमन आयोग का गठन परिसीमन आयोग अधिनियम के अंतर्गत किया जाता है, जो संसद द्वारा पारित एक विशेष कानून होता है।
  • अब तक भारत में परिसीमन आयोग का गठन 1952, 1963, 1973 और 2002 में किया गया है।
  • आयोग में सामान्यतः तीन सदस्य होते हैं, एक सेवानिवृत्त या कार्यरत उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश (अध्यक्ष के रूप में), मुख्य निर्वाचन आयुक्त या उनके द्वारा नामित निर्वाचन आयुक्त, तथा संबंधित राज्य का राज्य निर्वाचन आयुक्त।
  • आयोग के आदेश या निर्णय अंतिम होते हैं, इन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
  • आयोग के आदेश संसद के दोनों सदनों तथा संबंधित राज्य विधानसभाओं के समक्ष रखे जाते हैं, परंतु उनमें किसी प्रकार का संशोधन नहीं किया जा सकता।
  • आयोग का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में जनसंख्या का अनुपात यथासंभव समान रहे, जिससे “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” का सिद्धांत बना रहे।
  • अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सीटें आरक्षित करने का कार्य भी परिसीमन आयोग ही करता है, जनसंख्या के अनुपात के आधार पर।

अब हम लेख के विभिन्न आयामों को समझेंगे:

संसद की मूल जिम्मेदारी

संसद की सबसे पुरानी और मौलिक शक्ति है, “पर्स की शक्ति”, यानी यह तय करना कि सरकार पैसा कैसे जुटाए और कहां खर्च करे। यह जांचना संसद का प्राथमिक कर्तव्य है कि धन कहां से आ रहा है और किस दिशा में जा रहा है। यही कारण है कि जब धनी राज्य अधिक कर देते हैं, तो यह स्वाभाविक अपेक्षा बनती है कि नीति निर्माण और खर्च के फैसलों में उनकी भूमिका भी उसी अनुपात में हो। परंतु व्यवहार में देखा जाए तो जो राज्य अधिक कर देते हैं, उन्हें अपेक्षाकृत कम हिस्सा वापस मिलता है, और उनकी संसद में आवाज़ भी लगातार सिकुड़ रही है।

दक्षिण बनाम उत्तर का आर्थिक चित्र

आंकड़ों की बात करें तो तमिलनाडु, कर्नाटक और तेलंगाना मिलकर देश के कुल प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों का लगभग बीस प्रतिशत हिस्सा देते हैं, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश मिलकर मात्र छह प्रतिशत का योगदान करते हैं। स्पष्ट है कि दक्षिणी राज्य अपनी अर्थव्यवस्था और कर संग्रह की दृष्टि से कहीं अधिक सक्षम हैं। पांच वर्ष पहले दक्षिणी राज्यों का हिस्सा तेरह प्रतिशत जनसंख्या के बदले तेईस प्रतिशत कर संग्रह का था, जो अब तेईस से बढ़कर तेतीस प्रतिशत हो गया है। इसके विपरीत उत्तर के राज्य चौवालीस प्रतिशत जनसंख्या के बावजूद केवल तेतीस प्रतिशत कर योगदान करते हैं। यानी जहां आर्थिक योगदान बढ़ रहा है, वहां जनसंख्या का हिस्सा और संसद में सीटों का हिस्सा घटता जा रहा है, और जहां आर्थिक योगदान घट रहा है, वहां जनसंख्या तथा सीटों का अनुपात बढ़ रहा है। यह विरोधाभास ही आज के परिसीमन विवाद की मूल जड़ है।

जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व का ऐतिहासिक आधार

यह समझना आवश्यक है कि जनसंख्या को प्रतिनिधित्व का आधार बनाने की सोच कहां से आई। यह विचार अठारहवीं सदी के अमेरिका से जुड़ा है, जब सन सत्रह सौ सत्तासी में जेम्स मैडिसन ने अमेरिकी संविधान का प्रारूप तैयार करते हुए यह सिद्धांत प्रतिपादित किया था कि हर दस वर्ष में जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का आकार तय किया जाए। उस दौर में एक निर्वाचित प्रतिनिधि भौतिक रूप से अपने क्षेत्र की जनता से जुड़ा होता था। वह चलकर, घूमकर, मिलकर लोगों की समस्याएं समझता था। स्वाभाविक रूप से एक व्यक्ति की क्षमता सीमित थी, वह अधिकतम कितने लोगों तक पहुंच सकता है, कितने लोगों से मिल सकता है, इसकी एक व्यावहारिक सीमा थी। इसलिए समान जनसंख्या के आधार पर सीटें तय करना उस समय की परिस्थितियों में एक न्यायसंगत और तर्कसंगत व्यवस्था थी, ताकि हर नागरिक को समान अवसर और समान आवाज़ मिल सके।

