भारत और चीन एशिया की दो प्रमुख शक्तियाँ हैं। दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग, सीमा विवाद, क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा, बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग तथा वैश्विक शक्ति-संतुलन जैसे अनेक आयाम जुड़े हुए हैं। हाल के वर्षों में गलवान संघर्ष (2020) के बाद संबंधों में गंभीर तनाव आया, लेकिन 2024 के बाद दोनों देशों ने धीरे-धीरे संवाद और स्थिरीकरण की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।
सितंबर 2026 में नई दिल्ली में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात ने भारत–चीन संबंधों में पुनः सक्रिय कूटनीतिक संपर्क को सामने रखा।
भारत सरकार के अनुसार, दोनों नेताओं ने संबंधों को दीर्घकालिक एवं रणनीतिक दृष्टिकोण से देखने, सीमा क्षेत्रों में शांति बनाए रखने तथा मतभेदों को विवाद में परिवर्तित न होने देने पर जोर दिया।
लेकिन इसे तत्काल “India-China Reset” कहना जल्दबाजी होगी। हालिया घटनाक्रम को अधिक उचित रूप से “Active Re-engagement” अर्थात सक्रिय पुनः–संलग्नता कहा जा सकता है। यही इस पूरे विषय का केंद्रीय विचार है।

भारत चीन संबंधों का विकास
- ध्यातव्य है कि हज़ारों वर्षों तक तिब्बत ने एक ऐसे क्षेत्र के रूप में काम किया जिसने भारत और चीन को भौगोलिक रूप से अलग और शांत रखा, परंतु जब वर्ष 1950 में चीन ने तिब्बत पर आक्रमण कर वहाँ कब्ज़ा कर लिया तब भारत और चीन आपस में सीमा साझा करने लगे और पड़ोसी देश बन गए।
- 20वीं सदी के मध्य तक भारत और चीन के बीच संबंध न्यूनतम थे एवं कुछ व्यापारियों, तीर्थयात्रियों और विद्वानों के आवागमन तक ही सीमित थे।
- दोनों देशों के मध्य व्यापक तौर पर बातचीत की शुरुआत भारत की स्वतंत्रता (1947) और चीन की कम्युनिस्ट क्रांति (1949) के बाद हुई।
- भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू एक स्वतंत्र तिब्बत के पक्ष में थे, नेहरू जी के इस विचार ने शुरुआती दौर में भारत और चीन के संबंधों को कमज़ोर करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- उल्लेखनीय है कि भारत और तिब्बत के मध्य आध्यात्मिक संबंध चीन के लिये चिंता का विषय था।
- वर्ष 1954 में नेहरू और झोउ एनलाई ने “हिंदी-चीनी-भाई-भाई” के नारे के साथ पंचशील संधि पर हस्ताक्षर किये, ताकि क्षेत्र में शांति स्थापित करने के लिये कार्ययोजना तैयार की जा सके।
- वर्ष 1959 में तिब्बती लोगों के आध्यात्मिक और लौकिक प्रमुख दलाई लामा तथा उनके साथ अन्य कई तिब्बती शरणार्थी हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में बस गए। इसके पश्चात् चीन ने भारत पर तिब्बत और पूरे हिमालयी क्षेत्र में विस्तारवाद और साम्राज्यवाद के प्रसार का आरोप लगा दिया।
- चीन ने भारत के मानचित्र में प्रदर्शित 104,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र पर दावा प्रस्तुत किया और दोनों देश के मध्य अंतर्राष्ट्रीय सीमा के संशोधन की मांग की।
- वर्ष 1962 में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने लद्दाख और तत्कालीन नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी में मैकमोहन रेखा के पार भारत पर आक्रमण कर दिया, जिसके बाद दोनों देश के मध्य युद्ध शुरू हो गया एवं संबंध और अधिक खराब स्थिति में पहुँच गए।
- वर्ष 1988 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी की ऐतिहासिक यात्रा ने दोनों देशों के मध्य द्विपक्षीय संबंधों में सुधार के एक नए चरण की शुरुआत की और जिसके माध्यम से भारत और चीन के संबंध पुनः सामान्य होने लगे।
- भारत–चीन संबंधों में वर्तमान परिवर्तन
भारत और चीन के शीर्ष नेतृत्व के बीच पिछले कुछ वर्षों में संवाद की निरंतरता बढ़ी है। कज़ान (2024), तियानजिन (2025) और नई दिल्ली (2026) में हुई उच्च-स्तरीय बैठकों ने संबंधों को पूरी तरह टकराव की स्थिति में जाने से रोकने तथा संवाद को बनाए रखने में भूमिका निभाई है।
सितंबर 2026 की बैठक में दोनों पक्षों ने सीमा, व्यापार, आपूर्ति शृंखला, लोगों के बीच संपर्क और वैश्विक मुद्दों पर सहयोग की आवश्यकता स्वीकार की।
हालाँकि, संवाद बढ़ना और संबंधों का सामान्य होना एक ही बात नहीं है।
यही कारण है कि वर्तमान स्थिति को तनाव, संवाद, स्थिरीकरण, क्रमिक सामान्यीकरण की प्रक्रिया के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
- “Reset” की बजाय “Active Re-engagement” क्यों?
