in , , , ,

चुनाव आयोग : नियुक्ति और कार्यप्रणाली पर प्रश्न

एक विस्तृत विश्लेषण

लोकतंत्र में चुनाव का खेल तभी भरोसे लायक बनता है जब निर्णायक (अंपायर) पर सबको यकीन हो। भारत का निर्वाचन आयोग इन दिनों इसी भरोसे की परीक्षा से गुज़र रहा है। इस सप्ताह एक खोजी रिपोर्ट सामने आई कि दस महीनों में कम से कम चौदह मौकों पर दो चुनाव आयुक्तों ने आयोग के फ़ैसलों पर अपनी आपत्तियाँ दर्ज कराईं। आयोग ने सफ़ाई दी कि उसके सभी निर्णय सर्वसम्मत रहे हैं और ये आपत्तियाँ केवल “अवलोकन” थीं, जो विचार-विमर्श की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा होती हैं।

लगभग इसी समय सर्वोच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ ने 2023 के उस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाएँ संविधान पीठ को भेज दीं, जिसके तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति होती है। पीठ के दोनों न्यायाधीशों, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा, में इस पर मतभेद रहा।

ये दोनों घटनाएँ अलग दिखती हैं, पर जड़ एक ही है। पहली का प्रश्न है कि आयोग भीतर से कैसे काम करता है। दूसरी का प्रश्न है कि आयोग के सदस्य चुने कैसे जाते हैं। दोनों को साथ रखकर देखने पर ही तस्वीर पूरी होती है।

संवैधानिक ढाँचा: आयोग की शक्ति का स्रोत

आयोग की शक्तियाँ संविधान के अनुच्छेद 324 से आती हैं। यह अनुच्छेद संसद, राज्य विधानमंडलों तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के चुनावों के लिए मतदाता सूची तैयार करने और चुनाव के संचालन का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण आयोग को सौंपता है।

इसकी मुख्य बातें ये हैं:

  • आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त और उतनी संख्या में अन्य चुनाव आयुक्त होंगे, जितनी राष्ट्रपति समय-समय पर तय करें।
  • इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं, पर यह नियुक्ति संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून के अधीन है।
  • मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया वही है जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की है, जबकि अन्य आयुक्तों को उसकी सिफ़ारिश के बिना हटाया नहीं जा सकता (अनुच्छेद 324(5))।

आरंभ में आयोग एकल सदस्यीय था। 1993 में इसे तीन सदस्यीय बनाया गया, और तभी से पदधारियों के बीच मतभेद की घटनाएँ भी सामने आने लगीं। उस समय के मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन और आयुक्त एम. एस. गिल तथा जी. वी. जी. कृष्णमूर्ति के बीच टकराव इतना बढ़ा कि शेषन ने दो अन्य आयुक्तों की नियुक्ति को ही सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे दी। न्यायालय ने नियुक्ति को वैध ठहराया और 1995 के टी. एन. शेषन बनाम भारत संघ मामले में स्पष्ट किया कि तीनों सदस्यों का दर्जा समान है।

निर्णय कैसे होते हैं: बराबरी में प्रथम

  • निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 आयोग के कामकाज की रूपरेखा तय करता है।
  • धारा 17: आयोग का कारोबार जहाँ तक संभव हो सर्वसम्मति से चले। यदि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों में मतभेद हो, तो निर्णय बहुमत की राय से होगा।
  • धारा 18: बहुमत की व्यवस्था का आधार यही धारा है। मौजूदा तीन सदस्यों में से किन्हीं दो की राय निर्णायक हो सकती है।

मुख्य चुनाव आयुक्त आयोग की बैठक की अध्यक्षता करता है, पर मताधिकार में तीनों सदस्य बराबर हैं। इसीलिए उसे “बराबरी वालों में प्रथम” कहा जाता है। अधिकारियों के अनुसार आयोग सामान्यतः सप्ताह में एक या दो बार लंबित मामलों पर चर्चा के लिए बैठता है। चुनाव कराना हो या प्रशासनिक मामले, मतभेद को नियमित प्रक्रिया माना जाता है। पर जब निर्णय लेने की घड़ी आती है, तो या तो सब एकमत होते हैं या बहुमत की राय चलती है।

असहमति की परंपरा: यह पहली दरार नहीं है

आयोग के भीतर मतभेद का इतिहास पुराना है। कुछ प्रमुख उदाहरण:

  1. शेषन बनाम गिल और कृष्णमूर्ति (1990 का दशक): बहु-सदस्यीय आयोग बनते ही टकराव सामने आया और मामला न्यायालय तक पहुँचा।
  2. गोपालस्वामी और नवीन चावला (जनवरी 2009): तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफ़ारिश की। उन्होंने “राजनीतिक तटस्थता के अभाव” का हवाला दिया। इस सिफ़ारिश को नहीं माना गया, और चावला बाद में स्वयं मुख्य चुनाव आयुक्त बने।
  3. अशोक लवासा (2019): लोकसभा चुनाव के दौरान आचार संहिता उल्लंघन की शिकायतों पर आयोग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को क्लीन चिट दी। लवासा ने बहुमत से असहमति जताई। उनकी आपत्ति यह भी थी कि उनके असहमति-नोट अंतिम आदेशों में दर्ज नहीं किए जा रहे। वरिष्ठता के आधार पर वे आगे मुख्य चुनाव आयुक्त बन सकते थे, पर उन्होंने 2020 में आयोग से त्यागपत्र देना उचित समझा।

मौजूदा विवाद: विशेष गहन पुनरीक्षण और आपत्तियों का सिलसिला

24 जून 2025 को आयोग ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का आदेश जारी किया। आदेश के मसौदे पर आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने लिखा था कि इस प्रक्रिया से मतदाताओं और नागरिकों का उत्पीड़न नहीं होना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से बीमार, बुज़ुर्ग, दिव्यांग, गरीब और अन्य कमज़ोर वर्गों का उल्लेख किया, ताकि वे प्रताड़ित न महसूस करें और उन्हें सुविधा मिले। आयोग के सूत्रों के अनुसार यह एक टिप्पणी भर थी, और अंततः SIR का आदेश सर्वसम्मति से पारित हुआ।

रिपोर्ट के अनुसार इसके बाद भी आयुक्त संधू और विवेक जोशी ने फ़ाइलों पर कई बार अपनी आपत्तियाँ दर्ज कीं। ये आपत्तियाँ:

  • आयोग की सूचना-प्रौद्योगिकी व्यवस्था के संचालन से जुड़ी थीं।
  • मतदाता पंजीकरण के फ़ॉर्म 6 में नई घोषणा जोड़ने से भी संबंधित थीं।

आयोग का पक्ष: “अवलोकन” बनाम “असहमति”

22 सितंबर को जारी वक्तव्य में आयोग ने “अवलोकन” और आयोग के निर्णयों के बीच अंतर स्पष्ट करने का प्रयास किया। उसके तर्क इस प्रकार हैं:

  • अवलोकन मानक प्रक्रिया और आंतरिक नियंत्रण एवं संतुलन का हिस्सा हैं।
  • मसौदा चरणों में आयुक्तों द्वारा उठाए गए प्रश्न या सुझाव मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए किए जाने वाले सामान्य प्रशासनिक कार्य हैं।
  • ऐसे सुझाव निर्वाचन प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए होते हैं। किसी भी संस्था में भिन्न दृष्टिकोण निर्णय-प्रक्रिया का स्वाभाविक अंग हैं।
  • केवल तीन आयुक्त ही नहीं, आयोग का प्रत्येक अधिकारी सुझाव देने के लिए स्वतंत्र है।

हाल के महीनों के सभी निर्णय “सर्वसम्मत” रहे हैं। बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुदुचेरी, असम और पश्चिम बंगाल के हालिया चुनावों का उदाहरण देते हुए आयोग ने कहा कि इन चुनावों में व्यापक प्रशासनिक और परिचालन तंत्र लगा और अनेक आयोग-अनुमोदन और निर्देश जारी हुए।

विश्लेषण: सहमति की औपचारिकता या असहमति की पारदर्शिता?

आयोग का तर्क अपनी जगह सही है, क्योंकि हर संस्था में विचार-विमर्श के दौरान मतभेद स्वाभाविक हैं। प्रश्न यह है कि जब असहमति लिखित रूप में दर्ज हो चुकी हो, तो उसकी भूमिका क्या रहे। यदि वह अंतिम आदेश में दर्ज ही न हो, तो जनता को यह पता कैसे चलेगा कि निर्णय कितनी बहस के बाद हुआ? लवासा का उदाहरण दिखाता है कि यह प्रश्न पहले भी उठ चुका है। “सर्वसम्मति” शब्द तब तक निर्विवाद नहीं रह सकता जब तक उसके पीछे की प्रक्रिया पारदर्शी न हो।

निष्पक्षता की शुरुआत नियुक्ति से

आयोग की निष्पक्षता पर बहस अंततः इस प्रश्न पर लौटती है कि उसके सदस्य चुने कैसे जाते हैं। तटस्थता चुनाव आयोग के लिए कोई सजावट नहीं, उसके अस्तित्व का संवैधानिक कारण है।

