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चीन की विश्व-दृष्टि (China’s Worldview)

China’s Worldview: “Shared Future for Mankind” (The Statesman)

इक्कीसवीं शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय राजनीति एक ऐसे संक्रमणकाल से गुजर रही है, जहाँ वैश्विक शक्ति-संतुलन में निरंतर परिवर्तन हो रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जिस उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था (Liberal International Order) का निर्माण संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों के नेतृत्व में हुआ था, वह आज अनेक नई चुनौतियों का सामना कर रही है।

चीन का तीव्र आर्थिक, तकनीकी और सैन्य उत्थान इस परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण कारण है। चीन अब स्वयं को केवल एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक शासन (Global Governance) के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाने वाली महाशक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है।

इसी संदर्भ में चीन द्वारा वैश्विक शासन पर जारी श्वेत पत्र (White Paper) अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। यह केवल एक सरकारी नीति दस्तावेज नहीं है, बल्कि भविष्य की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के स्वरूप, वैश्विक संस्थाओं के पुनर्गठन तथा विश्व राजनीति में शक्ति के वितरण को लेकर चीन की व्यापक वैचारिक दृष्टि को प्रस्तुत करता है।

चीन का श्वेत पत्र : केवल नीति नहीं, बल्कि वैश्विक दृष्टिकोण

  • किसी भी देश द्वारा प्रकाशित श्वेत पत्र (White Paper) का उद्देश्य किसी विशेष विषय पर सरकार की आधिकारिक नीति, प्राथमिकताओं तथा दृष्टिकोण को स्पष्ट करना होता है।
  • किंतु चीन का यह दस्तावेज केवल प्रशासनिक या कूटनीतिक घोषणा नहीं है। यह विश्व समुदाय के समक्ष एक मूलभूत प्रश्न प्रस्तुत करता है कि भविष्य में अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के नियमों का निर्माण कौन करेगा और उन नियमों को निर्धारित करने का अधिकार किन देशों के पास होना चाहिए।
  • चीन का तर्क है कि वर्तमान वैश्विक संस्थाएँ उस समय निर्मित हुई थीं जब विश्व की शक्ति-संरचना पश्चिमी देशों के पक्ष में थी। आज परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं।
  • एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका के अनेक विकासशील देशों का वैश्विक अर्थव्यवस्था में योगदान लगातार बढ़ रहा है। इसलिए चीन का मत है कि वर्तमान वैश्विक शासन व्यवस्था को भी इस बदलती वास्तविकता के अनुरूप पुनर्गठित किया जाना चाहिए।
  • यह दृष्टिकोण केवल संस्थागत सुधार की मांग नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति-संतुलन के पुनर्वितरण (Redistribution of Global Power) की भी मांग करता है।

विश्व व्यवस्था में परिवर्तन की पृष्ठभूमि

  • द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाओं का निर्माण एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था स्थापित करने के उद्देश्य से किया गया था जिसमें वैश्विक शांति, आर्थिक सहयोग तथा सामूहिक विकास सुनिश्चित किया जा सके।
  • इन संस्थाओं की संरचना उस समय की शक्ति-संरचना पर आधारित थी, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका तथा यूरोपीय देशों का प्रभाव अत्यधिक था।
  • वर्तमान समय में विश्व की आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकताएँ बदल चुकी हैं। चीन विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। भारत, ब्राज़ील, इंडोनेशिया तथा अन्य विकासशील देशों का वैश्विक महत्व भी निरंतर बढ़ रहा है। इसके बावजूद अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में निर्णय लेने की प्रक्रिया अब भी मुख्यतः द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों को प्रतिबिंबित करती है।
  • चीन का मत है कि यदि वैश्विक संस्थाएँ वर्तमान वास्तविकताओं के अनुरूप स्वयं को परिवर्तित नहीं करेंगी, तो उनकी वैधता (Legitimacy) और प्रभावशीलता (Effectiveness) दोनों पर प्रश्नचिह्न लग सकता है।

बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की अवधारणा

चीन की विश्व-दृष्टि का केंद्रीय तत्व बहुध्रुवीयता (Multipolarity) है। बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का अर्थ है कि वैश्विक शक्ति किसी एक देश या दो देशों के हाथों में केंद्रित न होकर अनेक शक्तियों के बीच संतुलित रूप से वितरित हो। चीन का मानना है कि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद विकसित एकध्रुवीय व्यवस्था, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका का प्रभुत्व था, अब धीरे-धीरे समाप्त हो रही है।

चीन के अनुसार बहुध्रुवीय व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय संबंधों को अधिक लोकतांत्रिक, संतुलित तथा न्यायसंगत बना सकती है क्योंकि इसमें विभिन्न देशों को नीति-निर्माण की प्रक्रिया में समान अवसर प्राप्त होंगे। इस दृष्टिकोण के माध्यम से चीन स्वयं को केवल एक उभरती हुई शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे देश के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है जो वैश्विक शक्ति के अधिक न्यायपूर्ण वितरण का समर्थन करता है।

हालाँकि आलोचकों का मत है कि चीन द्वारा बहुध्रुवीयता की अवधारणा का समर्थन केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि उसके दीर्घकालिक सामरिक हितों से भी जुड़ा हुआ है। यदि वैश्विक शक्ति का पुनर्वितरण होता है, तो स्वाभाविक रूप से चीन की अंतरराष्ट्रीय भूमिका और प्रभाव में भी वृद्धि होगी।

