1-प्लेटो
- “न्याय का अर्थ है प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपना स्वाभाविक कार्य करना।”
- “राज्य व्यक्ति का विस्तृत रूप है।”
- “दार्शनिक ही शासन करने के सर्वाधिक योग्य हैं।”
- “जब तक दार्शनिक राजा नहीं बनते अथवा राजा दार्शनिक नहीं बनते, तब तक राज्य की बुराइयों का अंत नहीं होगा।”
- “ज्ञान ही सद्गुण है।”
- “आदर्श राज्य का उद्देश्य नैतिक जीवन की स्थापना है।”
- “शिक्षा आदर्श राज्य की आधारशिला है।”
- “शासक वर्ग के लिए निजी संपत्ति और निजी परिवार का निषेध होना चाहिए।”
- “आत्मा के तीन भागों के अनुरूप राज्य के तीन वर्ग होते हैं।”
2-अरस्तू
- “मनुष्य स्वभाव से एक राजनीतिक प्राणी है।”
- “राज्य का जन्म जीवन के लिए होता है, किंतु उसका अस्तित्व उत्तम जीवन के लिए होता है।”
- “जो व्यक्ति राज्य के बाहर रहता है, वह या तो पशु है या देवता।”
- “कानून का शासन व्यक्ति के शासन से श्रेष्ठ है।”
- “मध्यम वर्ग राज्य की स्थिरता का आधार है।”
- “सर्वोत्तम व्यावहारिक शासन मिश्रित शासन है।”
- “राज्य एक प्राकृतिक संस्था है।”
- “नागरिक वही है जो शासन करने और शासित होने दोनों में भाग ले सके।”
- “क्रांतियों का मुख्य कारण असमानता है।”
3-निकोलो मैकियावेली
- “राजनीति का अध्ययन नैतिकता और धर्म से स्वतंत्र होना चाहिए।”
- “राज्य की सुरक्षा शासक का सर्वोच्च कर्तव्य है।”
- “सफल शासक को परिस्थितियों के अनुसार नीति बदलनी चाहिए।”
- “सिंह और लोमड़ी दोनों के गुण शासक में होने चाहिए।”
- “मनुष्य सामान्यतः स्वार्थी और चंचल होता है।”
- “यदि दोनों संभव न हों, तो शासक के लिए प्रेम की अपेक्षा भय अधिक सुरक्षित है।”
- “राजनीति में परिणाम का विशेष महत्व है।”
4-थॉमस हॉब्स
- “प्राकृतिक अवस्था में प्रत्येक व्यक्ति प्रत्येक व्यक्ति के विरुद्ध युद्ध की स्थिति में होता है।”
- “प्राकृतिक अवस्था में जीवन एकाकी, निर्धन, घृणित, पशुवत् और अल्पकालिक होता है।”
- “शांति प्राप्त करने के लिए सामाजिक अनुबंध आवश्यक है।”
- “संप्रभु सत्ता अविभाज्य और सर्वोच्च होती है।”
- “सुरक्षा राज्य की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य है।”
- “कानून संप्रभु की आज्ञा है।”
- “प्राकृतिक अधिकार आत्मरक्षा का अधिकार है।”
5-जॉन लॉक
- “मनुष्य जन्म से स्वतंत्र और समान है।”
- “जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति प्राकृतिक अधिकार हैं।”
- “सरकार की वैधता शासितों की सहमति पर आधारित है।”
- “यदि सरकार अधिकारों की रक्षा में विफल हो जाए, तो जनता को उसका प्रतिरोध करने का अधिकार है।”
- “विधायिका सरकार का सर्वोच्च अंग है।”
- “प्राकृतिक अवस्था स्वतंत्रता की अवस्था है, अराजकता की नहीं।”
- “राज्य का मुख्य उद्देश्य संपत्ति की रक्षा है।”
6-जाँ-जाक रूसो
- “मनुष्य जन्म से स्वतंत्र है, किंतु सर्वत्र जंजीरों में जकड़ा हुआ है।”
- “सामान्य इच्छा संप्रभुता का आधार है।”
