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भारत पाकिस्तान संबंधों की दिशा

आगरा शिखर वार्ता के 25 वर्ष

जुलाई 2001 में आगरा में हुई भारत पाकिस्तान शिखर वार्ता को पच्चीस वर्ष पूरे हो चुके हैं। यह वार्ता तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तान के सैन्य शासक जनरल परवेज मुशर्रफ के बीच हुई थी। यह वार्ता इतिहास बनने के बहुत करीब पहुंची लेकिन अंतिम क्षणों में टूट गई। यह घटना भारत पाकिस्तान संबंधों की जटिलता, विश्वास की कमी और कूटनीतिक अवसरों के खोने की एक महत्वपूर्ण मिसाल है, जो प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से भी अत्यंत उपयोगी विषय है।

पृष्ठभूमि, लाहौर से कारगिल तक का सफर

  • आगरा वार्ता को समझने से पहले उस दौर की घटनाओं को समझना आवश्यक है, जिनने दोनों देशों के बीच माहौल को गहराई से प्रभावित किया।
  • फरवरी 1999 में प्रधानमंत्री वाजपेयी ऐतिहासिक सदा ए सरहद बस से लाहौर गए थे। इस दौरान उन्होंने और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने लाहौर घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए थे, जो शांति और विश्वास बहाली की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया था। लेकिन इस मैत्री भाव के कुछ ही महीनों बाद पाकिस्तानी सेना ने कारगिल में घुसपैठ शुरू कर दी।
  • मई 1999 में भारतीय सेना ने कारगिल में घुसपैठ का पता लगाया, जिसके बाद जुलाई 1999 में ऑपरेशन विजय के तहत भारत ने सफलतापूर्वक अपने क्षेत्र को वापस हासिल किया। इस युद्ध के मुख्य सूत्रधार तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल मुशर्रफ ही थे। अक्टूबर 1999 में मुशर्रफ ने नवाज शरीफ की सरकार का तख्तापलट कर स्वयं सत्ता संभाल ली।
  • दिसंबर 1999 में इंडियन एयरलाइंस के विमान आईसी 814 का अपहरण हुआ, जिसके बदले में भारत को मसूद अजहर जैसे आतंकवादियों को रिहा करना पड़ा। इसके बाद वर्ष 2000 में जम्मू कश्मीर में हिंसा की कई घटनाएं हुईं, जिनमें चित्तीसिंहपुरा में सिखों का नरसंहार और लाल किले पर हमला शामिल है।
  • इस प्रकार लगातार धोखे और विश्वासघात की एक श्रृंखला के बाद भी मई 2001 में वाजपेयी ने मुशर्रफ को आगरा शिखर वार्ता के लिए आमंत्रित किया। यह निर्णय अपने समय में अत्यंत साहसिक माना गया था।

निमंत्रण का साहसिक फैसला

  • 23 मई 2001 को एक नियमित बैठक में वाजपेयी ने अपने गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी और विदेश मंत्री जसवंत सिंह से पूछा था, आब आगे क्या करना चाहिए। यह प्रश्न पाकिस्तान के संदर्भ में था। कारगिल युद्ध को केवल दो वर्ष हुए थे और मुशर्रफ ही इसके मुख्य सूत्रधार थे, इसके बावजूद इसी बैठक में मुशर्रफ को आमंत्रित करने का निर्णय लिया गया।
  • वाजपेयी के तत्कालीन निजी सचिव अजय बिसारिया, जो बाद में पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त भी रहे, अपनी पुस्तक “एंगर मैनेजमेंट” में लिखते हैं कि आगरा शिखर वार्ता कारगिल के बाद संबंधों में एक निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए आवश्यक कदम था। इसके साथ ही यह वाजपेयी और उनकी टीम के लिए मुशर्रफ के व्यवहार और स्वभाव को समझने का भी एक जरूरी अवसर था।
  • पत्रकार शुभजीत रॉय के अनुसार यह निमंत्रण उस समय अनेक लोगों के लिए अप्रत्याशित था। विदेश मंत्रालय में पाकिस्तान मामलों के तत्कालीन संयुक्त सचिव विवेक कात्जू, जो इस पूरी वार्ता के महत्वपूर्ण सूत्रधारों में से एक थे, बताते हैं कि यह अवसर अत्यंत असाधारण था। उनके अनुसार पीछे मुड़कर देखने पर यह भी स्पष्ट होता है कि दोनों पक्षों ने आवश्यक तैयारी में कमी छोड़ी थी।

