जी-7 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भागीदारी इस बार महज एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं थी।फ्रांस के इवियान में यह भारत की 13वीं उपस्थिति थी और मोदी का 2019 के बाद सातवाँ जी-7 दौरा। यह निरंतरता अपने आप में एक संदेश है।भारत इस मंच को गंभीरता से लेता है और यह समूह भी भारत को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। लेकिन इस बार का संदर्भ पहले से कहीं अधिक जटिल है। दुनिया की सबसे पुरानी लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ खुद अपने भीतर बिखर रही हैं, और ऐसे में भारत के सामने चुनौती यह नहीं है कि वह पश्चिम और बाकी दुनिया के बीच कहाँ खड़ा हो,असली सवाल यह है कि वह पश्चिम के अंदर चल रही उठापटक को कैसे समझे और उससे कैसे निपटे।
जी-7 में भारत की यात्रा: एक लंबा सफर
भारत और जी-7 का रिश्ता कोई नया नहीं है। 2003 में इवियान में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पहली बार इस मंच पर आमंत्रित किया गया था।
उसके बाद मनमोहन सिंह 2005 से 2009 के बीच इस मंच पर गए। यह निरंतर जुड़ाव इस बात का प्रतीक है कि भारत 1990 के दशक से जिस आर्थिक रूपांतरण की राह पर चला, उसने उसे वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था में एक ऐसी ताकत बना दिया जिसे नज़रअंदाज़ करना संभव नहीं रहा।
शीत युद्ध के दौरान भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था और राजनीतिक दाँव-पेंच दोनों को सोवियत खेमे के करीब रखा था।
1991 में सोवियत संघ के विघटन और उसी वर्ष भारत के खुद के आर्थिक संकट ने एक साथ दो बड़े बदलाव किए: भारत की विदेश नीति को नई दिशा मिली और अर्थव्यवस्था के दरवाज़े खुले। इन्हीं बदलावों ने भारत को धीरे-धीरे पश्चिम के करीब लाया और जी-7 जैसे मंचों पर नियमित उपस्थिति की ज़मीन तैयार हुई।
पश्चिम के भीतर का संकट
परंतु आज का पश्चिम वह नहीं है जो 2003 में था। ट्रंप की वापसी ने अमेरिकी एकपक्षवाद को नए सिरे से परिभाषित किया है। “अमेरिका फर्स्ट” की नीति अब सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक कार्यक्रम बन चुकी है जिसके तहत अमेरिका अपने परंपरागत सहयोगियों पर भी दबाव बना रहा है। प्रमुख मुद्दों पर मतभेद गहरे हो रहे हैं और यूरोप व एशिया में अटलांटिक रिश्तों की चौड़ाई सिकुड़ती जा रही है।
तीन प्रमुख प्रवृत्तियाँ इस बदलाव को समझने में मदद करती हैं:
- पहली, अमेरिकी एकपक्षवाद का उभार, ट्रंप का झुकाव साफ है कि वह ‘अमेरिका फर्स्ट’ के नाम पर संकीर्ण राष्ट्रीय हित को आगे रखें, भले ही उसके लिए गठबंधनों की कीमत चुकानी पड़े।
- दूसरी, अमेरिकी सापेक्ष शक्ति का क्षरण — 1990 के दशक में यूरोपीय अर्थव्यवस्था अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लगभग बराबर थी, जापान भी काफी करीब था। आज यूरोज़ोन अमेरिकी जीडीपी के मुकाबले बहुत पीछे है और जापान तो अब और भी छोटा हो गया है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था वर्तमान में 31 ट्रिलियन डॉलर के करीब है और 2.5 फीसदी की दर से बढ़ रही है।
- तीसरी प्रवृत्ति है चीन का उभार,चीन अब जी-7 में नहीं है, लेकिन उसकी छाया इस समूह पर हमेशा बनी रहती है। वाशिंगटन ने उन्नत विनिर्माण, इलेक्ट्रिक वाहन, और प्रतिस्पर्धी कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल जैसे क्षेत्रों में चीन को काफी जगह दे दी है।
चीन का प्रश्न: भारत के सामने दोहरी चुनौती
2003 में इवियान की एक याद उल्लेखनीय है, उस समय चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ वाजपेयी के साथ बैठे थे। यह चीन का पहला पश्चिमी आउटरीच था। उस समय चीन की जीडीपी मुश्किल से 600 अरब डॉलर थी, भारत की भी तब करीब इतनी ही थी। आज चीन 20 ट्रिलियन डॉलर के करीब पहुँच चुका है जबकि भारत अभी भी 4 ट्रिलियन डॉलर से कम है।
