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निरस्त्रीकरण एवं अप्रसार की प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संधियाँ

1. अंटार्कटिक संधि, 1959 (Antarctic Treaty, 1959)

द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात शीतयुद्ध के तनाव के बीच अंटार्कटिका को लेकर विभिन्न देशों के बीच क्षेत्रीय दावे तीव्र होने लगे थे। अर्जेंटीना, चिली, ब्रिटेन, नॉर्वे, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और फ्रांस जैसे देशों ने अंटार्कटिका के विभिन्न क्षेत्रों पर अपना संप्रभु अधिकार जताना आरंभ कर दिया था। इस विवाद को सुलझाने एवं इस महाद्वीप को किसी भी प्रकार के सैन्य संघर्ष से दूर रखने के उद्देश्य से 1957 से 1958 के बीच अंतर्राष्ट्रीय भूभौतिकीय वर्ष (International Geophysical Year) के दौरान बहुपक्षीय वैज्ञानिक सहयोग की नींव पड़ी, जो बाद में इस संधि का आधार बनी।

(a) हस्ताक्षर एवं लागू होने की तिथि
इस संधि पर 1 दिसंबर 1959 को वाशिंगटन डी.सी. में हस्ताक्षर हुए। इसे लागू होने के लिए सभी 12 मूल हस्ताक्षरकर्ता देशों की संसद से अनुमोदन आवश्यक था, जो 23 जून 1961 को पूर्ण हुआ।

(b) मूल हस्ताक्षरकर्ता देश
12 देशों ने इस संधि पर आरंभ में हस्ताक्षर किए, जिनमें संयुक्त राज्य अमेरिका, सोवियत संघ, ब्रिटेन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना, चिली, न्यूजीलैंड, नॉर्वे, बेल्जियम, जापान और दक्षिण अफ्रीका सम्मिलित थे।

(c) संधि के प्रमुख प्रावधान:

  • संधि का अनुच्छेद 1 स्पष्ट करता है कि अंटार्कटिका का उपयोग केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया जाएगा। किसी भी सैन्य ठिकाने की स्थापना, सैन्य प्रशिक्षण, एवं किसी भी प्रकार के हथियार का परीक्षण इस क्षेत्र में वर्जित है।
  • अनुच्छेद 5 के अंतर्गत अंटार्कटिका को परमाणु-मुक्त क्षेत्र घोषित किया गया। यहाँ किसी भी प्रकार के परमाणु विस्फोट पर पूर्ण प्रतिबंध है तथा रेडियोधर्मी कचरे का निपटान भी निषिद्ध है।
  • अनुच्छेद 2 वैज्ञानिक अनुसंधान की स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है। सभी देश अपने शोध के परिणाम साझा करेंगे और अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग को प्रोत्साहित किया जाएगा।
  • अनुच्छेद 4 क्षेत्रीय दावों के विवाद को “फ्रीज” करता है। इसका अर्थ यह है कि संधि न तो किसी देश के पूर्व क्षेत्रीय दावों को मान्यता देती है और न ही उन्हें अस्वीकार करती है। यह सबसे महत्त्वपूर्ण कूटनीतिक समझौता माना जाता है क्योंकि इसने संघर्ष की संभावना को अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया।
  • अनुच्छेद 7 के तहत निरीक्षण की व्यवस्था की गई है। किसी भी हस्ताक्षरकर्ता देश का पर्यवेक्षक दल किसी भी अन्य देश के अनुसंधान केंद्र का बिना पूर्व सूचना के निरीक्षण कर सकता है।

(d) संधि प्रणाली का विस्तार:

