अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अध्ययन में लंबे समय तक यथार्थवाद (Realism) और उदारवाद (Liberalism) जैसे पारंपरिक सिद्धांतों का प्रभाव रहा। इन सिद्धांतों ने मुख्य रूप से राज्य, शक्ति, सुरक्षा, युद्ध, राष्ट्रीय हित और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को समझने का प्रयास किया। लेकिन समय के साथ अनेक विद्वानों ने यह प्रश्न उठाया कि क्या अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अध्ययन केवल राज्यों और उनकी शक्ति के आधार पर किया जा सकता है? क्या ज्ञान वास्तव में पूरी तरह वस्तुनिष्ठ (Objective) और मूल्य-निरपेक्ष (Value-Free) होता है? क्या अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में मौजूद असमानता, शोषण, वर्ग, जाति, लिंग, नस्ल और उपनिवेशवाद की विरासत को पारंपरिक सिद्धांत पर्याप्त रूप से समझा सकते हैं?
इन्हीं प्रश्नों के आधार पर क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत (Critical International Theory) का विकास हुआ। यह सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय संबंधों की स्थापित धारणाओं, शक्ति संरचनाओं और ज्ञान के पारंपरिक स्रोतों की आलोचनात्मक समीक्षा करता है। इसका उद्देश्य केवल यह समझना नहीं है कि विश्व व्यवस्था जैसी है, वह क्यों है, बल्कि यह भी जानना है कि उसे अधिक न्यायपूर्ण और मानवीय कैसे बनाया जा सकता है। इसलिए क्रिटिकल सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अध्ययन में आलोचना (Critique), नैतिकता (Ethics), न्याय (Justice) और मुक्ति (Emancipation) को केंद्रीय महत्व देता है।
क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत का अर्थ
- क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय राजनीति की उन पारंपरिक धारणाओं को चुनौती देता है जो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को एक स्थिर और प्राकृतिक वास्तविकता के रूप में प्रस्तुत करती हैं। इसके अनुसार विश्व व्यवस्था, शक्ति संरचनाएँ, संस्थाएँ और ज्ञान किसी प्राकृतिक या अपरिवर्तनीय प्रक्रिया के परिणाम नहीं हैं। वे सामाजिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक परिस्थितियों द्वारा निर्मित होते हैं।
- इस सिद्धांत का मूल तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कोई भी ज्ञान पूरी तरह निष्पक्ष नहीं होता। ज्ञान का निर्माण सामाजिक संदर्भों, सत्ता संबंधों और ऐतिहासिक परिस्थितियों के भीतर होता है। इसलिए यह जानना आवश्यक है कि किसी विशेष सिद्धांत या ज्ञान से किसका हित सुरक्षित होता है और किन समूहों की आवाज को उपेक्षित किया जाता है।
- क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत केवल यह नहीं पूछता कि विश्व व्यवस्था कैसे कार्य करती है। यह यह भी पूछता है कि विश्व व्यवस्था में असमानता क्यों बनी हुई है। उदाहरण के लिए, विकासशील देशों की आर्थिक निर्भरता, वैश्विक संस्थाओं में शक्तिशाली देशों का प्रभाव, नस्लीय असमानता और उपनिवेशवाद की विरासत को क्रिटिकल दृष्टिकोण शक्ति संरचनाओं के परिणाम के रूप में देखता है।
इस दृष्टिकोण का अंतिम उद्देश्य अधिक न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था की कल्पना करना है। इसलिए यह सिद्धांत केवल विश्लेषणात्मक नहीं बल्कि परिवर्तनकारी (Transformative) और मानकात्मक (Normative) भी है।
क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत की बौद्धिक पृष्ठभूमि
