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होर्मुज से मलक्का तक

बदलते समुद्री भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत की रणनीतिक प्राथमिकताएँ

पश्चिम एशिया में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक विश्व में समुद्री मार्ग केवल व्यापारिक संपर्क के साधन नहीं हैं, बल्कि वे वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण उपकरण बन चुके हैं। जून 2026 में होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास उत्पन्न तनाव और उसके बाद समुद्री यातायात पर पड़े प्रभाव ने यह दिखा दिया कि किसी भी रणनीतिक समुद्री मार्ग में अस्थिरता का प्रभाव केवल क्षेत्रीय देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था उसकी कीमत चुकाती है।

भारत, जिसकी लगभग 95 प्रतिशत विदेशी व्यापारिक मात्रा समुद्री मार्गों से संचालित होती है और जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पश्चिम एशिया पर काफी हद तक निर्भर है, उसके लिए यह संकट केवल एक अंतरराष्ट्रीय घटना नहीं है। यह एक ऐसा रणनीतिक संकेत है, जिससे भारत को अपनी समुद्री सुरक्षा, विदेश नीति तथा हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी दीर्घकालिक भूमिका का पुनर्मूल्यांकन करना होगा।

होर्मुज संकट ने क्या संदेश दिया?

जून 2026 में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और उसके बाद ईरान की प्रतिक्रिया ने होर्मुज जलडमरूमध्य को एक बार फिर वैश्विक चिंता का विषय बना दिया। कुछ व्यापारी जहाजों पर हमले, समुद्री यातायात में व्यवधान तथा युद्धविराम समझौतों के कमजोर पड़ने से यह स्पष्ट हुआ कि यदि किसी भी कारण से यह समुद्री मार्ग अवरुद्ध होता है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और समुद्री आपूर्ति शृंखलाएँ गंभीर संकट में पड़ सकती हैं।

यह संकट यह भी दर्शाता है कि आज की दुनिया में समुद्री मार्गों पर नियंत्रण केवल नौसैनिक शक्ति का विषय नहीं है, बल्कि यह भू-राजनीतिक दबाव बनाने का प्रभावी माध्यम बन चुका है। किसी भी जलडमरूमध्य में उत्पन्न अस्थिरता का उपयोग बड़े देश अपने सामरिक हितों की पूर्ति के लिए कर सकते हैं।

होर्मुज जलडमरूमध्य का वैश्विक महत्व

होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला अत्यंत संकरा समुद्री मार्ग है। विश्व के समुद्री तेल निर्यात का बड़ा भाग तथा प्राकृतिक गैस का महत्वपूर्ण हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया तथा यूरोप के अनेक देशों की ऊर्जा सुरक्षा इस मार्ग पर निर्भर करती है।

यदि यह मार्ग कुछ समय के लिए भी बाधित हो जाए तो तेल की कीमतों में तीव्र वृद्धि, मुद्रास्फीति, समुद्री बीमा लागत में बढ़ोतरी तथा वैश्विक व्यापारिक गतिविधियों में मंदी जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए होर्मुज केवल एक समुद्री मार्ग नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक स्थिरता की जीवनरेखा है।

भारत पर संभावित प्रभाव

  • भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशियाई देशों से आयात करता है। ऐसी स्थिति में होर्मुज में किसी भी प्रकार का व्यवधान भारत के लिए कई प्रकार की चुनौतियाँ उत्पन्न कर सकता है।
  • सबसे पहले ऊर्जा आयात महंगा हो जाएगा, जिससे पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में वृद्धि होगी। इसके परिणामस्वरूप परिवहन लागत बढ़ेगी और मुद्रास्फीति पर दबाव बनेगा। दूसरा, समुद्री बीमा प्रीमियम तथा जहाजरानी की लागत बढ़ने से भारत के निर्यात और आयात दोनों प्रभावित होंगे। तीसरा, भारतीय नौसेना को अपने व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त संसाधन लगाने पड़ेंगे।
  • इस प्रकार समुद्री संकट केवल सुरक्षा का विषय नहीं, बल्कि आर्थिक विकास, औद्योगिक उत्पादन और वित्तीय स्थिरता से भी जुड़ा हुआ प्रश्न है।

