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ADR (Association for Democratic Reforms) रिपोर्ट: भारत में राजनीति का अपराधीकरण

ADR (Association for Democratic Reforms) Report: Criminalization of Politics in India

यदि किसी लोकतंत्र की आत्मा को समझना हो, तो केवल उसके संविधान को पढ़ना पर्याप्त नहीं होता; यह भी देखना आवश्यक होता है कि कानून बनाने वाले लोग स्वयं कानून के प्रति कितने उत्तरदायी हैं।

यहीं से “राजनीति के अपराधीकरण” (Criminalisation of Politics) का प्रश्न उत्पन्न होता है।

भारत का संविधान लोकतंत्र, समानता, न्याय और कानून के शासन (Rule of Law) पर आधारित है। संविधान निर्माताओं ने यह कल्पना की थी कि संसद और विधानसभाएँ ऐसे प्रतिनिधियों से भरी होंगी जो सार्वजनिक हित (Public Interest) को सर्वोच्च मानेंगे। किंतु समय के साथ एक ऐसी प्रवृत्ति विकसित हुई जिसमें अनेक ऐसे व्यक्ति, जिन पर हत्या, अपहरण, भ्रष्टाचार, महिलाओं के विरुद्ध अपराध, रंगदारी और आर्थिक अपराध जैसे गंभीर मामले लंबित हैं, चुनाव जीतकर संसद एवं विधानसभाओं तक पहुँचने लगे।

यह केवल एक कानूनी समस्या नहीं है; यह लोकतंत्र की नैतिकता (Constitutional Morality), शासन क्षमता (Governance), नागरिकों के विश्वास (Public Trust) और न्याय व्यवस्था (Justice System) से जुड़ी गहरी संरचनात्मक समस्या है।

सबसे पहले एक मूल प्रश्न

राजनीति का उद्देश्य क्या होना चाहिए?

राजनीति का मूल उद्देश्य है-

  • समाज का कल्याण,
  • न्यायपूर्ण शासन,
  • संसाधनों का समान वितरण,
  • नागरिक अधिकारों की रक्षा,
  • संविधान के मूल्यों की स्थापना।

यदि वही व्यक्ति कानून बनाए जो स्वयं कानून तोड़ने के आरोपों का सामना कर रहा हो, तो क्या वह निष्पक्ष कानून बना पाएगा?

यहीं से राजनीति के अपराधीकरण की समस्या शुरू होती है।

राजनीति का अपराधीकरण वास्तव में क्या है?

जब अपराधी पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति चुनाव लड़ते हैं, निर्वाचित होते हैं तथा शासन में भाग लेते हैं, तो इसे राजनीति का अपराधीकरण कहते हैं।

वास्तव में राजनीति का अपराधीकरण तीन स्तरों पर होता है;

पहला स्तर : अपराधी राजनीति में प्रवेश करते हैं

दूसरा स्तर : राजनेता अपराधियों का संरक्षण करते हैं

तीसरा स्तर : राजनीति और अपराध का गठजोड़

  • यही वह स्थिति है जिसे Vohra Committee (1993) ने सबसे गंभीर माना।
  • इसमें तीन शक्तियाँ मिल जाती हैं; 1. अपराधी,राजनेता, 3.व्यवसायी
  • इसे Criminal-Politician-Business Nexus कहा जाता है।
  • अब राजनीति केवल जनसेवा नहीं रह जाती, बल्कि एक “Investment” बन जाती है।

इसलिए राजनीति का अपराधीकरण केवल नेताओं की समस्या नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति की भी समस्या है।

ADR रिपोर्ट ने इस विषय को फिर से क्यों चर्चा में ला दिया?

Association for Democratic Reforms (ADR) और National Election Watch (NEW) ने राज्यसभा सांसदों के शपथपत्रों का विश्लेषण किया।

रिपोर्ट में सामने आया;

  • लगभग 31% सांसदों ने अपने विरुद्ध आपराधिक मामले घोषित किए हैं।
  • इनमें से 16% गंभीर आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं।

भारतीय विधि व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि जब तक न्यायालय किसी व्यक्ति को दोषी सिद्ध करे, तब तक उसे निर्दोष माना जाएगा।

यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत Presumption of Innocence (निर्दोषता की धारणा)  लागू होता है

अर्थात

  • मामला दर्ज होना = दोषी होना नहीं है।
  • आरोप लगना = अपराध सिद्ध होना नहीं है।

इसी कारण केवल FIR दर्ज होने से कोई चुनाव लड़ने से अयोग्य नहीं हो जाता।

क्या भारत में राजनीति का अपराधीकरण केवल कुछ नेताओं की समस्या है, या यह भारतीय लोकतंत्र की संरचना (Structure), चुनावी व्यवस्था (Electoral System), न्यायिक प्रक्रिया (Judicial Process) और मतदाता व्यवहार (Voter Behaviour) की संयुक्त विफलता का परिणाम है?