- क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत का विकास मुख्य रूप से बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ। इसका बौद्धिक आधार कई विचारधाराओं और दार्शनिक परंपराओं से निर्मित हुआ। इनमें विशेष रूप से फ्रैंकफर्ट स्कूल (Frankfurt School), मार्क्सवाद, ग्राम्शीवादी विचार, उत्तर–संरचनावाद (Post-Structuralism) और उत्तर–औपनिवेशिक चिंतन (Post-Colonialism) महत्वपूर्ण हैं।
- फ्रैंकफर्ट स्कूल ने पारंपरिक सामाजिक विज्ञान की उस धारणा की आलोचना की जिसके अनुसार ज्ञान पूर्णतः वस्तुनिष्ठ और मूल्य-निरपेक्ष हो सकता है। इस परंपरा के विचारकों ने तर्क दिया कि ज्ञान और शक्ति के बीच गहरा संबंध होता है। सामाजिक विज्ञान को केवल समाज का वर्णन नहीं करना चाहिए बल्कि समाज में मौजूद प्रभुत्व और शोषण की संरचनाओं की आलोचना भी करनी चाहिए।
- मार्क्सवादी चिंतन ने क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत को आर्थिक शक्ति, वर्ग संबंधों और पूंजीवाद के वैश्विक प्रभाव को समझने का आधार प्रदान किया। ग्राम्शी के विचारों ने विशेष रूप से आधिपत्य (Hegemony) की अवधारणा के माध्यम से यह समझने में सहायता की कि शासक वर्ग केवल बल द्वारा ही नहीं बल्कि विचारों, संस्थाओं और सहमति के माध्यम से भी अपनी सत्ता बनाए रखता है।
पारंपरिक सिद्धांतों की आलोचना
- क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत यथार्थवाद और उदारवाद जैसे पारंपरिक सिद्धांतों की आलोचना करता है। यथार्थवाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में राज्य को प्रमुख इकाई मानता है और शक्ति तथा राष्ट्रीय हित को केंद्रीय महत्व देता है। क्रिटिकल सिद्धांत इस बात पर प्रश्न उठाता है कि राज्य को एक एकीकृत और तटस्थ इकाई क्यों माना जाए। राज्य के भीतर विभिन्न वर्गों, समूहों और सामाजिक शक्तियों के हित अलग-अलग हो सकते हैं।
- इसी प्रकार उदारवाद अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, सहयोग और लोकतंत्र को महत्वपूर्ण मानता है, लेकिन क्रिटिकल सिद्धांत यह पूछता है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की संरचना में वास्तव में किसके हितों को प्राथमिकता मिलती है। क्या वैश्विक संस्थाएँ सभी देशों के लिए समान रूप से कार्य करती हैं या शक्तिशाली देशों का उनमें अधिक प्रभाव है?
- इस प्रकार क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय राजनीति के तथ्यों को केवल स्वीकार नहीं करता बल्कि उनके पीछे मौजूद शक्ति संबंधों और ऐतिहासिक प्रक्रियाओं की आलोचनात्मक जांच करता है।
क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत की प्रमुख विशेषताएँ
- प्रत्यक्षवाद की आलोचना
- क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत प्रत्यक्षवाद (Positivism) की उस धारणा को चुनौती देता है जिसके अनुसार सामाजिक और राजनीतिक घटनाओं का अध्ययन प्राकृतिक विज्ञान की तरह पूर्णतः वस्तुनिष्ठ तरीके से किया जा सकता है। क्रिटिकल सिद्धांत के अनुसार अंतरराष्ट्रीय राजनीति में मूल्यों, विचारों और सामाजिक परिस्थितियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
- यह दृष्टिकोण मानता है कि शोधकर्ता स्वयं भी सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भों से प्रभावित होता है। इसलिए ज्ञान को पूर्णतः निष्पक्ष मानना उचित नहीं है। किसी भी सिद्धांत के निर्माण में शक्ति, इतिहास और सामाजिक परिस्थितियों की भूमिका होती है।
