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अनुच्छेद-1 पर संविधान सभा की बहस

Constituent Assembly Debates on Article-1

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 पर संविधान सभा में हुई बहस केवल भारत के नाम या प्रशासनिक संरचना तक सीमित नहीं थी। यह बहस भारत की राष्ट्रीय पहचान, संघीय ढांचे, संप्रभुता, राज्यों की स्थिति, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद तथा राष्ट्रीय एकता जैसे मूलभूत प्रश्नों से जुड़ी हुई थी।

अनुच्छेद 1 का मूल प्रारूप था: ‘India shall be a Union of States.’ (भारत राज्यों का एक संघ होगा।)

भारत का नाम: India, Bharat, Bharatvarsha या Hindustan?

बहस की शुरुआत भारत के नाम को लेकर हुई।

एम. अनंतसायनम अय्यंगार ने बताया कि कई संशोधन प्रस्तुत किए गए हैं जिनमें India के स्थान पर Bharat, Bharatvarsha और Hindustan रखने का प्रस्ताव था। उन्होंने सुझाव दिया कि इन संशोधनों पर बाद में विचार किया जाए।

मुख्य बहस

  • संविधान सभा में अनुच्छेद 1 पर विचार प्रारंभ होने से पहले अनेक सदस्यों ने भारत के नाम को लेकर संशोधन प्रस्तुत किए थे। कुछ सदस्य चाहते थे कि औपनिवेशिक विरासत से जुड़े ‘India’ शब्द के स्थान पर ‘Bharat’, ‘Bharatvarsha’ अथवा ‘Hindustan’ जैसे भारतीय सांस्कृतिक पहचान वाले नामों को स्वीकार किया जाए। यह केवल भाषाई परिवर्तन नहीं बल्कि स्वतंत्र भारत की सभ्यतागत पहचान निर्धारित करने का प्रयास था।
  • कई सदस्यों का मत था कि ‘भारतवर्ष’ शब्द भारतीय इतिहास, संस्कृति और प्राचीन सभ्यता का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि ‘India’ विदेशी शासन और औपनिवेशिक इतिहास की याद दिलाता है। इसलिए संविधान में भारतीय परंपरा के अनुरूप नाम अपनाया जाना चाहिए।
  • दूसरी ओर कुछ सदस्यों का विचार था कि ‘India’ नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध और स्वीकृत है। यदि इसे पूरी तरह हटाया गया तो विश्व समुदाय में भारत की पहचान संबंधी व्यावहारिक कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
  • इसी बहस का परिणाम आगे चलकर संविधान के अंतिम स्वरूप में दिखाई देता है, जहाँ एक संतुलित समाधान के रूप में ‘India, that is Bharat’ शब्दों को स्वीकार किया गया। इससे भारतीय सांस्कृतिक विरासत और अंतरराष्ट्रीय पहचान दोनों को संरक्षण मिला।

‘Secular, Federal, Socialist’ शब्द जोड़ने का प्रस्ताव

प्रो. के. टी. शाह का संशोधन

  • प्रो. के. टी. शाह ने अनुच्छेद 1 में संशोधन प्रस्तुत करते हुए प्रस्ताव रखा कि भारत को केवल ‘Union of States’ न कहा जाए बल्कि ‘Secular, Federal, Socialist Union of States’ घोषित किया जाए। उनके अनुसार संविधान की शुरुआत में ही राज्य के मूल चरित्र को स्पष्ट कर देना चाहिए।
  • उन्होंने कहा कि विभाजन और सांप्रदायिक दंगों के बाद यह आवश्यक है कि संविधान स्पष्ट रूप से घोषित करे कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है जहाँ शासन किसी धर्म विशेष के आधार पर नहीं बल्कि नागरिक समानता और न्याय के आधार पर चलेगा।
  • समाजवाद (Socialism) को जोड़ने के पक्ष में उनका तर्क था कि आर्थिक विषमता और सामाजिक शोषण को समाप्त करने के लिए संविधान को एक स्पष्ट समाजवादी दिशा प्रदान करनी चाहिए। संविधान केवल वर्तमान की व्यवस्था न होकर भविष्य के आदर्शों का भी मार्गदर्शन करे।
  • उन्होंने संघवाद (Federalism) को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने की आवश्यकता बताई। उनका मानना था कि ‘Union’ शब्द पर्याप्त नहीं है और भविष्य में कोई यह तर्क दे सकता है कि भारत एक पूर्णतः एकात्मक (Unitary) राज्य है।
  • प्रो. शाह के अनुसार इन शब्दों को जोड़ने से संविधान की वैचारिक दिशा स्पष्ट होती तथा नागरिकों और सरकार दोनों के लिए एक निश्चित आदर्श स्थापित होता।