आज के दौर में यह तर्क कितना वैध

लेकिन सवाल यह है कि उस अठारहवीं सदी की परिस्थिति आज दो सौ चालीस वर्ष बाद भी क्या उतनी ही प्रासंगिक है। आज का सांसद अपने पूरे निर्वाचन क्षेत्र में पैदल घूमकर हर मतदाता से मिलने की कोशिश नहीं करता, न ही यह आवश्यक है। तकनीक ने संवाद और संपर्क की वह सीमा ही समाप्त कर दी है जिसके आधार पर मूल रूप से समान जनसंख्या का सिद्धांत बनाया गया था। एक सांसद आज संदेश, सोशल मीडिया, वीडियो कॉल और अन्य माध्यमों से हजारों लोगों तक एक साथ पहुंच सकता है। जो व्यावहारिक सीमा अठारहवीं सदी में समान जनसंख्या के आधार को उचित बनाती थी, वह सीमा अब तकनीक ने पूरी तरह मिटा दी है।

फिर भी समान जनसंख्या के पक्ष में एक नैतिक तर्क आज भी मजबूती से खड़ा है, कि हर नागरिक का वोट बराबर मूल्य का होना चाहिए। यह सर्वथा उचित है कि कानपुर में रहने वाले किसी भारतीय की आवाज़ कोयंबटूर में रहने वाले भारतीय से कमतर नहीं मानी जा सकती। परंतु यहां एक बारीक अंतर समझना जरूरी है। बहस इस बात पर नहीं है कि क्या प्रत्येक नागरिक का वोट बराबर होना चाहिए, इस पर सभी सहमत हैं। असली प्रश्न यह है कि क्या किसी राज्य की सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति संसद में केवल उसकी जनसंख्या पर आधारित होनी चाहिए, या इसे अधिक व्यापक और समग्र आधार पर तय किया जाना चाहिए।

धन और प्रतिनिधित्व का जटिल संबंध

संसद का मूल कार्य यह तय करना है कि देश का धन कैसे जुटाया जाए और कैसे खर्च किया जाए। ऐसे में जो राज्य संघ के खजाने में अधिक योगदान करते हैं, उनकी यह मांग असंगत नहीं मानी जा सकती कि खर्च के निर्णयों में उनकी उचित हिस्सेदारी हो। बेशक इसका अर्थ यह कभी नहीं हो सकता कि मताधिकार केवल करदाताओं तक सीमित कर दिया जाए, यह विचार लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के विपरीत होगा और अनुचित भी। परंतु परिसीमन आयोग के सामने यह अवसर है कि वह इक्कीसवीं सदी के भारतीय संघवाद की जरूरतों के अनुरूप एक ऐसा व्यापक सूत्र तैयार करे, जो संसद में हिस्सेदारी के लिए भी वैसी ही व्यवस्था बनाए जैसी वित्त आयोग करों के बंटवारे के लिए बनाता है। वित्त आयोग जब राज्यों के बीच करों का बंटवारा तय करता है, तो वह केवल जनसंख्या को नहीं, बल्कि आय, राजकोषीय अनुशासन, वनावरण, जनांकिकीय प्रदर्शन जैसे कई मानकों को साथ मिलाकर एक संतुलित सूत्र बनाता है। परिसीमन में भी ऐसा ही समग्र दृष्टिकोण अपनाया जा सकता है।

वर्तमान व्यवस्था के दुष्परिणाम

आज का सिर्फ जनसंख्या आधारित परिसीमन कुछ बेहद विकृत और प्रतिगामी प्रवृत्तियों को जन्म दे रहा है। कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा अपने राज्य के परिवारों से अधिक बच्चे पैदा करने का आग्रह किया जाना इसका स्पष्ट उदाहरण है। यह आग्रह मानव विकास या पारिवारिक कल्याण की किसी गहरी सोच से नहीं आता, बल्कि इस डर से आता है कि भविष्य में होने वाले परिसीमन में उनके राज्य की सीटें कहीं कम न हो जाएं। इसी तरह अंतरराज्यीय प्रवासी श्रम का मुद्दा भी राजनीतिक रूप से संवेदनशील बन गया है, क्योंकि जो लोग रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में जाकर काम करते हैं, वे मूल राज्य की जनगणना में तो गिने जाते हैं, परंतु वास्तविक आर्थिक योगदान वहां देते हैं जहां वे काम करते हैं। यह विडंबना ही है कि कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों का जो कर राजस्व उन प्रवासी श्रमिकों के परिश्रम से भी बनता है, उन्हीं श्रमिकों के मूल राज्यों को भविष्य में सीटें बढ़ने का लाभ मिलने वाला है, जबकि वे श्रमिक अब भी अपने मूल राज्य की जनसंख्या में ही गिने जा रहे हैं।

