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कौन सा दस्तावेज़ सिद्ध करता है भारतीय नागरिकता?

भारत एक संप्रभु गणराज्य है और नागरिकता उसकी आत्मा है। किंतु जब यह प्रश्न उठता है कि भारतीय नागरिकता को प्रमाणित करने वाला एकमात्र और निर्णायक दस्तावेज़ कौन सा है, तो उत्तर उतना सहज नहीं है जितना प्रतीत होता है। विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने द हिंदू की जिज्ञासा के उत्तर में स्पष्ट किया कि भारतीय पासपोर्ट नागरिकता का कोई अकाट्य प्रमाण नहीं है। इस कथन ने एक व्यापक बहस को जन्म दिया है, जो संविधान, कानून और व्यक्ति के मूल अधिकारों से जुड़ी है।

संवैधानिक आधार: नागरिकता की जड़ें

भारतीय संविधान का भाग-II, अनुच्छेद 5 से 11 तक, नागरिकता के प्रारंभिक प्रावधानों को परिभाषित करता है। संविधान लागू होने के समय जो व्यक्ति भारत में जन्मे थे, या जिनके माता-पिता भारत में जन्मे थे, या जो पाँच वर्षों से अधिक भारत में निवास कर रहे थे, वे नागरिक माने गए। किंतु संविधान ने यह भी कहा कि नागरिकता के विस्तृत प्रावधान संसद द्वारा कानून के माध्यम से निर्धारित किए जाएंगे।

इसी के अनुरूप नागरिकता अधिनियम, 1955 अस्तित्व में आया। इस अधिनियम के अंतर्गत नागरिकता चार प्रमुख आधारों पर प्राप्त होती है: जन्म से, वंश से, पंजीकरण से और देशीयकरण से। अधिनियम की धारा 5 के अंतर्गत पंजीकृत नागरिकों और धारा 6 के अंतर्गत देशीयकृत नागरिकों को नागरिकता प्रमाण पत्र जारी किया जाता है। यह प्रमाण पत्र नागरिकता का निर्णायक दस्तावेज़ माना जाता है। किंतु अधिकांश भारतीय, जो जन्म या वंश से नागरिक हैं, उनके पास ऐसा कोई प्रमाण पत्र होता ही नहीं।

पासपोर्ट: यात्रा दस्तावेज़ है, नागरिकता का प्रमाण नहीं

सामान्यतः यह माना जाता है कि भारतीय पासपोर्ट नागरिकता का सबसे मजबूत प्रमाण है। किंतु विधिक दृष्टि से यह धारणा सही नहीं है। सरकार का पासपोर्ट मैनुअल स्पष्ट रूप से कहता है कि पासपोर्ट धारक की राष्ट्रीयता का प्रमाण है, नागरिकता की स्थिति का नहीं। राष्ट्रीयता और नागरिकता दो अलग अवधारणाएं हैं।

  • पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 6(2)(a) के अनुसार यदि आवेदक भारत का नागरिक नहीं है तो अधिकारी पासपोर्ट देने से मना कर सकते हैं। किंतु इसी अधिनियम की धारा 20 के अंतर्गत सरकार किसी ऐसे व्यक्ति को भी यात्रा दस्तावेज़ जारी कर सकती है जो भारत का नागरिक नहीं है, यदि यह जनहित में आवश्यक हो। इससे स्पष्ट है कि पासपोर्ट का होना नागरिकता की गारंटी नहीं देता।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने मनेका गांधी बनाम भारत संघ (1978) के ऐतिहासिक निर्णय में माना था कि पासपोर्ट जारी करना इस आधार पर होता है कि धारक भारतीय नागरिक है, किंतु इसे नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। यदि किसी की नागरिकता विवादित है तो न्यायालय पासपोर्ट के साथ अन्य साक्ष्यों पर भी विचार करेगा।

यह प्रश्न केवल सैद्धांतिक नहीं है। NRC की विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान उत्तर प्रदेश में कुछ मतदाताओं को मसौदा NRC से हटाया गया, जबकि उनके पास भारतीय पासपोर्ट था। पश्चिम बंगाल में भी ऐसे मामले सामने आए जहां पासपोर्ट धारक मसौदा मतदाता सूची से बाहर थे। इससे यह प्रश्न और गंभीर हो जाता है।