  • 1959 की मूल संधि के आधार पर अंटार्कटिक संधि प्रणाली (Antarctic Treaty System) विकसित हुई, जिसके अंतर्गत कई महत्त्वपूर्ण समझौते शामिल हुए।
  • 1972 का सीलों के संरक्षण पर अभिसमय (Convention for Conservation of Antarctic Seals),
  • 1980 का अंटार्कटिक समुद्री जीव संसाधन संरक्षण अभिसमय (CCAMLR),
  • 1991 का मैड्रिड प्रोटोकॉल (Protocol on Environmental Protection) जो खनिज संसाधनों के दोहन पर 50 वर्षों के लिए प्रतिबंध लगाता है, इस प्रणाली के प्रमुख स्तंभ हैं।

महत्त्व एवं आलोचनात्मक मूल्यांकन:

यह संधि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में उस दुर्लभ उदाहरण के रूप में स्थापित है जब शीतयुद्ध के चरम काल में भी दो प्रतिद्वंद्वी महाशक्तियाँ किसी भूभाग के सैन्यीकरण को रोकने में सफल रहीं। हालाँकि आलोचक यह भी कहते हैं कि इस संधि ने विकासशील देशों के हितों की अनदेखी की क्योंकि इसमें उन्हें आरंभ में शामिल नहीं किया गया। वर्तमान में 56 से अधिक देश इस संधि के सदस्य हैं।

2. आंशिक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि, 1963(Partial Test Ban Treaty, 1963)

1945 में हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बमबारी के पश्चात परमाणु हथियारों की विनाशकारी शक्ति विश्व के समक्ष स्पष्ट हो गई थी। 1950 के दशक में अमेरिका और सोवियत संघ दोनों ने भूमि, जल और वायुमंडल में बड़े पैमाने पर परमाणु परीक्षण किए जिससे वातावरण में रेडियोधर्मी प्रदूषण तेजी से फैला। 1961 में सोवियत संघ ने “ज़ार बम्बा” का परीक्षण किया जो इतिहास का सबसे शक्तिशाली परमाणु विस्फोट था। इसके अतिरिक्त 1962 के क्यूबा मिसाइल संकट ने परमाणु युद्ध की संभावना को वास्तविक रूप से सामने ला दिया, जिसने दोनों महाशक्तियों को वार्ता के लिए प्रेरित किया।

(a) हस्ताक्षर एवं लागू होने की तिथि

इस संधि पर 5 अगस्त 1963 को मॉस्को में अमेरिका, सोवियत संघ और ब्रिटेन ने हस्ताक्षर किए। इसीलिए इसे मॉस्को संधि भी कहा जाता है। 10 अक्टूबर 1963 को यह संधि प्रभावी हो गई।

(b)संधि के प्रमुख प्रावधान

इस संधि के अंतर्गत वायुमंडल में, समुद्र के भीतर और बाह्य अंतरिक्ष में परमाणु परीक्षणों पर प्रतिबंध लगाया गया। भूमिगत परमाणु परीक्षणों को तब तक अनुमति दी गई जब तक कि उससे रेडियोधर्मी विखंडन (radioactive fallout) अन्य देशों की सीमाओं से परे न पहुँचे।

(c) “आंशिक” क्यों है यह संधि

यह संधि “आंशिक” इसलिए कही जाती है क्योंकि इसमें भूमिगत परमाणु परीक्षणों को पूर्ण रूप से प्रतिबंधित नहीं किया गया। इसका मुख्य कारण यह था कि भूमिगत परीक्षणों के सत्यापन के लिए कोई सर्वमान्य तंत्र उस समय उपलब्ध नहीं था और सोवियत संघ किसी भी प्रकार के अंतर्राष्ट्रीय निरीक्षण का विरोध करता था।

(d) संधि में सम्मिलित न होने वाले देश

फ्रांस और चीन ने इस संधि पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। फ्रांस ने 1960 में और चीन ने 1964 में परमाणु शक्ति सम्पन्न देश के रूप में अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के बाद इस संधि को अपने हितों के विरुद्ध माना।