- “संप्रभुता जनता में निहित होती है।”
- “संप्रभुता अविभाज्य है।”
- “संप्रभुता अहस्तांतरणीय है।”
- “कानून सामान्य इच्छा की अभिव्यक्ति है।”
- “स्वतंत्रता का अर्थ उस कानून का पालन करना है जिसे व्यक्ति ने स्वयं अपने लिए बनाया हो।”
- “सभ्यता ने मनुष्य को भ्रष्ट किया है।”
7-जेरेमी बेंथम
- “उपयोगिता प्रत्येक विधि और संस्था की कसौटी है।”
- “अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख शासन का लक्ष्य होना चाहिए।”
- “प्राकृतिक अधिकार निरर्थक कल्पना हैं।”
- “कानून संप्रभु की इच्छा की अभिव्यक्ति है।”
- “दंड तभी उचित है जब वह किसी बड़े अनिष्ट को रोक सके।”
- “राज्य का औचित्य उसकी उपयोगिता में निहित है।”
ध्यान दें: “Natural rights are nonsense upon stilts” बेंथम का प्रसिद्ध अंग्रेज़ी कथन है; UGC NET में इसका आशय पूछा जाता है, इसलिए हिंदी में उसका भावार्थ ऊपर दिया गया है।
8-जॉन स्टुअर्ट मिल
- “किसी सभ्य समाज में किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर बलपूर्वक प्रतिबंध लगाने का एकमात्र औचित्य दूसरों को हानि से बचाना है।”
- “विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सत्य की खोज के लिए आवश्यक है।”
- “अल्पमत के विचारों का भी सम्मान होना चाहिए।”
- “प्रतिनिधि शासन सर्वोत्तम शासन-पद्धति है।”
- “उच्चतर और निम्नतर सुखों में गुणात्मक अंतर है।”
- “स्त्री और पुरुष की समानता न्याय की अनिवार्य शर्त है।”
9-जी. डब्ल्यू. एफ. हेगेल
- “राज्य नैतिक विचार (Ethical Idea) की वास्तविक अभिव्यक्ति है।”
- “राज्य नैतिक जीवन (Ethical Life) का सर्वोच्च रूप है।”
- “व्यक्ति की वास्तविक स्वतंत्रता राज्य में ही संभव है।”
- “परिवार, नागरिक समाज और राज्य नैतिक जीवन के क्रमिक स्तर हैं।”
- “राज्य विशेष हितों का नहीं, सार्वभौमिक हित का प्रतिनिधित्व करता है।”
10-टी. एच. ग्रीन
- “स्वतंत्रता केवल बंधनों का अभाव नहीं, बल्कि आत्मविकास की क्षमता है।”
- “राज्य का उद्देश्य व्यक्तियों के नैतिक विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ निर्मित करना है।”
- “अधिकार समाज द्वारा मान्यता प्राप्त दावे हैं।”
- “सकारात्मक स्वतंत्रता नैतिक जीवन की आधारशिला है।”
11-कार्ल मार्क्स
- “अब तक के समस्त समाज का इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास है।”
- “राज्य वर्गीय प्रभुत्व का उपकरण है।”
- “आर्थिक आधार सामाजिक अधिरचना को निर्धारित करता है।”
- “पूंजीवाद अपने भीतर ही अपने विनाश के बीज रखता है।”
- “निजी संपत्ति वर्गीय शोषण का मूल स्रोत है।”
- “सर्वहारा वर्ग की मुक्ति स्वयं सर्वहारा वर्ग का कार्य है।”
- “वर्गविहीन समाज साम्यवाद का अंतिम लक्ष्य है।”
- “राज्य अंततः लुप्त हो जाएगा।”
- “श्रमिक वर्ग की मुक्ति, स्वयं श्रमिक वर्ग का ही कार्य है।”
12-फ्रेडरिक एंगेल्स Friedrich Engels
- “राज्य समाज पर बाहर से थोपी गई शक्ति नहीं है।”