हल क्या हो सकता है

यदि परिसीमन का आधार केवल जनसंख्या न होकर आर्थिक योगदान अथवा कर हिस्सेदारी को भी शामिल करने वाला एक समग्र सूत्र बना दिया जाए, तो संपूर्ण राजनीतिक विमर्श की दिशा ही बदल जाएगी। तब किसी मुख्यमंत्री को बच्चों की संख्या को सीट संरक्षण की रणनीति के रूप में नहीं देखना पड़ेगा। इसी प्रकार अंतरराज्यीय प्रवास का मुद्दा भी इतना राजनीतिक रूप से विवादास्पद नहीं रह जाएगा, क्योंकि प्रवासी श्रमिक जिस राज्य की अर्थव्यवस्था और कर संग्रह में योगदान करते हैं, उसे इसका श्रेय स्वाभाविक रूप से मिल जाएगा। इस प्रकार राज्यों के बीच होने वाली प्रतिस्पर्धा का केंद्र बिंदु बच्चों की संख्या और प्रवासी श्रम जैसे मुद्दों से हटकर विकास और वित्तीय योगदान की ओर मुड़ जाएगा, जो कि किसी भी संघीय व्यवस्था के लिए कहीं अधिक स्वस्थ और उपयोगी बहस होगी।

निष्कर्ष

परिसीमन को लेकर चल रही पूरी बहस अंततः एक गलत आंकड़े पर केंद्रित है। असली सवाल यह नहीं है कि जनगणना का कौन सा वर्ष आधार बने या सीटों की कुल संख्या क्या हो, बल्कि यह है कि संसदीय प्रतिनिधित्व का हर बुनियादी हर, यानी डिनॉमिनेटर, केवल जनसंख्या ही क्यों हो। जिस प्रकार वित्त आयोग करों के बंटवारे के लिए बहुआयामी सूत्र अपनाता है, उसी प्रकार परिसीमन आयोग को भी एक ऐसा संतुलित सूत्र खोजना होगा, जो न केवल यह दर्शाए कि किसी राज्य में कितने लोग रहते हैं, बल्कि यह भी प्रतिबिंबित करे कि वह राज्य राष्ट्रीय समग्रता में कितना योगदान करता है। भारतीय संघवाद की परिपक्वता इसी संतुलन को साधने में निहित है, कि जनसंख्या और आर्थिक योगदान दोनों को समुचित महत्व मिले, ताकि कोई भी राज्य स्वयं को उपेक्षित या असंतुलित प्रणाली का शिकार न समझे।

लेख का सार:

  • संसद की मूल शक्ति “पर्स की शक्ति” है, यह तय करना कि धन कहां से जुटाया जाए और कहां खर्च किया जाए, इसी आधार पर प्रतिनिधित्व का प्रश्न भी जुड़ा हुआ है।
  • तमिलनाडु, कर्नाटक और तेलंगाना मिलकर देश के कुल करों का लगभग बीस प्रतिशत योगदान करते हैं, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश मिलकर केवल छह प्रतिशत।
  • पांच वर्षों में दक्षिणी राज्यों का कर हिस्सा तेईस से तेतीस प्रतिशत हो गया, जबकि उत्तर के राज्यों का हिस्सा चौवालीस प्रतिशत जनसंख्या के बावजूद केवल तेतीस प्रतिशत कर योगदान तक सीमित है।
  • जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व का सिद्धांत 1787 में जेम्स मैडिसन द्वारा अमेरिकी संविधान में दिया गया था, जब एक प्रतिनिधि की जनता तक पहुंचने की क्षमता सीमित थी।
  • आज तकनीक ने वह सीमा समाप्त कर दी है, जिस कारण एक सांसद अब बड़ी जनसंख्या तक भी आसानी से पहुंच सकता है, इसलिए मूल तर्क की प्रासंगिकता पर प्रश्न उठता है।
  • बहस इस बात पर नहीं है कि प्रत्येक नागरिक का वोट बराबर होना चाहिए या नहीं, बल्कि इस बात पर है कि राज्य की सामूहिक सौदेबाजी शक्ति केवल जनसंख्या पर आधारित हो या नहीं।
  • वित्त आयोग करों के बंटवारे के लिए जनसंख्या के साथ आय, राजकोषीय अनुशासन जैसे कई मानक इस्तेमाल करता है, परिसीमन में भी ऐसा ही समग्र सूत्र अपनाया जा सकता है।
  • केवल जनसंख्या आधारित परिसीमन के कारण कुछ मुख्यमंत्री अपने राज्य में अधिक बच्चे पैदा करने का आग्रह कर रहे हैं, ताकि भविष्य में सीटें न घटें।
  • अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिकों का कर योगदान जिस राज्य में होता है, वहां नहीं गिना जाता, बल्कि उनके मूल राज्य की जनसंख्या में गिना जाता है, जिससे विसंगति उत्पन्न होती है।
  • मुख्य निष्कर्ष है कि परिसीमन की बहस गलत आंकड़े पर टिकी है, असली प्रश्न सीटों की संख्या नहीं बल्कि प्रतिनिधित्व का हर (डिनॉमिनेटर) क्या हो, इस पर होना चाहिए, जनसंख्या और आर्थिक योगदान दोनों को साथ लेकर संतुलित सूत्र बनाना जरूरी है।

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