(e) भारत का रुख

भारत ने इस संधि पर हस्ताक्षर किए, किंतु उसने यह भी स्पष्ट किया कि केवल वायुमंडलीय परीक्षणों पर प्रतिबंध पर्याप्त नहीं है। भारत ने बाद में व्यापक परीक्षण प्रतिबंध की माँग करते हुए संयुक्त राष्ट्र में राजीव गाँधी की अगुआई में 1988 में निरस्त्रीकरण योजना प्रस्तुत की।

(f) महत्त्व एवं सीमाएँ

PTBT ने पर्यावरण की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कदम उठाया क्योंकि इससे वायुमंडल में रेडियोधर्मी प्रदूषण में उल्लेखनीय कमी आई। यह भी महत्त्वपूर्ण है कि यह संधि परमाणु हथियारों के उत्पादन या भंडारण पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं लगाती। अतः आलोचकों के अनुसार यह वास्तव में परमाणु निरस्त्रीकरण की दिशा में एक छोटा किंतु प्रतीकात्मक कदम था।

3. परमाणु अप्रसार संधि, 1968(NPT, 1968)

1960 के दशक में यह आशंका प्रबल हो रही थी कि अनेक देश जल्द ही परमाणु शक्ति सम्पन्न हो जाएंगे। 1964 में चीन ने परमाणु परीक्षण किया, जिसके बाद यह स्पष्ट हो गया कि परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के लिए एक व्यापक अंतर्राष्ट्रीय ढाँचे की आवश्यकता है। संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ दोनों इस बात पर सहमत थे कि परमाणु हथियारों का अनियंत्रित प्रसार दोनों के लिए समान रूप से खतरनाक है।

(a) हस्ताक्षर एवं लागू होने की तिथि

इस संधि पर 1 जुलाई 1968 को हस्ताक्षर हुए और यह 5 मार्च 1970 को प्रभावी हुई। 1995 में इसे अनिश्चितकाल के लिए विस्तारित किया गया।

(b) संधि की मूल अवधारणा और तीन स्तंभ

NPT तीन मूल स्तंभों पर खड़ी है:

  1. पहला स्तंभ है अप्रसार (Non-Proliferation)। परमाणु हथियार सम्पन्न देश (NWS) अपने हथियार किसी अन्य देश को नहीं देंगे, और गैर-परमाणु हथियार देश (NNWS) इन्हें प्राप्त करने का प्रयास नहीं करेंगे।
  2. दूसरा स्तंभ है निरस्त्रीकरण (Disarmament)। अनुच्छेद 6 के तहत परमाणु हथियार सम्पन्न देश निरस्त्रीकरण की दिशा में ईमानदारीपूर्वक प्रयास करेंगे। यह प्रावधान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसे लेकर परमाणु और गैर-परमाणु देशों के बीच सतत विवाद बना रहता है।
  3. तीसरा स्तंभ है शांतिपूर्ण उपयोग का अधिकार (Peaceful Use)। प्रत्येक सदस्य देश को परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग का अधिकार प्राप्त है। अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) इस उद्देश्य के लिए तकनीकी सहयोग प्रदान करेगी।

(c) परमाणु हथियार सम्पन्न देशों की परिभाषा

NPT के अंतर्गत केवल वे देश परमाणु हथियार सम्पन्न देश माने जाते हैं जिन्होंने 1 जनवरी 1967 से पूर्व परमाणु परीक्षण किया हो। इस परिभाषा के अनुसार केवल पाँच देश मान्यता प्राप्त NWS हैं, अमेरिका, रूस (पूर्व सोवियत संघ), ब्रिटेन, फ्रांस और चीन। ये वही पाँच देश हैं जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं।

(d) निरीक्षण तंत्र

IAEA सुरक्षा उपाय (Safeguards) समझौतों के माध्यम से यह सुनिश्चित करता है कि गैर-परमाणु देश परमाणु सामग्री का दुरुपयोग न करें। IAEA के निरीक्षक किसी भी सदस्य देश के परमाणु प्रतिष्ठानों का निरीक्षण कर सकते हैं।

