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भारत-पाकिस्तान नौसैनिक टकराव: समुद्री सुरक्षा, द्विपक्षीय समझौते

समुद्र की लहरों पर जब दो परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसियों के युद्धपोत आमने-सामने आ जाएँ, तो एक छोटी चूक भी बड़े संकट का रूप ले सकती है। 15 सितंबर 2026 को उत्तरी अरब सागर में ऐसा ही हुआ। पाकिस्तानी नौसेना का पोत PNS हुनैन भारतीय युद्धपोत INS कोलकाता से जा टकराया। यह घटना ओमान के तट से लगभग 220 किलोमीटर पूर्व में हुई। भारत का आरोप है कि पाकिस्तानी पोत ने तेज गति से खतरनाक ढंग से आगे निकलने का प्रयास किया, जबकि पाकिस्तान इस आरोप को सिरे से नकारता है। नौसैनिक पोतों की टक्कर अत्यंत दुर्लभ मानी जाती है और मई 2025 के चार दिवसीय सैन्य संघर्ष के बाद दोनों देशों के बीच तनाव के खुलकर सामने आने का यह पहला अवसर है।

घटना का सार

  • 15 सितंबर को उत्तरी अरब सागर में PNS हुनैन और INS कोलकाता के बीच टक्कर हुई।
  • भारत के अनुसार पाकिस्तानी पोत ने ऊँची गति से खतरनाक ओवरटेकिंग की।
  • भारत ने पाकिस्तान के प्रभारी राजदूत (चार्ज द अफेयर्स) को तलब किया और 1991 के समझौते के अनुच्छेद 10 के उल्लंघन का हवाला दिया।
  • INS कोलकाता को कोई बड़ी क्षति नहीं हुई और वह समुद्र में तैनात है।
  • PNS हुनैन को नुकसान पहुँचा और वह बंदरगाह लौट गया।
  • पाकिस्तान ने भारत के सभी आरोप अस्वीकार कर दिए।

टकराव में शामिल दोनों पोत

दोनों पोत अलग-अलग श्रेणी के हैं, इसलिए उनकी प्रकृति समझना आवश्यक है।

INS कोलकाता

  • यह भारतीय नौसेना की प्रोजेक्ट 15A के अंतर्गत बनी कोलकाता श्रेणी के निर्देशित प्रक्षेपास्त्र विध्वंसक पोतों (गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर) का अग्रणी पोत है।
  • इसका निर्माण मुंबई के मझगाँव डॉक शिपबिल्डर्स ने किया है। इसकी लंबाई 164 मीटर, पूर्ण भार पर विस्थापन लगभग 7,400 टन और अधिकतम गति 30 नॉट है।
  • अगस्त 2014 में इसे नौसेना में सम्मिलित किया गया।
  • इसकी रचना मुख्यतः उच्च क्षमता वाले सतह युद्धपोत के रूप में हुई है।
  • इसमें लंबी दूरी की वायु रक्षा, सतह-विरोधी और पनडुब्बी-रोधी क्षमताएँ हैं।
  • यह हेलीकॉप्टर संचालित कर सकता है और इसका प्रमुख सतह-आक्रामक अस्त्र ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है।

PNS हुनैन (F-273)

  • यह एक अपतटीय गश्ती पोत (ऑफशोर पेट्रोल वेसल) है, जिसे रोमानिया की डेमेन शिपयार्ड्स ने बनाया और जुलाई 2024 में पाकिस्तानी नौसेना को सौंपा गया।
  • यह OPV 2600 डिजाइन पर आधारित यारमुक श्रेणी के गश्ती पोतों की अगली कड़ी का पहला पोत है।
  • इसकी लंबाई लगभग 98 मीटर, विस्थापन करीब 2,600 टन और गति लगभग 24 नॉट है। इसका कार्य समुद्री निगरानी, गश्त और सुरक्षा है।
  • पाकिस्तान इसे इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, पोत-रोधी और वायु-रोधी क्षमताओं से लैस बहुउद्देशीय मंच बताता है, जिसमें आत्मरक्षा प्रणालियाँ हैं और बहुभूमिका हेलीकॉप्टर भी उतारा जा सकता है।
  • आकार का अंतर स्पष्ट है। भारतीय विध्वंसक का भार पाकिस्तानी पोत से लगभग तीन गुना है। टक्कर में हल्के पोत को अधिक क्षति होना स्वाभाविक है।

