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क्या अंतरराष्ट्रीय कानून ढांचा वास्तव में ढह रहा है?

क्या अंतरराष्ट्रीय कानून वास्तव में अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है? यह प्रश्न दिन प्रतिदिन अधिक जटिल होता जा रहा है, और इसे नजरअंदाज करना कठिन हो गया है। यूक्रेन और गाजा में जारी संघर्ष, पश्चिम एशिया की अस्थिरता, नागरिकों के विरुद्ध हिंसा, और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की प्रभावी प्रतिक्रिया देने में असमर्थता ने कई विश्लेषकों को इस निष्कर्ष तक पहुंचाया है कि अंतरराष्ट्रीय कानून अब अप्रासंगिक हो चुका है।

यह धारणा इस विचार पर आधारित रही है कि राष्ट्रों के बीच संबंध केवल शक्ति संतुलन से नहीं, बल्कि सहमति पर निर्मित नियमों और कानूनी सिद्धांतों से नियंत्रित होने चाहिए। परंतु जब युद्ध जैसी परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं, तो इस व्यवस्था की प्रभावशीलता स्वाभाविक रूप से जांच के दायरे में आ जाती है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय कानून का मृत्युलेख लिखना जल्दबाजी होगी।

“यह प्रबल होगा”: एंटोनियो गुटेरेस 

  • जुलाई 2026 में संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय विधि आयोग को संबोधित करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतारेस ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी कि अंतरराष्ट्रीय कानून दबाव में है, परंतु यह अंततः प्रबल होगा। इस वक्तव्य का दूसरा भाग पहले भाग जितना ही ध्यान देने योग्य है।
  • निस्संदेह अंतरराष्ट्रीय कानून को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, परंतु यह अब भी राष्ट्रों के आचरण को आकार देता है और अंतरराष्ट्रीय विवादों के निपटारे की भाषा बना हुआ है।
  • विरोधाभास यह है कि युद्ध स्वयं यह प्रदर्शित करते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कानून अब भी महत्वपूर्ण है। यदि यह वास्तव में अप्रासंगिक हो गया होता, तो संघर्षरत राष्ट्रों को अपने कृत्यों को कानूनी आधार पर सही ठहराने की आवश्यकता ही नहीं होती।
  • परंतु राष्ट्र संयुक्त राष्ट्र चार्टर, संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता, आत्मरक्षा और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का हवाला देना जारी रखते हैं।
  • यहां तक कि जब राष्ट्रों पर अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन का आरोप लगाया जाता है, तब भी वे यह तर्क देते हैं कि उनके कृत्य कानून के अनुरूप ही हैं।
  • इस प्रकार एक विधिक व्यवस्था, जिसका राष्ट्र पालन करते हैं, केवल इस कारण अर्थहीन नहीं कही जा सकती कि उसका आचरण सदैव उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहता।

अंतरराष्ट्रीय कानून के विद्वान अब्राम चेयस और एंटोनिया हैंडलर चेयस का यह प्रसिद्ध विश्लेषण भी इसी तर्क को समर्थन देता है कि राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन इस भय से नहीं करते कि उन्हें प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा, बल्कि इसलिए करते हैं क्योंकि वे उन संधि व्यवस्थाओं की गतिशीलता से प्रभावित होते हैं जिनसे वे संबद्ध होते हैं। यह प्रेक्षण आज भी अत्यंत सामयिक प्रतीत होता है।

अनुपालन बनाम उल्लंघन का प्रश्न

  • अंतरराष्ट्रीय कानून का महत्व केवल उल्लंघन की घटनाओं से नहीं मापा जा सकता।
  • यह इस बात में भी निहित है कि यह एक ऐसा ढांचा प्रदान करता है जिसके भीतर राष्ट्रों के आचरण का आकलन किया जाता है, विवादों को संबोधित किया जाता है, और सहयोग को कायम रखा जाता है।
  • कठिनाई यह है कि अनुपालन कभी भी सुर्खियां नहीं बनता, जबकि उल्लंघन सदैव समाचारों में हावी रहता है।
  • यह असंतुलन ही जनसामान्य में यह भ्रामक धारणा उत्पन्न करता है कि अंतरराष्ट्रीय कानून प्रभावहीन हो चुका है।