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर का विरोध

संविधान को वैचारिक रूप से तटस्थ रखने का पक्ष

  • डॉ. अम्बेडकर ने प्रो. शाह के संशोधन का विरोध करते हुए कहा कि संविधान किसी विशेष आर्थिक या सामाजिक विचारधारा को बाध्यकारी रूप में स्वीकार करने का दस्तावेज नहीं है। संविधान केवल शासन तंत्र (Mechanism of Government) प्रदान करता है।
  • उन्होंने तर्क दिया कि यदि संविधान में समाजवाद को अनिवार्य सिद्धांत के रूप में लिख दिया जाए तो भविष्य की पीढ़ियों और लोकतांत्रिक सरकारों की नीति निर्माण की स्वतंत्रता समाप्त हो जाएगी। लोकतंत्र का सार यही है कि जनता समय और परिस्थितियों के अनुसार अपनी नीतियाँ तय कर सके।
  • अम्बेडकर का मानना था कि किसी विशेष विचारधारा को संविधान में स्थायी रूप से शामिल करना लोकतांत्रिक विकल्पों को सीमित करना होगा। भविष्य में यदि कोई बेहतर आर्थिक या सामाजिक व्यवस्था विकसित होती है तो जनता को उसे अपनाने का अधिकार होना चाहिए।
  • उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान के नीति-निर्देशक तत्व (Directive Principles) पहले से ही सामाजिक और आर्थिक न्याय के सिद्धांतों को समाहित करते हैं। इसलिए समाजवाद शब्द जोड़ना अनावश्यक है।
  • अम्बेडकर के अनुसार संविधान का उद्देश्य राज्य की संरचना और शक्तियों का निर्धारण करना है, न कि किसी विशेष राजनीतिक दर्शन को स्थायी रूप से स्थापित करना।

‘Union’ बनाम Federation’ की बहस

भारत संघ है या परिसंघ?

  • कई सदस्यों ने तर्क दिया कि भारत की शासन प्रणाली संघीय (Federal) है क्योंकि केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन किया गया है। इसलिए अनुच्छेद 1 में ‘Federation’ शब्द का उपयोग अधिक उपयुक्त होगा।
  • संशोधन के समर्थकों का मानना था कि ‘Union’ शब्द भविष्य में केंद्र सरकार को अत्यधिक शक्तिशाली बना सकता है तथा राज्यों की स्वायत्तता कमजोर हो सकती है। इसलिए संघीय चरित्र को स्पष्ट रूप से व्यक्त करना आवश्यक है।
  • डॉ. अम्बेडकर और प्रारूप समिति ने ‘Union’ शब्द का समर्थन किया। उनका तर्क था कि भारत का संघ राज्यों के बीच किसी समझौते (Agreement) का परिणाम नहीं है बल्कि भारतीय जनता की सामूहिक संप्रभुता का परिणाम है।
  • अम्बेडकर ने स्पष्ट किया कि भारत में राज्यों को संघ से अलग होने (Right to Secede) का अधिकार नहीं होगा। अमेरिका जैसे देशों में संघीय ढाँचा राज्यों के समझौते से बना था, जबकि भारत की स्थिति भिन्न है।
  • अंततः संविधान सभा ने ‘Federation’ शब्द को अस्वीकार कर ‘Union’ शब्द को बनाए रखा। यह निर्णय भारत की एकता, अखंडता और अविभाज्यता को संवैधानिक आधार प्रदान करता है।

‘State’ के स्थान पर Pradesh’ रखने की बहस

एच. वी. कामथ और घनश्याम सिंह गुप्ता का प्रस्ताव

  • एच. वी. कामथ ने सुझाव दिया कि ‘States’ शब्द के स्थान पर ‘Pradeshas’ शब्द का प्रयोग किया जाए। उनका तर्क था कि ‘State’ शब्द विभिन्न संदर्भों में अलग-अलग अर्थ देता है और इससे भ्रम उत्पन्न हो सकता है।
  • उन्होंने यह भी कहा कि ‘State’ शब्द अमेरिकी संविधान से प्रभावित प्रतीत होता है, जबकि भारत को अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुरूप शब्दावली विकसित करनी चाहिए।
  • कुछ सदस्यों का मत था कि ‘State’ शब्द पूर्ववर्ती देशी रियासतों (Princely States) से जुड़ा हुआ है और इससे पृथक संप्रभुता की भावना विकसित हो सकती है। ‘Pradesh’ शब्द अधिक उपयुक्त और एकीकृत राष्ट्रीय भावना को प्रकट करता है।
  • समर्थकों ने यह भी तर्क दिया कि हिमाचल प्रदेश, विंध्य प्रदेश आदि नाम पहले से प्रचलित हैं, इसलिए ‘Pradesh’ शब्द जनता के लिए अधिक स्वाभाविक होगा।
  • उनका उद्देश्य राज्यों और पूर्व रियासतों दोनों के लिए एक समान शब्दावली स्थापित करना था ताकि किसी प्रकार की संवैधानिक असमानता या भ्रम न रहे।

