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भारत के लिए उभरती ढाका-बीजिंग-इस्लामाबाद सामरिक धुरी

इक्कीसवीं शताब्दी की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति संतुलन का स्वरूप निरंतर परिवर्तित हो रहा है। वैश्विक स्तर पर अमेरिका और चीन के मध्य बढ़ती प्रतिस्पर्धा, हिंद महासागर क्षेत्र का बढ़ता सामरिक महत्व तथा इंडो पैसिफिक की अवधारणा ने दक्षिण एशिया को पुनः वैश्विक शक्ति संघर्ष के केंद्र में ला खड़ा किया है। भारत के लिए यह परिस्थिति इसलिए अधिक जटिल है क्योंकि उसके निकटवर्ती पड़ोसी देशों की विदेश नीतियों में भी उल्लेखनीय परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं। विशेष रूप से चीन, बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच बढ़ता सामरिक एवं आर्थिक सहयोग भारत की सुरक्षा, विदेश नीति तथा समुद्री हितों के संदर्भ में नए प्रश्न उत्पन्न करता है।

हाल के वर्षों में चीन ने दक्षिण एशिया में अपनी आर्थिक शक्ति, आधारभूत संरचना निवेश, रक्षा सहयोग तथा बंदरगाह विकास परियोजनाओं के माध्यम से प्रभाव का उल्लेखनीय विस्तार किया है। दूसरी ओर पाकिस्तान लंबे समय से चीन का रणनीतिक साझेदार रहा है, जबकि बांग्लादेश भी आर्थिक विकास तथा अवसंरचना निर्माण के क्षेत्र में चीन के साथ अपने संबंधों को निरंतर सुदृढ़ कर रहा है। इन परिस्थितियों में भारत के समक्ष यह चुनौती उपस्थित होती है कि वह अपने पूर्वी समुद्री तट, उत्तर पूर्वी राज्यों तथा पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को किस प्रकार संतुलित एवं सुरक्षित बनाए।

यह विषय केवल कूटनीति का प्रश्न नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री शक्ति, आर्थिक संपर्क, क्षेत्रीय स्थिरता तथा भू राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से भी प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है।

बदलता सामरिक परिवेश

भारत की विदेश नीति लंबे समय तक पड़ोसी देशों के साथ सहयोग, क्षेत्रीय स्थिरता तथा विकासोन्मुख साझेदारी पर आधारित रही है। किंतु वर्तमान समय में दक्षिण एशिया में चीन की सक्रियता ने सामरिक समीकरणों को जटिल बना दिया है।

चीन की बेल्ट एंड रोड पहल, चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा, हिंद महासागर क्षेत्र में बंदरगाहों का विकास, रक्षा सहयोग तथा आर्थिक निवेश की रणनीति उसके व्यापक भू राजनीतिक उद्देश्यों का संकेत देती है। इन पहलों के माध्यम से चीन केवल आर्थिक अवसर नहीं खोज रहा, बल्कि दीर्घकालिक सामरिक उपस्थिति भी स्थापित करना चाहता है।

बांग्लादेश के साथ चीन के बढ़ते आर्थिक एवं रक्षा संबंध इस व्यापक रणनीति का महत्वपूर्ण भाग माने जा सकते हैं। यदि इसमें पाकिस्तान की सक्रिय भागीदारी भी जुड़ती है, तो भारत के पूर्वी और पश्चिमी दोनों मोर्चों पर सामरिक दबाव बढ़ सकता है।

भारत चीन संबंधों का विरोधाभास

भारत और चीन के संबंधों में एक विचित्र द्वैत दिखाई देता है। एक ओर दोनों देश बहुपक्षीय मंचों जैसे ब्रिक्स तथा शंघाई सहयोग संगठन में सहयोग करते हैं, जबकि दूसरी ओर सीमा विवाद, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव तथा सामरिक प्रतिस्पर्धा लगातार बनी हुई है।

भारत ने कई अवसरों पर द्विपक्षीय संबंधों को स्थिर बनाए रखने का प्रयास किया है। इसके विपरीत चीन ने अपनी विदेश नीति में सुरक्षा, व्यापार, निवेश तथा सामरिक विस्तार को समानांतर रूप से आगे बढ़ाया है।

यही कारण है कि केवल उच्च स्तरीय बैठकों अथवा कूटनीतिक संवादों के आधार पर सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का आकलन पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

आर्थिक सहयोग के माध्यम से रणनीतिक प्रभाव

चीन की विदेश नीति की एक प्रमुख विशेषता यह है कि वह आर्थिक निवेश को सामरिक प्रभाव विस्तार के साधन के रूप में उपयोग करता है। ऊर्जा, दूरसंचार, परिवहन, बंदरगाह, विद्युत उत्पादन तथा आधारभूत संरचना जैसे क्षेत्रों में निवेश के माध्यम से वह दीर्घकालिक निर्भरता का वातावरण निर्मित करता है।