अंतरराष्ट्रीय कानून और समुद्री स्वतंत्रता

  • समुद्री मार्गों की सुरक्षा का आधार संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून अभिसमय अर्थात यूएनसीएलओएस है। इसके अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्यों में सभी देशों के जहाजों को निर्बाध आवागमन का अधिकार प्राप्त है। किंतु जब किसी क्षेत्र में युद्ध या सैन्य संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती है, तब इन कानूनी व्यवस्थाओं का पालन कराना अत्यंत कठिन हो जाता है।
  • ईरान का दृष्टिकोण यह रहा है कि उसकी क्षेत्रीय जलसीमा में आने वाले जहाजों को उसकी सुरक्षा चिंताओं का सम्मान करना चाहिए, जबकि पश्चिमी देश इस मार्ग को वैश्विक नौवहन का स्वतंत्र समुद्री मार्ग मानते हैं। यही मतभेद समय-समय पर तनाव का कारण बनता है।

भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण सीख

  • इस संकट की सबसे बड़ी सीख यह है कि केवल होर्मुज की सुरक्षा पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। भारत को अपने पूर्वी समुद्री क्षेत्र, विशेषकर मलक्का जलडमरूमध्य तथा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के रणनीतिक महत्व को समान प्राथमिकता देनी होगी।
  • यदि पश्चिम एशिया में होर्मुज भारत की ऊर्जा सुरक्षा का प्रवेश द्वार है, तो पूर्व में मलक्का जलडमरूमध्य भारत के इंडो-पैसिफिक दृष्टिकोण का केंद्रीय बिंदु है।

मलक्का जलडमरूमध्य का रणनीतिक महत्व

  • मलक्का जलडमरूमध्य हिंद महासागर को दक्षिण चीन सागर तथा प्रशांत महासागर से जोड़ता है। यह विश्व का सबसे व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक है। पूर्वी एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया और हिंद महासागर के बीच होने वाला विशाल व्यापार इसी मार्ग से होकर गुजरता है।
  • चीन, जापान, दक्षिण कोरिया तथा आसियान देशों की ऊर्जा आपूर्ति भी इस मार्ग पर अत्यधिक निर्भर है। इसलिए यदि भविष्य में इस क्षेत्र में कोई सैन्य संघर्ष उत्पन्न होता है, तो उसका प्रभाव भी वैश्विक स्तर पर महसूस किया जाएगा।

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की बढ़ती भूमिका

  • भारत का सबसे बड़ा सामरिक लाभ अंडमान और निकोबार द्वीप समूह हैं। ये द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित होने के कारण भारत को पूरे पूर्वी हिंद महासागर की गतिविधियों पर निगरानी रखने की क्षमता प्रदान करते हैं।
  • यह क्षेत्र भारत की त्रि-सेवा कमान का मुख्य केंद्र भी है। यदि यहां नौसैनिक आधारभूत संरचना, हवाई पट्टियों, बंदरगाहों, निगरानी प्रणालियों तथा समुद्री डोमेन जागरूकता को और मजबूत किया जाए, तो भारत हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी रणनीतिक स्थिति को अत्यधिक सुदृढ़ बना सकता है।