- शक्ति संबंधों पर ध्यान
- क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत का केंद्रीय उद्देश्य शक्ति संबंधों को समझना है। यह केवल सैन्य शक्ति या आर्थिक शक्ति तक सीमित नहीं रहता बल्कि वैचारिक और संस्थागत शक्ति का भी अध्ययन करता है।
- उदाहरण के लिए, कोई शक्तिशाली राज्य केवल सैन्य क्षमता के माध्यम से प्रभाव नहीं डालता। वह अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, मीडिया, शिक्षा, आर्थिक नीतियों और विचारों के माध्यम से भी अपना प्रभाव स्थापित कर सकता है। इसलिए क्रिटिकल सिद्धांत शक्ति के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों का अध्ययन करता है।
- सामाजिक निर्माण पर बल
- क्रिटिकल सिद्धांत के अनुसार अंतरराष्ट्रीय राजनीति की अनेक अवधारणाएँ सामाजिक रूप से निर्मित होती हैं। मित्र और शत्रु, विकसित और विकासशील, सभ्य और असभ्य जैसी अवधारणाएँ स्वाभाविक रूप से मौजूद नहीं होतीं बल्कि ऐतिहासिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से निर्मित होती हैं।
- इसलिए अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अपरिवर्तनीय नहीं माना जा सकता। यदि यह सामाजिक रूप से निर्मित है तो इसमें परिवर्तन भी संभव है।
- नैतिकता और न्याय का महत्व
- पारंपरिक यथार्थवादी दृष्टिकोण अक्सर राष्ट्रीय हित और शक्ति पर केंद्रित रहता है। इसके विपरीत क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत नैतिक प्रश्नों को महत्वपूर्ण मानता है। यह वैश्विक न्याय, मानवाधिकार, समानता और सामाजिक मुक्ति जैसे मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय राजनीति का केंद्रीय विषय बनाता है।
- इस दृष्टिकोण के अनुसार अंतरराष्ट्रीय संबंधों का अध्ययन केवल इस प्रश्न तक सीमित नहीं होना चाहिए कि कौन-सा राज्य अधिक शक्तिशाली है। यह भी देखना चाहिए कि वैश्विक व्यवस्था मानव समाज के लिए कितनी न्यायपूर्ण है।
- हाशिए पर स्थित समूहों की आवाज
- क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत उन समूहों और समुदायों की आवाज को महत्व देता है जिन्हें पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अध्ययन में अक्सर उपेक्षित किया गया। इनमें विकासशील देश, गरीब वर्ग, महिलाएँ, उपनिवेशित समाज और अन्य हाशिए पर स्थित समुदाय शामिल हो सकते हैं।
- इस दृष्टिकोण का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय राजनीति की ऐसी समझ विकसित करना है जिसमें केवल महाशक्तियों के दृष्टिकोण को ही प्रमुख न माना जाए।
- अंतर्विषयक दृष्टिकोण
- क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत केवल राजनीति विज्ञान तक सीमित नहीं है। यह समाजशास्त्र, दर्शन, इतिहास, अर्थशास्त्र और अन्य सामाजिक विज्ञानों से विचार ग्रहण करता है।
- यह अंतर्विषयक दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय राजनीति को अधिक व्यापक सामाजिक संदर्भ में समझने में सहायता करता है।

क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत के प्रमुख विचारक
रॉबर्ट डब्ल्यू. कॉक्स
- रॉबर्ट कॉक्स क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत के प्रमुख विचारकों में शामिल हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में शक्ति और विश्व व्यवस्था के अध्ययन को नई दिशा प्रदान की। उनका प्रसिद्ध कथन है:
“Theory is always for someone and for some purpose.”