इसी प्रश्न का उत्तर ADR Report हमें आँकड़ों और तथ्यों के माध्यम से देती है।

ADR (Association for Democratic Reforms) क्या है?

  • किसी भी रिपोर्ट को समझने से पहले यह जानना आवश्यक है कि रिपोर्ट तैयार करने वाली संस्था कितनी विश्वसनीय है।
  • Association for Democratic Reforms (ADR) एक स्वतंत्र, गैर-सरकारी (Non-Governmental) एवं गैर-लाभकारी (Non-Profit) संस्था है, जिसकी स्थापना 1999 में हुई।

इसका उद्देश्य भारतीय लोकतंत्र में चुनावी पारदर्शिता (Electoral Transparency), राजनीतिक जवाबदेही (Political Accountability), स्वच्छ राजनीति (Clean Politics), मतदाता जागरूकता (Voter Awareness) को बढ़ावा देना है।

ADR स्वयं कोई जांच एजेंसी नहीं है। यह चुनाव आयोग को दिए गए उम्मीदवारों के शपथपत्र (Election Affidavits) का विश्लेषण करती है। इसलिए इसकी रिपोर्टें आधिकारिक दस्तावेज़ों पर आधारित होती हैं।

National Election Watch (NEW) क्या है?

  • ADR अकेले कार्य नहीं करता। यह पूरे देश में कार्यरत नागरिक संगठनों के नेटवर्क National Election Watch (NEW) के साथ मिलकर उम्मीदवारों की जानकारी का विश्लेषण करता है।
  • अर्थात रिपोर्ट के आंकड़े किसी अनुमान पर नहीं, बल्कि उम्मीदवारों द्वारा स्वयं घोषित जानकारी पर आधारित हैं।

यदि चुनाव आयोग के पास सारी जानकारी है, तो ADR जैसी संस्था की आवश्यकता क्यों है?

चुनाव आयोग उम्मीदवारों से केवल जानकारी एकत्र करता है। जैसे

  • कौन कितना धनी है?
  • किस पर कितने आपराधिक मुकदमे हैं?
  • किन दलों ने सबसे अधिक आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार उतारे?
  • पिछले चुनाव की तुलना में क्या बदलाव आया?

लेकिन इन सभी का विश्लेषण ADR जैसी संस्थाएँ करती हैं।

इस प्रकार ADR लोकतंत्र का “Public Watchdog” (लोक प्रहरी) बनकर कार्य करता है।

राजनीतिक अपराधीकरण क्यों बढ़ रहा है?

  • Winnability Factor (जीतने की क्षमता)
  • Money Power (धनबल)
  • Muscle Power (बाहुबल)
  • First-Past-The-Post System (FPTP)
  • Governance Deficit (शासन व्यवस्था की कमजोरी)
  • न्यायिक विलंब (Judicial Delay)
  • Identity Politics (पहचान आधारित राजनीति)
  • Vote Bank Politics
  • राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव
  • कारण 10 : Electoral Finance (चुनावी वित्त)

राजनीति के अपराधीकरण की समस्या केवल इसलिए नहीं है कि कानून कमजोर है, बल्कि इसलिए भी है कि कानून व्यक्ति के अधिकारों और लोकतंत्र की शुचिता दोनों की रक्षा करने का प्रयास करता है। वास्तविक चुनौती इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करने की है। इसलिए समाधान केवल कठोर अयोग्यता नियम नहीं, बल्कि समयबद्ध न्याय, पारदर्शिता, और स्वतंत्र संस्थाओं को मजबूत करने में निहित है।

राजनीति के अपराधीकरण पर सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण निर्णय