यह अंतर सिर्फ संख्याओं का नहीं है। चीन ने जो किया वह तकनीकी और वैज्ञानिक स्तर पर भी उल्लेखनीय है। “नई गुणवत्ता उत्पादकता शक्तियाँ” जैसी अवधारणाएं चीन के इस दावे को रेखांकित करती हैं कि वह अब सिर्फ सस्ती मज़दूरी पर निर्भर अर्थव्यवस्था नहीं है। SpaceX का नैस्डैक पर दो ट्रिलियन डॉलर का मूल्यांकन एक नई तकनीकी क्रांति की झलक है,लेकिन अमेरिकी नवाचार तंत्र के भीतर बड़े पैमाने पर पूँजी बाज़ार की भूमिका उतनी है जितनी वास्तविक लाभप्रदता नहीं।

भारत के लिए यहाँ दोहरी चुनौती है:
- एक तरफ उसे पश्चिम के साथ रणनीतिक साझेदारी गहरी करनी है
- दूसरी तरफ चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव कम करना भी एजेंडे पर है।
जिस तरह चीन ने पाँच दशकों में पश्चिम के साथ रिश्ते मज़बूत करते हुए अपनी राष्ट्रीय ताकत भी बढ़ाई, वह भारत के नीति निर्माताओं के लिए एक मॉडल नहीं तो कम से कम एक सबक ज़रूर है।
ट्रंप, पाकिस्तान और भारत का समीकरण
- भारत की कूटनीतिक चुनौती सिर्फ बहुपक्षीय मंचों तक सीमित नहीं है। ट्रंप प्रशासन का पाकिस्तान के साथ नए सिरे से जुड़ाव भारत के लिए एक महत्त्वपूर्ण परीक्षा है।
- इज़रायल के साथ गठबंधन पर दबाव, तेहरान के साथ संभावित बड़े समझौते की ओर झुकाव, यूरोप-मध्य पूर्व-हिंद-प्रशांत की भू-राजनीति को नए सिरे से आकार देने की कोशिश, ये सब मिलकर एक ऐसे माहौल को जन्म दे रहे हैं जहाँ भारत को हर कदम बहुत सोच-समझकर रखना होगा।
- पुराने अनुभव से बँधकर नहीं, बल्कि नई वास्तविकताओं के अनुसार सोचने की ज़रूरत है। भारतीय कूटनीति की परंपरागत शैली (धैर्य, संयम, और रणनीतिक अस्पष्टता ) की इस दौर में और भी प्रासंगिक हो जाती है। लेकिन यह भी सच है कि महज धैर्य से काम नहीं चलेगा, सक्रिय संलग्नता ज़रूरी है।
रणनीतिक स्वायत्तता: एक पुरानी बहस, नया संदर्भ
- भारत की विदेश नीति में “रणनीतिक स्वायत्तता” एक केंद्रीय अवधारणा रही है। लेकिन आज दिल्ली के कई विद्वानों के बीच एक बहस चल रही है
- क्या रणनीतिक स्वायत्तता और पश्चिम के साथ साझेदारी परस्पर विरोधी हैं? चीन ने इस प्रश्न का एक उत्तर दिया उसने पश्चिम के साथ गहरे आर्थिक रिश्ते बनाए, लेकिन अपनी राष्ट्रीय क्षमता को भी कम नहीं होने दिया।
- कोरियाई युद्ध में अमेरिका के खिलाफ लड़ते हुए भी चीन ने बाद में वाशिंगटन के साथ जुड़ने की कला सीखी। यही कठोर यथार्थवाद चीनी रणनीति को भारतीय नीति की अक्सर बेचैन और प्रतिक्रियावादी शैली से अलग करता है।
- भारत के लिए ज़रूरी है कि वह रणनीतिक स्वायत्तता को केवल ‘किसी के साथ न जाने’ की नकारात्मक परिभाषा से आगे ले जाए। आज की दुनिया में स्वायत्तता का अर्थ है ,तकनीकी आत्मनिर्भरता, मज़बूत रक्षा औद्योगिक आधार, और ऐसी आर्थिक ताकत जो दूसरों को भारत के साथ संबंध रखने पर मजबूर करे।
घरेलू आधार: विदेश नीति की असली ताकत
यहीं वह बिंदु है जो अक्सर हम सभी की नज़रों से ओझल हो जाता है। किसी भी देश की विदेश नीति की ताकत उसके घरेलू आधार से आती है। अपर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण, रक्षा उद्योग को पुनर्जीवित करना, तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र को मज़बूत बनाना,ये केवल घरेलू मुद्दे नहीं हैं, ये भारत की विदेश नीति की मूल शर्तें हैं।
