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बदलते पश्चिम एशिया में भारत की भूमिका

पश्चिम एशिया, जिसे परंपरागत रूप से “मध्य पूर्व” कहा जाता रहा है, दशकों से भारत की विदेश नीति में एक विशेष स्थान रखता रहा है। यह क्षेत्र भारत के लिए कच्चे तेल का प्रमुख स्रोत, श्रमशक्ति के निर्यात का केंद्र और विदेशी विप्रेषण यानी रेमिटेंस का बड़ा माध्यम रहा है। परंतु हाल के दिनों में सऊदी अरब, तुर्कीये और पाकिस्तान के बीच हुए “मक्का रक्षा समझौते” ने भारत की परंपरागत नीति की सीमाओं को उजागर कर दिया है। यह लेख इस बदलते भूराजनीतिक परिदृश्य, भारत की अब तक की रणनीति, उसकी कमजोरियों और आगे के मार्ग का विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जो सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा।

भारत की परंपरागत पश्चिम एशिया नीति

भारत ने दशकों तक पश्चिम एशिया के प्रति एक सुविचारित अस्पष्टता और सामरिक दूरी की नीति अपनाई। इसके पीछे मूल तर्क यह था कि इस क्षेत्र के सभी देशों से आर्थिक संबंध बनाए रखना अधिक लाभप्रद है, बजाय किसी एक पक्ष का साथ देकर बाकी को नाराज़ करने के।

इस नीति की प्रमुख विशेषताएं थीं:

  • रियाद, तेहरान, तेल अवीव और अबू धाबी जैसी परस्पर विरोधी शक्तियों के साथ संतुलित संबंध।
  • क्षेत्रीय सुरक्षा दायित्वों में उलझने से परहेज।
  • आर्थिक और श्रम आधारित संबंधों को प्राथमिकता।

इसी दृष्टिकोण को हाल के वर्षों में “बहु संरेखण” या मल्टी अलाइनमेंट की संज्ञा दी गई। यह रणनीति उस दौर में भारत के हित में काम करती रही जब अमेरिका पश्चिम एशिया में सुरक्षा का निर्विवाद संरक्षक था और समुद्री मार्गों की सुरक्षा तथा क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करता था।

भूराजनीतिक बुनियाद में बदलाव

पश्चिम एशिया की सुरक्षा संरचना अब तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। अमेरिका अपनी वैश्विक प्रतिबद्धताओं को सीमित कर एक अनिश्चित “चयनात्मक संलग्नता” यानी सिलेक्टिव एंगेजमेंट की मुद्रा की ओर बढ़ रहा है। इसके परिणामस्वरूप क्षेत्र में एक गहरी सुरक्षा रिक्तता उत्पन्न हो गई है, जिसे भरने के लिए क्षेत्रीय शक्तियां आपस में होड़ कर रही हैं।

पश्चिम एशियाई देश अब दूरी बनाए रखने या बहु संरेखण की नीति को सद्गुण नहीं मानते। वे सक्रिय रूप से ऐसे भरोसेमंद सुरक्षा साझीदारों की खोज में हैं जो केवल कूटनीतिक बयानबाजी और नियमित आर्थिक सहयोग से आगे बढ़कर कुछ ठोस पेशकश कर सकें।

मक्का संयुक्त रक्षा समझौता : एक नया सुरक्षा ढांचा

इस बदलती संरचनात्मक वास्तविकता का सबसे स्पष्ट प्रमाण है सऊदी अरब, तुर्कीये और पाकिस्तान के बीच हुआ मक्का संयुक्त रक्षा समझौता। यद्यपि इसे साझा कमजोरियों के प्रबंधन हेतु एक रक्षात्मक प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया गया है, यह वास्तव में एक व्यापक सुरक्षा पुनर्गठन का संकेत देता है।

समझौते की प्रमुख विशेषताएं

  • खाड़ी की पूंजी को तुर्की के रक्षा तकनीक के साथ जोड़ना।
  • पाकिस्तानी सैन्य जनशक्ति और सैनिक कौशल का समावेश।
  • एक सामूहिक रक्षा व्यवस्था का निर्माण, जो सीधे भारत की पश्चिमी समुद्री सीमा पर खड़ी होती है।

इस समझौते का सबसे बड़ा महत्व यह है कि यह पहली बार भारत की सामरिक सीमाओं के अत्यंत निकट एक ऐसी सैन्य साझेदारी को जन्म देता है, जिसमें भारत की कोई भूमिका नहीं है, जबकि इसमें शामिल एक पक्ष यानी पाकिस्तान भारत का पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी है।