आधार: पहचान है, नागरिकता का आधार नहीं

  • जब आधार आया था तो इसे एकल डिजिटल पहचान दस्तावेज़ के रूप में प्रस्तुत किया गया था जो अनेक दस्तावेज़ों की आवश्यकता को समाप्त कर देगा। किंतु भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण ने शुरू से ही यह स्पष्ट किया है कि आधार केवल पहचान और पते का प्रमाण है, नागरिकता का नहीं।
  • भारत में निवास करने वाले गैर-नागरिक भी आधार प्राप्त करने के पात्र हैं। इसलिए आधार की उपस्थिति मात्र से यह सिद्ध नहीं होता कि कोई व्यक्ति भारत का नागरिक है। सर्वोच्च न्यायालय ने मई 2017 के एक निर्णय में स्पष्ट किया था कि आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं है और इसलिए इसे नागरिकता के निर्णायक साक्ष्य के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता।
  • चुनाव आयोग ने आधार को नागरिकता प्रमाण की 11 सूचक दस्तावेज़ों की सूची में अवश्य स्थान दिया है। किंतु यह सूचक मात्र है, निर्णायक नहीं।

मतदाता पहचान पत्र और चुनावी सूची: क्या यह नागरिकता प्रमाणित करती है?

  • भारत में केवल नागरिक ही मतदान कर सकते हैं, इसलिए सहज बोध यह कहता है कि मतदाता सूची में नाम होना नागरिकता का प्रमाण होना चाहिए। किंतु कानूनी व्यवस्था इस सहज बोध को पूर्णतः स्वीकार नहीं करती।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने लाल बाबू हुसैन बनाम इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (1995) के निर्णय में माना था कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची में हैं उन्हें नागरिकता की उपधारणा प्राप्त होती है और यह उपधारणा केवल विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करके ही खंडित की जा सकती है।
  • किंतु उसी निर्णय में न्यायालय ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग की भूमिका मतदाता सूची के लिए पात्रता निर्धारित करने तक सीमित है। वह नागरिकता का न्याय-निर्णयन नहीं कर सकता। नागरिकता अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत किसी व्यक्ति की नागरिकता समाप्त नहीं होगी भले ही वह मतदाता सूची में पंजीकरण के अयोग्य हो।
  • इसका अर्थ है कि मतदाता पहचान पत्र नागरिकता का एक सशक्त संकेत तो है, किंतु यह न तो निर्णायक प्रमाण है और न ही नागरिकता की एकमात्र कसौटी।

जन्म प्रमाण पत्र और नागरिकता: तारीखों का महत्व

नागरिकता अधिनियम, 1955 में समय-समय पर संशोधन हुए हैं, और जन्म की तारीख के आधार पर नागरिकता की स्थिति अलग-अलग हो सकती है।

  • 26 जनवरी 1950 से 1 जुलाई 1987 के बीच जन्मे किसी भी व्यक्ति को माता-पिता की राष्ट्रीयता की परवाह किए बिना भारतीय नागरिक माना जाता है, केवल जन्म स्थान भारत होना पर्याप्त है।
  • 1 जुलाई 1987 से 3 दिसंबर 2004 के बीच जन्मे व्यक्ति को नागरिकता के लिए यह सिद्ध करना होगा कि उसके जन्म के समय उसके माता-पिता में से कम से कम एक भारतीय नागरिक था।
  • 3 दिसंबर 2004 के बाद जन्मे व्यक्ति को नागरिकता तभी मिलेगी जब माता-पिता में से एक भारतीय नागरिक हो और दूसरा अवैध प्रवासी न हो।

इसलिए जन्म प्रमाण पत्र के साथ माता-पिता के दस्तावेज़ भी उतने ही महत्वपूर्ण हो जाते हैं। अकेला जन्म प्रमाण पत्र कई मामलों में पर्याप्त नहीं होगा।

लोकसभा में गृह मंत्रालय का उत्तर: असमंजस की स्थिति

25 अगस्त 2025 को लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने यह स्वीकार किया कि सरकार ने नागरिकता साबित करने के लिए “मान्य दस्तावेज़ों की श्रेणियाँ” निर्धारित नहीं की हैं। यह उत्तर अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह यह स्वीकार करता है कि एकल निर्णायक दस्तावेज़ का कोई आधिकारिक निर्धारण नहीं हुआ है।

मंत्री ने कहा कि नागरिकता अधिनियम, 1955 और उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों के प्रावधानों के आधार पर नागरिकता निर्धारित होती है। प्रमाण पत्र उन्हीं लोगों को जारी होते हैं जिन्होंने पंजीकरण या देशीयकरण के माध्यम से नागरिकता प्राप्त की। अधिकांश भारतीय इनमें से किसी श्रेणी में नहीं आते।

तो फिर नागरिकता साबित होती कैसे है?