ग्रेट निकोबार परियोजना का महत्व

  • ग्रेट निकोबार द्वीप पर प्रस्तावित विशाल अवसंरचनात्मक परियोजना केवल आर्थिक विकास का कार्यक्रम नहीं है। इसका सामरिक महत्व कहीं अधिक व्यापक है।
  • गहरे समुद्री बंदरगाह, आधुनिक हवाई अड्डा, बेहतर संपर्क व्यवस्था तथा नौसैनिक सुविधाओं का विकास भारत को हिंद महासागर और मलक्का क्षेत्र में अधिक प्रभावी उपस्थिति प्रदान करेगा। इससे व्यापारिक गतिविधियों के साथ-साथ समुद्री सुरक्षा और आपदा प्रबंधन क्षमता में भी वृद्धि होगी।
  • हालांकि इस परियोजना के क्रियान्वयन में पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय जनजातीय समुदायों के अधिकार तथा सतत विकास के सिद्धांतों का भी पूरा ध्यान रखा जाना आवश्यक है।

चीन की समुद्री रणनीति और भारत

हाल के वर्षों में चीन ने हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति निरंतर बढ़ाई है। बंदरगाहों में निवेश, समुद्री आधारभूत संरचना का विकास तथा नौसैनिक गतिविधियों में वृद्धि उसकी व्यापक समुद्री रणनीति का हिस्सा हैं।

ऐसी स्थिति में भारत के लिए आवश्यक है कि वह केवल प्रतिक्रिया देने वाली नीति न अपनाकर दीर्घकालिक समुद्री रणनीति विकसित करे। अंडमान और निकोबार द्वीपों का विकास, नौसैनिक आधुनिकीकरण, समुद्री निगरानी प्रणाली का विस्तार तथा मित्र देशों के साथ संयुक्त अभ्यास इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।

भारत की संतुलित विदेश नीति

  • इस पूरे संकट के दौरान भारत ने संतुलित और जिम्मेदार विदेश नीति का परिचय दिया है। भारत ने किसी भी पक्ष का खुला समर्थन करने के बजाय संवाद, कूटनीति और क्षेत्रीय स्थिरता पर बल दिया।
  • भारत के अमेरिका, ईरान, इजरायल तथा खाड़ी देशों के साथ अलग-अलग महत्वपूर्ण संबंध हैं। इसलिए भारत के लिए किसी एक पक्ष के साथ पूर्ण रूप से खड़ा होना व्यावहारिक नहीं है। उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसकी रणनीतिक स्वायत्तता है।
  • भविष्य में भी भारत को अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाए रखते हुए सभी पक्षों के साथ रचनात्मक संवाद जारी रखना होगा।

भारत की समुद्री रणनीति की प्रमुख दिशाए

  • भारत को बहुआयामी समुद्री रणनीति अपनानी होगी। इसके अंतर्गत ऊर्जा आयात के स्रोतों का विविधीकरण, सामरिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार, नौसैनिक क्षमता का आधुनिकीकरण, समुद्री डोमेन जागरूकता प्रणाली को मजबूत करना तथा हिंद महासागर क्षेत्र के देशों के साथ सहयोग बढ़ाना आवश्यक होगा।
  • इसके अतिरिक्त भारतीय जहाजरानी उद्योग को सुदृढ़ बनाना, समुद्री बीमा व्यवस्था को विकसित करना, तटीय अवसंरचना का विस्तार करना तथा ब्लू इकोनॉमी के विभिन्न क्षेत्रों में निवेश बढ़ाना भी समय की आवश्यकता है।
  • भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में नियम आधारित समुद्री व्यवस्था, नौवहन की स्वतंत्रता तथा अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान का लगातार समर्थन करना चाहिए। यही दृष्टिकोण उसे एक जिम्मेदार समुद्री शक्ति के रूप में स्थापित करेगा।

निष्कर्ष

होर्मुज संकट ने यह सिद्ध कर दिया है कि इक्कीसवीं शताब्दी की वैश्विक राजनीति का केंद्र केवल स्थलीय सीमाएँ नहीं हैं, बल्कि समुद्री मार्ग भी समान रूप से निर्णायक बन चुके हैं। ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक व्यापार, आपूर्ति शृंखलाएँ और सामरिक प्रतिस्पर्धा सभी समुद्री भूगोल से गहराई से जुड़ी हुई हैं।