अंतरराष्ट्रीय कानून की मौन शक्ति

  • अंतरराष्ट्रीय कानून की उपलब्धियां प्रतिदिन दृष्टिगोचर होती हैं, यद्यपि उन्हें अक्सर स्वाभाविक और सामान्य मान लिया जाता है।
  • विमान बिना किसी बाधा के अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के ऊपर उड़ान भर पाते हैं, क्योंकि राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय विमानन नियमों का पालन करते हैं।
  • जलपोत सुरक्षित रूप से समुद्र पार करते हैं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून की व्यवस्था कार्यरत है।
  • कूटनीति इसलिए कार्य करती है क्योंकि सरकारें स्थापित विधिक मानदंडों का पालन करती हैं।
  • अंतरराष्ट्रीय व्यापार, संचार और यात्रा निर्बाध रूप से जारी रहते हैं, क्योंकि राष्ट्र सदियों पुराने अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का सम्मान करते हैं।
  • जब सशस्त्र संघर्ष भी उत्पन्न होते हैं, तब भी राष्ट्र बहुपक्षीय समझौतों पर वार्ता करते रहते हैं।

हाल ही में उच्च समुद्र संधि (हाई सीज़ ट्रीटी) जैसे प्रयास, महामारी की तैयारी को लेकर अंतरराष्ट्रीय प्रयास, और साइबर अपराध के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन इस बात के प्रमाण हैं कि राष्ट्र अब भी अंतरराष्ट्रीय कानून पर निर्भर हैं और उसे और सशक्त बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

व्यक्ति के स्तर पर प्रभाव

अंतरराष्ट्रीय कानून केवल राष्ट्रों तक सीमित नहीं है, यह व्यक्तियों के जीवन को भी प्रभावित करता है। जिस क्षण कोई व्यक्ति किसी अंतरराष्ट्रीय सीमा को पार करता है, अंतरराष्ट्रीय कानून महत्वपूर्ण हो जाता है। पासपोर्ट की पहचान, कॉन्सुलर सहायता, अंतरराष्ट्रीय हवाई यात्रा और शरणार्थियों की सुरक्षा, यह सभी अंतरराष्ट्रीय विधिक नियमों पर निर्भर करते हैं। हम प्रायः अंतरराष्ट्रीय कानून को केवल तब नोटिस करते हैं जब वह विफल हो जाता है, परंतु लाखों लोग प्रतिदिन इस पर निर्भर रहते हैं, इस बात से अनभिज्ञ रहकर भी।

शांति निर्माण में अंतरराष्ट्रीय कानून की निरंतर उपयोगिता

अंतरराष्ट्रीय कानून की सामयिकता का सबसे स्पष्ट प्रमाण इस बात में देखा जा सकता है कि राष्ट्र शांति की खोज किस प्रकार करते हैं। यह खोज वार्ताओं, प्रतिबद्धताओं और विधिक व्यवस्थाओं के माध्यम से ही संपन्न होती है, चाहे वह शांति समझौते हों, संघर्षविराम व्यवस्थाएं हों, कूटनीतिक समझ हों, या वे विवादास्पद राष्ट्र, जो विधिक प्रतिबद्धताओं तथा दायित्वों को स्थापित करने की आवश्यकता को स्वीकार करते हैं।