भारत के लिए क्यों है यह चिंता का विषय

भारत के लिए यह समझौता एक पृथक कूटनीतिक घटना नहीं, बल्कि एक स्पष्ट संरचनात्मक संकेत है कि पश्चिम एशिया की सुरक्षा वास्तुकला मूलभूत रूप से पुनर्लिखित हो रही है, और यह पुनर्लेखन ऐसे कर्ताओं द्वारा किया जा रहा है जिनके सामरिक हित सीधे भारत के दीर्घकालिक लक्ष्यों के विरुद्ध जाते हैं।

यदि भारत परंपरागत कूटनीतिक प्रक्रियाओं और व्यापारिक वाणिज्य पर निर्भर रहना जारी रखता है, तो उसे उस क्षेत्र में हाशिये पर धकेले जाने का खतरा है जो उसके राष्ट्रीय अस्तित्व के लिए अनिवार्य है।

यहां तीन बड़े प्रश्न उभरते हैं:

  1. बाहरी शक्तियों और शत्रुतापूर्ण क्षेत्रीय गठबंधनों के बढ़ते प्रभाव का भारत के व्यापार मार्गों, ऊर्जा सुरक्षा और खाड़ी में रहने वाले लाखों भारतीयों के कल्याण पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
  2. क्या भारत स्वयं की साझेदारियां बनाएगा।
  3. या क्षेत्र की सुरक्षा में अप्रासंगिक होकर रह जाएगा।

क्षेत्रीय सुरक्षा वास्तुकला की चुनौतियां

1- ईरान संबंधी शत्रुता और आधारभूत संरचना की कमजोरी

ईरान से संबंधित हालिया तनाव ने यह प्रदर्शित किया कि आधुनिक और अत्यंत एकीकृत आर्थिक अवसंरचना ग्रे जोन तथा असममित युद्ध पद्धतियों के सामने अत्यंत संवेदनशील बनी रहती है। बंदरगाह सुविधाएं, ऊर्जा नेटवर्क और रसद गलियारे अल्प लागत वाले ड्रोन हमलों के प्रति अत्यंत असुरक्षित साबित हुए, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि पूंजी प्रधान अवसंरचना स्थानीयकृत सुरक्षा शून्यता की पूर्ति नहीं कर सकती।

2- हाइपर सिक्योर आर्थिक क्षेत्रों की भेद्यता

उच्च सुरक्षा वाले आर्थिक एन्क्लेव भी क्षेत्र की अस्थिरता के प्रभावों से अछूते नहीं रह सकते, क्योंकि आधुनिक खाड़ी मॉडल विदेशी निगमों और प्रवासी श्रमशक्ति पर भारी निर्भर है। क्षेत्रीय स्थिरता वैश्विक धारणा से गहराई से जुड़ी हुई है।

3- पूंजी और कौशल के पलायन का जोखिम

यदि सुरक्षा एक निश्चित मनोवैज्ञानिक सीमा को पार कर जाती है, तो प्रतिभा और पूंजी जितनी तेज़ी से इस क्षेत्र में प्रवेश करती हैं, उतनी ही तेज़ी से बाहर भी जा सकती हैं। इससे वे संकरे समुद्री चोकपॉइंट या भूमि व्यापार मार्ग भी प्रभावित होते हैं, जो पहले से ही अस्थिर भौगोलिक कड़ियों पर निर्भर हैं।

4- व्यापार और प्रवासी कूटनीति की सीमाएं

लाल सागर में समुद्री खतरे, महत्वपूर्ण अवसंरचना पर ड्रोन हमले, यमन और सूडान में संघर्ष में संलिप्तता, तथा होरमुज जलडमरूमध्य और अब बाब अल मंडेब से जुड़ी अस्थिरता को देखते हुए, यह धारणा कि केवल व्यापारिक संबंध और प्रवासी कूटनीति भारत के प्रभाव को सुरक्षित रख सकते हैं, तेजी से टूट रही है। ऐसे क्षेत्र में जहां समुद्री खतरे व्याप्त हैं, वहां ठोस सुरक्षा आश्वासन देने में सक्षम साझीदार ही टिक सकते हैं।