“Reset” का अर्थ सामान्यतः संबंधों में व्यापक एवं निर्णायक सुधार से लिया जाता है। लेकिन भारत–चीन संबंधों में अभी कई संरचनात्मक समस्याएँ मौजूद हैं।
प्रमुख कारण:
- सीमा विवाद अभी पूरी तरह हल नहीं हुआ है।
- LAC पर सैन्य तैनाती और विश्वास की समस्या बनी हुई है।
- व्यापार में भारत का संरचनात्मक घाटा है।
- बाजार तक पहुँच से संबंधित समस्याएँ हैं।
- चीन की नीतियों को लेकर भारत की सामरिक चिंताएँ बनी हुई हैं।
- अरुणाचल प्रदेश और सीमा-स्थिति से जुड़े मुद्दे संवेदनशील हैं।
- ब्रह्मपुत्र जैसी सीमा-पार नदियों से संबंधित चिंताएँ मौजूद हैं।
- हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दोनों देशों की रणनीतिक प्राथमिकताएँ पूरी तरह समान नहीं हैं।
इसलिए वर्तमान स्थिति को “संबंधों में सक्रिय पुनः–संलग्नता” कहा जा सकता है, न कि पूर्ण “रीसेट”।
- सीमा विवाद: भारत–चीन संबंधों की मूल चुनौती
- भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि सीमा पर शांति और स्थिरता द्विपक्षीय संबंधों की आधारशिला है।
- 2020 के गलवान संघर्ष ने दोनों देशों के बीच विश्वास को गंभीर रूप से प्रभावित किया। इसके बाद सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर कई दौर की वार्ताएँ हुईं।
- सितंबर 2026 में मोदी–शी बैठक में भारत ने भी इस बात पर जोर दिया कि सीमा क्षेत्रों में शांति एवं स्थिरता द्विपक्षीय संबंधों के निरंतर विकास के लिए आवश्यक है।

2026 में महत्वपूर्ण प्रगति
अगस्त 2026 में भारत और चीन के विशेष प्रतिनिधियों की 25वीं बैठक में सीमा प्रश्न पर आठ–बिंदु सहमति सामने आई। इसमें सीमा क्षेत्रों में शांति बनाए रखने, सीमा प्रश्न के समाधान के लिए वार्ता को आगे बढ़ाने और गलतफहमी/गलत आकलन को रोकने के लिए अतिरिक्त संचार व्यवस्थाओं पर जोर दिया गया।
Disengagement ≠ De-escalation ≠ Normalisation
- Disengagement – सैनिकों को टकराव वाले स्थानों से पीछे हटाना।
- De-escalation – सैन्य तनाव और तैनाती में व्यापक कमी।
- Normalisation – संबंधों का व्यापक स्तर पर सामान्य होना।
इसलिए किसी एक क्षेत्र में सैनिकों का पीछे हटना अपने आप में भारत–चीन संबंधों के पूर्ण सामान्यीकरण का प्रमाण नहीं है।
- चीन और भारत को “Asian Peers” के रूप में देखना
लेख का केंद्रीय तर्क यह है कि एशिया में स्थिरता के लिए चीन को भारत को केवल एक पड़ोसी या कनिष्ठ शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र और समान स्तर की एशियाई शक्ति (Asian Peer) के रूप में देखना होगा।
भारत आज;
- विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है,
- एक महत्वपूर्ण सैन्य शक्ति है,
- हिंद महासागर क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका रखता है,
- BRICS, SCO, G20 और Quad जैसे विभिन्न मंचों में सक्रिय है,
- Global South की राजनीति में महत्वपूर्ण आवाज रखता है।
इसलिए एशिया में चीन-केंद्रित शक्ति-संरचना की बजाय बहुध्रुवीय एशियाई व्यवस्था भारत के लिए महत्वपूर्ण है।
भारत की विदेश नीति का मूल तत्व यहाँ Strategic Autonomy + Multi-alignment के रूप में दिखाई देता है।
- आर्थिक संबंध: सहयोग भी और चुनौती भी
भारत और चीन के बीच व्यापार में काफी वृद्धि हुई है। लेकिन व्यापार की मात्रा बढ़ने के साथ भारत का व्यापार घाटा भी एक महत्वपूर्ण चिंता बना हुआ है।
सितंबर 2026 की मोदी–शी बैठक में दोनों पक्षों ने स्वयं structural trade imbalance, supply-chain issues और predictable market access की आवश्यकता को स्वीकार किया।
भारत की प्रमुख चिंताएँ
- चीन से आयात में अत्यधिक निर्भरता।
- भारतीय उत्पादों के लिए चीनी बाजार में सीमित पहुँच।
- Critical supply chains में निर्भरता।
