भारत की विदेश नीति स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से निरंतर विकास और परिवर्तन की प्रक्रिया से गुजरी है। 1947 में स्वतंत्रता के समय भारत के सामने औपनिवेशिक विरासत, विभाजन, सीमाई विवाद, आर्थिक कमजोरी तथा शीत युद्ध की महाशक्ति प्रतिस्पर्धा जैसी गंभीर चुनौतियाँ थीं। इसलिए भारत को ऐसी विदेश नीति विकसित करनी थी जो राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए उसकी स्वतंत्र पहचान को भी बनाए रख सके।
भारतीय विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें निरंतरता और परिवर्तन दोनों साथ–साथ दिखाई देते हैं। स्वतंत्रता के प्रारंभिक वर्षों में गुटनिरपेक्षता, पंचशील, उपनिवेशवाद-विरोध, विश्व शांति और विकासशील देशों के साथ एकजुटता को प्राथमिकता दी गई। बाद के दशकों में वैश्वीकरण, आर्थिक उदारीकरण, परमाणु शक्ति, आतंकवाद, चीन के उदय, इंडो-पैसिफिक तथा बदलती विश्व व्यवस्था के कारण भारत की विदेश नीति अधिक व्यावहारिक, आर्थिक और रणनीतिक बन गई।
इस प्रकार भारत की विदेश नीति को केवल निरंतरता या केवल परिवर्तन के रूप में नहीं समझा जा सकता। वास्तव में, भारत ने अपने मूल सिद्धांतों को बनाए रखते हुए बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुसार अपनी रणनीतियों और प्राथमिकताओं में परिवर्तन किया है।
भारतीय विदेश नीति का अर्थ और आधार
विदेश नीति से आशय उन सिद्धांतों, उद्देश्यों और रणनीतियों से है जिनके माध्यम से कोई राज्य अन्य देशों तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ अपने संबंधों का संचालन करता है। भारत की विदेश नीति का प्रमुख उद्देश्य सदैव राष्ट्रीय हितों की रक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास और अंतरराष्ट्रीय शांति को बढ़ावा देना रहा है।
भारत की विदेश नीति को प्रभावित करने वाले प्रमुख तत्व हैं:
राष्ट्रीय हित और राष्ट्रीय सुरक्षा: भारत की विशाल सीमाएँ, चीन और पाकिस्तान के साथ संबंध तथा हिंद महासागर क्षेत्र की रणनीतिक स्थिति विदेश नीति को प्रभावित करते हैं।
ऐतिहासिक अनुभव: औपनिवेशिक शासन के अनुभव ने भारत को उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध खड़ा किया।
भौगोलिक स्थिति: दक्षिण एशिया में भारत की केंद्रीय स्थिति तथा हिंद महासागर तक पहुँच उसकी विदेश नीति को महत्वपूर्ण बनाती है।
संवैधानिक मूल्य: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 में अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा, न्यायपूर्ण संबंधों और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान को प्रोत्साहित करने की बात कही गई है।
आर्थिक आवश्यकताएँ: आर्थिक विकास, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, विदेशी निवेश और तकनीकी सहयोग आज भारतीय विदेश नीति के प्रमुख आयाम बन चुके हैं।
भारत की विदेश नीति में निरंतरता
भारत की विदेश नीति में अनेक परिवर्तन हुए हैं, लेकिन कुछ बुनियादी सिद्धांत स्वतंत्रता के बाद से आज तक विभिन्न रूपों में मौजूद हैं।
राष्ट्रीय हित की प्राथमिकता
- भारत की विदेश नीति की सबसे महत्वपूर्ण निरंतरता राष्ट्रीय हितों की रक्षा है। जवाहरलाल नेहरू के काल से लेकर वर्तमान काल तक भारत ने अपनी विदेश नीति को किसी अन्य महाशक्ति के स्थायी प्रभाव में रखने के बजाय स्वतंत्र निर्णय लेने का प्रयास किया है।
- भारत ने अमेरिका, रूस, यूरोपीय देशों, जापान और अन्य देशों के साथ संबंध विकसित किए, लेकिन किसी एक शक्ति पर पूर्ण निर्भरता से बचने का प्रयास किया। यही दृष्टिकोण आज रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) के रूप में दिखाई देता है।
स्वतंत्र विदेश नीति
- स्वतंत्रता के बाद भारत ने यह स्पष्ट किया कि उसकी विदेश नीति किसी महाशक्ति द्वारा निर्धारित नहीं होगी। शीत युद्ध के दौरान भारत ने अमेरिका और सोवियत संघ के नेतृत्व वाले सैन्य गुटों से दूरी बनाए रखी।
- आज भारत औपचारिक रूप से गुटनिरपेक्षता की पुरानी भाषा का कम प्रयोग करता है, लेकिन स्वतंत्र निर्णय लेने का सिद्धांत अभी भी भारतीय विदेश नीति का केंद्रीय तत्व है। यही कारण है कि भारत एक ओर अमेरिका के साथ क्वाड में सहयोग करता है और दूसरी ओर रूस के साथ अपने पारंपरिक संबंध भी बनाए रखता है।
उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का विरोध
- भारत स्वयं ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से मुक्त हुआ था। इसलिए स्वतंत्रता के बाद भारत ने एशिया और अफ्रीका के स्वतंत्रता आंदोलनों का समर्थन किया।
- भारत ने दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद नीति का विरोध किया और अनेक उपनिवेशों की स्वतंत्रता की मांग का समर्थन किया। इस दृष्टिकोण ने भारत को एशिया, अफ्रीका और बाद में व्यापक ग्लोबल साउथ के देशों के बीच लोकप्रिय बनाया।
- आज भी भारत विकासशील देशों की आवाज़ को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता है। इसलिए उपनिवेशवाद-विरोध की पुरानी नीति आज ग्लोबल साउथ नेतृत्व और दक्षिण-दक्षिण सहयोग के रूप में नए रूप में दिखाई देती है।
विश्व शांति और विवादों का शांतिपूर्ण समाधान
- भारत ने लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन किया है। पंचशील के सिद्धांत, संयुक्त राष्ट्र के प्रति समर्थन और निरस्त्रीकरण की मांग इसी परंपरा का हिस्सा रहे हैं।
- भारत ने परमाणु हथियारों के पूर्ण उन्मूलन का समर्थन किया, यद्यपि बाद में राष्ट्रीय सुरक्षा की परिस्थितियों के कारण उसने स्वयं परमाणु क्षमता विकसित की। इसलिए भारत की नीति में शांति की प्रतिबद्धता बनी रही, लेकिन सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुसार रणनीतिक विकल्पों में परिवर्तन हुआ।
बहुपक्षवाद का समर्थन
- भारत स्वतंत्रता के बाद से संयुक्त राष्ट्र और अन्य बहुपक्षीय संस्थाओं में सक्रिय रहा है। भारत का मानना रहा है कि वैश्विक समस्याओं का समाधान केवल महाशक्तियों द्वारा नहीं, बल्कि व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से किया जाना चाहिए।
- भारत आज भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार, वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार तथा विकासशील देशों की अधिक भागीदारी की मांग करता है।
गुटनिरपेक्षता: भारत की विदेश नीति का महत्वपूर्ण आधार
- भारत की विदेश नीति में गुटनिरपेक्षता एक केंद्रीय सिद्धांत रही है। इसे अक्सर गलत रूप से तटस्थता समझा जाता है, जबकि दोनों अवधारणाएँ अलग हैं।
- तटस्थता (Neutrality) मुख्यतः युद्ध की स्थिति से संबंधित है, जिसमें कोई राज्य संघर्षरत पक्षों से दूर रहता है। इसके विपरीत गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment) शीत युद्ध के संदर्भ में एक सक्रिय विदेश नीति थी, जिसके अंतर्गत कोई देश किसी महाशक्ति के सैन्य गुट का स्थायी सदस्य नहीं बनता।
गुटनिरपेक्षता की पृष्ठभूमि
- द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व दो प्रमुख शक्ति गुटों में विभाजित हो गया। अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी गुट और सोवियत संघ के नेतृत्व में पूर्वी गुट के बीच राजनीतिक, वैचारिक और सैन्य प्रतिस्पर्धा शुरू हुई।
- नव स्वतंत्र एशियाई और अफ्रीकी देशों के सामने चुनौती थी कि वे किस गुट का हिस्सा बनें। भारत ने तीसरा मार्ग अपनाया और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को बनाए रखने का निर्णय लिया।
गुटनिरपेक्षता के प्रमुख नेता
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के निर्माण में अनेक नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई:
- जवाहरलाल नेहरू, भारत
- जोसेफ ब्रोज़ टीटो, यूगोस्लाविया
- गमाल अब्देल नासिर, मिस्र
- सुकर्णो, इंडोनेशिया
- क्वामे नक्रूमा, घाना
इन नेताओं ने नव स्वतंत्र देशों के लिए स्वतंत्र विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का मार्ग प्रशस्त किया।
बांडुंग सम्मेलन, 1955: इंडोनेशिया के बांडुंग में आयोजित एशिया-अफ्रीका सम्मेलन गुटनिरपेक्ष आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण था। इस सम्मेलन ने एशियाई और अफ्रीकी देशों के बीच सहयोग, उपनिवेशवाद-विरोध और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को बढ़ावा दिया।
