भारत की विदेश नीति में पड़ोसी देशों का विशेष महत्व रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपनाई गई “पड़ोस प्रथम” (Neighbourhood First) नीति का मूल उद्देश्य दक्षिण एशिया और निकटवर्ती क्षेत्रों में भारत के प्रभाव को मजबूत करना तथा क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करना है। किंतु पिछले कुछ वर्षों में भारत के अनेक पड़ोसी देशों—बांग्लादेश, नेपाल, मालदीव, श्रीलंका, अफगानिस्तान और पाकिस्तान—के साथ संबंधों में विभिन्न प्रकार की चुनौतियाँ उभरी हैं। ऐसे समय में म्यांमार भारत की विदेश नीति के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण देश बनकर उभरा है।
म्यांमार केवल एक पड़ोसी देश नहीं है, बल्कि वह भारत की “पड़ोस प्रथम” और “एक्ट ईस्ट” (Act East) नीति के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु का कार्य करता है। भारत के लिए यह देश सुरक्षा, व्यापार, संपर्क, ऊर्जा, सामरिक प्रतिस्पर्धा और पूर्वोत्तर भारत के विकास जैसे अनेक आयामों से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि म्यांमार में राजनीतिक अस्थिरता और गृहयुद्ध जैसी परिस्थितियों के बावजूद भारत उसके साथ निरंतर संवाद बनाए हुए है।
भारत और म्यांमार : ऐतिहासिक एवं सामरिक संबंध
भारत और म्यांमार के संबंध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक आधारों पर निर्मित हैं। दोनों देशों की लगभग 1,640 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम राज्यों से जुड़ती है। इसके अतिरिक्त बौद्ध धर्म, व्यापारिक संपर्क और औपनिवेशिक इतिहास भी दोनों देशों को एक-दूसरे के निकट लाते हैं।
स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में दोनों देशों के संबंध सामान्य रहे, किंतु म्यांमार में सैन्य शासन स्थापित होने के बाद भारत और म्यांमार के संबंधों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला। प्रारंभिक वर्षों में भारत लोकतंत्र समर्थक रुख अपनाता रहा, परंतु 1990 के दशक में चीन के बढ़ते प्रभाव और सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए भारत ने व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए म्यांमार की सैन्य सरकार के साथ भी संबंध विकसित किए।
पड़ोस नीति के संकट के बीच म्यांमार का बढ़ता महत्व
वर्तमान समय में भारत के अनेक पड़ोसी देशों में राजनीतिक अस्थिरता और बाहरी शक्तियों का प्रभाव बढ़ रहा है। पाकिस्तान के साथ संबंध लंबे समय से तनावपूर्ण हैं। अफगानिस्तान में तालिबान शासन की वापसी ने नई चुनौतियाँ पैदा की हैं। बांग्लादेश में राजनीतिक परिवर्तन और चीन की सक्रियता ने भारत की चिंताओं को बढ़ाया है। नेपाल और मालदीव में भी समय-समय पर भारत-विरोधी राजनीतिक रुझान दिखाई देते रहे हैं।
ऐसी परिस्थिति में म्यांमार भारत के लिए केवल एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने वाला एक रणनीतिक द्वार बन गया है। यदि भारत को अपनी एक्ट ईस्ट नीति को सफल बनाना है, तो म्यांमार के साथ स्थिर और सक्रिय संबंध बनाए रखना अनिवार्य है।
चीन की चुनौती और म्यांमार
म्यांमार के महत्व को समझने के लिए चीन की भूमिका को समझना आवश्यक है। पिछले दो दशकों में चीन ने म्यांमार में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। बंदरगाहों, ऊर्जा परियोजनाओं, सड़कों और आर्थिक गलियारों के माध्यम से चीन ने वहां अपना प्रभाव स्थापित किया है।
भारत को आशंका है कि यदि म्यांमार पूरी तरह चीन के प्रभाव क्षेत्र में चला जाता है, तो हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी में भारत की सामरिक स्थिति कमजोर हो सकती है। इसलिए नई दिल्ली म्यांमार के साथ संबंधों को केवल द्विपक्षीय संबंधों के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन के दृष्टिकोण से भी देखती है। हाल के वर्षों में भारत और म्यांमार के बीच उच्च स्तरीय संवाद तथा सहयोग इसी रणनीतिक सोच का परिणाम है।
पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा और म्यांमार
म्यांमार भारत की आंतरिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में सक्रिय कई उग्रवादी संगठनों ने अतीत में म्यांमार की सीमा के निकट शरणस्थल बनाए थे। इसलिए सीमा-पार आतंकवाद, हथियारों की तस्करी, नशीले पदार्थों का व्यापार और अवैध गतिविधियाँ भारत के लिए प्रमुख चिंताएँ रही हैं।
हाल ही में भारत और म्यांमार के बीच हुई वार्ताओं में सीमा सुरक्षा, उग्रवादी समूहों की गतिविधियाँ तथा खुफिया सहयोग प्रमुख मुद्दे रहे हैं। म्यांमार ने भारत को आश्वासन दिया है कि उसकी भूमि का उपयोग भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं होने दिया जाएगा।
इसके अतिरिक्त म्यांमार में जारी गृहयुद्ध और संघर्ष के कारण बड़ी संख्या में शरणार्थी भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में पहुंचे हैं। इससे स्थानीय प्रशासन, सामाजिक संतुलन और सुरक्षा व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है। यही कारण है कि भारत म्यांमार में स्थिरता की वापसी को अपनी सुरक्षा से सीधे जुड़ा हुआ मानता है।