भारत का पक्ष

भारतीय विवरण के अनुसार INS कोलकाता नियमित निगरानी अभियान पर था, तभी PNS हुनैन ऊँची गति से उसके निकट आया और खतरनाक ढंग से समीप पहुँच गया। 18 सितंबर को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया कि भारत ने पाकिस्तान के जवाब की समीक्षा की है और उसके आरोपों को खारिज किया है। उनके अनुसार पाकिस्तानी पोत की “खतरनाक ओवरटेकिंग” ही टक्कर का कारण बनी।

भारत के दो प्रमुख तर्क हैं:

  1. पाकिस्तानी पोत की गतिविधि 1991 के द्विपक्षीय समझौते का उल्लंघन थी।
  2. यह समुद्र में टकराव की रोकथाम के अंतरराष्ट्रीय नियमों (COLREG) का भी उल्लंघन थी।

कुछ भारतीय रक्षा सूत्रों ने अधिक विस्तृत ब्योरा दिया। उनके अनुसार INS कोलकाता खाड़ी ओमान से आ रहे जहाजों को सुरक्षा घेरा दे रहा था। ये सूत्र-आधारित दावे हैं और आधिकारिक वक्तव्य से अलग हैं।

पाकिस्तान का पक्ष

पाकिस्तान ने भारतीय आरोपों को नकारते हुए अलग कथा प्रस्तुत की। उसका आरोप है कि टक्कर के समय भारतीय युद्धपोत ने उकसाने वाली चाल चली। पाकिस्तानी पक्ष के अनुसार भारतीय पोत ने PNS हुनैन के अत्यंत निकट आक्रामक गतिविधियाँ कीं, जबकि हुनैन अपने विशेष आर्थिक क्षेत्र में द्विवार्षिक अभ्यास “सी स्पार्क-26” में भाग ले रहा था। पाकिस्तानी सूत्रों का यह भी दावा है कि भारतीय पोत 7 सितंबर से अभ्यास क्षेत्र में प्रवेश का प्रयास कर रहा था।

टकराव से ठीक पहले की गतिविधियों का सटीक क्रम अब तक विवादित है और किसी स्वतंत्र स्रोत से प्रमाणित नहीं हुआ है। यही इस प्रकरण की सबसे बड़ी अनिश्चितता है।

1991 के समझौते का अनुच्छेद 10

समझौते का परिचय

6 अप्रैल 1991 को नई दिल्ली में भारत और पाकिस्तान के बीच “सैन्य अभ्यास, गतिविधियों और सैनिक आवागमन की अग्रिम सूचना” संबंधी समझौता हुआ। इसका उद्देश्य दूसरे पक्ष की मंशा को गलत समझने से उपजने वाले संकट को टालना था। यह विश्वास बहाली उपायों (कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेजर्स) की उसी श्रृंखला का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य दोनों देशों के बीच गलतफहमी से पैदा होने वाले जोखिम को घटाना है।

अनुच्छेद 10 क्या कहता है?

अनुच्छेद 10 समुद्री सुरक्षा का विशिष्ट प्रावधान करता है। इसके अनुसार अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में संचालन करते समय दोनों देशों के युद्धपोत और पनडुब्बियाँ एक-दूसरे के तीन नॉटिकल मील (लगभग 5.6 किलोमीटर) के भीतर नहीं जाएँगी, ताकि कोई दुर्घटना न हो।