‘Pradesh’ के विरोध में तर्क

नेहरू और अन्य सदस्यों का दृष्टिकोण

  • के. हनुमंथैया ने कहा कि संविधान अंग्रेज़ी भाषा में तैयार किया जा रहा है और ‘Pradesh’ अंग्रेज़ी शब्द नहीं है। संविधान जैसे विधिक दस्तावेज में ऐसे शब्दों का प्रयोग न्यायिक व्याख्या में कठिनाइयाँ उत्पन्न कर सकता है।
  • जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि ‘State’ एक स्थापित संवैधानिक शब्द है जिसका अर्थ पूरी दुनिया में समझा जाता है, जबकि ‘Pradesh’ का कोई निश्चित संवैधानिक अर्थ नहीं है।
  • नेहरू के अनुसार किसी शब्द की महत्ता उसके नाम में नहीं बल्कि संविधान द्वारा निर्धारित शक्तियों और अधिकारों में होती है। केवल नाम बदल देने से संवैधानिक स्थिति नहीं बदलती।
  • उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसे संशोधन अनावश्यक भाषाई और सांस्कृतिक विवादों को जन्म देंगे तथा संविधान निर्माण के मूल उद्देश्य से ध्यान भटका देंगे।
  • अंततः संविधान सभा ने ‘Pradesh’ शब्द को अस्वीकार कर ‘State’ शब्द को बनाए रखा, क्योंकि यह अधिक स्पष्ट, व्यावहारिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य था।

संप्रभुता (Sovereignty) कहाँ निहित है?

महावीर त्यागी का महत्वपूर्ण प्रश्न

  • महावीर त्यागी ने संविधान सभा के सामने यह मूलभूत प्रश्न उठाया कि संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लेख होना चाहिए कि संप्रभुता (Sovereignty) का वास्तविक स्रोत कौन है।
  • उन्होंने प्रस्ताव रखा कि संविधान में यह स्पष्ट लिखा जाए कि संप्रभुता राज्यों, राजाओं या किसी संस्था में नहीं बल्कि सम्पूर्ण जनता में निहित है।
  • उनका तर्क था कि यदि संविधान इस विषय पर मौन रहा तो भविष्य में संप्रभुता की व्याख्या को लेकर विवाद उत्पन्न हो सकते हैं, विशेषकर पूर्व देशी रियासतों के संदर्भ में।
  • कई सदस्यों ने इस विचार का समर्थन करते हुए कहा कि आधुनिक लोकतंत्र में सभी शक्तियों का अंतिम स्रोत जनता होती है, इसलिए इसे संविधान में स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त किया जाना चाहिए।
  • यद्यपि यह संशोधन स्वीकार नहीं किया गया, लेकिन बाद में प्रस्तावना के शब्द ‘We, the People of India’ ने इस सिद्धांत को संवैधानिक मान्यता प्रदान कर दी कि भारत की संप्रभुता जनता में निहित है।

निष्कर्ष

  • संविधान सभा ने गहन विचार-विमर्श के बाद ‘India shall be a Union of States’ वाक्य को स्वीकार किया और यह स्पष्ट किया कि भारत साधारण संघीय समझौते (Federation by Agreement) का परिणाम नहीं, बल्कि एक अविभाज्य और अखंड संघ (Indestructible Union) है।
  • सभा ने ‘Federation’ शब्द के स्थान पर ‘Union’ शब्द को प्राथमिकता दी, क्योंकि संविधान निर्माताओं का उद्देश्य एक मजबूत केंद्र की स्थापना करना था तथा राज्यों को संघ से अलग होने का कोई अधिकार नहीं देना था।
  • ‘State’ के स्थान पर Pradesh’ या ‘Province’ शब्द रखने के प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया गया। जवाहरलाल नेहरू और डॉ. अम्बेडकर ने माना कि ‘State’ एक स्थापित संवैधानिक शब्द है, जबकि ‘Pradesh’ का कोई निश्चित विधिक अर्थ नहीं है।
  • प्रो. के. टी. शाह द्वारा ‘Secular’, ‘Federal’ और Socialist’ शब्द जोड़ने का प्रस्ताव भी स्वीकार नहीं किया गया। डॉ. अम्बेडकर का मत था कि संविधान को किसी विशेष राजनीतिक या आर्थिक विचारधारा से बाँधना उचित नहीं होगा; ऐसी नीतियों का निर्णय भविष्य की लोकतांत्रिक सरकारों पर छोड़ना चाहिए।
  • महावीर त्यागी तथा अन्य सदस्यों ने संप्रभुता के स्रोत को स्पष्ट करने की मांग की, जिसके पीछे यह विचार था कि सत्ता का अंतिम स्रोत जनता होनी चाहिए। यद्यपि यह अनुच्छेद 1 में नहीं जोड़ा गया, लेकिन बाद में प्रस्तावना के ‘We, the People of India’ शब्दों ने इस सिद्धांत को संवैधानिक आधार प्रदान किया।
  • इस बहस से यह सिद्ध हुआ कि भारतीय संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रीय एकता, मजबूत केंद्र, लोकतांत्रिक संप्रभुता और संघीय ढाँचे के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया।

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