भारत के लिए यह अवसर है कि वह इस संकट को केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष के रूप में न देखकर दीर्घकालिक समुद्री रणनीति के निर्माण का आधार बनाए। होर्मुज की घटनाओं से सीख लेते हुए यदि भारत अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, मलक्का जलडमरूमध्य, हिंद महासागर क्षेत्र तथा इंडो-पैसिफिक सहयोग को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का प्रमुख आधार बनाता है, तो वह न केवल अपने आर्थिक हितों की बेहतर रक्षा कर सकेगा, बल्कि एक जिम्मेदार, विश्वसनीय और प्रभावशाली समुद्री शक्ति के रूप में भी उभर सकेगा।

आने वाले वर्षों में भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह संकट उत्पन्न होने की प्रतीक्षा करता है या समय रहते समुद्री सुरक्षा, कूटनीतिक संतुलन और रणनीतिक अवसंरचना के माध्यम से भविष्य की चुनौतियों के लिए स्वयं को तैयार करता है। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है।

मलक्का जलडमरूमध्य (Malacca Strait) का भौगोलिक महत्व 

  • हिंद महासागर को दक्षिण चीन सागर तथा प्रशांत महासागर से जोड़ने वाला प्रमुख समुद्री मार्ग है।
  • यह मलय प्रायद्वीप (मलेशिया) और इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप के बीच स्थित है।
  • इसकी लंबाई लगभग 890 किमी तथा न्यूनतम चौड़ाई लगभग 2.8 किमी (फिलिप्स चैनल) है।
  • यह विश्व के सबसे व्यस्त और रणनीतिक समुद्री चोकपॉइंट्स (Chokepoints) में से एक है।
  • इसके तट पर इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर स्थित हैं।
  • यह पूर्वी एशिया और यूरोप के बीच सबसे छोटा समुद्री मार्ग उपलब्ध कराता है।
  • यह हिंद महासागर और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के बीच सामरिक संपर्क का प्रमुख द्वार है।
  • भारत के अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह इसके पश्चिमी प्रवेश द्वार के निकट स्थित हैं, जिससे भारत को सामरिक बढ़त मिलती है।
  • यह दक्षिण पूर्व एशिया की समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन का महत्वपूर्ण केंद्र है।
  • चीन की “मलक्का दुविधा” (Malacca Dilemma) का प्रमुख कारण यही जलडमरूमध्य है।

मलक्का जलडमरूमध्य का आर्थिक महत्व

  • विश्व के लगभग एक-तिहाई समुद्री व्यापार का आवागमन इसी मार्ग से होता है।
  • प्रतिवर्ष लगभग 1 लाख से अधिक जहाज इस जलडमरूमध्य से गुजरते हैं।
  • पूर्वी एशिया के लिए पश्चिम एशिया से तेल एवं गैस की आपूर्ति का प्रमुख मार्ग है।
  • चीन, जापान और दक्षिण कोरिया की ऊर्जा सुरक्षा इस जलडमरूमध्य पर अत्यधिक निर्भर है।
  • यह वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं (Global Supply Chains) की महत्वपूर्ण कड़ी है।
  • इस मार्ग के बाधित होने पर वैश्विक व्यापार लागत और समुद्री बीमा प्रीमियम बढ़ जाते हैं।
  • मलक्का के बंद होने पर जहाजों को सुंडा या लोम्बोक जलडमरूमध्य से होकर लंबा मार्ग अपनाना पड़ता है, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ते हैं।
  • भारत के पूर्वी तट के बंदरगाहों और आसियान देशों के बीच व्यापार के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है।
  • यह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की आर्थिक स्थिरता का आधार माना जाता है।
  • विश्व व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री परिवहन के लिए यह एक “आर्थिक जीवनरेखा” (Economic Lifeline) के रूप में जाना जाता है।

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