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लद्दाख के लिए 371K का प्रस्ताव

भारत का संविधान एक ऐसा जीवंत दस्तावेज है जिसने देश की विविधता को समायोजित करने के लिए समय समय पर लचीलापन दिखाया है। इसी लचीलेपन का सबसे प्रत्यक्ष उदाहरण है अनुच्छेद 371, जिसके अंतर्गत भारत के कुछ राज्यों और क्षेत्रों को उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, सामाजिक संरचना और राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विशेष संवैधानिक संरक्षण दिया गया है। हाल ही में केंद्र सरकार ने गृह मंत्रालय, लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी) और करगिल डेमोक्रेटिक एलायंस (केडीए) के प्रतिनिधियों के बीच हुई सहमति के आधार पर लद्दाख के लिए एक नए संवैधानिक प्रावधान, अनुच्छेद 371K को जोड़ने का प्रस्ताव रखा है। यह प्रस्ताव 9 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में एक उप समिति की बैठक में सामने आया। इसका उद्देश्य लद्दाख को एक निर्वाचित संघ राज्य क्षेत्र स्तरीय निकाय प्रदान करना है, जिसके पास विधायी, कार्यकारी, वित्तीय और योजना संबंधी अधिकार होंगे।

यह लेख अनुच्छेद 371 की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, इसके अंतर्गत विभिन्न राज्यों को दी गई विशेष व्यवस्थाओं और लद्दाख के लिए प्रस्तावित नए प्रावधान की विस्तृत समीक्षा करता है।

अनुच्छेद 371 क्या है?

अनुच्छेद 371 मूल रूप से भारतीय संविधान में सम्मिलित नहीं था। इसे विशेष रूप से उत्तर पूर्वी और जनजातीय क्षेत्रों को संवैधानिक संरक्षण देने के लिए बाद में जोड़ा गया। स्वतंत्रता के समय भारत केवल उन प्रांतों तक सीमित नहीं था जो सीधे ब्रिटिश शासन के अधीन थे, बल्कि इसमें अनेक देसी रियासतें भी शामिल थीं, जिनका ऐतिहासिक और प्रशासनिक अनुभव बहुत भिन्न भिन्न था। संविधान निर्माताओं ने इन क्षेत्रों को भाग ख राज्यों जैसे हैदराबाद, मैसूर, जम्मू और कश्मीर, राजस्थान इत्यादि के रूप में वर्गीकृत किया।

केंद्रीय शासन के अधीन इन नवगठित क्षेत्रों को तुरंत मुख्यधारा के ढांचे में समाहित करना उचित नहीं समझा गया, इसलिए संविधान में विशेष उपबंधों के लिए एक अस्थायी प्रावधान की आवश्यकता महसूस की गई।

मूल रूप से 1950 में स्वीकृत अनुच्छेद 371 केवल महाराष्ट्र और गुजरात के लिए बेस्पोक यानी विशेष रूप से गढ़े गए संवैधानिक प्रबंधों की व्यवस्था करता था। किंतु आगे चलकर राज्य पुनर्गठन अधिनियम और सातवें संवैधानिक संशोधन जैसे विभिन्न विधायी उपायों से भाग ख, भाग ग और भाग घ राज्यों का यह वर्गीकरण समाप्त हो गया। इसके स्थान पर संसद ने आवश्यकतानुसार विभिन्न राज्यों के लिए विशेष संवैधानिक प्रावधान बनाए, जिससे 371 के अंतर्गत अनेक उप अनुच्छेद जुड़ते चले गए।

भारत की संघीय व्यवस्था स्वयं इतनी लचीली बनाई गई थी कि वह देश की भिन्न भिन्न ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक मांगों को समायोजित कर सके। इसी कारण संसद ने बार बार परिस्थिति अनुसार नई और विशिष्ट संवैधानिक व्यवस्थाएं गढ़ीं।

राज्यवार विशेष प्रावधानों की समीक्षा

अनुच्छेद 371 के विभिन्न उप खंड अलग अलग राज्यों की भिन्न भिन्न चुनौतियों के उत्तर में बने हैं। इन्हें बिंदुवार समझा जा सकता है।