(e) भारत का NPT से बाहर रहना और उसके कारण

भारत ने NPT पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। भारत का तर्क है कि NPT एक भेदभावपूर्ण संधि है जो विश्व को दो असमान वर्गों में बाँटती है। वे देश जिन्होंने 1967 से पहले परमाणु हथियार बनाए, उन्हें अपने हथियार रखने की अनुमति है, जबकि बाकी सभी देशों के लिए यह निषिद्ध है। भारत का मानना है कि सच्चा समाधान सार्वभौमिक निरस्त्रीकरण है। 1974 में भारत ने “शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट” (Pokhran-I) और 1998 में Pokhran-II परीक्षण किए। पाकिस्तान और इजरायल ने भी NPT पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।

(f) उत्तर कोरिया का मामला

उत्तर कोरिया ने 1985 में NPT पर हस्ताक्षर किए किंतु 2003 में संधि से बाहर हो गया। यह NPT के इतिहास का अब तक का एकमात्र उदाहरण है जब किसी देश ने संधि से अपनी सदस्यता वापस ली।

(g) इराक और लीबिया के मामले

इराक एवं लीबिया NPT के सदस्य थे, फिर भी उन्होंने गुप्त परमाणु कार्यक्रम चलाए। इससे NPT की सत्यापन क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगा।

(h) महत्त्व एवं आलोचना

NPT को परमाणु अप्रसार के क्षेत्र में आधारशिला संधि माना जाता है। इसके बावजूद यह संधि अनेक कारणों से विवादास्पद रही है। पहली आलोचना यह है कि NWS देशों ने अनुच्छेद 6 के तहत निरस्त्रीकरण के प्रति प्रतिबद्धता पूरी नहीं की और उनके पास आज भी हजारों परमाणु हथियार हैं। दूसरी आलोचना यह है कि भारत, पाकिस्तान और इजरायल जैसे देश संधि के बाहर रहकर परमाणु हथियार विकसित कर सके, जो संधि की सार्वभौमिकता पर प्रश्न उठाता है।

4. मिसाइल-रोधी प्रतिरक्षा संधि, 1972 (Anti-Ballistic Missile Treaty, 1972)

1960 के दशक के अंत तक अमेरिका और सोवियत संघ दोनों ने मिसाइल-रोधी प्रणाली (Anti-Ballistic Missile System) विकसित कर ली थी। इन प्रणालियों का उद्देश्य था कि यदि शत्रु परमाणु मिसाइल दागे तो उसे बीच में ही नष्ट किया जा सके। प्रथम दृष्टया यह रक्षात्मक प्रणाली लाभदायक प्रतीत होती थी, किंतु सामरिक विशेषज्ञों ने यह समझा कि यदि कोई देश प्रभावी ABM प्रणाली बना ले तो वह पहले परमाणु प्रहार करने की स्थिति में आ जाएगा (First Strike Capability) क्योंकि शत्रु के जवाबी हमले को रोका जा सकेगा। इससे परस्पर सुनिश्चित विनाश (MAD – Mutually Assured Destruction) का संतुलन बिगड़ सकता था जो शीतयुद्ध के दौरान एक प्रकार की स्थिरता प्रदान कर रहा था।

SALT-I और ABM संधि का संबंध

ABM संधि रणनीतिक शस्त्र सीमा वार्ता (Strategic Arms Limitation Talks / SALT-I) के अंग के रूप में उभरी। SALT-I के तहत दो समझौते हुए, एक अंतरिम समझौता जो आक्रामक हथियारों की संख्या को सीमित करता था, और दूसरा ABM संधि जो रक्षात्मक मिसाइल प्रणालियों पर प्रतिबंध लगाती थी।

हस्ताक्षर एवं लागू होने की तिथि

इस संधि पर 26 मई 1972 को मॉस्को में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और सोवियत महासचिव लियोनिद ब्रेझनेव ने हस्ताक्षर किए। यह संधि 3 अक्टूबर 1972 को लागू हुई।

