हालिया वैश्विक रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2025 में विश्व स्तर पर आतंकवादी घटनाओं में लगभग 22% तथा आतंकवाद से होने वाली मृत्यु में 28% की कमी दर्ज की गई है। किंतु यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि आतंकवाद समाप्त हो रहा है। वास्तव में आतंकवाद अब अपने स्वरूप, रणनीति और संचालन के तरीके को बदल रहा है। यह पहले की तुलना में अधिक विकेन्द्रित, तकनीक-आधारित और सीमा-पार नेटवर्क पर आधारित हो गया है, जिससे वैश्विक सुरक्षा के सामने नई चुनौतियाँ उत्पन्न हो रही हैं।
आतंकवाद की वर्तमान वैश्विक स्थिति
- वर्तमान समय में अफ्रीका का साहेल (Sahel) क्षेत्र वैश्विक आतंकवाद का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है, जहाँ विश्व की आधे से अधिक आतंकवादी मौतें हुईं। विशेष रूप से बुर्किना फासो अकेले वैश्विक मौतों के लगभग पाँचवें हिस्से के लिए उत्तरदायी रहा।
- दूसरी ओर, इस्लामिक स्टेट (IS) अभी भी विश्व का सबसे घातक आतंकवादी संगठन बना हुआ है और उसकी गतिविधियाँ 22 देशों तक फैल चुकी हैं।
- पश्चिमी देशों में लोन वुल्फ (Lone Wolf) हमलों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो दर्शाता है कि आतंकवाद अब संगठित नेटवर्क से आगे बढ़कर व्यक्तिगत कट्टरपंथ के रूप में भी विकसित हो रहा है।
- भारत की स्थिति भी चिंताजनक बनी हुई है। ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स 2025 में भारत को आतंकवाद से प्रभावित देशों में 14वाँ स्थान प्राप्त हुआ था।
- भारत को पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठनों जैसे लश्कर–ए–तैयबा (LeT) और जैश–ए–मोहम्मद (JeM) से निरंतर खतरा बना हुआ है। साथ ही, वामपंथी उग्रवाद (नक्सलवाद) की घटनाओं में कमी आने के बावजूद छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा जैसे क्षेत्रों में इसकी उपस्थिति अभी भी बनी हुई है।
आतंकवाद के स्वरूप में प्रमुख परिवर्तन
- भौगोलिक रूप से सीमित लेकिन अधिक घातक (Geographical Confinement)
वर्तमान समय में विश्व के लगभग 70% आतंकवाद संबंधी मृत्युएँ केवल पाँच देशों (जैसे पाकिस्तान, बुर्किना फासो, कांगो आदि) में केंद्रित हैं। ये सभी देश लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता, गृहयुद्ध, कमजोर प्रशासन और आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। इससे स्पष्ट होता है कि आतंकवाद अब मुख्यतः उन्हीं क्षेत्रों में पनप रहा है जहाँ राज्य की संस्थाएँ कमजोर हैं और कानून-व्यवस्था प्रभावी नहीं है।
- विकेन्द्रीकृत एवं डिजिटल आतंकवाद (Decentralised Attacks)
आधुनिक आतंकवादी संगठन अब बड़े संगठित हमलों की बजाय छोटे, स्वतंत्र और स्थानीय स्तर पर संचालित हमलों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
- सोशल मीडिया, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग एप तथा ऑनलाइन प्रचार के माध्यम से युवाओं का कट्टरपंथीकरण किया जा रहा है।
- लोन वुल्फ (Lone Wolf) हमले बढ़ रहे हैं, जिनमें कोई व्यक्ति अकेले ही किसी संगठन से प्रत्यक्ष संपर्क के बिना ऑनलाइन विचारधारा से प्रेरित होकर हमला करता है।
- इंटरनेट पर बने Echo Chambers (विचारों के बंद समूह) कट्टरपंथी विचारधारा को और मजबूत करते हैं।
- इसी के साथ White Collar Terrorism जैसे आर्थिक एवं तकनीकी माध्यमों से आतंकवाद को सहायता पहुँचाने के नए रूप भी सामने आए हैं।