यदि किसी पड़ोसी देश की महत्वपूर्ण आर्थिक परियोजनाओं में चीनी कंपनियों की भूमिका अत्यधिक बढ़ती है, तो भविष्य में उसका प्रभाव केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि नीति निर्माण, सुरक्षा सहयोग तथा विदेश नीति पर भी परोक्ष प्रभाव पड़ सकता है।

भारत के लिए यह चुनौती इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उसके अधिकांश पड़ोसी देश विकासशील अर्थव्यवस्थाएँ हैं, जिन्हें बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता है।

बांग्लादेश की बदलती विदेश नीति

बांग्लादेश लंबे समय तक भारत के निकटतम साझेदारों में से एक रहा है। सीमा समझौते, भूमि सीमा विवाद का समाधान, संपर्क परियोजनाएँ, ऊर्जा सहयोग तथा आतंकवाद विरोधी सहयोग ने दोनों देशों के संबंधों को मजबूत आधार प्रदान किया।

किन्तु हाल के वर्षों में बांग्लादेश ने अपनी विदेश नीति में बहुआयामी संतुलन अपनाने का प्रयास किया है। उसने चीन के साथ आर्थिक सहयोग बढ़ाया है, रक्षा उपकरणों की खरीद की है तथा अवसंरचना परियोजनाओं में चीनी निवेश को प्रोत्साहित किया है।

यह आवश्यक नहीं कि चीन के साथ सहयोग का अर्थ भारत विरोधी नीति हो, किंतु यदि सामरिक निर्भरता अत्यधिक बढ़ती है तो भारत के सुरक्षा हित प्रभावित हो सकते हैं।

BCIM (बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार) से CMBC (चीन-म्यांमार-बांग्लादेश)

  • एक समय भारत, बांग्लादेश, चीन और म्यांमार को जोड़ने वाले बीसीआईएम आर्थिक गलियारे की परिकल्पना क्षेत्रीय संपर्क और व्यापार को बढ़ाने के उद्देश्य से की गई थी। भारत की पूर्वोन्मुखी नीति के संदर्भ में इसे महत्वपूर्ण माना जाता था।

  • किन्तु वर्तमान परिस्थितियों में चीन म्यांमार बांग्लादेश आर्थिक संपर्क की अवधारणा अधिक सक्रिय दिखाई देती है, जबकि भारत की भूमिका अपेक्षाकृत सीमित हो गई है।
  • यदि क्षेत्रीय संपर्क व्यवस्थाओं से भारत क्रमशः बाहर होता है, तो उसकी पूर्वोन्मुखी नीति के आर्थिक तथा सामरिक लाभ प्रभावित हो सकते हैं।

मोंगला बंदरगाह का सामरिक महत्व

  • बंगाल की खाड़ी में स्थित मोंगला बंदरगाह भौगोलिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह भारत के पश्चिम बंगाल तथा पूर्वी समुद्री तट के निकट स्थित है।
  • यदि किसी बाहरी शक्ति को ऐसे बंदरगाहों पर दीर्घकालिक परिचालन सुविधाएँ प्राप्त होती हैं, तो समुद्री निगरानी, रसद सहयोग तथा सामरिक उपस्थिति की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं।
  • यद्यपि वर्तमान समय में बांग्लादेश ने किसी विदेशी नौसैनिक अड्डे की औपचारिक अनुमति नहीं दी है, फिर भी बंदरगाह अवसंरचना, दोहरे उपयोग वाली सुविधाएँ तथा लॉजिस्टिक सहयोग भविष्य की सामरिक संभावनाओं को प्रभावित कर सकते हैं।
  • भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह इस प्रकार के विकास पर निरंतर निगरानी रखे और अपने समुद्री हितों की रक्षा हेतु समुचित तैयारी बनाए रखे।

 

बंगाल की खाड़ी और भारत की समुद्री सुरक्षा

  • बंगाल की खाड़ी केवल एक समुद्री क्षेत्र नहीं है, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, नौवहन तथा पूर्वी राज्यों की आर्थिक प्रगति का प्रमुख आधार है।
  • भारत का एक बड़ा समुद्री व्यापार इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है। अंडमान निकोबार द्वीप समूह, विशाखापत्तनम, कोलकाता, हल्दिया तथा अन्य बंदरगाह इस क्षेत्र के सामरिक महत्व को और अधिक बढ़ाते हैं।
  • यदि किसी प्रतिद्वंद्वी शक्ति की समुद्री उपस्थिति इस क्षेत्र में बढ़ती है, तो समुद्री निगरानी, संचार सुरक्षा तथा नौसैनिक संचालन की जटिलताएँ भी बढ़ सकती हैं।
  • इसी कारण भारत ने हाल के वर्षों में अपनी समुद्री क्षमता, तटरक्षक बल, समुद्री डोमेन जागरूकता तथा इंडो पैसिफिक साझेदारियों को निरंतर मजबूत किया है।

उत्तर पूर्व भारत की सामरिक संवेदनशीलता

भारत का उत्तर पूर्व क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है। यह क्षेत्र संकीर्ण सिलीगुड़ी गलियारे के माध्यम से शेष भारत से जुड़ा हुआ है।