बेलग्रेड सम्मेलन, 1961: 1961 में यूगोस्लाविया की राजधानी बेलग्रेड में पहला औपचारिक गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ। इसे गुटनिरपेक्ष आंदोलन की औपचारिक स्थापना के रूप में माना जाता है।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने विकासशील देशों को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सामूहिक आवाज़ प्रदान की।
गुटनिरपेक्षता के प्रमुख सिद्धांत
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के प्रमुख सिद्धांतों में निम्न विचार शामिल थे:
- राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान
- दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना
- शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व
- उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का विरोध
- नस्लवाद और रंगभेद का विरोध
- विवादों का शांतिपूर्ण समाधान
- निरस्त्रीकरण को प्रोत्साहन
- स्वतंत्र विदेश नीति का समर्थन
इन सिद्धांतों ने भारत की विदेश नीति को नैतिक और राजनीतिक आधार प्रदान किया।
पंचशील: शांतिपूर्ण सह–अस्तित्व का सिद्धांत
भारत की विदेश नीति में पंचशील का विशेष महत्व है। पंचशील के सिद्धांत 1954 में भारत और चीन के बीच हुए समझौते के संदर्भ में सामने आए।
पंचशील के पाँच सिद्धांत हैं:
- एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान
- एक-दूसरे के विरुद्ध आक्रमण न करना
- एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना
- समानता और पारस्परिक लाभ
- शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व
पंचशील केवल भारत-चीन संबंधों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे अंतरराष्ट्रीय संबंधों के एक व्यापक सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया गया।
हालाँकि 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद पंचशील की व्यावहारिक सीमाओं पर प्रश्न उठे, फिर भी संप्रभुता, पारस्परिक सम्मान और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांत भारत की विदेश नीति के मूल तत्व बने रहे।
धर्मनिरपेक्षता और विदेश नीति
- भारत का धर्मनिरपेक्ष चरित्र भी उसकी विदेश नीति को प्रभावित करता है। भारत ने सामान्यतः अन्य देशों के साथ संबंध धार्मिक पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्थापित किए हैं।
- भारत के मध्य पूर्व के देशों, इज़राइल, मुस्लिम देशों, पश्चिमी देशों तथा अन्य सांस्कृतिक क्षेत्रों के साथ संबंध इस संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाते हैं।
- भारत ने विविध सभ्यताओं के बीच संवाद और सह-अस्तित्व की भावना को बढ़ावा दिया है। इस कारण भारतीय विदेश नीति में सांस्कृतिक बहुलवाद और सभ्यतागत संवाद का महत्व बना रहा है।
भारत की विदेश नीति में परिवर्तन
भारतीय विदेश नीति में सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन शीत युद्ध की समाप्ति, आर्थिक उदारीकरण, परमाणु शक्ति, चीन के उदय और नई वैश्विक व्यवस्था के कारण आया।
आर्थिक कूटनीति का उदय: 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत की विदेश नीति में आर्थिक आयाम अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया। इससे पहले भारत की विदेश नीति में राजनीतिक और वैचारिक मुद्दों का अधिक महत्व था, लेकिन उदारीकरण के बाद व्यापार, निवेश, ऊर्जा और प्रौद्योगिकी को प्राथमिकता दी जाने लगी।
आर्थिक कूटनीति के प्रमुख उद्देश्य हैं:
- विदेशी निवेश आकर्षित करना
- निर्यात और व्यापार को बढ़ावा देना
- नई तकनीकों तक पहुँच प्राप्त करना
- ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना
- वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की भूमिका बढ़ाना
आज भारत के विभिन्न देशों के साथ व्यापक आर्थिक और तकनीकी संबंध उसकी विदेश नीति के केंद्रीय भाग बन चुके हैं।
रणनीतिक स्वायत्तता: गुटनिरपेक्षता का नया रूप
- शीत युद्ध समाप्त होने के बाद गुटनिरपेक्षता की प्रासंगिकता पर प्रश्न उठे। विश्व अब केवल दो महाशक्तियों के बीच विभाजित नहीं रहा।
- इस नई परिस्थिति में भारत ने रणनीतिक स्वायत्तता की अवधारणा को अधिक महत्व दिया।
- रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर विभिन्न देशों के साथ सहयोग करे, लेकिन किसी एक शक्ति का पूर्ण अनुयायी न बने।