  • भारत का सिंधु जल संधि से जुड़ा अनुभव इस संदर्भ में एक उपयुक्त उदाहरण प्रस्तुत करता है। भारत का अनुभव यह दर्शाता है कि राजनीतिक अस्थिरता के दौर में भी, विधिक ढांचे राष्ट्रों के मध्य संलग्नता के लिए आधार बने रहते हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय कानून, विशेष रूप से भारत और वृहत्तर वैश्विक दक्षिण के लिए, अनिवार्य बना हुआ है।
  • जलवायु परिवर्तन, महामारी, साइबर हमले और आर्थिक अस्थिरता जैसी समस्याओं को कोई भी राष्ट्र एकपक्षीय रूप से हल नहीं कर सकता। इन समस्याओं के समाधान हेतु सहयोग आवश्यक है, और यह सहयोग तभी संभव है जब आचरण के नियम पर सहमति बनाई जाए।
  • एक नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था विकासशील राष्ट्रों को अपने हितों की रक्षा करने और शक्ति के बल पर नहीं, अपितु वार्ताओं के माध्यम से उन्हें आगे बढ़ाने का अवसर प्रदान करती है।

अपूर्णताओं को स्वीकार करना आवश्यक

  • यह स्वीकार करना भी आवश्यक है कि अंतरराष्ट्रीय कानून कभी पूर्ण नहीं रहा है। यह सदैव राजनीतिक वास्तविकताओं के साथ सह अस्तित्व में रहा है और असमान शक्ति संरचनाओं को प्रतिबिंबित करने के लिए बार बार आलोचना का शिकार बना है।
  • हाल के संघर्षों ने संरचनात्मक सीमाओं को पुनः उजागर किया है, जिनमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सीमाएं और व्यापक अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यवस्था की सीमाएं सम्मिलित हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों को प्राप्त वीटो अधिकार अक्सर सामूहिक कार्रवाई में सबसे बड़ी बाधा साबित होता है, विशेषकर तब जब स्थायी सदस्य स्वयं किसी संघर्ष में पक्षकार हों।
  • तथापि यह अपूर्णता संपूर्ण व्यवस्था को त्याग देने का पर्याप्त कारण नहीं है। कोई भी विधिक व्यवस्था पूर्ण अनुपालन की गारंटी नहीं दे सकती।
  • इसकी वास्तविक कसौटी यह है कि उस मानदंड को स्थापित करने में सफलता प्राप्त हो, जिसके आधार पर आचरण का मूल्यांकन किया जा सके।
  • इतिहास यह दर्शाता है कि जिन संकटों ने अंतरराष्ट्रीय कानून की मृत्यु की सर्वाधिक भविष्यवाणी की, उन्होंने ही इसके अनुकूलन और पुनर्नवीकरण को प्रेरित किया।
  • अंतरराष्ट्रीय कानून दबाव में अवश्य है, परंतु यह पराभूत नहीं है। वास्तविक खतरा इस बढ़ती हुई मान्यता में है कि इसके उल्लंघन ही इसे अप्रासंगिक सिद्ध करते हैं, जो एक ऐसे निष्कर्ष की ओर ले जाता है जो केवल उन्हें लाभान्वित करता है जो शक्ति को अधिकार के स्थान पर वरीयता देते हैं।
  • जितना अधिक राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय कानून का आह्वान करते हैं, उसकी व्याख्या करते हैं और उस पर निर्भर रहते हैं, उतनी ही जल्दबाजी में इसका मृत्युलेख लिखा जाना प्रतीत होगा।

अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रासंगिक आयाम:

उपरोक्त लेख में उल्लिखित बिंदुओं के अतिरिक्त, कुछ अन्य महत्वपूर्ण आयामों को समझना भी आवश्यक है।

अंतरराष्ट्रीय कानून के स्रोत

  • अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के अधिनियम की धारा 38 के अनुसार अंतरराष्ट्रीय कानून के मुख्य स्रोतों में अंतरराष्ट्रीय संधियां, अंतरराष्ट्रीय प्रथा, सभ्य राष्ट्रों द्वारा मान्यता प्राप्त विधि के सामान्य सिद्धांत, तथा न्यायिक निर्णय एवं विधिशास्त्रियों के लेखन को सहायक साधन के रूप में सम्मिलित किया गया है।
  • इसकी बहुस्रोतीय प्रकृति ही इसे राष्ट्रीय कानून से भिन्न बनाती है, क्योंकि इसके पीछे कोई केंद्रीय विधायी सत्ता नहीं होती।