पश्चिम के साथ साझेदारी इस प्रयास में सहायक हो सकती है — और यही वह जगह है जहाँ भारत-पश्चिम संबंध का असली मूल्य है। तकनीकी हस्तांतरण, रक्षा सह-उत्पादन, अर्धचालक आपूर्ति श्रृंखला में भागीदारी,ये सब उस बड़े सौदे के हिस्से हैं जो भारत को पश्चिम के साथ करना है। लेकिन यह सब तभी संभव है जब भारत खुद को एक विश्वसनीय और मज़बूत साझेदार के रूप में प्रस्तुत करे न कि एक ऐसे देश के रूप में जो हमेशा अपनी “रणनीतिक स्वायत्तता” का हवाला देकर किसी भी प्रतिबद्धता से बचता रहे।
निष्कर्ष: नेविगेशन की कला
भारत की असली चुनौती पश्चिम और बाकी दुनिया के बीच चुनाव करने की नहीं है। वह चुनाव तो 1991 के बाद से ही व्यवहारतः हो चुका है। असली चुनाव यह है कि पश्चिम के भीतर चल रही उठापटक; अमेरिकी एकपक्षवाद, यूरोपीय अनिश्चितता, ट्रांसअटलांटिक रिश्तों में खिंचाव के बीच भारत अपने हितों को कैसे साधे।
इसके लिए ज़रूरी है एक परिपक्व, यथार्थवादी और दीर्घकालीन सोच। न तो पश्चिम की हर बात पर हाँ करना, और न ही “रणनीतिक स्वायत्तता” के नाम पर खुद को हर बड़े निर्णय से अलग रखना। जैसे एक कुशल नाविक तूफान में पाल की दिशा बदलकर आगे बढ़ता है,उसी तरह भारत को भी इस बदलती विश्व व्यवस्था में अपनी राह निकालनी होगी।
2003 में जब इवियान में चीन का राष्ट्रपति और भारत का प्रधानमंत्री एक ही मेज़ पर बैठे थे, दोनों देशों की जीडीपी लगभग बराबर थी। आज चीन भारत से पाँच गुना बड़ा है। यह अंतर सिर्फ नीतिगत नहीं, बल्कि इरादे और निरंतरता का है। आने वाले दशक में भारत को यह तय करना होगा कि वह जी-7 के मंचों पर केवल “आमंत्रित अतिथि” रहेगा या एक ऐसी ताकत बनेगा जिसके बिना इन मंचों की बैठकें अधूरी मानी जाएँ।
परीक्षा उपयोगी संक्षिप्त वन लाइनर तथ्य
- G7 में कनाडा, फ्रांँस, जर्मनी, इटली, जापान, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका शामिल हैं।
- यह एक अंतर-सरकारी संगठन है जिसका गठन वर्ष 1975 में उस समय की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं द्वारा वैश्विक मुद्दों पर चर्चा करने के लिये एक अनौपचारिक मंच के रूप में किया गया था।
- इसके तहत वैश्विक आर्थिक व्यवस्था, अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा और ऊर्जा नीति जैसे साझा हित के मुद्दों पर चर्चा करने के लिये वार्षिक रूप से बैठक की जाती है।
- फ्रांँस, पश्चिम जर्मनी, इटली, जापान, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका ने 1975 में छह देशों के समूह (Group of Six) का गठन किया।
- 1976 में कनाडा को भी समूह में शामिल होने के लिये आमंत्रित किया गया और सभी G-7 राष्ट्रों की पहली बैठक संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा वर्ष 1976 में प्यूर्टो रिको में आयोजित की गई।
- 1997 में इस मूल सात देशों के समूह में रूस के शामिल होने के बाद G-7 को कई वर्षों तक G-8 के रूप में जाना जाता था।
- रूस द्वारा यूक्रेन के क्रीमिया क्षेत्र के अधिग्रहण के बाद वर्ष 2014 में रूस की सदस्यता रद्द कर दी गई और यह समूह पुनः G-7 कहा जाने लगा।
- जी-7 बैठकों में भारत की भागीदारी की शुरुआत 2003 (एवियन, फ्रांस) में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के समय हुई थी।
- प्रधानमंत्री मोदी इस सम्मेलन में 2019 से शिरकत कर रहे हैं।
अभ्यास प्रश्न
प्रश्न 1.जी-7 शिखर सम्मेलन में भारत की नियमित भागीदारी उसकी बदलती वैश्विक स्थिति को किस प्रकार प्रतिबिंबित करती है? 1991 के आर्थिक सुधारों के संदर्भ में विश्लेषण कीजिए।
प्रश्न 2.”रणनीतिक स्वायत्तता” की अवधारणा को भारत-पश्चिम संबंधों के परिप्रेक्ष्य में परिभाषित कीजिए। क्या यह अवधारणा आज के बहुध्रुवीय विश्व में व्यावहारिक है?
प्रश्न 3.ट्रंप प्रशासन की “अमेरिका फर्स्ट” नीति ने ट्रांसअटलांटिक संबंधों को किस प्रकार प्रभावित किया है? भारत के लिए इसके निहितार्थ स्पष्ट कीजिए।
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