- संस्थागत एवं कूटनीतिक विफलता का परिणाम (Product of Institutional Collapse)
विश्व में होने वाली लगभग 99% आतंकवाद संबंधी मौतें उन देशों में होती हैं जो पहले से ही किसी सशस्त्र संघर्ष या गृहयुद्ध में उलझे हुए हैं।
यह दर्शाता है कि जहाँ सरकारें कमजोर होती हैं, प्रशासनिक संस्थाएँ विफल हो जाती हैं तथा राजनीतिक अस्थिरता बनी रहती है, वहाँ आतंकवादी संगठन आसानी से अपनी जड़ें जमा लेते हैं।
- सीमावर्ती क्षेत्रों में आतंकवादी गतिविधियों का विस्तार (Frontier Zone Attacks)
विश्व की लगभग 60% आतंकवादी घटनाएँ अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से 100 किलोमीटर के भीतर घटित होती हैं।
ऐसे क्षेत्रों में;
- सीमाओं की प्रभावी निगरानी कठिन होती है।
- आतंकवादी आसानी से एक देश से दूसरे देश में प्रवेश कर सकते हैं।
- कमजोर सीमा प्रबंधन और कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ उन्हें सुरक्षित ठिकाने उपलब्ध कराती हैं।
- साइबर आतंकवाद (Cyber Terrorism)
डिजिटल युग में आतंकवाद केवल भौतिक हमलों तक सीमित नहीं रहा।
आतंकवादी संगठन अब;
- सरकारी वेबसाइटों पर साइबर हमले,
- बैंकिंग प्रणाली को बाधित करने,
- विद्युत ग्रिड, संचार नेटवर्क एवं अन्य महत्वपूर्ण अवसंरचनाओं को निशाना बनाने,
- संवेदनशील सूचनाओं की चोरी,
- दुष्प्रचार (Disinformation) फैलाने
जैसी गतिविधियों के माध्यम से राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती दे रहे हैं।
आधुनिक आतंकवाद पर नियंत्रण की प्रमुख चुनौतियाँ
- वैश्विक संघर्षों का विस्तार (Global Conflicts)
पश्चिम एशिया सहित अनेक क्षेत्रों में चल रहे युद्धों के कारण;
- बड़े पैमाने पर विस्थापन,
- प्रशासनिक संस्थाओं का पतन,
- आर्थिक संकट,
- सामाजिक अस्थिरता
उत्पन्न हुई है, जिससे आतंकवादी संगठनों को नए सदस्य भर्ती करने का अवसर मिलता है।
- आतंकवादी संगठनों की अनुकूलन क्षमता (Adaptive Nature)
आधुनिक आतंकवादी संगठन परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को तेजी से बदल लेते हैं।
- छोटे-छोटे समूहों में विभाजित हो जाते हैं,
- स्थानीय असंतोष का लाभ उठाते हैं,
- नई तकनीकों का उपयोग करते हैं,
- वित्तीय स्रोतों में विविधता लाते हैं,
जिससे उनका पता लगाना और उन्हें समाप्त करना अधिक कठिन हो जाता है।
- सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन
- आतंकवाद रोकने के लिए सरकारें व्यापक निगरानी (Mass Surveillance), डिजिटल डेटा संग्रह, सोशल मीडिया मॉनिटरिंग, आतंकवाद विरोधी कानून का प्रयोग करती हैं।
- किन्तु इससे नागरिकों की गोपनीयता (Privacy), अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा मानवाधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती है।
- आतंकवाद के नए स्वरूपों से निपटने में नीतिगत कमी
वर्तमान आतंकवाद अब केवल पारंपरिक हथियारों तक सीमित नहीं है।
नई चुनौतियाँ हैं;
- जैव आतंकवाद (Bioterrorism)
- साइबर आतंकवाद
- ड्रोन आधारित हमले
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का दुरुपयोग
- क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से आतंकवाद का वित्तपोषण
वर्तमान आतंकवाद-रोधी नीतियाँ इन उभरते खतरों का प्रभावी ढंग से सामना करने के लिए अभी पूरी तरह सक्षम नहीं हैं।
वैश्विक आतंकवाद–रोधी प्रयासों की प्रमुख कमियाँ
आज वैश्विक स्तर पर आतंकवाद के विरुद्ध एक समान दृष्टिकोण का अभाव दिखाई देता है।