दिल्ली में मुशर्रफ की व्यक्तिगत यात्रा

  • 14 जुलाई 2001 को मुशर्रफ अपनी पत्नी सेहबा के साथ दिल्ली पहुंचे। यहां उन्होंने पहले अपना पारिवारिक घर देखा, जहां वे 1947 में भारत छोड़ने से पहले रहते थे। इसके बाद वे राजघाट गए और गांधी परिवार के सदस्यों से भी मिले।
  • इसी दौरान आडवाणी ने मुशर्रफ से राष्ट्रपति भवन में भेंट की। दोनों की एक साझा बात थी, दोनों ने कराची के प्रसिद्ध सेंट पैट्रिक हाई स्कूल से शिक्षा प्राप्त की थी। बातचीत के दौरान जब आडवाणी ने स्पष्ट किया कि मुख्य मुद्दा सीमा पार आतंकवाद है, तो मुशर्रफ का चेहरा लाल हो गया। यही वह पहला संकेत था जिससे यह अनुमान लगाया जाने लगा कि वार्ता में कठिनाई आ सकती है।

आगरा में शिखर वार्ता का आयोजन

आगरा में मुशर्रफ ओबेरॉय अमरविलास होटल में और वाजपेयी जयपी पैलेस में ठहरे थे। यही दोनों स्थान वार्ता के अधिकारिक केंद्र भी बने। वाजपेयी की पूरी सुरक्षा एवं मंत्रिमंडलीय समिति उनके साथ थी, जिनमें आडवाणी, विदेश मंत्री जसवंत सिंह, वाणिज्य मंत्री मुरासोली मारन, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा, विदेश सचिव चोकिला अय्यर, प्रमुख सचिव विजय नांबियार और सूचना सचिव सुषमा सिंह शामिल थीं।

15 जुलाई की द्विपक्षीय वार्ता में वाजपेयी ने अपने उद्देश्यों को स्पष्ट और सटीक शब्दों में रखा। दूसरी तरफ मुशर्रफ ने इस मुलाकात को व्यापक स्वरूप देने का प्रयास किया और पाकिस्तान में जड़ स्तर के लोकतंत्र लाने की अपनी योजनाओं का भी विस्तृत विवरण दिया।

संयुक्त वक्तव्य के मसौदे पर विवाद

  • वार्ता के केंद्र में एक साझा वक्तव्य तैयार करने की जिम्मेदारी जसवंत सिंह और पाकिस्तान के विदेश मंत्री अब्दुल सत्तार को दी गई थी। जसवंत सिंह अपनी पुस्तक “अ कॉल टु ऑनर” में लिखते हैं कि प्रारंभिक मसौदे में सीमा पार आतंकवाद का कोई उल्लेख नहीं था। दूसरी ओर सिन्हा के अनुसार शिमला समझौते का भी कोई संदर्भ नहीं दिया गया था।
  • आडवाणी ने अपनी आत्मकथा में इस बात की पुष्टि की है कि 1972 के शिमला समझौते और 1999 की लाहौर घोषणा का उल्लेख न होना उन्हें असहज कर रहा था।
  • 15 जुलाई की शाम को मुशर्रफ, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के बीच मसौदे पर चर्चा हुई। मुशर्रफ ने कहा कि उन्होंने देखा है कि मसौदे में सीमा पार आतंकवाद का कोई जिक्र नहीं है। इस पर आडवाणी ने स्पष्ट कहा कि यह स्वीकार नहीं किया जा सकता और यह विचार पूरे भारतीय पक्ष द्वारा एकमत से समर्थित था।
  • जसवंत सिंह के अनुसार इसके बाद मुशर्रफ ने स्वयं कुछ बदलाव कर मसौदे को टाइप किया और उसकी छायाप्रति सत्तार को भेजी गई। इसी बीच विवेक कात्जू, जो विदेश मंत्रालय में पाकिस्तान प्रभार देखते थे, कागज लेकर कमरे में पहुंचे। कात्जू का रुख इस मसौदे को लेकर संतुष्ट नहीं था। मुशर्रफ ने शायद उन्हें गंभीरता से नहीं लिया, जिससे कात्जू असहज हो गए। बाद में कात्जू ने मुशर्रफ को याद दिलाया कि उनके प्रधानमंत्री उन्हें केवल आदेश नहीं दे सकते, बल्कि यह पूरी बातचीत की एक प्रक्रिया है। इस पूरे विवाद के दौरान बातचीत लगभग साढ़े चार बजे सुबह तक चलती रही, लेकिन अंतिम मसौदे पर कोई सहमति नहीं बन पाई।