संधि के प्रमुख प्रावधान:

  • प्रत्येक देश को केवल दो स्थानों पर ABM प्रणाली तैनात करने की अनुमति थी। एक अपनी राजधानी की सुरक्षा के लिए और दूसरी ICBM (अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल) के एक क्षेत्र की सुरक्षा के लिए।
  • 1974 में एक प्रोटोकॉल के माध्यम से इसे और सीमित कर दिया गया। इसके अंतर्गत प्रत्येक देश को केवल एक स्थान पर ABM प्रणाली रखने की अनुमति दी गई। सोवियत संघ ने मॉस्को की सुरक्षा को चुना और अमेरिका ने नॉर्थ डकोटा में अपने ICBM क्षेत्र की सुरक्षा को प्राथमिकता दी।
  • संधि के तहत समुद्री, वायु या अंतरिक्ष आधारित ABM प्रणालियाँ भी पूर्णतः वर्जित थीं।

MAD सिद्धांत और ABM संधि का तर्क

परस्पर सुनिश्चित विनाश (MAD) का सिद्धांत यह मानता था कि यदि दोनों पक्षों के पास पर्याप्त परमाणु हथियार हों और दोनों जानते हों कि पहले प्रहार के बाद भी शत्रु जवाबी हमला करने में सक्षम है, तो कोई भी देश पहले प्रहार का जोखिम नहीं उठाएगा। ABM प्रणाली इस संतुलन को तोड़ सकती थी, इसलिए उस पर प्रतिबंध लगाना दोनों देशों के हित में था।

“स्टार वार्स” कार्यक्रम और संधि पर खतरा

1983 में अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने रणनीतिक रक्षा पहल (Strategic Defense Initiative / SDI) की घोषणा की, जिसे लोकप्रिय रूप से “स्टार वार्स” कहा गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य अंतरिक्ष में ऐसी प्रणाली स्थापित करना था जो परमाणु मिसाइलों को उड़ान के दौरान ही नष्ट कर सके। सोवियत संघ ने इसे ABM संधि का उल्लंघन बताया और दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया।

अमेरिका द्वारा संधि से अलगाव

13 दिसंबर 2001 को अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने ABM संधि से अमेरिका की वापसी की घोषणा की। उन्होंने तर्क दिया कि 11 सितंबर 2001 के आतंकी हमलों के बाद नए खतरों से निपटने के लिए मिसाइल रक्षा प्रणाली आवश्यक है। 13 जून 2002 को अमेरिका औपचारिक रूप से ABM संधि से अलग हो गया। ABM संधि ऐसी एकमात्र प्रमुख शस्त्र नियंत्रण संधि थी जिससे अमेरिका ने स्वेच्छा से अलगाव लिया।

महत्त्व

ABM संधि शीतयुद्धकालीन शस्त्र नियंत्रण की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। इसने यह सिद्धांत स्थापित किया कि रक्षात्मक हथियार भी हथियारों की दौड़ को बढ़ावा दे सकते हैं। इसका दूरगामी महत्त्व यह था कि इसने दोनों महाशक्तियों के बीच सामरिक स्थिरता बनाए रखी।

5. व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि, 1996 ( CTBT, 1996)

1963 की PTBT के पश्चात भूमिगत परमाणु परीक्षण जारी रहे। 1968 की NPT ने भी परीक्षणों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया। 1974 में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच “थ्रेशोल्ड टेस्ट बैन ट्रिटी” (TTBT) हुई जिसने 150 किलोटन से अधिक के भूमिगत परीक्षणों पर प्रतिबंध लगाया। 1976 में “शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट संधि” (PNET) हुई। 1990 के दशक में शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद एक व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध की दिशा में नई गति आई।