इसका अर्थ है कि कोई भी सिद्धांत पूरी तरह तटस्थ नहीं होता। प्रत्येक सिद्धांत किसी विशेष दृष्टिकोण और उद्देश्य से जुड़ा होता है।
कॉक्स ने दो प्रकार के सिद्धांतों का उल्लेख किया:
समस्या समाधान सिद्धांत (Problem-Solving Theory): यह वर्तमान व्यवस्था को स्वीकार करता है और उसके भीतर मौजूद समस्याओं का समाधान खोजता है।
क्रिटिकल सिद्धांत (Critical Theory): यह स्वयं वर्तमान व्यवस्था, उसकी उत्पत्ति और शक्ति संरचनाओं पर प्रश्न उठाता है।
कॉक्स ने विश्व व्यवस्था को समझने के लिए तीन प्रमुख शक्तियों के संबंध पर ध्यान दिया:
- भौतिक क्षमताएँ (Material Capabilities)
- विचार (Ideas)
- संस्थाएँ (Institutions)
इनके माध्यम से यह समझा जा सकता है कि वैश्विक आधिपत्य किस प्रकार स्थापित और बनाए रखा जाता है।
एंड्रयू लिंकलेटर
- एंड्रयू लिंकलेटर ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में मुक्ति (Emancipation), वैश्विक न्याय और नैतिकता पर विशेष ध्यान दिया। उन्होंने यह प्रश्न उठाया कि क्या अंतरराष्ट्रीय राजनीति को केवल राज्य सीमाओं के आधार पर समझना पर्याप्त है।
- उनके अनुसार अंतरराष्ट्रीय संबंधों का अध्ययन उन राजनीतिक और सामाजिक सीमाओं की आलोचना भी करे जो कुछ समूहों को शामिल करती हैं और कुछ को बाहर रखती हैं। उनका विचार था कि मानव समुदायों के बीच अधिक व्यापक संवाद और नैतिक सहयोग की आवश्यकता है।
युर्गेन हैबरमास
- युर्गेन हैबरमास ने संचारात्मक क्रिया (Communicative Action) और सार्वजनिक क्षेत्र (Public Sphere) की अवधारणाओं के माध्यम से क्रिटिकल चिंतन को प्रभावित किया। उनके अनुसार मानव समाज में संवाद और तर्कपूर्ण संचार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
- अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हैबरमास का प्रभाव इस विचार में दिखाई देता है कि वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए केवल शक्ति और रणनीतिक हित पर्याप्त नहीं हैं। तर्कपूर्ण संवाद और लोकतांत्रिक संचार भी महत्वपूर्ण हैं।
क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत के प्रमुख अनुप्रयोग
क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत का उपयोग वैश्विक राजनीति की अनेक समस्याओं को समझने में किया जा सकता है।
- वैश्विक आर्थिक असमानता: क्रिटिकल दृष्टिकोण के माध्यम से यह समझा जा सकता है कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में विकसित और विकासशील देशों के बीच असमानता क्यों बनी रहती है। यह व्यापार, ऋण, निवेश और वैश्विक संस्थाओं की शक्ति संरचना की आलोचनात्मक समीक्षा करता है।
- उत्तर–दक्षिण संबंध: यह सिद्धांत विकसित देशों और विकासशील देशों के बीच मौजूद शक्ति असमानता का अध्ययन करता है। वैश्विक निर्णय लेने की प्रक्रिया में विकासशील देशों की सीमित भूमिका को भी इस दृष्टिकोण से समझा जा सकता है।
- मानवाधिकार और वैश्विक न्याय: क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत मानवाधिकारों के अध्ययन में यह प्रश्न उठाता है कि क्या मानवाधिकारों के मानक सभी समाजों में समान रूप से लागू किए जाते हैं। यह न्याय और सार्वभौमिकता के बीच मौजूद तनाव का भी अध्ययन करता है।