  • महाराष्ट्र और गुजरात को अनुच्छेद 371 के मूल प्रावधान के अंतर्गत विदर्भ, मराठवाड़ा, सौराष्ट्र और कच्छ जैसे पिछड़े क्षेत्रों के समान विकास के लिए विशेष विकास बोर्ड बनाने का अधिकार राज्यपाल को दिया गया।
  • नागालैंड के संदर्भ में स्वतंत्रता के बाद नागा राष्ट्रवादी आंदोलन ने भारत के दावे को चुनौती दी थी। यह संघर्ष लगभग छह वर्षों तक चला जब तक 1960 के सोलह सूत्रीय समझौते के आधार पर नागालैंड को अलग राज्य नहीं बना दिया गया। 1963 में नागालैंड के गठन के साथ अनुच्छेद 371A के जरिए नागा धार्मिक और सामाजिक प्रथाओं, प्रथागत विधि और प्रक्रिया, तथा भूमि और उसके संसाधनों के स्वामित्व एवं हस्तांतरण जैसे विषयों को संविधान में विशेष संरक्षण मिला।
  • असम में 1969 में जोड़े गए अनुच्छेद 371B के जरिए राज्य की विधानसभा के भीतर एक ऐसी समिति के गठन का प्रावधान किया गया जिसमें छठी अनुसूची के अंतर्गत आने वाले जनजातीय क्षेत्रों से निर्वाचित सदस्य शामिल हों। इससे संरक्षित जनजातीय इलाकों को एक विशिष्ट राजनीतिक प्रतिनिधित्व का तंत्र प्राप्त हुआ।
  • मणिपुर के मामले में 1972 में पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने के बाद बहुसंख्यक जनजातीय पहाड़ी क्षेत्रों और इम्फाल घाटी के मध्य राजनीतिक संबंध को संतुलित करना एक बड़ी चुनौती थी। इसी उद्देश्य से अनुच्छेद 371C के जरिए विधानसभा की एक विशेष समिति की व्यवस्था की गई, जिसमें पहाड़ी क्षेत्रों से चुने गए सदस्य शामिल होते हैं, और जिसके प्रशासन की एक विशेष जिम्मेदारी राज्यपाल की राष्ट्रपति के प्रति होती है।

  • आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के संबंध में तेलंगाना और आंध्र क्षेत्रों के बीच लंबे समय से राजनीतिक तनाव रहा, जिसने शिक्षा, सरकारी रोजगार और क्षेत्रीय विकास को लेकर असंतोष उत्पन्न किया। 1973 में इसी असमानता और सांस्कृतिक स्वायत्तता की मांग से जन्मे आंदोलन के परिणामस्वरूप अनुच्छेद 371D जोड़ा गया, जो राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में शिक्षा और सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर उपलब्ध कराता है। बाद में 2014 के आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम के जरिए इसे प्रतिस्थापित किया गया।
  • सिक्किम का भारतीय संघ में 1975 में जनमत संग्रह के बाद विलय हुआ। इसकी पूर्ववर्ती स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को बरकरार रखने के लिए अनुच्छेद 371F के जरिए विशेष संक्रमणकालीन व्यवस्था की गई ताकि सिक्किम भारतीय संघ में आसानी से समाहित हो सके।
  • मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश दोनों ने भिन्न भिन्न परिस्थितियों में विशेष प्रावधान प्राप्त किए। 1986 के मिजो शांति समझौते के बाद मिजो नेशनल फ्रंट के साथ मिजोरम की राज्यता का मार्ग प्रशस्त हुआ। अनुच्छेद 371G में मिजो धार्मिक और सामाजिक प्रथाओं, प्रथागत विधि प्रक्रिया, न्याय प्रशासन तथा भूमि के स्वामित्व एवं हस्तांतरण से जुड़ी सुरक्षा का प्रावधान है, जो विधानसभा की सहमति के बिना लागू नहीं होता। अरुणाचल प्रदेश को 1987 में राज्यता मिली और अनुच्छेद 371H के जरिए राज्यपाल को कानून और व्यवस्था के विषय में एक विशेष जिम्मेदारी दी गई है।
  • गोवा और कर्नाटक को भी विशेष व्यवस्थाएं मिलीं। गोवा को 1987 में राज्यता मिलने के साथ अनुच्छेद 371I जोड़ा गया, जिसमें विधानसभा की न्यूनतम सदस्य संख्या तीस निर्धारित की गई। 2012 में कर्नाटक के लिए अनुच्छेद 371J जोड़ा गया, जो हैदराबाद कर्नाटक अर्थात अब कल्याण कर्नाटक क्षेत्र के लिए एक विकास बोर्ड, शिक्षा और सार्वजनिक रोजगार के अवसरों में क्षेत्रीय पिछड़ेपन को दूर करने हेतु आरक्षण की व्यवस्था करता है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि अनुच्छेद 371 का प्रत्येक उप खंड किसी न किसी विशिष्ट ऐतिहासिक, सामाजिक अथवा राजनीतिक मांग से उपजा है। संसद ने बार बार आवश्यकतानुसार नई विशिष्ट व्यवस्थाएं गढ़ी हैं, न कि एक जैसा साँचा सभी राज्यों पर थोप दिया है।