ऐतिहासिक चेतावनियाँ

मोहिंदर सिंह गिल (1978) में न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर ने आगाह किया था कि उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों में भी निरंकुश प्रवृत्ति की संभावना रहती है, इसलिए व्यापक विवेकाधिकार के साथ कानूनी और संस्थागत अंकुश ज़रूरी हैं।

संविधान सभा में शिब्बन लाल सक्सेना ने आशंका जताई थी कि मुख्य चुनाव आयुक्त कहीं कार्यपालिका का “दास” न बन जाए। इसी चिंता के जवाब में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने अनुच्छेद 324(2) रखा, जिसमें नियुक्ति संसद के कानून के अधीन रखी गई।

दशकों की चुप्पी और अनूप बरनवाल का हस्तक्षेप

लंबे समय तक संसद ने ऐसा कानून बनाया ही नहीं। परिणामस्वरूप नियुक्ति की शक्ति व्यवहार में कार्यपालिका के पास रही। 2023 के अनूप बरनवाल मामले में संविधान पीठ ने इस खालीपन को भरा और आदेश दिया कि जब तक संसद कानून न बनाए, नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश की समिति करेगी।

संसद का जवाब: 2023 का अधिनियम

संसद ने शीघ्रता से नया कानून पारित किया। उसमें मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक कैबिनेट मंत्री को समिति में रखा गया। इससे समिति में सरकार का बहुमत हो गया और न्यायपालिका बाहर हो गई। यह वैसा ही कदम था जैसा शाह बानो मामले के बाद कानून बनाकर निर्णय का असर खत्म करने के लिए उठाया गया था। कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाएँ दो साल से न्यायालय में लंबित थीं।

सर्वोच्च न्यायालय के भीतर मतभेद: दो न्यायाधीश, दो दृष्टियाँ

बुधवार को पीठ ने मामला संविधान पीठ को भेजा, पर दोनों न्यायाधीश इस बात पर असहमत रहे कि भेजा जाए या नहीं।

न्यायमूर्ति दत्ता का दृष्टिकोण

केंद्र सरकार की इस दलील को ठुकराया कि मामला संविधान पीठ को “धीरे-धीरे” या क्रमशः भेजा जाए। उनके अनुसार याचिका पर पहले ही देर हो चुकी थी।

निर्णय का आधार दो सिद्धांतों का भेद है: कानून का अनुप्रयोग और कानून की व्याख्या अलग हैं।

  • ठाकुर गंगा सिंह (1960) में न्यायालय ने कहा था कि व्याख्या का प्रश्न तब उठता है जब किसी प्रावधान के दो प्रतिस्पर्धी अर्थ हों।
  • PUCL (2003) में तीन न्यायाधीशों की पीठ ने ऐसी माँग को “पूरी तरह भ्रांतिपूर्ण” कहा।
  • लोकतांत्रिक सुधार संघ (ADR, 2002) के फ़ैसले को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33B जोड़कर संसद ने निष्प्रभावी किया, तो न्यायालय ने वहाँ भी सिद्धांत लागू किया।
  • अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (2024) में भी दो न्यायाधीशों की पीठ का 1981 का निर्णय अनुचित माना गया।

बरनवाल का सार:

“जो व्यक्ति नियुक्तिकर्ता का ऋणी हो, उसकी राष्ट्र के प्रति निष्ठा कमज़ोर पड़ जाती है।” चुनाव आयुक्त “कमज़ोर घुटनों वाला” (weak-kneed) नहीं हो सकता, और नियुक्ति ऐसी होनी चाहिए कि वह “हाँ में हाँ मिलाने वाले” के रूप में न देखी जाए।

उनके अनुसार बरनवाल का सिद्धांत बाध्यकारी है, पर उसका निर्धारित तरीका (सिद्धांत को लागू करने का उपाय) संसद बदल सकती है। सिद्धांत यह है कि नियुक्ति की प्रक्रिया कार्यपालिका के एकाधिकार से मुक्त हो। मुख्य न्यायाधीश की उपस्थिति उसे प्रत्यक्ष रूप से स्वतंत्र दिखाती है, और न्याय होना ही नहीं, होते हुए दिखना भी चाहिए।

जब पीठ ने पूछा कि नेता प्रतिपक्ष असहमत हो तो क्या प्रधानमंत्री का प्रत्याशी नियुक्त हो सकता है, तो अटॉर्नी जनरल ने कहा “संभवतः नहीं”। याचिकाकर्ताओं ने कहा “निश्चित रूप से नहीं”।