प्रवर्तन क्षमता की सीमा

  • घरेलू कानून के विपरीत अंतरराष्ट्रीय कानून के पास कोई केंद्रीय प्रवर्तन प्राधिकरण नहीं है। न कोई विश्व पुलिस है और न ही कोई सर्वमान्य न्यायालय, जिसके निर्णय स्वतः बाध्यकारी हों।
  • अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के निर्णय भी तभी प्रभावी होते हैं जब संबंधित राष्ट्र स्वेच्छा से उनका पालन करें, अन्यथा सुरक्षा परिषद के माध्यम से प्रवर्तन की प्रक्रिया राजनीतिक रूप से जटिल हो जाती है।

भारत और अंतरराष्ट्रीय कानून

भारत ऐतिहासिक रूप से अंतरराष्ट्रीय कानून, विशेष रूप से पंचशील के सिद्धांतों, संयुक्त राष्ट्र चार्टर, तथा शांतिपूर्ण सह अस्तित्व का प्रबल समर्थक रहा है। भारत ने वैश्विक दक्षिण के हितों की वकालत करते हुए बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार की मांग निरंतर उठाई है, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विस्तार और लोकतंत्रीकरण की दिशा में।

समकालीन चुनौतियां

  • बहुपक्षवाद के समक्ष एकपक्षीय कार्रवाइयों का बढ़ता प्रचलन।
  • क्षेत्रीय संघर्षों में मानवीय कानून के उल्लंघन की घटनाएं।
  • नई प्रौद्योगिकियों, जैसे साइबर स्पेस और कृत्रिम बुद्धिमत्ता, के लिए विधिक ढांचे का अभाव।
  • जलवायु न्याय से जुड़े दायित्वों के क्रियान्वयन में असमानता।

निष्कर्ष

अंतरराष्ट्रीय कानून की प्रासंगिकता को केवल संघर्ष और उल्लंघन की घटनाओं के आधार पर नहीं आंका जा सकता। यह एक जीवंत, गतिशील और निरंतर विकसित होती व्यवस्था है, जो राष्ट्रों के दैनिक व्यवहार को आकार देती है, चाहे वह विमानन हो, समुद्री यातायात हो, कूटनीति हो, या व्यक्तिगत स्तर पर पासपोर्ट और शरणार्थी संरक्षण जैसे विषय हों। संघर्षों के मध्य भी राष्ट्र इसका आह्वान करना बंद नहीं करते, जो स्वयं इसकी सार्थकता का प्रमाण है।

निःसंदेह इसकी संरचनात्मक कमियां, विशेष रूप से सुरक्षा परिषद की सीमाएं, गंभीर चिंता का विषय बनी हुई हैं, परंतु इतिहास यह भी सिखाता है कि प्रत्येक संकट के पश्चात इस व्यवस्था ने स्वयं को पुनर्नवीकृत किया है। अतः यह कहना उचित होगा कि अंतरराष्ट्रीय कानून दबाव में तो अवश्य है, परंतु समाप्त नहीं हुआ है, और इसका मृत्युलेख लिखना अभी भी समय से पहले होगा।

वैश्विक कानून अनुपालन की प्रमुख संस्थाएं

संयुक्त राष्ट्र प्रणाली से संबंधित संस्थाएं

  1. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद: अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा हेतु बाध्यकारी प्रस्ताव तथा प्रतिबंध लगाने की शक्ति रखती है।
  2. संयुक्त राष्ट्र महासभा: सदस्य राष्ट्रों के मध्य विधिक मानदंड और घोषणाएं तय करने का प्रमुख मंच है।
  3. अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे): राष्ट्रों के मध्य विधिक विवादों का निपटारा करने वाला संयुक्त राष्ट्र का प्रमुख न्यायिक अंग है।
  4. अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी): नरसंहार, युद्ध अपराध तथा मानवता के विरुद्ध अपराधों की सुनवाई करता है।
  5. अंतरराष्ट्रीय विधि आयोग: अंतरराष्ट्रीय कानून के संहिताकरण और प्रगतिशील विकास हेतु कार्य करता है।