- भारत अमेरिका के साथ रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग करता है, रूस के साथ रक्षा संबंध बनाए रखता है, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ इंडो-पैसिफिक में सहयोग करता है तथा ग्लोबल साउथ के देशों के साथ विकास सहयोग को आगे बढ़ाता है।
यह भारत की विदेश नीति में परिवर्तन भी है और स्वतंत्र विदेश नीति की पुरानी परंपरा की निरंतरता भी।
परमाणु नीति में परिवर्तन
भारत की परमाणु नीति भारत की विदेश नीति में परिवर्तन का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
- स्वतंत्रता के प्रारंभिक वर्षों में भारत ने परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग और वैश्विक परमाणु निरस्त्रीकरण पर जोर दिया। लेकिन चीन के परमाणु परीक्षण और क्षेत्रीय सुरक्षा परिस्थितियों ने भारत की रणनीतिक सोच को प्रभावित किया।
- पोखरण–I, 1974: भारत ने 18 मई 1974 को पोखरण में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया, जिसे स्माइलिंग बुद्ध (Smiling Buddha) कहा गया। भारत ने इसे शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट बताया।
- पोखरण–II, 1998: मई 1998 में भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षणों की श्रृंखला आयोजित की। इसके बाद भारत ने स्वयं को वास्तविक परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित किया।
भारत की परमाणु नीति के प्रमुख तत्व हैं:
विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता (Credible Minimum Deterrence): भारत इतनी परमाणु क्षमता बनाए रखना चाहता है जो संभावित शत्रु को आक्रमण से रोक सके।
- पहले प्रयोग न करने की नीति (No First Use): भारत की घोषित परमाणु नीति के अनुसार भारत सामान्यतः परमाणु हथियारों का पहले प्रयोग नहीं करेगा।
- द्वितीय प्रहार क्षमता: भारत ऐसी क्षमता विकसित करना चाहता है जिससे परमाणु हमले के बाद भी जवाबी कार्रवाई की जा सके।
परमाणु अप्रसार और भारत
- भारत परमाणु अप्रसार संधि (NPT) का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है। भारत का तर्क है कि यह संधि परमाणु हथियार संपन्न और गैर-परमाणु देशों के बीच असमानता बनाए रखती है।
- भारत ने व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) पर भी हस्ताक्षर नहीं किए हैं, लेकिन लंबे समय से परमाणु परीक्षणों पर स्वैच्छिक रोक बनाए रखी है।
- भारत की नीति का महत्वपूर्ण परिवर्तन 2008 के भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु सहयोग समझौते में दिखाई देता है। इस समझौते ने भारत की वैश्विक परमाणु स्थिति को मजबूत किया और असैन्य परमाणु व्यापार के क्षेत्र में नए अवसर खोले।
क्षेत्रीय सहयोग में परिवर्तन
भारत ने दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग को विदेश नीति का महत्वपूर्ण साधन माना।
सार्क
दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) की स्थापना दक्षिण एशिया में आर्थिक और सामाजिक सहयोग बढ़ाने के उद्देश्य से की गई।
भारत ने सार्क के माध्यम से क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देने का प्रयास किया, लेकिन भारत-पाकिस्तान तनाव के कारण इसकी प्रभावशीलता सीमित रही।
बिम्सटेक
बिम्सटेक भारत की विदेश नीति में बढ़ते महत्व वाला क्षेत्रीय संगठन है। यह बंगाल की खाड़ी क्षेत्र के दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों को जोड़ता है।
बिम्सटेक के माध्यम से भारत ने नेबरहुड फर्स्ट, एक्ट ईस्ट और इंडो-पैसिफिक दृष्टिकोण को क्षेत्रीय स्तर पर जोड़ने का प्रयास किया है।
यह परिवर्तन दर्शाता है कि भारत ने सार्क पर अत्यधिक निर्भर रहने के बजाय नए क्षेत्रीय मंचों को भी प्राथमिकता देना शुरू किया।
वैश्विक शासन और बहुपक्षवाद
भारत की विदेश नीति में संयुक्त राष्ट्र और बहुपक्षवाद का महत्व लगातार बना रहा है, लेकिन अब भारत वैश्विक संस्थाओं में संरचनात्मक सुधार की मांग अधिक सक्रियता से कर रहा है।
भारत का तर्क है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की वर्तमान संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की शक्ति व्यवस्था को दर्शाती है और वर्तमान विश्व की वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं है।
