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भारतीय विचारकों के प्रसिद्ध कथन

1- मनु

  • “दण्ड ही प्रजा पर शासन करता है।”
  • “दण्ड ही प्रजा की रक्षा करता है।”
  • “दण्ड तब भी जागता है जब सब सो रहे होते हैं।”
  • “विद्वान दण्ड को ही धर्म मानते हैं।”
  • “राजा का सर्वोच्च कर्तव्य प्रजा की रक्षा करना है।”
  • “राजा को धर्म के अनुसार शासन करना चाहिए।”
  • “धर्म राज्य का आधार है।”
  • “धर्म की रक्षा करने वाला स्वयं धर्म द्वारा संरक्षित होता है।” (धर्मो रक्षति रक्षितः)
  • “दण्ड के अभाव में मत्स्यन्याय स्थापित हो जाता है।”
  • “बलवान निर्बलों का नाश कर देंगे यदि दण्ड का भय न हो।”
  • “राजा को दण्ड का प्रयोग विचारपूर्वक करना चाहिए।”
  • “अनुचित दण्ड राजा के विनाश का कारण बनता है।”
  • “उचित दण्ड से ही समाज में व्यवस्था बनी रहती है।”
  • “राजा स्वयं धर्म के अधीन है।”
  • “राजा को न्याय करते समय पक्षपात नहीं करना चाहिए।”
  • “राजा को विद्वानों और ब्राह्मणों का सम्मान करना चाहिए।”
  • “राजा को प्रजा के धन और जीवन की रक्षा करनी चाहिए।”
  • “राजा को सत्यवादी, संयमी और जितेन्द्रिय होना चाहिए।”
  • “राजा को योग्य मंत्रियों की सहायता से शासन करना चाहिए।”
  • “कर-वसूली न्यायसंगत और मर्यादित होनी चाहिए।”
  • “प्रजा के कल्याण में ही राज्य की स्थिरता निहित है।”
  • “धर्म, अर्थ और सामाजिक व्यवस्था की रक्षा राज्य का प्रमुख उद्देश्य है।”

2-स्वामी विवेकानन्द 

  • “प्रत्येक आत्मा मूलतः दिव्य है।”
  • “मनुष्य निर्माण ही शिक्षा का उद्देश्य है।”
  • “दरिद्र नारायण की सेवा ही ईश्वर की सेवा है।”
  • “राष्ट्र का उत्थान जनसाधारण के उत्थान पर निर्भर करता है।”
  • “शक्ति ही जीवन है, दुर्बलता मृत्यु है।”
  • “स्वतंत्रता विकास की पहली शर्त है।”

3- महात्मा गांधी

  • “साधन उतने ही पवित्र होने चाहिए जितना साध्य।”
  • “अहिंसा मानव का सर्वोच्च धर्म है।”
  • “सत्य ही ईश्वर है।”
  • “ग्राम स्वराज वास्तविक लोकतंत्र की आधारशिला है।”
  • “राज्य संगठित हिंसा का प्रतीक है।”
  • “स्वराज का अर्थ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि आत्मशासन भी है।”
  • “ट्रस्टीशिप सामाजिक-आर्थिक न्याय का अहिंसक मार्ग है।”

4-डॉ. भीमराव आंबेडकर

  • “राजनीतिक लोकतंत्र तब तक स्थायी नहीं हो सकता जब तक उसका आधार सामाजिक लोकतंत्र न हो।”
  • “संवैधानिक नैतिकता स्वाभाविक गुण नहीं है; इसका विकास करना पड़ता है।”
  • “शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।”
  • “जाति केवल श्रम का विभाजन नहीं, बल्कि श्रमिकों का विभाजन है।”
  • “स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व एक-दूसरे से अविभाज्य हैं।”
  • “नायक-पूजा लोकतंत्र के लिए घातक हो सकती है।”

5-जवाहरलाल नेहरू

  • “लोकतंत्र केवल शासन प्रणाली नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका है।”
  • “वैज्ञानिक दृष्टिकोण आधुनिक समाज की अनिवार्य आवश्यकता है।”
  • “धर्मनिरपेक्ष राज्य का अर्थ धर्मविरोधी राज्य नहीं है।”
  • “राष्ट्रीय एकता भारत की सबसे बड़ी शक्ति है।”

6-एम. एन. रॉय

  • “रैडिकल ह्यूमनिज्म व्यक्ति की स्वतंत्रता को सर्वोच्च मानता है।”
  • “मनुष्य सभी सामाजिक संस्थाओं का केंद्र है।”
  • “राजनीतिक लोकतंत्र के साथ बौद्धिक स्वतंत्रता भी आवश्यक है।”
  • “तर्क और विज्ञान मानव प्रगति के मूल आधार हैं।”

7-राम मनोहर लोहिया

  • “सप्त क्रांति सामाजिक परिवर्तन का व्यापक कार्यक्रम है।”
  • “चौखम्भा राज्य सत्ता के विकेंद्रीकरण का मॉडल है।”
  • “समानता के बिना स्वतंत्रता अधूरी है।”

8-दीनदयाल उपाध्याय

  • “एकात्म मानववाद भारतीय संस्कृति पर आधारित विकास-दृष्टि है।”
  • “व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और मानवता परस्पर पूरक हैं।”
  • “अंत्योदय विकास का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए।”

9-विनोबा भावे

  • “भूदान सामाजिक न्याय का अहिंसक माध्यम है।”
  • “सर्वोदय का उद्देश्य सबका उत्थान है।”
  • “हृदय परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी साधन है।”

