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संविधान सभा में अल्पसंख्यक अधिकार (Minority Rights)

Minority Rights in the Constituent Assembly

1934 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पहली बार वयस्क मताधिकार के आधार पर संविधान सभा गठित करने की मांग की। कांग्रेस का मानना था कि भारत का संविधान भारतीय जनता द्वारा ही बनाया जाना चाहिए तथा अल्पसंख्यकों को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए।

  • 16 मई 1946 की कैबिनेट मिशन योजना के आधार पर संविधान सभा का गठन हुआ। इस योजना में स्पष्ट कहा गया था कि भारतीय जनता को सत्ता हस्तांतरण तभी होगा जब संविधान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त प्रावधान किए जाएँ।
  • संविधान सभा में मुसलमानों, सिखों, अनुसूचित जातियों, ईसाइयों, पारसियों और अन्य समूहों को प्रतिनिधित्व दिया गया था ताकि सभी वर्गों की चिंताओं को संविधान में स्थान मिल सके।
  • विभाजन (Partition) और सांप्रदायिक तनाव के कारण अल्पसंख्यकों की सुरक्षा संविधान सभा के सामने सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण प्रश्न बन गई थी।
  • संविधान निर्माताओं के सामने चुनौती थी कि राष्ट्रीय एकता को बनाए रखते हुए विविध धार्मिक, भाषायी और सांस्कृतिक समुदायों के अधिकारों की रक्षा कैसे की जाए।

उद्देश्य प्रस्ताव (Objectives Resolution) और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा

जवाहरलाल नेहरू की ऐतिहासिक घोषणा

  • 13 दिसंबर 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया, जिसने भारतीय संविधान के दर्शन और मूल सिद्धांतों की नींव रखी।
  • इस प्रस्ताव में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, समानता, स्वतंत्रता तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की गारंटी दी गई।
  • प्रस्ताव में स्पष्ट रूप से कहा गया कि अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों, आदिवासी क्षेत्रों तथा कमजोर वर्गों के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय उपलब्ध कराए जाएंगे।
  • 22 जनवरी 1947 को संविधान सभा ने सर्वसम्मति से इस प्रस्ताव को स्वीकार किया, जिससे अल्पसंख्यकों को यह विश्वास मिला कि स्वतंत्र भारत उनके अधिकारों की रक्षा करेगा।
  • यही उद्देश्य प्रस्ताव बाद में संविधान की प्रस्तावना (Preamble) और मौलिक अधिकारों की आधारशिला बना।

सलाहकार समिति (Advisory Committee) और अल्पसंख्यक उपसमिति

सरदार पटेल की भूमिका

  • संविधान सभा ने सरदार वल्लभभाई पटेल की अध्यक्षता में मौलिक अधिकार एवं अल्पसंख्यक संबंधी सलाहकार समिति (Advisory Committee) का गठन किया।
  • समिति के अंतर्गत अल्पसंख्यक उपसमिति (Minorities Sub-Committee) बनाई गई, जिसके अध्यक्ष एच. सी. मुखर्जी थे।
  • इस उपसमिति ने राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक तथा शैक्षणिक अधिकारों पर व्यापक विचार-विमर्श किया।
  • के. एम. मुंशी द्वारा तैयार प्रश्नावली में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, प्रतिनिधित्व, शिक्षा, संस्कृति तथा प्रशासनिक संरक्षण से जुड़े अनेक प्रश्न शामिल किए गए थे।
  • समिति ने खुले और उदार दृष्टिकोण से विचार करते हुए विभिन्न समुदायों की मांगों और चिंताओं को समझने का प्रयास किया।

प्रारूप संविधान (Draft Constitution) में अल्पसंख्यकों के लिए प्रस्तावित विशेष प्रावधान