- वैश्वीकरण और राष्ट्रीय संप्रभुता: वैश्वीकरण ने राज्यों की आर्थिक और राजनीतिक नीतियों को प्रभावित किया है। क्रिटिकल दृष्टिकोण यह विश्लेषण करता है कि वैश्विक आर्थिक संस्थाएँ और शक्तिशाली देश कमजोर राज्यों की नीतिगत स्वायत्तता को किस प्रकार प्रभावित कर सकते हैं।
क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत की आलोचनाएँ
क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत के महत्वपूर्ण योगदान के बावजूद इसकी कई आलोचनाएँ की गई हैं।
- व्यावहारिक समाधान की कमी: आलोचकों का तर्क है कि यह सिद्धांत मौजूदा व्यवस्था की आलोचना तो प्रभावी रूप से करता है, लेकिन कई बार व्यावहारिक समाधान स्पष्ट रूप से प्रस्तुत नहीं करता।
- अत्यधिक जटिलता: इसकी भाषा और दार्शनिक आधार कई बार अत्यधिक जटिल माने जाते हैं। इससे इसका अनुभवजन्य अध्ययन कठिन हो सकता है।
- विचारों पर अधिक जोर: कुछ आलोचकों का मानना है कि क्रिटिकल दृष्टिकोण कई बार विचारधारा और विमर्श को अत्यधिक महत्व देता है तथा भौतिक शक्ति और सुरक्षा संबंधी वास्तविकताओं को पर्याप्त महत्व नहीं देता।
- राज्य की भूमिका को कम महत्व: यथार्थवादी विद्वानों का तर्क है कि क्रिटिकल सिद्धांत वैश्विक राजनीति में राज्य और राष्ट्रीय सुरक्षा की स्थायी भूमिका को पर्याप्त रूप से स्वीकार नहीं करता।
निष्कर्ष
क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अध्ययन को व्यापक और अधिक मानवीय बनाया है। इसने यह स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल राज्यों, शक्ति और युद्ध तक सीमित नहीं है। इसके पीछे सामाजिक संरचनाएँ, ऐतिहासिक प्रक्रियाएँ, आर्थिक संबंध, विचारधाराएँ और शक्ति संबंध कार्य करते हैं।
यह सिद्धांत पारंपरिक दृष्टिकोणों से अलग वर्तमान विश्व व्यवस्था को अंतिम या अपरिवर्तनीय सत्य नहीं मानता। इसके अनुसार यदि वैश्विक व्यवस्था मानव निर्मित है तो उसे बदला भी जा सकता है। इसलिए क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य विश्व व्यवस्था में मौजूद असमानता, प्रभुत्व और शोषण की पहचान करके अधिक न्यायपूर्ण व्यवस्था की संभावना तलाशना है।
रॉबर्ट कॉक्स, एंड्रयू लिंकलेटर और युर्गेन हैबरमास जैसे विचारकों ने इस दृष्टिकोण को महत्वपूर्ण बौद्धिक आधार प्रदान किया। आज वैश्वीकरण, आर्थिक असमानता, मानवाधिकार, पर्यावरणीय न्याय और वैश्विक शक्ति संरचनाओं को समझने में क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत अत्यंत उपयोगी है।
अतः कहा जा सकता है कि क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत केवल विश्व राजनीति की व्याख्या नहीं करता, बल्कि उसके परिवर्तन की संभावनाओं को भी खोजता है। यही इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।
MCQ
- निम्नलिखित में से किस विचारक का संबंध क्रिटिकल थ्योरी से सबसे अधिक है?
(a) रॉबर्ट कॉक्स
(b) हैंस मॉर्गेंथाउ
(c) केनेथ वॉल्ट्ज
(d) जॉन मियरशाइमर
उत्तर: (a) रॉबर्ट कॉक्स
- रॉबर्ट कॉक्स के अनुसार “Theory is always for someone and for some purpose” का मुख्य अर्थ क्या है?