समझौते के अन्य प्रावधान

  • बड़े सैन्य अभ्यास एक-दूसरे के निकट न करने का प्रावधान है।
  • छह या अधिक विध्वंसक या फ्रिगेट श्रेणी के पोतों के ऐसे बड़े नौसैनिक अभ्यास, जो दूसरे के विशेष आर्थिक क्षेत्र में प्रवेश करें, की पूर्व सूचना 30 दिन पहले राजनयिक माध्यम से देनी होती है।
  • लड़ाकू विमान एक-दूसरे के हवाई क्षेत्र से 10 किलोमीटर के भीतर नहीं उड़ेंगे।

सीमाएँ

यह प्रावधान एक द्विपक्षीय दायित्व है। यह सभी देशों के युद्धपोतों पर लागू होने वाला सार्वभौमिक अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियम नहीं है। साथ ही यह समझौता विवाद निपटारे या दंड की कोई कठोर व्यवस्था नहीं देता, जिससे इसकी प्रभावशीलता राजनीतिक इच्छाशक्ति पर टिकी रहती है।

क्या ऐसी घटना पहले भी हुई है?

सितंबर 2026 की घटना दोनों देशों के बीच 1991 के ढाँचे से जुड़ी दूसरी दर्ज नौसैनिक टकराव की घटना है। इससे पहले जून 2011 में अदन की खाड़ी में समुद्री डकैती-रोधी अभियान के दौरान पाकिस्तानी युद्धपोत PNS बाबर भारतीय नौसेना के फ्रिगेट INS गोदावरी के अत्यंत निकट आ गया था। इससे मामूली क्षति हुई और भारत ने नौवहन सुरक्षा नियमों के उल्लंघन का हवाला देते हुए विरोध दर्ज कराया।

तत्कालीन रक्षा मंत्री ने संसद में बताया था कि अपहृत जहाज MV स्वेज के निकट संपर्क साधने के दौरान PNS बाबर तेज गति से पीछे से आया और गोदावरी के हेलीडेक के सुरक्षा जाल को मामूली नुकसान पहुँचाया। दोनों घटनाओं में समानता यह है कि दोनों बार भारत ने नौवहन सुरक्षा के उल्लंघन को आधार बनाया। अंतर यह है कि 2011 में मामला दूर के समुद्री अभियान का था, जबकि इस बार दोनों पोत अपने-अपने हितों के निकट क्षेत्र में आमने-सामने थे और पूर्व में सैन्य संघर्ष की स्मृति भी ताजा है।

अंतरराष्ट्रीय विधि का आयाम

इस प्रकरण में जिन अंतरराष्ट्रीय नियमों का केवल संकेत मिलता है, उन्हें परीक्षा की दृष्टि से खोलना आवश्यक है।

COLREG, 1972

  • समुद्र में टकराव की रोकथाम के लिए अंतरराष्ट्रीय नियम (COLREG) अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) के तत्वावधान में 1972 में अपनाए गए और 1977 से प्रभावी हैं।
  • ये नियम सुरक्षित गति, ओवरटेकिंग के समय रास्ता देने के दायित्व और टकराव टालने के लिए समय रहते कार्रवाई जैसे सिद्धांत तय करते हैं। ये युद्धपोतों पर भी लागू होते हैं।
  • भारत का आरोप इसी आधार पर है कि पाकिस्तानी पोत की ओवरटेकिंग इन नियमों के अनुरूप नहीं थी।

UNCLOS और विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ)

  • संयुक्त राष्ट्र समुद्री विधि अभिसमय (UNCLOS, 1982) के अंतर्गत तट से 200 नॉटिकल मील तक का विशेष आर्थिक क्षेत्र तटीय राज्य के संसाधन-अधिकार के अधीन है, किंतु अन्य देशों को वहाँ नौवहन की स्वतंत्रता प्राप्त है।
  • इस प्रकरण में विशेष आर्थिक क्षेत्र का प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है कि पाकिस्तान का दावा अपने EEZ में चल रहे अभ्यास से जुड़ा है। यहाँ भारत की अपनी घोषित स्थिति ध्यान देने योग्य है।
  • 1995 में UNCLOS की पुष्टि करते समय भारत ने घोषणा की थी कि यह अभिसमय अन्य राज्यों को तटीय राज्य की सहमति के बिना उसके EEZ में हथियारों या विस्फोटकों वाले सैन्य अभ्यास की अनुमति नहीं देता। इसलिए भारत की यह घोषणा पाकिस्तान के पक्ष को भी वैचारिक बल दे सकती है, और यही इस विषय की कूटनीतिक जटिलता है।
  • इस पर अंतरराष्ट्रीय मतभेद भी रहा है, क्योंकि अमेरिका जैसे देश ऐसी पूर्व अनुमति की अपेक्षा को अभिसमय के अनुरूप नहीं मानते।