10-कौटिल्य (चाणक्य)

  • “प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है।”
  • “प्रजा के हित में ही राजा का हित निहित है।”
  • “राजा को अपना प्रिय नहीं, प्रजा का प्रिय कार्य करना चाहिए।”
  • “अर्थ ही पुरुषार्थों का आधार है।”
  • “दण्डनीति राज्य की आधारशिला है।”
  • “सप्तांग राज्य के सात आवश्यक अंग हैं।”
  • “राज्य की सुरक्षा सर्वोच्च दायित्व है।”
  • “गुप्तचर राज्य की आँखें और कान हैं।”
  • “विदेश नीति राष्ट्रीय हित पर आधारित होनी चाहिए।”
  • “राजा को सदैव सतर्क और परिश्रमी रहना चाहिए।”

11-आचार्य नरेंद्र देव

  • “लोकतांत्रिक समाजवाद स्वतंत्रता और समानता दोनों को स्वीकार करता है।”
  • “समाजवाद का आधार लोकतांत्रिक मूल्यों पर होना चाहिए।”
  • “सामाजिक न्याय समाजवाद का मूल उद्देश्य है।”

12-वी. आर. मेहता 

  • “मनु का राजनीतिक चिंतन ब्रह्मांडीय (Cosmic) दृष्टि पर आधारित है।”
  • “कौटिल्य का राजनीतिक चिंतन व्यावहारिक (Pragmatic) राजनीति का प्रतिनिधित्व करता है।”
  • “गांधी का राजनीतिक दर्शन समन्वयवादी (Synthetic Vision) है।”
  • “एम. एन. रॉय का चिंतन मानववादी (Humanist) परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है।”
  • “रवीन्द्रनाथ ठाकुर का राजनीतिक दर्शन विश्वमानवतावाद (Cosmopolitanism) की अभिव्यक्ति है।”
  • “भारतीय राजनीतिक चिंतन में राज्य कभी भी अपने-आप में साध्य नहीं रहा, बल्कि धर्म और लोककल्याण का साधन रहा है।”
  • “भारतीय राजनीतिक परंपरा में धर्म और राजनीति पूर्णतः पृथक नहीं हैं।”
  • “कौटिल्य ने राजनीति को नैतिकता से पूर्णतः पृथक नहीं किया, बल्कि राज्यहित को प्राथमिकता दी।”

13-श्री अरविन्द

  • “राष्ट्रवाद एक आध्यात्मिक शक्ति है।”
  • “मानव का विकास चेतना के विकास की प्रक्रिया है।”
  • “स्वतंत्रता मानव जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है।”
  • “राष्ट्र केवल भौगोलिक इकाई नहीं, एक जीवंत शक्ति है।”

14-रवीन्द्रनाथ ठाकुर

  • “राष्ट्रवाद मानवता से ऊपर नहीं हो सकता।”
  • “स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ मानसिक स्वतंत्रता है।”
  • “राज्य व्यक्ति के लिए है, व्यक्ति राज्य के लिए नहीं।”
  • “मानवतावाद राष्ट्रीय सीमाओं से व्यापक है।”

15-गोपाल कृष्ण गोखले 

  • “राजनीतिक सुधार क्रमिक होने चाहिए।”
  • “संवैधानिक साधन ही राजनीतिक परिवर्तन का उचित मार्ग हैं।”
  • “शिक्षा राष्ट्रीय विकास का आधार है।”

16-बाल गंगाधर तिलक 

  • “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।”
  • “राष्ट्रीय जागरण के लिए जनसंगठन आवश्यक है।”
  • “राजनीतिक स्वतंत्रता राष्ट्रीय जीवन की पहली आवश्यकता है।”

17-ज्योतिराव फुले

  • “शिक्षा सामाजिक मुक्ति का सबसे प्रभावी साधन है।”
  • “जाति-व्यवस्था सामाजिक अन्याय का मूल स्रोत है।”
  • “स्त्री शिक्षा सामाजिक परिवर्तन की आधारशिला है।”

18-ई. वी. रामासामी ‘पेरियार’ 

  • “आत्मसम्मान सामाजिक समानता की आधारशिला है।”
  • “जाति-व्यवस्था सामाजिक दासता का आधार है।”
  • “तर्कवाद सामाजिक सुधार का आवश्यक साधन है।”

19-जयप्रकाश नारायण 

  • “संपूर्ण क्रांति केवल राजनीतिक परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और नैतिक परिवर्तन का भी कार्यक्रम है।”
  • “लोकशक्ति लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है।”
  • “दलविहीन लोकतंत्र लोकतांत्रिक आदर्श की दिशा में एक प्रयास है।”

20-विनायक दामोदर सावरकर

  • “हिंदुत्व एक सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान की अवधारणा है।”
  • “राष्ट्र की एकता सांस्कृतिक आधार पर निर्मित होती है।”
  • “राष्ट्रीय शक्ति स्वतंत्रता की रक्षा के लिए आवश्यक है।”

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1. “धर्म मनु की राज्य-व्यवस्था का वास्तविक आधार है।” यह कथन किस विद्वान का है?

(A) नलिनी सिन्हा

(B) सत्यमित्र दुबे

(C) महेंद्र प्रसाद सिंह

(D) हिमांशु रॉय

2. “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।” यह कथन किसका है?

(A) गोपाल कृष्ण गोखले

(B) बाल गंगाधर तिलक

(C) लाला लाजपत राय

(D) बिपिन चंद्र पाल

 


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