वार्ता की अचानक टूट

  • 16 जुलाई की सुबह, जब वाजपेयी और मुशर्रफ की निर्धारित बैठक होनी थी, उससे कुछ समय पहले मुशर्रफ ने संपादकों के साथ एक नाश्ता गोलमेज बैठक की। इस बैठक में मुशर्रफ ने कश्मीर मुद्दे पर अत्यंत कठोर रुख अपनाया और आतंकवादियों की तुलना स्वतंत्रता सेनानियों से कर दी। यह बात सुनकर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा को गहरा धक्का लगा।
  • अजय बिसारिया के अनुसार इसी दौरान उन्होंने वाजपेयी के लिए एक त्वरित संदेश तैयार किया। जब मुशर्रफ यह सब कह रहे थे, दोनों नेता एक साथ ऊपर देखने लगे क्योंकि बातचीत में एक व्यवधान आया था। इसके बाद वाजपेयी ने वह कागज पढ़ा जिसमें मुशर्रफ के व्यवहार के बारे में लिखा था। बाद में मजाकिया लहजे में मुशर्रफ पर आरोप लगाया गया कि वे आगरा की पूरी पहल को खतरे में डाल रहे हैं।
  • अपनी पुस्तक में जसवंत सिंह ने लिखा है कि मुशर्रफ यह समझ पाने में असफल रहे कि कारगिल युद्ध ने भारत पाकिस्तान संबंधों के वातावरण को कितनी गहराई से क्षतिग्रस्त किया था। साथ ही वे यह भी नहीं समझ पाए कि वाजपेयी ने जो नई शुरुआत की पेशकश की थी, उसका वास्तविक महत्व क्या था।

अंतिम प्रयास

जब वार्ता विफल होने के करीब थी, तब मुशर्रफ ने वाजपेयी से एक अंतिम मुलाकात का अनुरोध किया, ताकि इस शिखर वार्ता को बचाया जा सके। बिसारिया लिखते हैं कि इससे वाजपेयी को 1972 के शिमला समझौते की याद आई, जब पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की मां के समय ऐसी ही स्थिति बनी थी। तब वाजपेयी ने इंदिरा गांधी को इसी प्रकार की स्थिति में अंतिम बुलावा दिया था।

अंततः मुशर्रफ इस्लामाबाद लौट गए और उन्होंने अजमेर शरीफ भी नहीं जाने का फैसला किया। जब जसवंत सिंह से पूछा गया कि क्या भारत सरकार ने उन्हें दरगाह जाने से रोका, तो उनका उत्तर था कि उनकी क्या हैसियत है कि वे मुशर्रफ को गरीब नवाज के पास जाने से रोकें।