व्यापार और आर्थिक क्षेत्र से संबंधित संस्थाएं

  1. विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ): अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों के अनुपालन और विवाद निपटारे की व्यवस्था संचालित करता है।
  2. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ): सदस्य राष्ट्रों की आर्थिक नीतियों और वित्तीय स्थिरता की निगरानी करता है।
  3. विश्व बैंक: विकासशील राष्ट्रों में परियोजनाओं हेतु ऋण संबंधी शर्तों के माध्यम से अनुपालन सुनिश्चित करता है।
  4. वित्तीय कार्यवाही कार्यबल (एफएटीएफ): धनशोधन और आतंकी वित्तपोषण रोकने संबंधी मानकों का अनुपालन सुनिश्चित करता है।

समुद्री और पर्यावरण क्षेत्र से संबंधित संस्थाएं

  1. अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (आईएमओ): समुद्री सुरक्षा तथा प्रदूषण नियंत्रण संबंधी मानकों का निर्धारण करता है।
  2. अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून न्यायाधिकरण (आईटीएलओस): समुद्री सीमा और संसाधनों से जुड़े विवादों का निपटारा करता है।
  3. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी): पर्यावरण संधियों के कार्यान्वयन में समन्वय स्थापित करता है।
  4. जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल तथा यूएनएफसीसीसी सचिवालय: जलवायु समझौतों के अनुपालन की निगरानी करते हैं।

मानवाधिकार और मानवीय कानून से संबंधित संस्थाएं

  1. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद: सदस्य राष्ट्रों में मानवाधिकार स्थिति की समीक्षा करती है।
  2. अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस समिति: युद्ध और सशस्त्र संघर्ष में मानवीय कानून के पालन की निगरानी करती है।
  3. संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त कार्यालय (यूएनएचसीआर): शरणार्थी संरक्षण से जुड़ी संधियों का क्रियान्वयन सुनिश्चित करता है।
  4. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ): श्रम अधिकारों से संबंधित अंतरराष्ट्रीय अनुबंधों के पालन की निगरानी करता है।

नाभिकीय एवं शस्त्र नियंत्रण से संबंधित संस्थाएं

  1. अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए): परमाणु अप्रसार संधि के अनुपालन की जांच करती है।
  2. रासायनिक शस्त्र निषेध संगठन (ओपीसीडब्ल्यू): रासायनिक हथियार संधि के क्रियान्वयन की निगरानी करता है।
  3. संयुक्त राष्ट्र निरस्त्रीकरण कार्यालय: शस्त्र नियंत्रण संधियों में समन्वय स्थापित करता है।

क्षेत्रीय स्तर की प्रमुख संस्थाएं

  1. यूरोपीय न्यायालय: यूरोपीय संघ के कानून के अनुपालन हेतु सदस्य राष्ट्रों पर बाध्यकारी निर्णय देता है।
  2. यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय: यूरोपीय मानवाधिकार अभिसमय के उल्लंघन संबंधी मामलों की सुनवाई करता है।
  3. अफ्रीकी संघ: महाद्वीपीय स्तर पर शांति और सुरक्षा संबंधी विधिक ढांचे का पर्यवेक्षण करता है।
  4. आसियान: क्षेत्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान हेतु संवाद तंत्र उपलब्ध कराता है।

साइबर एवं प्रौद्योगिकी क्षेत्र से संबंधित संस्थाएं

  1. अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (आईटीयू): वैश्विक दूरसंचार मानकों के निर्धारण और समन्वय का कार्य करता है।
  2. संयुक्त राष्ट्र साइबर अपराध सम्मेलन प्रक्रिया: साइबर अपराध रोकने हेतु अंतरराष्ट्रीय सहयोग को संस्थागत रूप देती है।

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