यही इस पूरी बहस का केंद्रीय प्रश्न है। जब एकल निर्णायक दस्तावेज़ नहीं है तो नागरिकता कैसे प्रमाणित होगी?

व्यवहार में नागरिकता कई दस्तावेज़ों के समग्र साक्ष्य से सिद्ध होती है। जन्म का स्थान और तारीख, माता-पिता की राष्ट्रीयता, पीढ़ियों से भारत में निवास का प्रमाण जैसे भूमि रिकॉर्ड, शैक्षणिक प्रमाण पत्र, चुनावी रिकॉर्ड, आधार, इन सबका मिला-जुला साक्ष्य न्यायालय में विचार करता है। यदि नागरिकता विवादित हो तो न्यायालय संदर्भ के अनुसार इन साक्ष्यों का मूल्यांकन करेगा।

पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राव ने कहा कि भारत को व्यापक नागरिक पंजीकरण, सर्वसुलभ जन्म पंजीकरण और विश्वसनीय अभिलेखागार की आवश्यकता है ताकि नागरिकता कभी भी अधूरे या असंगत कागज़ों की बंधक न बने। यह कथन इस पूरे प्रकरण का सार है।

समाधान की दिशा

इस समस्या का स्थायी समाधान कागज़ों की जटिलता में नहीं, बल्कि व्यवस्थागत सुधार में है। सार्वभौमिक जन्म पंजीकरण, जो अभी भी देश के कई हिस्सों में अधूरा है, इस दिशा में पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम है। राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की परिकल्पना तभी न्यायसंगत होगी जब उससे पहले दस्तावेज़ीकरण की सर्वसुलभ और विश्वसनीय व्यवस्था सुनिश्चित हो। अन्यथा यह प्रक्रिया उन्हीं को सबसे अधिक दंडित करेगी जो पहले से ही सबसे अधिक कमजोर हैं।

नागरिकता केवल एक कागज़ का टुकड़ा नहीं है। यह किसी व्यक्ति और राज्य के बीच के उस बुनियादी संबंध की अभिव्यक्ति है जिसके आधार पर अधिकार और कर्तव्य दोनों निर्धारित होते हैं। जब यह संबंध अनिश्चितता के भंवर में फंस जाए तो न केवल व्यक्ति बल्कि लोकतंत्र की नींव भी कमजोर होती है।

भारत को आज एक ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जहां हर नागरिक अपनी नागरिकता को सरलता से, सम्मान के साथ और बिना किसी कागज़ी भूलभुलैया में उलझे, प्रमाणित कर सके। यही संविधान की भावना है और यही एक समावेशी लोकतंत्र की पहचान भी।

नागरिकता से जुड़े सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय

1. मनेका गांधी बनाम भारत संघ (1978)

यह निर्णय नागरिकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संदर्भ में मील का पत्थर है। न्यायालय ने माना कि पासपोर्ट जारी करना इस उपधारणा पर आधारित है कि धारक भारतीय नागरिक है, किंतु पासपोर्ट को नागरिकता का अकाट्य प्रमाण नहीं माना जा सकता। यदि नागरिकता विवादित हो तो न्यायालय पासपोर्ट के साथ अन्य साक्ष्यों पर भी विचार करेगा। इस निर्णय ने अनुच्छेद 21 की व्याख्या को भी विस्तारित किया और कहा कि जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार में गरिमापूर्ण जीवन निहित है।

2. लाल बाबू हुसैन बनाम इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (1995)

इस निर्णय में न्यायालय ने दो महत्वपूर्ण बातें कही। पहली, जिन व्यक्तियों के नाम मतदाता सूची में दर्ज हैं उन्हें नागरिकता की उपधारणा प्राप्त होती है और यह उपधारणा केवल विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के माध्यम से ही खंडित की जा सकती है। दूसरी, चुनाव आयोग की भूमिका मतदाता पात्रता निर्धारण तक सीमित है, वह नागरिकता का न्याय-निर्णयन नहीं कर सकता। यह निर्णय NRC और मतदाता सूची विवादों के संदर्भ में बार-बार उद्धृत किया जाता है।

3. सरबानंद सोनोवाल बनाम भारत संघ (2005)