लद्दाख की पृष्ठभूमि और मांगें

अगस्त 2019 में जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के जरिए लद्दाख को जम्मू कश्मीर से अलग करके एक संघ राज्य क्षेत्र बनाया गया, किंतु इसे विधानसभा रहित संघ राज्य क्षेत्र के रूप में गठित किया गया। इसका अर्थ यह हुआ कि लद्दाख का प्रशासन मुख्यतः उपराज्यपाल और नौकरशाही के माध्यम से संचालित होने लगा, जबकि क्षेत्र के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की भूमिका सीमित रह गई।

इसके पश्चात लद्दाख के दोनों प्रमुख क्षेत्रों, लेह और करगिल के संगठनों ने संयुक्त रूप से पूर्ण राज्यता, संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत संरक्षण, लोक सेवा आयोग की स्थापना और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार आरक्षण जैसी मांगों को लेकर आंदोलन तेज किया। लेह एपेक्स बॉडी और करगिल डेमोक्रेटिक एलायंस, जो पहले अलग अलग राजनीतिक दिशा रखते थे, ने संयुक्त रूप से केंद्र सरकार के साथ वार्ता आरंभ की। इन वार्ताओं का उद्देश्य भूमि, पर्यावरण, सांस्कृतिक पहचान और स्थानीय रोजगार जैसे संवेदनशील विषयों पर संवैधानिक सुरक्षा सुनिश्चित करना रहा है।

अनुच्छेद 371K में क्या प्रस्तावित है?

गृह मंत्रालय ने संविधान के भाग इक्कीस अर्थात अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष प्रावधानों वाले भाग के अंतर्गत अनुच्छेद 371 में एक नया अध्याय ककार के रूप में जोड़ने का प्रस्ताव रखा है। इसे एक सुई जेनरिस अर्थात पूर्णतः अनूठा शासन मॉडल बताया गया है, क्योंकि यह लद्दाख को पूर्ण राज्यता दिए बिना भी एक सशक्त निर्वाचित संरचना प्रदान करने का प्रयास करता है।

प्रस्तावित निकाय की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार समझी जा सकती हैं:

  • यह निकाय संघ राज्य क्षेत्र स्तर पर सीधे लद्दाख के निवासियों द्वारा निर्वाचित होगा।
  • इसे विशिष्ट विषयों पर विधायी अधिकार प्राप्त होंगे, जिनमें भूमि, संस्कृति और भाषा, वन एवं पर्यावरण, तथा प्राकृतिक संसाधन शामिल हैं।
  • भूमि से संबंधित विषयों पर स्वामित्व अथवा उपयोग में अनधिकृत परिवर्तन के विरुद्ध सुरक्षा का प्रावधान होगा।
  • सांस्कृतिक पहचान के अंतर्गत लद्दाखी भाषा, परंपरा और स्थानीय पहचान के संरक्षण पर बल दिया जाएगा।
  • वन एवं पर्यावरण से जुड़े विषयों पर निकाय को प्रवर्तन का अधिकार होगा।
  • अनुच्छेद 240 के अंतर्गत आरक्षित अन्य संघ राज्य क्षेत्र संबंधी विषयों पर भी इसका अधिकार क्षेत्र विस्तारित रहेगा।