युद्धपोतों की संप्रभु उन्मुक्ति

अंतरराष्ट्रीय विधि में युद्धपोतों को खुले समुद्र में ध्वज राज्य के अतिरिक्त किसी अन्य राज्य के क्षेत्राधिकार से उन्मुक्ति प्राप्त है। इसका अर्थ है कि टक्कर की जाँच और दायित्व का निर्धारण न्यायालयीन नहीं, मुख्यतः कूटनीतिक मार्ग से होगा।

भारत की प्रतिक्रिया और आगे की राह

भारत ने नई दिल्ली में पाकिस्तान के प्रभारी राजदूत को तलब कर कड़ा विरोध जताया और इस्लामाबाद में अपने प्रभारी राजदूत को निर्देश दिया कि वे पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के समक्ष मामला उठाएँ। दोनों देशों ने एक-दूसरे के शीर्ष राजनयिकों को तलब किया। नई दिल्ली ने पाकिस्तान को परामर्श दिया है कि उसकी सैन्य इकाइयाँ सावधानी बरतें और पुनरावृत्ति रोकने के लिए संबद्ध द्विपक्षीय समझौतों का पालन करें।

भारत का यह भी कहना है कि घटना अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में होने से दोनों नौसेनाएँ नियमों की बाध्यता से मुक्त नहीं हो जातीं। अभी सबसे बड़ा अनुत्तरित प्रश्न यही है कि टक्कर से पूर्व दोनों पोतों की चालें ठीक-ठीक क्या थीं।

संभावित आगे के कदम

  • दोनों नौसेनाओं के बीच सीधे संवाद की व्यवस्था (हॉटलाइन) को सक्रिय करना।
  • समुद्री घटनाओं के लिए अलग प्रोटोकॉल, जैसे शीत युद्धकाल में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच हुए “घटना-रोकथाम समझौते”।
  • 1991 के समझौते की समीक्षा, ताकि तीन नॉटिकल मील की सीमा के उल्लंघन पर स्पष्ट प्रक्रिया बने।

विश्लेषण: इस घटना का महत्व

पहला, यह घटना दर्शाती है कि हिंद महासागर क्षेत्र में भारत और पाकिस्तान की नौसैनिक उपस्थिति बढ़ने से आमना-सामना बढ़ रहा है। दूसरा, सूचना युद्ध का पक्ष भी है, क्योंकि दोनों ओर से क्षति और दोषारोपण के अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं, जिनमें सूत्र-आधारित खबरें और आधिकारिक बयान घुल-मिल जाते हैं। तीसरा, इसने विश्वास बहाली उपायों की सीमा उजागर की है, क्योंकि लिखित समझौता मौजूद होने पर भी वास्तविक समुद्री परिस्थितियों में उसका पालन सुनिश्चित करना कठिन है।

निष्कर्ष

PNS हुनैन और INS कोलकाता की टक्कर में जनहानि नहीं हुई और क्षति सीमित रही, यह राहत की बात है। फिर भी यह प्रकरण चेतावनी है कि परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसियों के बीच समुद्र में भी गलतफहमी की गुंजाइश बहुत कम है। अनुच्छेद 10 जैसे प्रावधान तभी सार्थक हैं जब उनका पालन दोनों पक्ष ईमानदारी से करें और घटना होने पर तथ्यों की पारदर्शी जाँच हो। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अपने हितों की दृढ़ता से रक्षा करते हुए नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था की अपनी वकालत पर भी अडिग रहे।


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