पश्चिम एशियाई शक्तियों की नई अपेक्षाएं

पश्चिम एशिया की शक्तियां अब हार्ड पावर विकल्पों की भूखी हैं, जिनमें शामिल हैं

  • नौसैनिक गश्त
  • आसूचना यानी इंटेलिजेंस साझाकरण
  • रक्षा औद्योगिक सहयोग
  • विश्वसनीय आतंकवाद विरोधी क्षमताएं

यदि नई दिल्ली इस भूमिका में प्रवेश करने में देरी करती है, तो यह रिक्तता अन्य शक्तियां भर देंगी, जैसा कि तुर्कीये ने मक्का में पहले ही प्रदर्शित कर दिया है।

भारत को करने होंगे कठोर नीतिगत परिवर्तन

अपने सामरिक स्थान की रक्षा के लिए नई दिल्ली को एक निर्णायक सिद्धांतगत परिवर्तन पर विचार करना होगा, जिसमें भारत क्षेत्रीय स्थिरता के निष्क्रिय लाभार्थी से एक सक्रिय गारंटर की भूमिका की ओर बढ़े।

इसके लिए आवश्यक प्रमुख कदम इस प्रकार हैं:

  • उच्च स्तरीय द्विपक्षीय दौरों और आर्थिक शिखर सम्मेलनों से आगे बढ़कर पश्चिमी हिंद महासागर तथा पश्चिम एशिया क्षेत्र में सक्रिय रूप से हार्ड पावर का प्रक्षेपण करना।
  • होरमुज जलडमरूमध्य, ओमान की खाड़ी, अदन की खाड़ी, सोमाली तट और बाब अल मंडेब जैसे प्रमुख चोकपॉइंट्स पर नौसैनिक और समुद्री सुरक्षा साझेदारियों का तेज़ विस्तार।
  • संयुक्त समुद्री गश्त, स्थायी रसद पहुंच व्यवस्था और मित्र खाड़ी देशों के साथ अंतर परिचालनीय निगरानी नेटवर्क के माध्यम से नौसैनिक उपस्थिति को गहराई देना।
  • इससे भारत स्वयं को अपने निकटतम पड़ोस में प्रमुख सुरक्षा प्रदाता के रूप में स्थापित कर सकता है।

रक्षा निर्माण और साझेदारी की भूमिका

भारत को अपने बढ़ते रक्षा निर्माण तंत्र का उपयोग खाड़ी देशों को हार्डवेयर और तकनीक के लिए एक विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करने हेतु करना चाहिए।

इसके लिए आवश्यक तत्व:

  • सहयोगात्मक रक्षा उपक्रम
  • वास्तविक परिचालन क्षमता वाले संयुक्त सैन्य अभ्यास
  • गहन आसूचना साझाकरण व्यवस्था, जो केवल खरीद संबंधी चर्चाओं से आगे बढ़े

संयुक्त अरब अमीरात और इज़राइल जैसे साझीदारों के साथ मजबूत द्विपक्षीय और पृथक रूप से सऊदी अरब के साथ “मिनी लेटरल” यानी छोटे बहुपक्षीय सुरक्षा ढांचे विकसित करने से दिल्ली शत्रुतापूर्ण गठबंधनों के विरुद्ध एक प्रतिसंतुलन तैयार कर सकती है, बिना किसी शीत युद्धकालीन कठोर गठबंधन प्रणाली में उलझे।

लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए कि:

भारत का उद्देश्य किसी विदेशी दलदल में उलझना नहीं, बल्कि एक ऐसा सामरिक प्रतिरोधक जाल तैयार करना है जो भारतीय हितों की रक्षा करे और सहयोगी देशों को आश्वस्त करे।

निष्कर्ष

पश्चिम एशिया में भारत की निष्क्रिय उपस्थिति का दौर अब स्वाभाविक रूप से समाप्ति की ओर है। मक्का समझौता एक कठोर स्मरण है कि क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्थाएं भारत की भागीदारी के साथ बनें या उसके बिना, आगे बढ़ती रहेंगी। यदि दिल्ली अपने आर्थिक भविष्य की सुरक्षा करना चाहती है, अपनी ऊर्जा धमनियों की रक्षा करनी है और स्वयं को एक अग्रणी हार्ड पावर के रूप में स्थापित करना है, तो उसे तात्कालिकता और महत्वाकांक्षा के साथ कार्य करना होगा।

पश्चिम एशिया में परंपरागत कूटनीतिक संलग्नता से आगे बढ़कर ठोस हार्ड पावर सुरक्षा साझेदारियां निर्मित करना अब भारत के लिए मात्र एक सामरिक विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्यता बन गया है।


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