न्यायमूर्ति शर्मा का दृष्टिकोण

  • वे मानते हैं कि मुख्य न्यायाधीश को समिति से बाहर रखना संसद के लिए उचित था या नहीं, यह मौलिक प्रश्न है जो न्यायालय के सामने पहली बार आया है।
  • उनके अनुसार निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव संविधान की मूल संरचना का हिस्सा हैं, और अनुच्छेद 141 के तहत बरनवाल का निर्णय लागू भी है। पर बरनवाल का ही तर्क कि “तटस्थ चयनकर्ता” ज़रूरी है, इस प्रश्न को खुला छोड़ता है, क्योंकि इसी की जाँच होनी है कि क्या कानून स्वतंत्र चुनाव की कसौटी पर खरा उतरता है।
  • सॉलिसिटर जनरल ने NJAC (2015) का सहारा लेकर कहा कि उसमें कानून मंत्री की मौजूदगी पर न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित मानी गई थी। न्यायमूर्ति शर्मा ने इसे बेमानी नहीं माना, बल्कि माना कि न्यायपालिका के लिए जितनी स्वतंत्रता आवश्यक है, कार्यपालिका से उतने ही “समकक्ष स्तर” की संवैधानिक स्वतंत्रता चुनाव आयोग के लिए भी माननी होगी।
  • उन्होंने बरनवाल समिति को एक तदर्थ व्यवस्था माना और न्यायिक विनम्रता दिखाते हुए कठिनाई स्वीकार की।

अनुच्छेद 324: खिलाड़ी नहीं, अंपायर की सुरक्षा

चुनाव आयोग को जो संवैधानिक दर्जा मिला है, वह अंपायर की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए है, खिलाड़ियों के लिए नहीं। सरकारें खुद चुनाव की प्रतिभागी होती हैं, इसलिए नियुक्ति का एकाधिकार उनके पास रहना हितों के टकराव जैसा है। न्यायमूर्ति दत्ता का यह साहसिक कथन इसी तर्क को सामने रखता है।

आगे की राह: कुछ ठोस सुझाव

चूँकि दोनों न्यायाधीश उपर्युक्त कानून को सीधे रद्द करने पर सहमत नहीं थे, इसलिए एक बीच का रास्ता यह हो सकता है कि चयन समिति चुनाव आयुक्त के नाम पर सर्वसम्मति से निर्णय ले। तब प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष, दोनों की सहमति से नियुक्त व्यक्ति की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता पर कहीं अधिक भरोसा होगा।

इसके अतिरिक्त, अन्य स्रोतों से जो सुझाव समय-समय पर आए हैं, वे भी विचारणीय हैं:

  • दिनेश गोस्वामी समिति (1990) और विधि आयोग की 255वीं रिपोर्ट (2015) ने बहु-सदस्यीय समिति से नियुक्ति की सिफ़ारिश की थी, जिसमें मुख्य न्यायाधीश जैसे तटस्थ सदस्य शामिल हों।
  • मुख्य चुनाव आयुक्त की तरह अन्य आयुक्तों को भी कार्यकाल की सुरक्षा और हटाने की समान कठोर प्रक्रिया मिले। विधि आयोग ने इसकी सिफ़ारिश भी की है।
  • आयोग के लिए स्वतंत्र सचिवालय हो और उसका खर्च संचित निधि पर भारित हो।
  • असहमति-नोट अंतिम आदेश के साथ दर्ज हों, और गोपनीय प्रकृति के विषयों को छोड़कर उन्हें सार्वजनिक किया जाए, ताकि “सर्वसम्मति” का दावा पारदर्शिता की कसौटी पर परखा जा सके।

निष्कर्ष

आयोग के भीतर की असहमति अपने आप में अपराध नहीं, बल्कि जीवंत संस्था का लक्षण है। संकट तब पैदा होता है जब असहमति दबा दी जाए या जब यह संदेह जन्म ले कि निर्णायक को जान-बूझकर किसी के अनुकूल चुना गया है। भूल करना मानवीय है, और कोई लोकतंत्र निर्णायक की भूल से उबर सकता है। पर उस संदेह से नहीं उबर सकता कि निर्णायक को चुना ही इसलिए गया था कि वह किसी एक पक्ष के काम आए। इसलिए चुनाव आयोग की स्वतंत्रता की लड़ाई दो मोर्चों पर लड़ी जानी है: भीतर, जहाँ हर मत दर्ज और पारदर्शी हो, और बाहर, जहाँ हर नियुक्ति कार्यपालिका के एकाधिकार से मुक्त दिखे। जिस दिन ये दोनों सुनिश्चित होंगे, उसी दिन “बराबरी वालों में प्रथम” की भावना भी सार्थक होगी और मतदाता का भरोसा भी।


Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

What do you think?

फॉर्म 26: चुनावी पारदर्शिता और उम्मीदवारों के अधिकार

संयुक्त राष्ट्र चार्टर में ‘शत्रु राज्य’ (Enemy State): जापान इन्हें क्यों हटाना चाहता है?