बांग्लादेश, म्यांमार, भूटान तथा चीन से घिरे इस क्षेत्र की सुरक्षा केवल सैन्य दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आर्थिक संपर्क, सीमा प्रबंधन तथा आंतरिक स्थिरता से भी जुड़ी हुई है।

यदि पड़ोसी देशों में बाहरी शक्तियों का प्रभाव बढ़ता है, तो भारत को अपनी सीमाओं, संपर्क मार्गों तथा क्षेत्रीय विकास रणनीतियों पर विशेष ध्यान देना होगा।

भारत के समक्ष समुद्री और कूटनीतिक विकल्प

भारत के लिए केवल सैन्य प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं होगी। दीर्घकालिक समाधान व्यापक राष्ट्रीय शक्ति के समन्वित उपयोग में निहित है।

  • सबसे पहले भारत को पड़ोसी देशों के साथ विश्वास आधारित संबंधों को और अधिक मजबूत करना होगा। विकास सहयोग, क्षमता निर्माण, शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा तथा संपर्क परियोजनाओं में भारत की सक्रिय भागीदारी बढ़नी चाहिए।
  • दूसरे, भारतीय नौसेना के आधुनिकीकरण, समुद्री निगरानी प्रणाली, पनडुब्बी रोधी क्षमता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित समुद्री सूचना प्रणाली तथा अंडमान निकोबार कमान को और अधिक सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।
  • तीसरे, भारत को इंडो पैसिफिक क्षेत्र में फ्रांस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, आसियान तथा अन्य समान विचार वाले देशों के साथ समुद्री सहयोग को व्यावहारिक रूप देना चाहिए।
  • चौथे, बंगाल की खाड़ी बहुक्षेत्रीय तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग पहल, भारतीय महासागर क्षेत्रीय संगठनों तथा हिंद महासागर रिम एसोसिएशन जैसे मंचों के माध्यम से क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ाना आवश्यक है।

क्या ढाका बीजिंग इस्लामाबाद सहयोग भारत विरोधी गठबंधन है?

यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्तमान उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि बांग्लादेश, चीन और पाकिस्तान के बीच कोई औपचारिक भारत विरोधी सैन्य गठबंधन अस्तित्व में है।

हाँ, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि चीन अपने आर्थिक एवं सामरिक प्रभाव का विस्तार कर रहा है, पाकिस्तान उसके साथ दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदार बना हुआ है तथा बांग्लादेश अपनी राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुसार बहुध्रुवीय विदेश नीति अपनाने का प्रयास कर रहा है।

भारत के लिए चुनौती इन संबंधों का भावनात्मक नहीं, बल्कि यथार्थवादी और रणनीतिक मूल्यांकन करना है।

भारत की आगे की रणनीति

भारत को अपनी विदेश नीति में संतुलित यथार्थवाद अपनाना होगा। पड़ोसी देशों के साथ सम्मानजनक साझेदारी, आर्थिक सहयोग तथा विश्वास निर्माण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

इसके साथ ही समुद्री शक्ति, रक्षा आधुनिकीकरण, सीमावर्ती अवसंरचना, खुफिया समन्वय, साइबर सुरक्षा तथा तकनीकी आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए।

भारत को अपनी एक्ट ईस्ट नीति को केवल घोषणाओं तक सीमित न रखकर पूर्वोत्तर भारत के विकास, क्षेत्रीय संपर्क, व्यापारिक गलियारों तथा समुद्री सहयोग के माध्यम से वास्तविक गति प्रदान करनी होगी।

निष्कर्ष

दक्षिण एशिया की बदलती भू राजनीतिक परिस्थितियाँ भारत के समक्ष नई चुनौतियाँ प्रस्तुत कर रही हैं। चीन का बढ़ता प्रभाव, बांग्लादेश की संतुलित विदेश नीति तथा पाकिस्तान के साथ चीन की दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी भारत के लिए सतर्कता का विषय अवश्य है, किंतु इसे केवल सुरक्षा संकट के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।

भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी आर्थिक क्षमता, लोकतांत्रिक विश्वसनीयता, समुद्री स्थिति, मानवीय संसाधन तथा क्षेत्रीय नेतृत्व की संभावनाएँ हैं। यदि भारत पड़ोसी देशों के साथ विश्वास, विकास और सुरक्षा का संतुलित मॉडल प्रस्तुत करता है तथा अपनी सैन्य एवं कूटनीतिक क्षमताओं का समानांतर विकास करता है, तो वह किसी भी उभरती सामरिक चुनौती का प्रभावी ढंग से सामना करने में सक्षम होगा। दक्षिण एशिया का भविष्य प्रतिस्पर्धा और सहयोग दोनों का मिश्रण होगा, और भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह इन दोनों आयामों के मध्य कितना संतुलित, दूरदर्शी और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाता है।


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Citizenship and its Discontents: An Indian History