- “राज्य वर्ग-विरोधों की उपज है।”
- “वर्गहीन समाज में राज्य का लोप हो जाएगा।”
- “राज्य तब उत्पन्न होता है जब वर्ग-विरोधों का समाधान असंभव हो जाता है।”
13-एंटोनियो ग्राम्शी
- “प्रभुत्व (Hegemony) केवल बल से नहीं, बल्कि सहमति से भी स्थापित होता है।”
- “नागरिक समाज प्रभुत्व के निर्माण का प्रमुख क्षेत्र है।”
- “बौद्धिक वर्ग सामाजिक परिवर्तन में निर्णायक भूमिका निभाता है।”
- “जैविक बुद्धिजीवी (Organic Intellectuals) प्रत्येक वर्ग के साथ विकसित होते हैं।”
- “सांस्कृतिक प्रभुत्व राजनीतिक प्रभुत्व को स्थिरता प्रदान करता है।”
14-मैक्स वेबर
- “राज्य वह संस्था है जिसके पास वैध भौतिक बल के प्रयोग का एकाधिकार होता है।”
- “वैध प्रभुत्व के तीन आदर्श प्रकार हैं: पारंपरिक, करिश्माई और वैधानिक-तर्कसंगत।”
- “नौकरशाही आधुनिक प्रशासन का सबसे तर्कसंगत स्वरूप है।”
- “राजनीति शक्ति में भागीदारी या शक्ति के वितरण को प्रभावित करने का प्रयास है।”
- “नैतिकता और राजनीति के संबंध में उत्तरदायित्व की नैतिकता का विशेष महत्व है।”
15-हैरोल्ड डी. लासवेल Harold Lasswell
- “राजनीति का संबंध इस प्रश्न से है कि कौन, क्या, कब और कैसे प्राप्त करता है।”
- “शक्ति राजनीतिक विश्लेषण की केंद्रीय अवधारणा है।”
- “राजनीतिक प्रक्रिया मूलतः मूल्यों के वितरण से संबंधित होती है।”
- “अभिजन (Elite) नीति-निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।”
16-डेविड ईस्टन
- “राजनीति समाज के लिए मूल्यों का आधिकारिक आवंटन है।”
- “राजनीतिक व्यवस्था एक खुली व्यवस्था (Open System) है।”
- “इनपुट और आउटपुट राजनीतिक व्यवस्था के प्रमुख घटक हैं।”
- “फीडबैक राजनीतिक व्यवस्था को स्थिरता प्रदान करता है।”
- “पर्यावरण राजनीतिक व्यवस्था को निरंतर प्रभावित करता है।”
- “राजनीतिक व्यवस्था मांगों और समर्थन के माध्यम से कार्य करती है।”
- “हम अपने मूल्यों को वैसे नहीं उतार सकते, जैसे हम अपना कोट उतार देते हैं।”
- “राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक मूल्यों के स्पष्टीकरण और आलोचनात्मक परीक्षण से संबंधित है।”
17-गैब्रियल आल्मंड
- “सभी राजनीतिक व्यवस्थाएँ समान प्रकार के राजनीतिक कार्य संपन्न करती हैं।”
- “राजनीतिक संस्कृति राजनीतिक व्यवस्था के अध्ययन की महत्वपूर्ण अवधारणा है।”
- “संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम तुलनात्मक राजनीति का प्रभावी उपकरण है।”
- “राजनीतिक विकास में संरचनात्मक विभेदीकरण महत्वपूर्ण है।”
- “परंपरागत और आधुनिक संरचनाएँ एक ही व्यवस्था में सह-अस्तित्व रख सकती हैं।”
18-सिडनी वर्बा
- “नागरिक संस्कृति स्थिर लोकतंत्र की आधारशिला है।”
- “लोकतंत्र की सफलता राजनीतिक संस्कृति पर निर्भर करती है।”
- “सहभागी राजनीतिक संस्कृति लोकतंत्र को सुदृढ़ करती है।”
19-लूसियन पाई
- “राजनीतिक विकास बहुआयामी प्रक्रिया है।”
- “राजनीतिक आधुनिकीकरण में संस्थागत क्षमता का विकास आवश्यक है।”