- कुछ महत्वपूर्ण औद्योगिक inputs और तकनीकी उत्पादों की आपूर्ति।
- निर्यात नियंत्रण और व्यापार संबंधी प्रतिबंध।
इसलिए भारत के लिए लक्ष्य केवल “अधिक व्यापार” नहीं होना चाहिए, बल्कि—
Balanced, predictable and resilient trade
होना चाहिए।
- Supply Chain Security का महत्व
COVID-19, रूस–यूक्रेन युद्ध और विभिन्न भू-राजनीतिक तनावों ने यह दिखाया है कि अत्यधिक किसी एक देश पर निर्भरता आर्थिक सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है।
भारत इसलिए;
- घरेलू विनिर्माण,
- Critical Minerals,
- Semiconductor ecosystem,
- Electronics,
- Pharmaceuticals,
- Renewable-energy components,
- Diversified supply chains पर जोर दे रहा है।
यहाँ Atmanirbhar Bharat का अर्थ पूर्ण आर्थिक अलगाव नहीं, बल्कि strategic resilience के निर्माण से जोड़ा जा सकता है।

भारत–चीन और BRICS
2026 का BRICS Summit भारत–चीन संबंधों के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आए और दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों के साथ-साथ बहुपक्षीय सहयोग पर भी चर्चा की। BRICS भारत और चीन के बीच cooperation तथा competition दोनों का मंच है।
भारत के लिए BRICS का महत्व
- Global South की आवाज को मजबूत करना।
- वैश्विक संस्थाओं में सुधार।
- बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को बढ़ावा देना।
- विकासशील देशों के हितों की रक्षा।
- आर्थिक एवं वित्तीय सहयोग।
लेकिन भारत BRICS को किसी एक देश या पश्चिम-विरोधी समूह के रूप में नहीं देखता। भारत की विदेश नीति में BRICS के साथ Quad, SCO, G20 तथा अन्य साझेदारियाँ समानांतर रूप से चलती हैं।
इससे भारत की multi-alignment strategy स्पष्ट होती है।
- सीमा–पार नदियाँ: उभरती हुई चुनौती
भारत और चीन के बीच एक महत्वपूर्ण लेकिन अपेक्षाकृत कम चर्चा वाला विषय Transboundary Rivers है।
विशेष रूप से यारलुंग त्सांगपो, सियांग, ब्रह्मपुत्र तिब्बत में ब्रह्मपुत्र को Yarlung Tsangpo कहा जाता है। यह भारत में अरुणाचल प्रदेश से प्रवेश करती है और आगे ब्रह्मपुत्र के रूप में बहती है।
चीन द्वारा ऊपरी क्षेत्रों में बाँध एवं जलविद्युत परियोजनाओं का विकास भारत के लिए चिंता का विषय है।
भारत की चिंताएँ
- Strategic और Security Dimension
- भारत–चीन संबंध केवल द्विपक्षीय सीमा या व्यापार तक सीमित नहीं हैं।
- यह व्यापक रूप से Himalayas, Indian Ocean, Indo-Pacific, Technology, Supply Chains, Global Governance से जुड़ा हुआ है।
- भारत की चिंता यह भी है कि चीन हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी रणनीतिक उपस्थिति बढ़ा रहा है, जबकि भारत SAGAR, Quad और Indo-Pacific जैसे ढाँचों के माध्यम से क्षेत्रीय स्थिरता और समुद्री सुरक्षा पर जोर देता है।
- इसलिए दोनों देशों के बीच सहयोग के साथ-साथ strategic competition भी बनी रहेगी।

निष्कर्ष
भारत–चीन संबंधों का वर्तमान चरण न तो पूर्ण टकराव का है और न ही पूर्ण सामान्यीकरण का। यह “Active Re-engagement” का चरण है।
सितंबर 2026 की मोदी–शी वार्ता में दोनों पक्षों ने रणनीतिक एवं दीर्घकालिक दृष्टिकोण, सीमा पर शांति, आर्थिक संबंधों और वैश्विक मुद्दों पर सहयोग की आवश्यकता को रेखांकित किया।
लेकिन सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन, रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, आपूर्ति-शृंखला निर्भरता और जल-सुरक्षा जैसी समस्याएँ अभी भी मौजूद हैं। इसलिए भारत–चीन संबंधों का भविष्य केवल summit diplomacy से नहीं, बल्कि जमीन पर विश्वास–निर्माण, सीमा स्थिरीकरण, संतुलित आर्थिक संबंध और पारस्परिक सम्मान से निर्धारित होगा।
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