प्रारंभिक दृष्टिकोण

  • 1948 के प्रारूप संविधान में अल्पसंख्यकों को विधानमंडलों में आरक्षण, सेवाओं में प्रतिनिधित्व और विशेष संरक्षण देने के विस्तृत प्रावधान शामिल किए गए थे।
  • लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में मुसलमानों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा कुछ राज्यों में भारतीय ईसाइयों के लिए सीट आरक्षण का प्रस्ताव था।
  • एंग्लो-इंडियन समुदाय को संसद और विधानसभाओं में नामांकन के माध्यम से प्रतिनिधित्व देने का प्रावधान किया गया था।
  • सार्वजनिक सेवाओं में नियुक्तियों के समय अल्पसंख्यकों के दावों पर विचार करने की व्यवस्था प्रस्तावित थी।
  • अल्पसंख्यकों के हितों की निगरानी के लिए विशेष अधिकारियों (Special Officers for Minorities) की नियुक्ति का भी प्रावधान था।

अल्पसंख्यक अधिकारों पर बदलता दृष्टिकोण

विभाजन का प्रभाव

  • भारत विभाजन और उससे उत्पन्न सांप्रदायिक हिंसा ने संविधान सभा के वातावरण और सोच को काफी प्रभावित किया।
  • प्रारंभ में सभा अल्पसंख्यकों को व्यापक राजनीतिक और आर्थिक अधिकार देने के पक्ष में थी, लेकिन बाद में यह दृष्टिकोण बदल गया।
  • सरदार पटेल ने 1949 में कहा कि धार्मिक आधार पर आरक्षण और विशेष राजनीतिक प्रतिनिधित्व धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक राज्य की भावना के विपरीत हो सकता है।
  • उनका मानना था कि ऐसे प्रावधान अलगाववाद (Separatism) को बढ़ावा दे सकते हैं और राष्ट्रीय एकता को कमजोर कर सकते हैं।
  • परिणामस्वरूप धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए प्रस्तावित अधिकांश राजनीतिक और प्रशासनिक आरक्षण समाप्त कर दिए गए।

अल्पसंख्यक अधिकारों के तीन चरण

संवैधानिक विकास की प्रक्रिया

  • प्रथम चरण में पृथक निर्वाचन मंडल (Separate Electorates) को अस्वीकार कर संयुक्त निर्वाचन और आरक्षण का समर्थन किया गया।
  • द्वितीय चरण में धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए विधानमंडलों में आरक्षण को समाप्त करने पर सहमति बनने लगी।
  • तृतीय चरण में धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए सार्वजनिक सेवाओं में आरक्षण भी समाप्त कर दिया गया।
  • अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण व्यवस्था को बनाए रखा गया।
  • अंततः केवल सांस्कृतिक, भाषायी और शैक्षणिक अधिकारों को अल्पसंख्यकों के विशेष अधिकार के रूप में स्वीकार किया गया।

अनुच्छेद 29 और 30 : सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकार

अल्पसंख्यकों की पहचान की रक्षा

  • संविधान सभा ने माना कि भारत की विविधता को बनाए रखने के लिए भाषायी और धार्मिक अल्पसंख्यकों को विशेष सांस्कृतिक अधिकार दिए जाने चाहिए।
  • अनुच्छेद 29 के अंतर्गत प्रत्येक समुदाय को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति को संरक्षित रखने का अधिकार प्रदान किया गया।
  • अनुच्छेद 30 के तहत धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित और संचालित करने का अधिकार दिया गया।
  • राज्य सहायता प्रदान करते समय अल्पसंख्यक संस्थानों के साथ भेदभाव न करने की संवैधानिक गारंटी दी गई।
  • यही अनुच्छेद आज भारत में अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के संवैधानिक आधार के रूप में कार्य करते हैं।

निष्कर्ष

  • संविधान सभा ने प्रारंभ में अल्पसंख्यकों को व्यापक राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक संरक्षण देने का विचार किया था, लेकिन विभाजन और राष्ट्रीय एकता की चुनौतियों के कारण यह दृष्टिकोण धीरे-धीरे बदल गया।
  • धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण और विशेष राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रावधानों को अंततः समाप्त कर दिया गया, जबकि अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षण व्यवस्था जारी रखी गई।
  • संविधान निर्माताओं ने अल्पसंख्यकों के लिए सांस्कृतिक, भाषायी और शैक्षणिक अधिकारों को सबसे उपयुक्त सुरक्षा उपाय माना।
  • अनुच्छेद 29 और 30 भारतीय धर्मनिरपेक्षता, बहुलवाद और सांस्कृतिक विविधता की संवैधानिक अभिव्यक्ति हैं।

 


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