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राजनीतिक संस्कृति (Political Culture)

राजनीतिक संस्कृति की अवधारणा का विकास आधुनिक राजनीति विज्ञान, विशेषकर व्यवहारवादी क्रांति और तुलनात्मक राजनीति के अंतर्गत हुआ।

पारंपरिक उपागम मुख्य रूप से औपचारिक, कानूनी और संस्थागत ढांचों के अध्ययन तक सीमित थे। इसके विपरीत, राजनीतिक संस्कृति का दृष्टिकोण राजनीतिक व्यवस्था के अनौपचारिक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और व्यवहारपरक पहलुओं पर बल देता है।

यह अवधारणा यह स्पष्ट करने में सहायता करती है कि समान संविधान या समान लोकतांत्रिक संस्थागत संरचनाएं होने के बावजूद विभिन्न देशों में राजनीतिक प्रक्रियाएं और परिणाम भिन्न-भिन्न क्यों होते हैं।

राजनीतिक संस्कृति का अर्थ एवं परिभाषाएँ

  • सामान्य अर्थ: राजनीतिक संस्कृति किसी राजनीतिक समाज के सदस्यों की अपनी राजनीतिक व्यवस्था, उसकी विभिन्न संस्थाओं, प्रतीकों और उसमें अपनी स्वयं की भूमिका के प्रति अभिवृत्तियों (attitudes), विश्वासों (beliefs), भावनाओं (emotions/feelings), मूल्यों और प्रवृत्तियों का समग्र समुच्चय है।
  • प्रमुख विद्वानों के अनुसार परिभाषाएँ:
    • गेब्रियल आमण्ड एवं सिडनी वर्बा (Gabriel Almond & Sidney Verba – The Civic Culture, 1963): राजनीतिक संस्कृति राजनीतिक व्यवस्था के प्रति नागरिकों की विशिष्ट अभिवृत्तियों और अभिमुखीकरणों (orientations) का प्रतिमान है।
    • ल्यूशियन पाई (Lucian Pye): राजनीतिक संस्कृति मूलभूत मनोवृत्तियों, संवेगों तथा उन भावनाओं का समूह है जो किसी राजनीतिक प्रक्रिया को व्यवस्था और सार्थकता प्रदान करती हैं।
    • एलन बॉल (Alan Ball): राजनीतिक संस्कृति उन अभिवृत्तियों, विश्वासों, भावनाओं और मूल्यों से निर्मित होती है जो किसी समाज की राजनीतिक व्यवस्था और राजनीतिक मुद्दों से संबंधित होते हैं।

राजनीतिक अभिमुखीकरण के तीन आयाम (Three Dimensions of Political Orientation)

आमण्ड और वर्बा के अनुसार नागरिक अपनी राजनीतिक व्यवस्था के प्रति तीन प्रमुख आयामों में उन्मुख (orient) होते हैं:

  1. ज्ञानात्मक अभिमुखीकरण (Cognitive Orientation): इसके अंतर्गत राजनीतिक व्यवस्था, उसके अंगों, नेताओं और प्रक्रियाओं के संबंध में नागरिकों का यथार्थ ज्ञान, जानकारी और बौद्धिक समझ आती है।
  2. भावात्मक अभिमुखीकरण (Affective Orientation): इसके अंतर्गत नागरिकों की राजनीतिक व्यवस्था, उसके प्रतीकों (जैसे राष्ट्रध्वज, संविधान), नीतियों और नेतृत्व के प्रति भावनात्मक लगाव, अस्वीकृति, निष्ठा या अलगाव की भावनाएं सम्मिलित होती हैं।
  3. मूल्यांकनात्मक अभिमुखीकरण (Evaluative Orientation): इसके अंतर्गत नागरिक नैतिक मानदंडों, व्यक्तिगत मूल्यों और अपेक्षाओं के आधार पर राजनीतिक व्यवस्था के कार्यों और निर्णयों का मूल्यांकन करते हैं।

राजनीतिक संस्कृति के तीन स्तर (Mapping the Three Levels of Political Culture)

आमण्ड और पावेल (Almond & Powell) के अनुसार राजनीतिक संस्कृति का मानचित्रण तीन स्तरों पर किया जाता है:

व्यवस्था स्तर (System Level)

  • इसमें नागरिक राजनीतिक व्यवस्था की समग्र वैधता (legitimacy) और राष्ट्रीय पहचान के प्रति निष्ठा रखते हैं।
  • इसमें यह देखा जाता है कि नागरिक व्यवस्था को कितना स्वीकार्य और स्थिर मानते हैं।