वर्ष / केसBackground (विवाद क्या था?)संवैधानिक/कानूनी प्रश्नन्यायालय का निर्णय (Judgment)तर्क (Reasoning)प्रभाव / UPSC Relevance
Union of India v. Association for Democratic Reforms (ADR), 2002उम्मीदवारों की संपत्ति, शिक्षा और आपराधिक मामलों की जानकारी सार्वजनिक नहीं होती थी।क्या मतदाता को उम्मीदवार की जानकारी जानने का अधिकार है? (Art. 19(1)(a))सभी उम्मीदवारों के लिए Affidavit में आपराधिक मामले, संपत्ति, देनदारियाँ और शिक्षा घोषित करना अनिवार्य।Right to Know अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Article 19(1)(a)) का अभिन्न हिस्सा है।चुनावी पारदर्शिता (Electoral Transparency) की नींव रखी; मतदाता को सूचित निर्णय (Informed Choice) का अधिकार मिला।
PUCL v. Union of India (2003/2004)संसद ने RPA में Section 33B जोड़कर ADR निर्णय का प्रभाव सीमित करने का प्रयास किया।क्या संसद मतदाता के Right to Know को सीमित कर सकती है?Section 33B असंवैधानिक घोषित; ADR निर्णय बरकरार।संविधान सर्वोच्च है; संसद मौलिक अधिकारों को कम नहीं कर सकती।Constitutional Supremacy बनाम Parliamentary Supremacy का महत्वपूर्ण उदाहरण।
K. Prabhakaran v. P. Jayarajan (2005)RPA की अयोग्यता संबंधी धाराओं की व्याख्या का प्रश्न।दोषसिद्ध व्यक्तियों की चुनावी पात्रता कैसे समझी जाए?न्यायालय ने RPA की कठोर व्याख्या की और कहा कि दोषसिद्ध व्यक्तियों को चुनावी लाभ नहीं मिलना चाहिए।“Those who break the law should not make the law.”Rule of Law और स्वच्छ राजनीति के सिद्धांत को मजबूत किया।
Lily Thomas v. Union of India (2013)RPA की Section 8(4) दोषसिद्ध सांसद/विधायक को अपील तक सदस्य बने रहने की अनुमति देती थी।क्या जनप्रतिनिधियों को सामान्य नागरिकों से अलग संरक्षण दिया जा सकता है?Section 8(4) असंवैधानिक; 2 वर्ष या अधिक की सजा पर सदस्यता तुरंत समाप्त।संविधान सभी के लिए समानता (Article 14) का सिद्धांत अपनाता है।राजनीति के अपराधीकरण के विरुद्ध सबसे प्रभावशाली निर्णय; तत्काल अयोग्यता (Immediate Disqualification) लागू हुई।
Manoj Narula v. Union of India (2014)गंभीर आपराधिक मामलों वाले व्यक्तियों को मंत्री बनाए जाने को चुनौती।क्या न्यायालय प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री को ऐसे व्यक्तियों को मंत्री बनाने से रोक सकता है?न्यायालय ने प्रत्यक्ष प्रतिबंध नहीं लगाया, पर Constitutional Morality पर बल दिया।मंत्री नियुक्त करना कार्यपालिका का विशेषाधिकार है; न्यायालय केवल संवैधानिक नैतिकता की अपेक्षा कर सकता है।GS-4 Ethics के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण; Law vs Ethics का श्रेष्ठ उदाहरण।
Public Interest Foundation v. Union of India (2018)मांग थी कि गंभीर अपराधों में Charges Frame होते ही चुनाव लड़ने पर रोक लगे।क्या न्यायालय नया अयोग्यता आधार (Disqualification) बना सकता है?न्यायालय ने कहा नहीं; यह संसद का कार्य है। लेकिन राजनीतिक दलों को उम्मीदवारों का आपराधिक रिकॉर्ड सार्वजनिक करना होगा।Separation of Powers; न्यायपालिका कानून नहीं बना सकती।पारदर्शिता बढ़ी; राजनीतिक दलों पर जवाबदेही (Accountability) बढ़ी।
Rambabu Singh Thakur v. Sunil Arora (2020)राजनीतिक दल 2018 के निर्देशों का पालन नहीं कर रहे थे।क्या सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन की निगरानी आवश्यक है?चुनाव आयोग को अनुपालन (Compliance) सुनिश्चित करने का निर्देश।केवल निर्देश पर्याप्त नहीं; प्रभावी क्रियान्वयन (Enforcement) भी आवश्यक है।Election Commission की निगरानी भूमिका मजबूत हुई; Transparency से आगे Compliance पर बल।