वैश्विक शासन (Global Governance) की चीन की अवधारणा

चीन यह स्पष्ट करता है कि वैश्विक शासन का उद्देश्य किसी एक शक्ति के प्रभुत्व को बनाए रखना नहीं होना चाहिए। इसके स्थान पर सभी देशों को समान सम्मान, संप्रभु समानता तथा पारस्परिक सहयोग के आधार पर निर्णय लेने का अवसर मिलना चाहिए।

इस संदर्भ में चीन “Shared Future for Mankind” अर्थात “मानवता के साझा भविष्य” की अवधारणा प्रस्तुत करता है। इस विचार के अनुसार जलवायु परिवर्तन, महामारी, आतंकवाद, खाद्य सुरक्षा तथा आर्थिक असमानता जैसी वैश्विक समस्याओं का समाधान केवल सामूहिक प्रयासों द्वारा ही संभव है।

इसलिए किसी एक देश द्वारा अंतरराष्ट्रीय राजनीति को नियंत्रित करने के स्थान पर सहयोगात्मक बहुपक्षवाद (Cooperative Multilateralism) को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

यद्यपि यह विचार आकर्षक प्रतीत होता है, किंतु पश्चिमी देशों के अनेक विशेषज्ञों का मत है कि चीन इन सिद्धांतों का उपयोग अपने वैश्विक प्रभाव को वैधता प्रदान करने के लिए भी करता है।

संयुक्त राष्ट्र के प्रति चीन का दृष्टिकोण

  • चीन स्वयं को संयुक्त राष्ट्र प्रणाली का एक महत्वपूर्ण समर्थक प्रस्तुत करता है। वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है और शांति स्थापना अभियानों, विकास परियोजनाओं तथा बहुपक्षीय सहयोग में अपनी सक्रिय भूमिका को रेखांकित करता है।
  • चीन का तर्क है कि संयुक्त राष्ट्र को वैश्विक शासन का केंद्रीय मंच बने रहना चाहिए और अंतरराष्ट्रीय विवादों का समाधान एकपक्षीय सैन्य हस्तक्षेप के बजाय बहुपक्षीय संस्थाओं के माध्यम से किया जाना चाहिए।
  • हालाँकि आलोचकों का यह भी कहना है कि संयुक्त राष्ट्र के समर्थन के बावजूद चीन दक्षिण चीन सागर, ताइवान तथा मानवाधिकार जैसे अनेक मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना करता रहा है। इसलिए चीन की घोषित नीतियों और उसके व्यवहार के बीच संतुलन पर निरंतर बहस चलती रहती है।

ग्लोबल साउथ के साथ चीन की रणनीति

  • चीन स्वयं को विकासशील देशों का स्वाभाविक साझेदार प्रस्तुत करता है। एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका के अनेक देशों में उसने आधारभूत संरचना, ऊर्जा, परिवहन तथा डिजिटल संपर्क से जुड़ी परियोजनाओं में भारी निवेश किया है। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) इसी व्यापक रणनीति का प्रमुख उदाहरण है।
  • चीन का उद्देश्य केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं है। वह इन देशों के साथ राजनीतिक विश्वास तथा कूटनीतिक समर्थन भी विकसित करना चाहता है। इससे संयुक्त राष्ट्र तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन को व्यापक समर्थन प्राप्त हो सकता है।
  • हालाँकि कुछ विशेषज्ञों का मत है कि चीन की आर्थिक सहायता के साथ ऋण-निर्भरता (Debt Dependency), रणनीतिक प्रभाव तथा राजनीतिक दबाव की संभावनाएँ भी जुड़ी रहती हैं। इसलिए चीन की इस नीति को लेकर विश्व स्तर पर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलती हैं।

भारत के लिए निहितार्थ

  • भारत के दृष्टिकोण से चीन की यह विश्व-दृष्टि अवसर और चुनौती दोनों प्रस्तुत करती है। एक ओर भारत भी वैश्विक शासन संस्थाओं में सुधार, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विस्तार तथा विकासशील देशों के अधिक प्रतिनिधित्व का समर्थन करता है।
  • दूसरी ओर भारत और चीन के बीच सीमा विवाद, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा तथा क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर मतभेद भी बने हुए हैं।
  • भारत की विदेश नीति का उद्देश्य ऐसी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का निर्माण करना है जिसमें कोई भी शक्ति प्रभुत्व स्थापित न कर सके तथा सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान किया जाए। इसलिए भारत चीन द्वारा प्रस्तावित सुधारों का मूल्यांकन उसके व्यावहारिक व्यवहार तथा अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के आधार पर करता है।

निष्कर्ष

चीन की विश्व-दृष्टि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उभर रहे व्यापक परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करती है। यह दृष्टिकोण उस विश्व व्यवस्था को चुनौती देता है जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विकसित हुई थी और इसके स्थान पर अधिक बहुध्रुवीय, बहुपक्षीय तथा विकासशील देशों की भागीदारी वाली व्यवस्था की वकालत करता है। यद्यपि इस दृष्टिकोण में वैश्विक संस्थाओं के लोकतंत्रीकरण तथा शक्ति के संतुलित वितरण जैसे महत्वपूर्ण विचार निहित हैं, फिर भी इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि चीन अपने घोषित सिद्धांतों संप्रभु समानता, नियम-आधारित सहयोग तथा पारस्परिक सम्मान का पालन अपने व्यवहार में किस सीमा तक करता है। आने वाले वर्षों में यही प्रश्न वैश्विक राजनीति की दिशा और भविष्य की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को निर्धारित करेगा।


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