असम में अवैध प्रवासियों से जुड़े इस मामले में न्यायालय ने IMDT अधिनियम (Illegal Migrants Determination by Tribunals Act) को असंवैधानिक घोषित किया। न्यायालय ने माना कि यह अधिनियम अवैध प्रवासियों को पहचानने और निष्कासित करने की प्रक्रिया को इतना कठिन बना देता है कि यह संविधान के अनुच्छेद 355 के अंतर्गत राज्यों की रक्षा के केंद्र के दायित्व के विपरीत है। इस निर्णय ने NRC प्रक्रिया की नींव तैयार की।

4. प्रभा दत्त बनाम भारत संघ (1982)

इस निर्णय में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नागरिकता एक विधिक दर्जा है जो नागरिकता अधिनियम, 1955 और संविधान के भाग-II के प्रावधानों से संचालित होता है। नागरिकता का प्रश्न तथ्य और विधि दोनों का प्रश्न है और इसे संदर्भ के अनुसार समग्र साक्ष्यों के आधार पर निर्धारित किया जाना चाहिए।

5. Abdul Kuddus बनाम भारत संघ (2019)

इस निर्णय में न्यायालय ने नागरिकता अधिनियम की धारा 9 की व्याख्या की जो स्वैच्छिक रूप से किसी विदेशी नागरिकता ग्रहण करने पर भारतीय नागरिकता की समाप्ति से संबंधित है। न्यायालय ने माना कि नागरिकता की समाप्ति का निर्णय केंद्र सरकार के पास है और इसकी न्यायिक समीक्षा सीमित आधारों पर ही होगी। यह निर्णय OCI और दोहरी नागरिकता के प्रश्नों के संदर्भ में प्रासंगिक है।

6. Assam Sanmilita Mahasangha बनाम भारत संघ (2015)

यह निर्णय NRC और अनुच्छेद 6 की व्याख्या के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। न्यायालय ने यह प्रश्न संविधान पीठ को संदर्भित किया कि क्या 1971 के बाद बांग्लादेश से आए व्यक्तियों को संविधान के अनुच्छेद 6 का लाभ मिल सकता है। इस निर्णय ने असम में नागरिकता विवाद की जटिलता को रेखांकित किया।

7. Rajubala Das बनाम भारत संघ (2021) संदर्भ में NRC पर सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी

NRC प्रक्रिया के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्थापित किया कि विदेशी अधिकरणों के निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं। किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने से पहले उसे सुनवाई का उचित अवसर मिलना चाहिए। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत नागरिकता से जुड़े मामलों में पूरी तरह लागू होते हैं।

8. State of Uttar Pradesh बनाम Shah Mohammed (2009)

इस निर्णय में न्यायालय ने माना कि दीर्घकालीन निवास, संपत्ति का स्वामित्व, बच्चों का भारतीय शिक्षण संस्थानों में नामांकन, ये सभी तथ्य नागरिकता के संदर्भ में सहायक साक्ष्य के रूप में विचार किए जा सकते हैं। एकल दस्तावेज़ की अनुपस्थिति स्वतः नागरिकता की समाप्ति नहीं है।

परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु

  1. पहली बात, नागरिकता एक विधिक अवधारणा है जो संविधान के भाग-II और नागरिकता अधिनियम, 1955 से संचालित होती है। अनुच्छेद 11 संसद को नागरिकता संबंधी कानून बनाने का अधिकार देता है।
  2. दूसरी बात, राष्ट्रीयता और नागरिकता में अंतर है। पासपोर्ट राष्ट्रीयता का प्रमाण है, नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं।
  3. तीसरी बात, NRC जैसी प्रक्रियाओं में जब नागरिकता का प्रश्न उठता है तो एकल दस्तावेज़ की अपर्याप्तता व्यापक मानवीय संकट को जन्म दे सकती है, विशेषकर समाज के उन वर्गों में जिनकी दस्तावेज़ीकरण तक पहुंच ऐतिहासिक रूप से सीमित रही है।
  4. चौथी बात, यह मुद्दा अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से भी जुड़ता है। यदि किसी की नागरिकता अनिश्चित हो जाए तो उसके मूलभूत अधिकार खतरे में पड़ जाते हैं।
  5. पांचवीं बात, लोकतांत्रिक शासन की गुणवत्ता इस बात पर भी निर्भर करती है कि राज्य अपने नागरिकों की पहचान को कितनी विश्वसनीयता और समावेशिता के साथ संरक्षित करता है।

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