भारत सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का समर्थन करता है और विकासशील देशों को वैश्विक शासन में अधिक प्रतिनिधित्व देने की मांग करता है।
भारत G20, BRICS और अन्य बहुपक्षीय मंचों के माध्यम से वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था को अधिक समावेशी बनाने का प्रयास करता है।
सॉफ्ट पावर और सांस्कृतिक कूटनीति
भारत की विदेश नीति में सॉफ्ट पावर का महत्व बढ़ा है। भारतीय संस्कृति, योग, आयुर्वेद, बौद्ध विरासत, भारतीय प्रवासी और लोकतांत्रिक परंपराएँ भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को मजबूत करती हैं।
सांस्कृतिक कूटनीति के माध्यम से भारत अपनी सभ्यतागत पहचान और वैश्विक प्रभाव को बढ़ाने का प्रयास करता है।
भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) सांस्कृतिक और शैक्षणिक संबंधों को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
भारतीय प्रवासी भी भारत की सॉफ्ट पावर का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। प्रवासी भारतीय अनेक देशों में आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करते हैं।
सुरक्षा और रक्षा कूटनीति
भारत की विदेश नीति में राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्व समय के साथ बढ़ा है। चीन के साथ सीमा विवाद, पाकिस्तान से सुरक्षा चुनौतियाँ, आतंकवाद और हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने भारत की विदेश नीति को अधिक रणनीतिक बनाया है।
भारत ने रक्षा सहयोग के लिए अनेक देशों के साथ संबंध मजबूत किए हैं।
क्वाड
भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच क्वाड सहयोग भारत की बदलती विदेश नीति का उदाहरण है।
क्वाड को औपचारिक सैन्य गठबंधन के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि यह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, आपूर्ति श्रृंखला और अन्य क्षेत्रों में सहयोग का मंच है।
भारत की भागीदारी यह दर्शाती है कि रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ सभी प्रकार के सहयोग से दूरी बनाना नहीं है।
आतंकवाद और समुद्री सुरक्षा
भारत की विदेश नीति में सीमा पार आतंकवाद का मुकाबला महत्वपूर्ण प्राथमिकता बन गया है। भारत विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक सहयोग की मांग करता है।
हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा, व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा और नौवहन की स्वतंत्रता भी भारत की विदेश नीति के प्रमुख मुद्दे बन गए हैं।
भारत की समुद्री नीति में हिंद महासागर को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र माना जाता है।
पर्यावरणीय और जलवायु कूटनीति
भारत की विदेश नीति में पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन का महत्व लगातार बढ़ रहा है।
भारत जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि विकास और न्याय का प्रश्न भी मानता है।
भारत की जलवायु कूटनीति के प्रमुख सिद्धांत हैं:
- सतत विकास
- जलवायु न्याय
- विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी
- विकासशील देशों के लिए जलवायु वित्त
- स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार
भारत ने पेरिस जलवायु समझौते में सक्रिय भूमिका निभाई और विकासशील देशों के हितों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया।
मानवीय सहायता और मानवतावाद
भारत की विदेश नीति में मानवीय सहायता और आपदा राहत का महत्व बढ़ा है।
भारत अनेक देशों को प्राकृतिक आपदाओं, मानवीय संकटों और अन्य आपातकालीन परिस्थितियों में सहायता प्रदान करता है।
यह दृष्टिकोण भारत की विदेश नीति में मानवतावादी कूटनीति और एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति की भूमिका को प्रदर्शित करता है।
मानवाधिकार और विदेश नीति
भारत अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विमर्श में सक्रिय रहता है, लेकिन वह सामान्यतः मानवाधिकार के मुद्दों को राज्य की संप्रभुता और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने के सिद्धांत के साथ संतुलित करने का प्रयास करता है।