- “राजनीतिक विकास केवल आर्थिक विकास का परिणाम नहीं है।”
20-सैमुअल पी. हंटिंगटन
- “राजनीतिक विकास का मूल तत्व संस्थागतकरण है।”
- “राजनीतिक व्यवस्था की स्थिरता संस्थाओं की शक्ति पर निर्भर करती है।”
- “राजनीतिक क्षय तब उत्पन्न होता है जब राजनीतिक सहभागिता संस्थागत विकास से आगे निकल जाती है।”
- “मजबूत संस्थाएँ राजनीतिक स्थिरता का आधार हैं।”
21-कार्ल डॉइच (Karl W. Deutsch)
- “राजनीतिक व्यवस्था संचार और नियंत्रण की व्यवस्था है।”
- “सूचना का प्रवाह राजनीतिक व्यवस्था की कार्यक्षमता को प्रभावित करता है।”
- “फीडबैक राजनीतिक नियंत्रण का आवश्यक तत्व है।”
22-रॉबर्ट ए. डाल (Robert A. Dahl)
- “बहुलतंत्र आधुनिक लोकतंत्र का व्यावहारिक स्वरूप है।”
- “लोकतंत्र में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और सहभागिता दोनों आवश्यक हैं।”
- “शक्ति समाज में विभिन्न समूहों में वितरित होती है।”
- “लोकतंत्र का मूल्यांकन सहभागिता और सार्वजनिक प्रतिस्पर्धा के आधार पर किया जाना चाहिए।”
- “पूर्ण लोकतंत्र की अपेक्षा बहुलतंत्र आधुनिक राज्यों का यथार्थ स्वरूप है।”
23-जोसेफ शुम्पीटर (Joseph Schumpeter)
- “लोकतंत्र राजनीतिक नेताओं के बीच प्रतिस्पर्धात्मक संघर्ष की व्यवस्था है।”
- “जनता नीतियाँ नहीं बनाती, बल्कि शासकों का चयन करती है।”
- “लोकतंत्र निर्णय लेने की एक संस्थागत व्यवस्था है।”
24-जियोवानी सार्टोरी
- “दलीय व्यवस्था का अध्ययन केवल दलों की संख्या से नहीं किया जा सकता।”
- “वैचारिक दूरी दलीय व्यवस्था के विश्लेषण में महत्वपूर्ण है।”
- “ध्रुवीकृत बहुदलीय व्यवस्था राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ा सकती है।”
25-मॉरिस डुवर्जे
- “एकल सदस्यीय बहुलता निर्वाचन प्रणाली द्विदलीय व्यवस्था को प्रोत्साहित करती है।”
- “आनुपातिक प्रतिनिधित्व बहुदलीय व्यवस्था को बढ़ावा देता है।”
- “निर्वाचन प्रणाली दलीय व्यवस्था को प्रभावित करती है।”
26-G. H. Sabine
- “राजनीतिक सिद्धांत में तीन प्रकार के तत्त्व होते हैं: तथ्यात्मक, कारणात्मक और मूल्यात्मक।”
- “राजनीतिक सिद्धांत व्याख्यात्मक होने के साथ-साथ मूल्यांकनात्मक भी है।”
- “राजनीतिक सिद्धांत का इतिहास राजनीतिक समस्याओं का इतिहास है।”
UGC NET PYQ
1- “We cannot shed our values in the way we remove our coats.” यह कथन किसका है?
(A) Peter Laslett
(B) David Easton
(C) Isaiah Berlin
(D) Robert Dahl
2- “श्रमिक वर्ग की मुक्ति, स्वयं श्रमिक वर्ग का ही कार्य है।” यह कथन किसका है?
(A) Mao Tse Tung
(B) V. I. Lenin
(C) Friedrich Engels
(D) Karl Marx
3-“राजनीतिक सिद्धांत में तीन प्रकार के तत्त्व निहित होते हैं: तथ्यात्मक, कारणात्मक तथा मूल्यात्मक।” यह कथन किसका है?
(A) लियो स्ट्रॉस
(B) डनिंग
(C) जी. एच. सबाइन
(D) एबेनस्टीन
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