(a) सिद्धांत पूर्णतः वस्तुनिष्ठ होता है
(b) सभी सिद्धांत समान रूप से सत्य होते हैं
(c) सिद्धांत किसी विशेष दृष्टिकोण और उद्देश्य से जुड़ा होता है
(d) सिद्धांत केवल वैज्ञानिक प्रयोगों पर आधारित होता है
उत्तर: (c) सिद्धांत किसी विशेष दृष्टिकोण और उद्देश्य से जुड़ा होता है
- रॉबर्ट कॉक्स द्वारा प्रतिपादित Problem-Solving Theory और Critical Theory के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- Problem-Solving Theory वर्तमान व्यवस्था को स्वीकार करता है।
- Critical Theory वर्तमान व्यवस्था की उत्पत्ति और शक्ति संरचनाओं पर प्रश्न उठाता है।
- Critical Theory का उद्देश्य केवल वर्तमान व्यवस्था के भीतर तकनीकी समाधान खोजना है।
सही उत्तर चुनिए:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a) केवल 1 और 2
- क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत में Emancipation (मुक्ति) का अर्थ है:
(a) केवल राज्य की राजनीतिक स्वतंत्रता
(b) सैन्य शक्ति में वृद्धि
(c) व्यक्तियों और समुदायों को दमनकारी संरचनाओं से मुक्त करना
(d) वैश्विक आर्थिक संस्थाओं का विस्तार
उत्तर: (c) व्यक्तियों और समुदायों को दमनकारी संरचनाओं से मुक्त करना
- निम्नलिखित में से कौन–सा Critical International Theory की प्रमुख विशेषता नहीं है?
(a) शक्ति संबंधों का विश्लेषण
(b) ज्ञान की पूर्ण मूल्य-निरपेक्षता में विश्वास
(c) नैतिकता और न्याय पर बल
(d) सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ का अध्ययन
उत्तर: (b) ज्ञान की पूर्ण मूल्य–निरपेक्षता में विश्वास
- क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत में Hegemony (आधिपत्य) का संबंध मुख्यतः किससे है?
(a) केवल सैन्य विजय से
(b) केवल आर्थिक नियंत्रण से
(c) विचारों, संस्थाओं और सहमति के माध्यम से प्रभुत्व स्थापित करने से
(d) केवल क्षेत्रीय विस्तार से
उत्तर: (c) विचारों, संस्थाओं और सहमति के माध्यम से प्रभुत्व स्थापित करने से
- निम्नलिखित विचारकों और अवधारणाओं का सही सुमेल कीजिए:
| विचारक | प्रमुख विचार |
| 1. रॉबर्ट कॉक्स | World Order और Hegemony |
| 2. एंड्रयू लिंकलेटर | Emancipation और Global Justice |
| 3. युर्गेन हैबरमास | Communicative Action |
सही उत्तर है:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) 1, 2 और 3
(d) केवल 1 और 3
उत्तर: (c) 1, 2 और 3
- Critical Discourse Analysis का मुख्य उद्देश्य क्या है?
(a) केवल सांख्यिकीय आंकड़ों का अध्ययन
(b) भाषा और विमर्श के माध्यम से शक्ति संबंधों को समझना
(c) सैन्य क्षमता का तुलनात्मक अध्ययन
(d) चुनावी परिणामों का विश्लेषण
उत्तर: (b) भाषा और विमर्श के माध्यम से शक्ति संबंधों को समझना
- क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत के अनुसार विश्व व्यवस्था:
(a) प्राकृतिक और अपरिवर्तनीय है
(b) केवल राज्यों द्वारा निर्मित है
(c) सामाजिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं से निर्मित होती है
(d) केवल सैन्य शक्ति पर आधारित है
उत्तर: (c) सामाजिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं से निर्मित होती है
- निम्नलिखित में से कौन–सा कथन क्रिटिकल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत के दृष्टिकोण को सबसे अच्छी तरह व्यक्त करता है?
(a) अंतरराष्ट्रीय राजनीति में केवल राज्य महत्वपूर्ण हैं।
(b) राष्ट्रीय हित ही अंतरराष्ट्रीय संबंधों का एकमात्र आधार है।
(c) ज्ञान, शक्ति और सामाजिक संरचनाओं के बीच संबंधों का आलोचनात्मक अध्ययन आवश्यक है।
(d) अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था स्थायी और अपरिवर्तनीय है।
उत्तर: (c) ज्ञान, शक्ति और सामाजिक संरचनाओं के बीच संबंधों का आलोचनात्मक अध्ययन आवश्यक है।
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