‘क्या आधुनिक बनने का मतलब पश्चिम जैसा बनना है?’
यह सवाल आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। लंबे समय तक विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था में पश्चिम का प्रभुत्व रहा, इसलिए यह धारणा बन गई कि विकास का केवल एक ही मॉडल है पश्चिमी मॉडल। लेकिन 21वीं सदी में चीन, भारत और अन्य एशियाई देशों के उभार ने इस सोच को चुनौती दी है। इसी संदर्भ में सिंगापुर के प्रसिद्ध विचारक किशोर महबूबानी ‘बहु-सभ्यतागत विश्व’ (Multi-Civilizational World) की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं।
पश्चिम की तीन बड़ी धारणाएँ
महबूबानी के अनुसार पश्चिम ने तीन मूलभूत गलत धारणाएँ विकसित कर ली थीं।
- पहली, यह कि पश्चिमी राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक मॉडल पूरी दुनिया पर समान रूप से लागू किए जा सकते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि प्रत्येक देश का इतिहास, समाज और संस्कृति अलग होती है। इसलिए विकास का कोई एक सार्वभौमिक मॉडल नहीं हो सकता।
- दूसरी, पश्चिम ने अपने दो सौ वर्षों के प्रभुत्व को इतिहास का स्थायी नियम मान लिया। जबकि यदि हम इतिहास के लंबे कालखंड को देखें, तो वर्ष 1 ईस्वी से 1820 तक चीन और भारत विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ रहे। इस दृष्टि से पश्चिम का प्रभुत्व इतिहास का एक अपेक्षाकृत छोटा दौर था।
- तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण भूल यह थी कि आधुनिकीकरण (Modernization) और पश्चिमीकरण (Westernization) को एक ही समझ लिया गया। आज चीन और भारत यह दिखा रहे हैं कि कोई देश अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हुए भी आधुनिक और तकनीकी रूप से उन्नत बन सकता है।
बहु–सभ्यतागत विश्व क्या है?
- बहु-सभ्यतागत विश्व का अर्थ है ऐसी वैश्विक व्यवस्था, जिसमें विभिन्न सभ्यताएँ अपनी-अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान के साथ विकास करें। इसमें किसी एक सभ्यता को श्रेष्ठ या ‘वैश्विक मानक’ नहीं माना जाता।
- इसका मतलब यह नहीं कि पश्चिम का महत्व समाप्त हो गया है, बल्कि यह कि अब पश्चिम दुनिया का एकमात्र संदर्भ बिंदु नहीं है। चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की आवाज़ भी वैश्विक विमर्श में उतनी ही महत्वपूर्ण होती जा रही है।
चीन और भारत क्यों महत्वपूर्ण हैं?
- चीन ने अपनी पाँच वर्षीय योजनाओं, दीर्घकालिक औद्योगिक नीति और मजबूत राज्य व्यवस्था के माध्यम से अभूतपूर्व आर्थिक विकास किया। यह पश्चिमी मुक्त-बाज़ार मॉडल से अलग रास्ता है।
- दूसरी ओर भारत लोकतंत्र, डिजिटल परिवर्तन, स्टार्टअप, अंतरिक्ष कार्यक्रम और अपनी सांस्कृतिक विविधता के साथ विकास कर रहा है। भारत यह दिखा रहा है कि लोकतंत्र, परंपरा और आधुनिक तकनीक साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं।
यानी दोनों देशों ने यह साबित किया कि आधुनिक बनने के लिए अपनी सभ्यता को छोड़ना आवश्यक नहीं है।
संस्कृति भी बदल रही है
वैश्विक शक्ति केवल सैन्य या आर्थिक नहीं होती; सांस्कृतिक प्रभाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
- आज के-पॉप, के-ड्रामा, बॉलीवुड, भारतीय योग, जापानी एनीमे और चीनी सांस्कृतिक उत्पाद पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो रहे हैं। यह संकेत है कि सांस्कृतिक शक्ति अब केवल पश्चिम के पास नहीं है।
- यही कारण है कि आज वैश्वीकरण का अर्थ ‘पश्चिमीकरण’ नहीं, बल्कि ‘विविध संस्कृतियों का वैश्वीकरण’ बनता जा रहा है।
- यही पर सैमुअल हंटिंगटन के प्रसिद्ध सिद्धांत ‘सभ्यताओं का संघर्ष’ (Clash of Civilizations, 1996) का उल्लेख प्रासंगिक हो जाता है। हंटिंगटन का तर्क था कि शीत युद्ध के बाद विश्व राजनीति का मुख्य आधार वैचारिक या आर्थिक प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि विभिन्न सभ्यताओं के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान होगी। उनके अनुसार पश्चिमी, सिनिक (चीनी), इस्लामी, हिंदू और अन्य सभ्यताएँ अपनी-अपनी विशिष्ट पहचान के साथ वैश्विक राजनीति को प्रभावित करेंगी।
- हालाँकि, वर्तमान वैश्विक परिदृश्य हंटिंगटन के सिद्धांत की एक नई व्याख्या प्रस्तुत करता है। आज विभिन्न सभ्यताएँ केवल संघर्ष नहीं कर रहीं, बल्कि अपनी सॉफ्ट पावर (Soft Power) के माध्यम से वैश्विक प्रभाव भी स्थापित कर रही हैं। कोरिया का के-पॉप, भारत का योग और आयुर्वेद, जापान का एनीमे तथा चीन की सांस्कृतिक और आर्थिक पहलें इस बात का प्रमाण हैं कि 21वीं सदी में सभ्यताओं के बीच केवल टकराव नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धा, संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी बढ़ रहा है।
- इसी कारण आज वैश्वीकरण का अर्थ केवल ‘पश्चिमीकरण’ नहीं रह गया है, बल्कि यह ‘विविध सभ्यताओं और संस्कृतियों के वैश्वीकरण’ का रूप ले चुका है। यह परिवर्तन किशोर महबूबानी के ‘बहु-सभ्यतागत विश्व’ (Multi-Civilizational World) के विचार को भी मजबूत करता है, जहाँ कोई एक सभ्यता वैश्विक मानक नहीं होती, बल्कि अनेक सभ्यताएँ समान रूप से विश्व व्यवस्था को आकार देती हैं।
आलोचनात्मक दृष्टिकोण भी आवश्यक
महबूबानी के विचार प्रभावशाली हैं, लेकिन उन्हें अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता।
- आज भी विज्ञान, उच्च शिक्षा, नवाचार, वित्तीय संस्थानों और वैश्विक तकनीकी कंपनियों में पश्चिम का प्रभाव अत्यंत मजबूत है। इसके अलावा लोकतंत्र, मानवाधिकार और विधि के शासन जैसे विचारों के विकास में भी पश्चिम का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
- इसलिए यह कहना उचित होगा कि दुनिया ‘पश्चिम बनाम पूर्व’ की नहीं, बल्कि ‘साझा नेतृत्व’ (Shared Leadership) की ओर बढ़ रही है।
निष्कर्ष
21वीं सदी का सबसे बड़ा परिवर्तन यह है कि अब विश्व व्यवस्था एकध्रुवीय नहीं रही। एशिया का उदय, Global South की बढ़ती भूमिका और विभिन्न सभ्यताओं का पुनर्जागरण यह संकेत देता है कि भविष्य का विश्व बहु-सभ्यतागत होगा।
भारत के लिए यह अवसर भी है और जिम्मेदारी भी। यदि भारत अपनी लोकतांत्रिक परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और आर्थिक क्षमता का संतुलित उपयोग करे, तो वह इस नई विश्व व्यवस्था के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
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