हस्ताक्षर

CTBT को 10 सितंबर 1996 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अपनाया। उसी वर्ष 24 सितंबर 1996 को न्यूयॉर्क में इस पर हस्ताक्षर प्रारंभ हुए। वर्तमान में 186 से अधिक देशों ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं जबकि 177 से अधिक देशों ने इसका अनुमोदन किया है।

CTBT अभी तक लागू क्यों नहीं हुई

CTBT की एक विशेष और जटिल प्रवेश प्रावधान शर्त है। यह संधि तभी प्रभावी होगी जब 44 विशिष्ट देश इसे अनुमोदित करें। ये 44 देश वे हैं जिनके पास 1996 में परमाणु ऊर्जा या परमाणु अनुसंधान की क्षमता थी और जो IAEA के सदस्य थे। इन 44 देशों में से 8 देशों ने अभी तक इसका अनुमोदन नहीं किया है, जिनमें भारत, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया, अमेरिका, चीन, इजरायल, ईरान और मिस्र सम्मिलित हैं। इस कारण CTBT तीन दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी आज तक लागू नहीं हो पाई है।

संधि के प्रमुख प्रावधान

  • CTBT किसी भी वातावरण में परमाणु विस्फोट पर पूर्ण प्रतिबंध लगाती है।
  • इसमें वायुमंडल, समुद्र, भूमि और भूमिगत सभी प्रकार के परमाणु परीक्षण शामिल हैं।
  • शांतिपूर्ण उद्देश्यों के नाम पर भी किसी प्रकार के परमाणु विस्फोट की अनुमति नहीं है।

व्यापक परीक्षण प्रतिबंध संधि संगठन (CTBTO)

संधि की निगरानी के लिए वियना में CTBTO (Comprehensive Nuclear-Test-Ban Treaty Organization) का मुख्यालय स्थापित किया गया। CTBTO ने एक अत्यंत उन्नत अंतर्राष्ट्रीय निगरानी प्रणाली (International Monitoring System / IMS) विकसित की है। इस प्रणाली के चार प्रमुख घटक हैं।

  1. पहला है भूकंपीय निगरानी (Seismic Monitoring) जो भूमिगत परमाणु विस्फोटों को प्राकृतिक भूकंपों से अलग पहचानती है।
  2. दूसरा है ध्वनि-तरंग निगरानी (Hydroacoustic Monitoring) जो समुद्री विस्फोटों का पता लगाती है।
  3. तीसरा है अवरक्त ध्वनि निगरानी (Infrasound Monitoring) जो वायुमंडलीय विस्फोटों को पकड़ती है।
  4. चौथा है रेडियोन्यूक्लाइड निगरानी (Radionuclide Monitoring) जो वायुमंडल में रेडियोधर्मी कण और गैसों का पता लगाती है।

भारत का CTBT के प्रति रुख

भारत ने CTBT पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया। भारत का तर्क है कि CTBT में निरस्त्रीकरण के लिए कोई बाध्यकारी समय-सीमा नहीं है। यह संधि केवल परीक्षणों को रोकती है किंतु वर्तमान परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों को अपने पहले से विकसित उन्नत हथियार भंडार रखने का अधिकार देती है। 1998 के पोखरण-II परीक्षणों के पश्चात भारत पर CTBT पर हस्ताक्षर करने का अंतर्राष्ट्रीय दबाव और बढ़ा, किंतु भारत ने सार्वभौमिक निरस्त्रीकरण की शर्त से अपना रुख नहीं बदला।

अमेरिका की स्थिति

अमेरिकी सीनेट ने 1999 में CTBT को अनुमोदित करने से मना कर दिया। यह क्लिंटन प्रशासन के लिए एक बड़ा कूटनीतिक पराजय था। इसके पश्चात अमेरिका ने इस पर पुनः विचार नहीं किया, हालाँकि उसने 1992 से परमाणु परीक्षणों पर स्वैच्छिक रोक लगाई हुई है।