संपर्क परियोजनाएँ : भारत की एक्ट ईस्ट नीति की रीढ़
भारत और म्यांमार के बीच संपर्क परियोजनाएँ दोनों देशों के संबंधों का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष हैं। इनमें प्रमुख हैं—
- कलादान मल्टी-मोडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट परियोजना
- भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग
- सीमा व्यापार अवसंरचना परियोजनाएँ
- पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने वाली सड़क परियोजनाएँ
इन परियोजनाओं का उद्देश्य भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को समुद्री और स्थलीय मार्गों से वैश्विक बाजारों तक पहुँच प्रदान करना है। म्यांमार के बिना भारत की एक्ट ईस्ट नीति व्यावहारिक रूप से अधूरी रह जाएगी।

हाल ही में दोनों देशों ने इन संपर्क परियोजनाओं को गति देने पर भी सहमति व्यक्त की है, जिससे आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय एकीकरण को बढ़ावा मिलेगा।
लोकतंत्र बनाम रणनीतिक यथार्थवाद
म्यांमार नीति के संदर्भ में भारत को एक महत्वपूर्ण दुविधा का सामना करना पड़ता है। एक ओर भारत स्वयं को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में प्रस्तुत करता है, जबकि दूसरी ओर उसे म्यांमार की सैन्य-समर्थित सरकार के साथ भी संबंध बनाए रखने पड़ रहे हैं।
2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद पश्चिमी देशों ने म्यांमार की सैन्य सरकार को अलग-थलग करने का प्रयास किया। लेकिन भारत ने पूर्ण बहिष्कार की नीति नहीं अपनाई। नई दिल्ली का मानना है कि संवाद और सहभागिता, अलगाव की तुलना में अधिक प्रभावी रणनीति है।
भारत लगातार लोकतांत्रिक संक्रमण और राजनीतिक समाधान की आवश्यकता पर बल देता रहा है, किंतु साथ ही उसने अपने रणनीतिक हितों को भी प्राथमिकता दी है। यही कारण है कि भारत लोकतंत्र और यथार्थवादी कूटनीति के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहा है।
आर्थिक अवसर और संसाधन
म्यांमार प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध देश है। हाल के वर्षों में दुर्लभ खनिजों (Rare Earth Minerals), ऊर्जा संसाधनों और व्यापारिक अवसरों ने भारत की रुचि को और बढ़ाया है। चीन के साथ प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में भी इन संसाधनों का महत्व बढ़ गया है।
भारत और म्यांमार के बीच व्यापार, ऊर्जा सहयोग, कृषि, स्वास्थ्य और डिजिटल संपर्क के क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाने के प्रयास हो रहे हैं। दोनों देशों ने हालिया बैठकों में व्यापार और आर्थिक संबंधों को और मजबूत करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है।
रोहिंग्या संकट और मानवीय चुनौती
म्यांमार की राजनीति का एक महत्वपूर्ण आयाम रोहिंग्या संकट भी है। रखाइन प्रांत में हिंसा और विस्थापन के कारण लाखों रोहिंग्या शरणार्थी बांग्लादेश तथा अन्य देशों में पहुंचे। इस संकट ने क्षेत्रीय सुरक्षा और मानवीय चुनौतियों को बढ़ाया।
भारत को इस मुद्दे पर सुरक्षा, मानवाधिकार और कूटनीतिक हितों के बीच संतुलन बनाना पड़ा है। रोहिंग्या संकट का प्रभाव केवल म्यांमार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने पूरे दक्षिण एशिया की राजनीति और सुरक्षा को प्रभावित किया है।
आगे की राह : भारत को क्या करना चाहिए?
म्यांमार के संदर्भ में भारत को बहुआयामी रणनीति अपनाने की आवश्यकता है। इसके लिए निम्नलिखित कदम महत्वपूर्ण हो सकते हैं—
- सीमा सुरक्षा और खुफिया सहयोग को और मजबूत करना।
- संपर्क परियोजनाओं को शीघ्र पूरा करना।
- म्यांमार में सभी प्रमुख राजनीतिक पक्षों के साथ संवाद बनाए रखना।
- लोकतांत्रिक संक्रमण के लिए रचनात्मक सहयोग देना।
- चीन के बढ़ते प्रभाव का संतुलन करने हेतु आर्थिक निवेश बढ़ाना।
- पूर्वोत्तर भारत के विकास को म्यांमार से जुड़ी परियोजनाओं के साथ जोड़ना।
- मानवीय संकटों और शरणार्थी समस्याओं के लिए समन्वित क्षेत्रीय नीति विकसित करना।
निष्कर्ष
म्यांमार आज भारत की विदेश नीति के सबसे महत्वपूर्ण देशों में से एक है। यह देश केवल एक पड़ोसी नहीं, बल्कि भारत की सुरक्षा, आर्थिक विकास, पूर्वोत्तर भारत के एकीकरण, दक्षिण-पूर्व एशिया से संपर्क और चीन के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्रीय बिंदु है। म्यांमार में जारी राजनीतिक अस्थिरता और गृहसंघर्ष ने भारत की चुनौतियों को बढ़ाया है, किंतु इसके बावजूद नई दिल्ली ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह म्यांमार के साथ अपने संबंधों को बनाए रखेगी।
वास्तव में, म्यांमार भारत की “पड़ोस प्रथम” और “एक्ट ईस्ट” नीतियों के संगम पर स्थित वह देश है, जिसके बिना भारत की पूर्वी रणनीति अधूरी रह जाएगी। इसलिए आने वाले वर्षों में म्यांमार के प्रति भारत की नीति न केवल द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित करेगी, बल्कि पूरे दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की भूमिका को भी परिभाषित करेगी।
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