 राजनीति के अपराधीकरण को रोकने हेतु विभिन्न समितियों एवं आयोगों की सिफारिशें

समिति/आयोगBackground (क्यों बनी?)मुख्य समस्या (Diagnosis)प्रमुख सिफारिश (Recommendation)तर्क / उद्देश्य (Why?)UPSC Perspective / Significance
Dinesh Goswami Committee (1990)चुनाव अत्यधिक महंगे और हिंसक होते जा रहे थे।चुनाव में धनबल और बाहुबल का बढ़ता प्रभाव।State Funding of Elections (आंशिक सरकारी सहायता)।यदि चुनाव का खर्च कम होगा, तो राजनीतिक दल धनवान या आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों पर कम निर्भर होंगे।चुनावी सुधारों (Electoral Reforms) पर पहली व्यापक समिति; चुनावी वित्त (Electoral Finance) की समस्या को प्रमुखता से उठाया।
Vohra Committee (1993)राजनीति, अपराध और माफिया के गठजोड़ की शिकायतें बढ़ रही थीं।Crime–Politics–Bureaucracy–Business Nexus तथा समानांतर सत्ता संरचना (Parallel Power Structure)।विभिन्न एजेंसियों (CBI, IB, Police आदि) के बीच समन्वय हेतु Nodal Agencyसंगठित अपराध के नेटवर्क पर संयुक्त निगरानी हो और सूचनाओं का आदान-प्रदान बढ़े।पहली आधिकारिक रिपोर्ट जिसने स्वीकार किया कि अपराध केवल कानून-व्यवस्था नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति का स्रोत बन चुका है।
Indrajit Gupta Committee (1998)चुनावों में निजी धन (Private Funding) का प्रभाव लगातार बढ़ रहा था।राजनीतिक दलों की निजी चंदे पर अत्यधिक निर्भरता।State Funding of Recognised Political Partiesसमान अवसर (Level Playing Field) मिले और काले धन (Black Money) की भूमिका घटे।चुनावी वित्त (Political Funding) में पारदर्शिता और समानता पर बल।
Second Administrative Reforms Commission (2nd ARC), 2008प्रशासन और शासन में नैतिकता (Ethics in Governance) पर चिंता।राजनीति का अपराधीकरण एक Ethical Failure भी है।गंभीर अपराधों में Charges Frame होने के बाद अयोग्यता पर विचार; Code of Ethicsकेवल कानून पर्याप्त नहीं, सार्वजनिक जीवन में नैतिकता (Public Ethics) भी आवश्यक है।GS-4 (Ethics) के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण; राजनीति और नैतिक शासन (Ethical Governance) को जोड़ता है।
Law Commission – 244th Report (2014)गंभीर आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों की बढ़ती संख्या।न्यायिक विलंब के कारण आरोपी वर्षों तक चुनाव लड़ते रहते हैं।यदि 5 वर्ष या अधिक सजा वाले अपराध में Court Charges Frame कर दे (और यह चुनाव से कम-से-कम 1 वर्ष पहले हुआ हो), तो अयोग्यता पर विचार। साथ ही Fast Track Courtsनिर्दोषता की धारणा (Presumption of Innocence) और स्वच्छ राजनीति (Clean Politics) के बीच संतुलन।राजनीति के अपराधीकरण पर सबसे महत्वपूर्ण विधि आयोग रिपोर्ट; UPSC में बार-बार उद्धृत की जाती है।
Law Commission – 255th Report (2015)चुनावी वित्त और राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता की कमी।काले धन और अपारदर्शी फंडिंग का बढ़ता प्रभाव।Political Donations का Disclosure, Independent Auditराजनीतिक दलों की जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़े।Electoral Finance Reform का प्रमुख आधार; पारदर्शिता (Transparency) पर बल।
Election Commission of India (ECI)चुनाव आयोग ने वर्षों के अनुभव से चुनावी समस्याओं का विश्लेषण किया।गंभीर मामलों वाले उम्मीदवारों का लगातार चुनाव जीतना।Convicted नेताओं पर Lifetime Ban, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को टिकट देने का कारण सार्वजनिक करना, मतदाता जागरूकता बढ़ाना।मतदाताओं को सूचित निर्णय लेने का अवसर मिले और राजनीतिक दल जवाबदेह बनें।चुनाव आयोग लगातार चुनावी सुधारों का प्रमुख समर्थक रहा है; इसकी सिफारिशें नीति निर्माण में महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

निष्कर्ष

वास्तव में राजनीति का अपराधीकरण केवल कानूनी समस्या नहीं, बल्कि संवैधानिक, प्रशासनिक, नैतिक, सामाजिक और लोकतांत्रिक चुनौती है। इसका प्रभाव केवल संसद तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह Rule of Law, Good Governance, Constitutional Morality, Public Trust, Economic Development, Policy Making, Women’s Participation और Democratic Culture सभी को प्रभावित करता है। यदि इस प्रवृत्ति पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया, तो लोकतंत्र केवल प्रक्रियात्मक (Procedural Democracy) रह जाएगा और उसकी वास्तविक आत्मा उत्तरदायित्व, पारदर्शिता, समानता और जनकल्याण कमजोर होती जाएगी।

अतः राजनीति के अपराधीकरण का स्थायी समाधान किसी एक कानून या एक संस्था के माध्यम से संभव नहीं है। इसके लिए संसद, न्यायपालिका, चुनाव आयोग, राजनीतिक दल, प्रशासन, मीडिया, नागरिक समाज और सबसे बढ़कर जागरूक मतदाताओं की सामूहिक जिम्मेदारी आवश्यक है। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल संविधान में नहीं, बल्कि उन नागरिकों और जनप्रतिनिधियों में निहित है जो संविधान के मूल्यों न्याय (Justice), स्वतंत्रता (Liberty), समानता (Equality) और बंधुत्व (Fraternity) को अपने आचरण में अपनाते हैं।

 


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