भारत का दृष्टिकोण यह रहा है कि मानवाधिकारों की रक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका उपयोग राजनीतिक हस्तक्षेप के साधन के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।
भारत की विदेश नीति: निरंतरता और परिवर्तन का तुलनात्मक स्वरूप
| निरंतरता | परिवर्तन |
| स्वतंत्र विदेश नीति | रणनीतिक स्वायत्तता |
| गुटनिरपेक्षता | बहु-संरेखण और मुद्दा आधारित साझेदारी |
| विश्व शांति | राष्ट्रीय सुरक्षा पर अधिक जोर |
| उपनिवेशवाद-विरोध | ग्लोबल साउथ नेतृत्व |
| विकासशील देशों का समर्थन | आर्थिक कूटनीति और निवेश |
| बहुपक्षवाद | वैश्विक संस्थाओं में सुधार की सक्रिय मांग |
| शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व | इंडो-पैसिफिक और समुद्री रणनीति |
| नैतिक कूटनीति | अधिक व्यावहारिक और हित-आधारित कूटनीति |
निष्कर्ष
भारत की विदेश नीति का विकास निरंतरता और परिवर्तन के बीच संतुलन की प्रक्रिया है। स्वतंत्रता के बाद नेहरू काल में विकसित गुटनिरपेक्षता, पंचशील, उपनिवेशवाद-विरोध, विश्व शांति और स्वतंत्र विदेश नीति जैसे सिद्धांत आज भी विभिन्न रूपों में दिखाई देते हैं।
इसके साथ ही बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों ने भारत की विदेश नीति को अधिक व्यावहारिक और बहुआयामी बनाया है। आर्थिक उदारीकरण के बाद आर्थिक कूटनीति का महत्व बढ़ा, 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद भारत एक परमाणु शक्ति के रूप में उभरा और आज रणनीतिक स्वायत्तता के आधार पर विभिन्न शक्तियों के साथ बहुस्तरीय सहयोग कर रहा है।
भारत की विदेश नीति अब केवल गुटनिरपेक्षता तक सीमित नहीं है। यह बहु–संरेखण, रणनीतिक स्वायत्तता, आर्थिक कूटनीति, रक्षा सहयोग, सॉफ्ट पावर, ग्लोबल साउथ नेतृत्व और बहुपक्षीय सहयोग का मिश्रित स्वरूप ग्रहण कर चुकी है।
अतः कहा जा सकता है कि भारत की विदेश नीति में मूल सिद्धांतों की निरंतरता बनी रही है, जबकि उन सिद्धांतों को लागू करने के साधनों और रणनीतियों में व्यापक परिवर्तन आया है। यही क्षमता भारत को बदलती और जटिल विश्व व्यवस्था में अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में सक्षम बनाती है।
MCQ
- गुटनिरपेक्षता के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- गुटनिरपेक्षता का अर्थ युद्ध की स्थिति में तटस्थ रहना है।
- इसका उद्देश्य महाशक्ति गुटों से स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखना था।
- पहला गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन 1961 में बेलग्रेड में आयोजित हुआ।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
(a) केवल 2 और 3
(b) केवल 1 और 2
(c) केवल 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a)
- पंचशील सिद्धांतों में निम्नलिखित में से कौन–सा शामिल नहीं है?
(a) एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान
(b) आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना
(c) सामूहिक सैन्य सुरक्षा की अनिवार्यता
(d) शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व
उत्तर: (c)
- भारत की विदेश नीति में “रणनीतिक स्वायत्तता” का सर्वोत्तम अर्थ क्या है?
(a) सभी अंतरराष्ट्रीय संगठनों से दूरी बनाए रखना
(b) किसी भी देश के साथ सहयोग न करना
(c) राष्ट्रीय हितों के आधार पर विभिन्न देशों से सहयोग करना, लेकिन किसी एक शक्ति का पूर्ण अनुयायी न बनना
(d) केवल सैन्य आत्मनिर्भरता पर बल देना
उत्तर: (c)
- भारत की परमाणु नीति के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारत NPT का हस्ताक्षरकर्ता है।
- भारत ने CTBT पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।
- भारत ने परमाणु परीक्षणों पर स्वैच्छिक रोक बनाए रखी है।
सही उत्तर चुनिए:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b)
- भारत की विदेश नीति के संदर्भ में निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
- SAARC – दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग
- BIMSTEC – बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच सहयोग
- QUAD – औपचारिक सैन्य गठबंधन
सही उत्तर चुनिए:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a)
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