मुशर्रफ का दावा और आडवाणी का खंडन

सितंबर 2006 में प्रकाशित अपनी आत्मकथा “इन द लाइन ऑफ फायर” में मुशर्रफ ने लिखा कि रात लगभग ग्यारह बजे उनकी वाजपेयी से मुलाकात हुई, जिसमें वाजपेयी अत्यंत उदास दिख रहे थे। मुशर्रफ का दावा है कि उन्होंने वाजपेयी को स्पष्ट रूप से बताया कि दोनों के ऊपर कोई ऐसी शक्ति प्रतीत होती है जो उनके निर्णयों को पलट सकती है, और यह भी कहा कि दोनों नेताओं का अपमान हुआ है, जिस पर वाजपेयी केवल खामोश बैठे रहे।

आडवाणी ने अपनी पुस्तक में इस दावे को पूरी तरह अस्वीकार करते हुए इसे अनावश्यक और भ्रामक बताया है।

25 वर्ष बाद वर्तमान स्थिति

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले दो वर्षों के कार्यकाल में पाकिस्तान के साथ संबंधों में सकारात्मक संकेत दिखाई दिए। दिसंबर 2015 में प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के निमंत्रण पर मोदी की अचानक लाहौर यात्रा ने दोनों देशों के संबंधों में नई उम्मीद जगाई। हालांकि, उसके बाद पठानकोट, उड़ी, पुलवामा और पहलगाम जैसे आतंकी हमलों ने दोनों देशों के बीच अविश्वास को और गहरा कर दिया।

हाल के दिनों में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) ने पाकिस्तान के साथ वार्ता की आवश्यकता पर फिर से चर्चा की है।

भारत और पाकिस्तान के संबंधों पर टिप्पणी करते हुए राघवन कहते हैं कि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि पाकिस्तान वास्तव में वार्ता चाहता भी है या नहीं। उनका मानना है कि संबंधों में सुधार तभी संभव है जब दोनों देशों की नीतियों में समानांतर परिवर्तन दिखाई दे।

हालांकि, वे ट्रैक-2 वार्ताओं के प्रति संदेह व्यक्त नहीं करते। उनके अनुसार इन संवादों से आम लोगों के बीच संचार के नए रास्ते खुलते हैं। उच्च राजनीतिक स्तर पर वार्ता शुरू होने से पहले भी इनकी उपयोगिता बनी रहती है।

पुलवामा आतंकी हमले, फरवरी 2019 की बालाकोट हवाई कार्रवाई और अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 को हटाने जैसे घटनाक्रमों ने परिस्थितियों को पूरी तरह बदल दिया। इसके साथ ही पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के पहलगाम क्षेत्र में हुई घटना ने भी माहौल को और जटिल बना दिया।

पुलवामा से पहले जो सकारात्मक माहौल बन रहा था, उसके बाद से ऐसा महसूस होने लगा कि आगे बढ़ी हुई प्रक्रिया फिर पीछे लौट गई है।

हालांकि, 0पाकिस्तान की सेना के साथ किसी भी प्रकार का संवाद बनाए रखना एक उचित और व्यावहारिक विकल्प है। उनके अनुसार एक संतुलित और तार्किक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।

आगरा शिखर सम्मेलन की एक प्रमुख सीख यह है कि शांति प्रक्रिया की राजनीतिक लागत बहुत अधिक नहीं होनी चाहिए। उदाहरण स्वरूप 1999 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लाहौर की ऐतिहासिक यात्रा की, 2001 में जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ को आगरा आमंत्रित किया और 2004 में इस्लामाबाद में आयोजित सार्क सम्मेलन में भाग लिया।

इसके विपरीत प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पाकिस्तान जाने को लेकर अधिक सतर्क रहे।इसका कारण यह था कि 26/11 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री के लिए पाकिस्तान की यात्रा राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत जोखिमपूर्ण हो गई थी। यदि राजनीतिक जोखिम अधिक हो तो वास्तविक निर्णय लेने की संभावना कम हो जाती है।

ऐसे में यदि कभी भविष्य में पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित हो सके, तो दोनों देशों के बीच फिर से वार्ता आरंभ की जा सकती है। उनका विश्वास है कि यदि पाकिस्तान वास्तव में गंभीर और सार्थक संवाद चाहता है, तो कोई भी उसकी राह में बाधा नहीं बनेगा।


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