प्रक्रिया स्तर (Process Level)

  • इसमें राजनीतिक प्रक्रिया में नागरिकों की सहभागिता, निर्णय-निर्माण में उनकी भागीदारी तथा राजनीतिक दलों और चुनाव प्रणाली के प्रति उनकी अपेक्षाएं सम्मिलित होती हैं।

नीति स्तर (Policy Level)

  • इसमें सरकार द्वारा बनाई जाने वाली नीतियों, सार्वजनिक सेवाओं, कल्याणकारी योजनाओं और कानून-व्यवस्था के परिणामों के प्रति जनता की अपेक्षाएं और मूल्यांकन शामिल होते हैं।

राजनीतिक संस्कृति के प्रकार (Typology of Political Culture – Almond & Verba)

आमण्ड और वर्बा ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक द सिविक कल्चर (The Civic Culture) में राजनीतिक व्यवस्था के निवेश (Inputs), निर्गत (Outputs) और स्व-भूमिका (Self as Actor) के प्रति नागरिकों की जागरूकता के आधार पर तीन शुद्ध प्रकार बताए हैं:

  1. संकीर्ण या संकुचित राजनीतिक संस्कृति (Parochial Political Culture):
  • इस संस्कृति में नागरिकों को केंद्रीय राजनीतिक व्यवस्था, उसकी प्रक्रियाओं और नीतियों के प्रति न तो विशेष जानकारी होती है और न ही कोई रुचि।
  • यहाँ व्यक्तिगत राजनीतिक भूमिका की कोई चेतना नहीं होती; लोग कबीलाई, स्थानीय या धार्मिक सीमाओं तक ही सीमित रहते हैं।
  • यह व्यवस्था पारंपरिक समाजों में देखने को मिलती है।

  1. अधीनस्थ या प्रजाभावी राजनीतिक संस्कृति (Subject Political Culture):
  • इस संस्कृति में नागरिक केंद्रीय सरकार के अस्तित्व और उसके निर्णयों (निर्गत/Outputs) से भली-भांति परिचित होते हैं।
  • नागरिक कानूनों का पालन करते हैं, लेकिन निर्णय-निर्माण प्रक्रिया या निवेश (Inputs) में उनकी सक्रिय सहभागिता नगण्य होती है।
  • यह प्रायः अधिनायकवादी या सख्त औपनिवेशिक व्यवस्थाओं में पाई जाती है।
  1. सहभागी राजनीतिक संस्कृति (Participant Political Culture):
  • इस संस्कृति में नागरिक व्यवस्था के निवेश (मांगों को प्रस्तुत करना) और निर्गत (नीति कार्यान्वयन) दोनों स्तरों पर सक्रिय रूप से जागरूक और सहभागी होते हैं।
  • नागरिक अपनी राजनीतिक भूमिका और अधिकारों के प्रति सचेत होते हैं तथा शासन को उत्तरदायी बनाने का प्रयास करते हैं।
  • यह परिपक्व लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का प्रमुख लक्षण है।

नागरिक संस्कृति की अवधारणा (Concept of The Civic Culture)

  • आमण्ड और वर्बा के अनुसार वास्तविक दुनिया में कोई भी समाज पूरी तरह से किसी एक शुद्ध प्रकार की राजनीतिक संस्कृति का प्रतिनिधित्व नहीं करता; बल्कि समाजों में मिश्रित संस्कृतियाँ पाई जाती हैं।
  • नागरिक संस्कृति (Civic Culture): यह सहभागी (Participant) राजनीतिक संस्कृति और पारंपरिक/अधीनस्थ (Subject & Parochial) संस्कृति का एक संतुलित एवं समकालिक मिश्रण है।
  • एक सफल और स्थिर लोकतंत्र के लिए नागरिक संस्कृति को अत्यंत उपयुक्त माना गया है, क्योंकि इसमें नागरिकों की सक्रिय सहभागिता व्यवस्था को गतिशील बनाती है, जबकि पारंपरिक निष्ठा और सत्ता के प्रति आज्ञाकारिता राजनीतिक व्यवस्था को स्थिरता (stability) प्रदान करती है।

राजनीतिक संस्कृति के निर्माणक/निर्धारक तत्व (Determinants of Political Culture)

राजनीतिक संस्कृति के निर्माण और विकास में निम्नलिखित घटक मुख्य भूमिका निभाते हैं:

  1. ऐतिहासिक निरंतरता एवं विरासत: किसी देश की ऐतिहासिक घटनाएं, क्रांतियां, स्वतंत्रता संघर्ष और निरंतरता उस देश की राजनीतिक संस्कृति की नींव तैयार करती हैं।
  2. भौगोलिक एवं पर्यावरणीय कारक: देश की भौगोलिक स्थिति, क्षेत्रफल, संसाधन और सामरिक परिवेश नागरिकों के दृष्टिकोण को दिशा देते हैं।
  3. सामाजिक–आर्थिक संरचना: सामाजिक स्तरीकरण, वर्ग संरचना, साक्षरता, शहरीकरण और आर्थिक विकास का स्तर राजनीतिक प्राथमिकताओं को तय करते हैं।
  4. धार्मिक एवं दार्शनिक मूल्य: समाज में प्रचलित धार्मिक मान्यताएं और दार्शनिक परंपराएं राजनीतिक आचरण और सत्ता की स्वीकार्यता को प्रभावित करती हैं।
  5. राजनीतिक संस्थाओं और नेतृत्व का स्वरूप: संविधान का ढांचा, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और ऐतिहासिक नेतृत्व की शैली राजनीतिक विश्वासों को पुख्ता करते हैं।

राजनीतिक संस्कृति के उप–प्रकार (Sub-cultures)

  • अभिजन बनाम जन संस्कृति (Elite vs. Mass Political Culture): निर्णय-निर्माण से जुड़े शासक वर्ग/अभिजनों की राजनीतिक संस्कृति और दृष्टिकोण सामान्य जनता की संस्कृति से भिन्न हो सकते हैं।
  • एकीकृत बनाम खंडित राजनीतिक संस्कृति (Integrated vs. Fragmented Political Culture):
    • एकीकृत संस्कृति: जहाँ बुनियादी मूल्यों और राजनीतिक नियमों पर पूरे समाज में व्यापक सहमति होती है (जैसे ब्रिटेन)।
    • खंडित संस्कृति: जहाँ समाज विभिन्न जातीय, भाषाई, क्षेत्रीय या धार्मिक पहचानों में गहराई से बंटा होता है और साझा राष्ट्रीय सहमति का अभाव होता है।

आलोचना

  • राजनीतिक संस्कृति का अध्ययन राजनीति विज्ञान को औपचारिक-कानूनी संकीर्णता से बाहर निकालकर समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक यथार्थ से जोड़ता है। यह विकासशील देशों में लोकतंत्र की सफलता या असफलता के कारणों का विश्लेषण करने के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।
    पश्चिमी एवं एंग्लो–अमेरिकन पूर्वाग्रह: आलोचकों का मानना है कि आमण्ड और वर्बा का मॉडल पश्चिमी उदारवादी लोकतंत्र को ही आदर्श मानकर अन्य समाजों का मूल्यांकन करता है।
  • अपेक्षाकृत स्थैतिक दृष्टिकोण: यह अवधारणा कई बार यह स्पष्ट करने में असमर्थ रहती है कि तीव्र सामाजिक परिवर्तनों और क्रांतियों के समय राजनीतिक संस्कृति किस प्रकार बदलती है।
  • मार्क्सवादी दृष्टिकोण: मार्क्सवादी विचारकों के अनुसार राजनीतिक संस्कृति वर्ग संरचना और उत्पादन संबंधों पर आधारित ‘अधिरचना’ (superstructure) का हिस्सा है, जिसे प्रायः सत्तारूढ़ पूंजीपति वर्ग अपने हितों को वैध ठहराने के लिए संचालित करता है।

निषकर्ष

राजनीतिक संस्कृति का अध्ययन तुलनात्मक राजनीति को केवल औपचारिक एवं कानूनी संरचनाओं तक सीमित न रखकर उसे समाज के मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक और व्यावहारिक यथार्थ से जोड़ता है। गैब्रियल आमण्ड और सिडनी वर्बा का ‘नागरिक संस्कृति’ (Civic Culture) संबंधी विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थिरता और सफलता मात्र उत्तम संविधान या सरकारी संस्थाओं पर नहीं, बल्कि नागरिकों की सक्रिय सहभागिता, उनके ज्ञान और व्यवस्था के प्रति उनके विश्वास के संतुलन पर निर्भर करती है। विकासशील देशों के संदर्भ में यह स्पष्ट होता है कि बिना अनुकूल राजनीतिक संस्कृति के मात्र पश्चिमी लोकतांत्रिक संस्थाओं को अपना लेना व्यवस्था में स्थिरता नहीं ला सकता; अतः औपचारिक संस्थाओं और सामाजिक-राजनीतिक मूल्यों के मध्य सामंजस्य होना अनिवार्य है।


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