CTBT का महत्त्व

CTBT भले ही अभी तक लागू न हुई हो, किंतु इसका निगरानी तंत्र (IMS) इतना प्रभावी है कि उत्तर कोरिया के सभी छह परमाणु परीक्षणों (2006, 2009, 2013, 2016 में दो बार, और 2017) का पता इसी प्रणाली से लगाया गया। CTBT यह सिद्धांत स्थापित करती है कि किसी भी प्रकार का परमाणु परीक्षण अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए अस्वीकार्य है।

तुलनात्मक विश्लेषण एवं परस्पर संबंध

इन पाँचों संधियों को एक क्रमिक विकास के रूप में देखा जाना चाहिए।

  • अंटार्कटिक संधि ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि पृथ्वी के कुछ क्षेत्रों को सैन्यीकरण से मुक्त रखा जा सकता है।
  • PTBT ने पर्यावरण की रक्षा का आयाम जोड़ा और यह दिखाया कि परमाणु शक्तियाँ परीक्षण के कुछ रूपों पर प्रतिबंध स्वीकार कर सकती हैं।
  • NPT ने व्यापक अप्रसार ढाँचा प्रदान किया, हालाँकि यह भेदभावपूर्ण है।
  • ABM संधि ने रक्षात्मक हथियारों की सीमा तय कर सामरिक स्थिरता को परिभाषित किया।
  • CTBT ने परमाणु परीक्षणों पर सम्पूर्ण प्रतिबंध का लक्ष्य रखा और निगरानी के उन्नत वैज्ञानिक तंत्र को विकसित किया।

तीनों प्रमुख संधियों (PTBT, NPT, CTBT) में यह समानता है कि वे परमाणु हथियारों की दुनिया में एक दोहरे मानक को बनाए रखती हैं जहाँ परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों के अधिकार एवं दायित्व गैर-परमाणु देशों से भिन्न हैं।

UGC NET PYQ 

प्रश्न 1 (UGC NET, दिसंबर 2019)

निम्नलिखित में से कौन सी संधि 1963 में मास्को में हस्ताक्षरित हुई थी?

(A) परमाणु अप्रसार संधि

(B) आंशिक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि

(C) व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि

(D) मिसाइल-रोधी प्रतिरक्षा संधि

उत्तर: (B)

प्रश्न 2 (UGC NET, जून 2019)

परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?

(A) भारत NPT का संस्थापक सदस्य है

(B) NPT 1 जनवरी 1968 को लागू हुई

(C) NPT केवल दो देशों के बीच की द्विपक्षीय संधि है

(D) NPT के अंतर्गत केवल वे देश परमाणु शक्ति सम्पन्न माने जाते हैं जिन्होंने 1 जनवरी 1967 से पूर्व परमाणु परीक्षण किया हो

उत्तर: (D)

प्रश्न 3 (UGC NET, दिसंबर 2018)

CTBT के प्रवेश-प्रावधान (Entry into Force) के संबंध में कितने देशों का अनुमोदन आवश्यक है?

(A) 36

(B) 40

(C) 44

(D) 50

उत्तर: (C)

प्रश्न 4 (UGC NET, जून 2018)

अंटार्कटिक संधि के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन सा कथन असत्य है?

(A) यह 1959 में वाशिंगटन में हस्ताक्षरित हुई

(B) इसने अंटार्कटिका को परमाणु-मुक्त क्षेत्र घोषित किया

(C) इसने अंटार्कटिका पर सभी क्षेत्रीय दावों को समाप्त कर दिया

(D) इसमें मूलतः 12 देश हस्ताक्षरकर्ता थे

उत्तर: (C)

प्रश्न 5 (UGC NET, जून 2017)

मिसाइल-रोधी प्रतिरक्षा संधि (ABM Treaty) 1972 से अमेरिका ने किस वर्ष अलगाव लिया?

(A) 1999

(B) 2001

(C) 2002

(D) 2003

उत्तर: (C)


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