- 9/11 के बाद विकसित “जीरो टॉलरेंस” की नीति अब कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है।
- विभिन्न देश अपने राजनीतिक एवं सामरिक हितों के अनुसार आतंकवाद की अलग-अलग व्याख्या करते हैं।
- चीन द्वारा संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रस्तावों को कई बार अवरुद्ध करना इस समस्या का उदाहरण है।
- अफ्रीका और एशिया में बढ़ते आतंकवाद को अपेक्षित वैश्विक प्राथमिकता नहीं मिल रही है।
भारत की आतंकवाद–रोधी रणनीति
भारत ने आतंकवाद से निपटने के लिए बहुआयामी रणनीति अपनाई है।
- सुदृढ़ सुरक्षा तंत्र: मल्टी एजेंसी सेंटर (MAC), राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA), राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) तथा विभिन्न राज्यों के आतंकवाद निरोधक दस्तों (ATS) के माध्यम से खुफिया समन्वय और त्वरित कार्रवाई को मजबूत किया गया है।
- आधुनिक तकनीक का उपयोग: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), ड्रोन, चेहरे की पहचान (Facial Recognition) तथा Comprehensive Integrated Border Management System (CIBMS) जैसी तकनीकों का उपयोग सीमा सुरक्षा एवं डिजिटल निगरानी के लिए किया जा रहा है।
- कानूनी ढाँचे को मजबूत बनाना: गैरकानूनी गतिविधियाँ (निवारण) अधिनियम (UAPA) तथा राष्ट्रीय जाँच एजेंसी अधिनियम (NIA Act) के माध्यम से आतंकवाद के विरुद्ध प्रभावी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की गई है।
- कूटनीतिक दबाव: भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) तथा FATF जैसे मंचों पर आतंकवाद के प्रायोजक देशों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने का प्रयास करता रहा है। पाकिस्तान को FATF की ग्रे-लिस्ट में शामिल किया जाना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही।
आगे की राह (Way Forward)
आतंकवाद जैसी वैश्विक चुनौती से निपटने के लिए केवल सैन्य कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग, प्रभावी कूटनीति, आधुनिक तकनीक और राजनीतिक इच्छाशक्ति का समन्वय आवश्यक है।
- Comprehensive Convention on International Terrorism (CCIT) को शीघ्र अपनाकर आतंकवाद की सार्वभौमिक परिभाषा सुनिश्चित की जानी चाहिए।
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार कर भारत तथा वैश्विक दक्षिण (Global South) के देशों को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए।
- रियल–टाइम इंटेलिजेंस शेयरिंग को संस्थागत रूप दिया जाए।
- सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आतंकवादी प्रचार को रोकने हेतु वैश्विक नियामक व्यवस्था विकसित की जाए।
- SAARC और BIMSTEC जैसे क्षेत्रीय मंचों के आतंकवाद-रोधी तंत्र को अधिक प्रभावी बनाया जाए।
निष्कर्ष
आतंकवाद आज केवल किसी एक देश की सुरक्षा का प्रश्न नहीं, बल्कि वैश्विक शांति, मानवाधिकार और सतत विकास के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। जब तक अंतरराष्ट्रीय समुदाय राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर “शून्य सहिष्णुता (Zero Tolerance)” की समान नीति नहीं अपनाता, तब तक आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष अधूरा रहेगा। भारत का अनुभव यह दर्शाता है कि आतंकवाद का प्रभावी मुकाबला केवल मजबूत आंतरिक सुरक्षा, उन्नत प्रौद्योगिकी, सुदृढ़ कूटनीति और व्यापक वैश्विक सहयोग के माध्यम से ही संभव है।
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