यह उल्लेखनीय है कि इस प्रस्तावित निकाय के पास विधायी, कार्यकारी और वित्तीय तीनों प्रकार के अधिकार होने की बात कही गई है, जो इसे अन्य सामान्य संघ राज्य क्षेत्रों से भिन्न बनाता है। हालांकि स्थानीय प्रतिनिधियों ने इस बात पर असंतोष व्यक्त किया है कि अभी तक विस्तृत मसौदा और शक्तियों का सटीक विभाजन सामने नहीं आया है, इसलिए यह व्यवस्था अभी बातचीत के चरण में ही है और इसे लागू नहीं किया गया है।

लद्दाख के लिए संभावित महत्व

यदि यह प्रस्ताव मूर्त रूप लेता है, तो इसका महत्व कई आयामों में देखा जा सकता है।

  1. पहला, यदि लद्दाख को केवल एक निर्वाचित निकाय दे दिया जाए और उसे वास्तविक विधायी शक्ति न सौंपी जाए, तो यह संरक्षण केवल कागजी बनकर रह सकता है। इसके विपरीत यदि भूमि, प्राकृतिक संसाधन, रोजगार और प्रशासन जैसे क्षेत्रों में शक्ति निर्वाचित निकाय को स्थानांतरित की जाती है, तो यह काफी हद तक सशक्त हो सकता है।
  2. दूसरा, यह मॉडल दार्शनिक रूप से अनुच्छेद 371A और 371G के करीब बताया जा रहा है, जो भूमि और सांस्कृतिक प्रथागत विधियों को संवैधानिक संरक्षण देते हैं। किंतु मिजोरम में यह व्यवस्था स्वतः लागू नहीं होती, बल्कि इसके लिए राज्य विधानसभा की सहमति आवश्यक होती है। लद्दाख के संदर्भ में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या समान शर्त लगाई जाती है।
  3. तीसरा, लद्दाख अपने लिए कानून एवं व्यवस्था पर भी नियंत्रण चाहता है। यदि वर्तमान निर्वाचित कार्यपालिका के हाथों से कानून व्यवस्था और नौकरशाही पर नियंत्रण अधिक मुख्यमंत्री जैसे पद के हाथों में हो, तो निर्वाचित सरकार अधिक प्रभावी सिद्ध हो सकती है।

निष्कर्ष

अनुच्छेद 371 भारत के संघीय ढांचे की उस लचीली प्रकृति को दर्शाता है, जिसने विविध ऐतिहासिक और सामाजिक परिस्थितियों को समायोजित करने के लिए हर बार एक नई और बेस्पोक संवैधानिक व्यवस्था गढ़ी है। नागालैंड, असम, मणिपुर, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना, सिक्किम, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, गोवा और कर्नाटक की भिन्न भिन्न कहानियां यह स्पष्ट करती हैं कि इस अनुच्छेद को एक सर्वसामान्य नुस्खे के रूप में नहीं, बल्कि प्रत्येक क्षेत्र की विशिष्ट जरूरत के अनुरूप गढ़ा गया प्रावधान माना जाना चाहिए।

लद्दाख के लिए प्रस्तावित अनुच्छेद 371K इसी परंपरा की एक नई कड़ी है। यह न तो पूर्ण राज्यता है और न ही पारंपरिक विधानसभा वाला संघ राज्य क्षेत्र, बल्कि एक बीच का रास्ता है जो स्थानीय स्वायत्तता, सांस्कृतिक संरक्षण और भूमि सुरक्षा को संतुलित करने का प्रयास करता है। इसकी सफलता अंततः इस बात पर निर्भर करेगी कि निर्वाचित निकाय को वास्तविक विधायी, कार्यकारी और वित्तीय शक्ति किस सीमा तक हस्तांतरित की जाती है, और क्या यह प्रावधान लद्दाख के लोगों की मूल आकांक्षाओं, विशेष रूप से छठी अनुसूची संरक्षण और अधिक सार्थक स्वशासन, को संतुष्ट कर पाता है।


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