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मक्का समझौता

इस्लामिक नाटो की ओर पहला कदम?

7 अगस्त 2026 को सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में एक ऐतिहासिक घटना घटी। सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने एक त्रिपक्षीय सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसे ‘मक्का समझौता’ नाम दिया गया है। इस समझौते पर सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने हस्ताक्षर किए। तीनों देशों ने आपस में यह प्रतिबद्धता जताई कि किसी एक देश पर सशस्त्र हमला तीनों के विरुद्ध हमला माना जाएगा। इस समझौते के केंद्र में दो शब्द हैं, सामूहिक रक्षा (collective defence) और सामूहिक निरोध (collective deterrence)। यह घटनाक्रम इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि यह अमेरिका की घटती रणनीतिक उपस्थिति के बीच पश्चिम एशिया की सुरक्षा वास्तुकला में एक बुनियादी बदलाव का संकेत देता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: तुर्की और सऊदी अरब की पुरानी प्रतिस्पर्धा

  • इस समझौते का महत्व समझने के लिए तुर्की और सऊदी अरब के बीच सदियों पुरानी प्रतिद्वंद्विता को समझना आवश्यक है।
  • 1814 में जब अब्दुल्ला बिन सऊद अपने पिता के बाद दिरिया रियासत (प्रथम सऊदी राज्य) के अमीर बने, उससे पहले ही मुहम्मद अली पाशा की कमान में ऑटोमन सेनाएं अल-सऊद वंश के विरुद्ध सैन्य अभियान छेड़ चुकी थीं।
  • ऑटोमन साम्राज्य का उद्देश्य इस अमीरात को समाप्त करके अरब प्रायद्वीप पर पुनः नियंत्रण स्थापित करना था। 1818 में मुहम्मद अली के पुत्र इब्राहीम पाशा ने दिरिया की घेराबंदी कर उसे आत्मसमर्पण के लिए विवश किया।
  • अब्दुल्ला और उनके साथियों को काहिरा और फिर कॉन्स्टेंटिनोपल (आज का इस्तांबुल) भेजा गया, जहां मई 1819 में उन्हें हागिया सोफिया के निकट सार्वजनिक रूप से शिरच्छेदन कर दिया गया।
  • इस पराजय के बावजूद सऊद वंश ने हार नहीं मानी। उन्नीसवीं सदी में द्वितीय सऊदी राज्य और बीसवीं सदी के आरंभ में ब्रिटिश समर्थन से तृतीय सऊदी राज्य की स्थापना हुई, जो कालांतर में आधुनिक सऊदी अरब के रूप में विकसित हुआ।
  • प्रथम विश्व युद्ध के बाद ऑटोमन साम्राज्य का पतन हो गया और उसके स्थान पर तुर्की गणराज्य का उदय हुआ। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद दोनों ही देश अमेरिका के करीबी सहयोगी बने, परंतु उनके आपसी संबंध सदैव तनावपूर्ण रहे।

हाल के दशकों में तनाव के प्रमुख कारण

  • इक्कीसवीं सदी में एर्दोगान के नेतृत्व में तुर्की का इस्लामी झुकाव बढ़ने से मतभेद गहराए।
  • 2010-11 के अरब स्प्रिंग आंदोलन के दौरान तुर्की ने विरोध प्रदर्शनों का समर्थन किया, जबकि सऊदी अरब ने इन्हें राजनीतिक स्थिरता के लिए खतरा माना।
  • 2018 में इस्तांबुल स्थित सऊदी वाणिज्य दूतावास में असंतुष्ट पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या ने संबंधों को और बिगाड़ दिया।
  • दोनों देश लीबिया सहित कई क्षेत्रीय संघर्षों में विरोधी खेमों में रहे।

वर्तमान बदलाव: पुरानी दुश्मनी का पिघलना

हाल के वर्षों में पश्चिम एशिया में ऐसे कई घटनाक्रम हुए हैं जिन्होंने शक्ति संतुलन को बदल दिया है, और इसी पृष्ठभूमि में सऊदी अरब और तुर्की ने अपने वर्षों पुराने विवादों को पीछे छोड़कर पाकिस्तान के साथ त्रिपक्षीय रक्षा समझौता किया। यह उल्लेखनीय है कि सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच सितंबर 2025 में ही एक सामरिक परस्पर रक्षा समझौता (Strategic Mutual Defence Agreement) हो चुका था, जिसमें दोनों देशों ने एक-दूसरे पर आक्रमण को दोनों के विरुद्ध आक्रमण मानने की प्रतिबद्धता जताई थी। मक्का समझौता इसी नींव पर तुर्की को जोड़कर एक विस्तृत त्रिपक्षीय ढांचे में बदल देता है।

तीन देशों की भिन्न आवश्यकताएं

यह गठबंधन इस अर्थ में अभूतपूर्व है कि इसमें तीन प्रमुख मुस्लिम बहुसंख्यक देश शामिल हैं, एक परमाणु शक्ति संपन्न दक्षिण एशियाई देश, एक तेल संपन्न फारस की खाड़ी की राजशाही और यूरोप-एशिया की सीमा पर स्थित नाटो का सदस्य देश। इस प्रकार का गठबंधन पश्चिम एशिया में पहले कभी नहीं देखा गया।

प्रत्येक सदस्य देश इस साझेदारी में अपनी विशिष्ट शक्तियां और कमजोरियां लेकर आता है।

पाकिस्तान

  • मुस्लिम जगत की एकमात्र परमाणु शक्ति है, जो इस गठबंधन को सामरिक भार प्रदान करती है।
  • परंतु इसकी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है।
  • भारत के साथ शत्रुतापूर्ण संबंध इसकी सुरक्षा नीति का केंद्रीय तत्व हैं। मई 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच एक संक्षिप्त हवाई संघर्ष भी हुआ था।
  • भारत यह स्पष्ट कर चुका है कि वह अपनी धरती पर होने वाले आतंकी हमलों के लिए पाकिस्तान को उत्तरदायी मानेगा, जिसके जवाब में इस्लामाबाद प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने हेतु ऐसे प्रति-गठबंधन तलाश रहा है।

सऊदी अरब

  • विश्व के सबसे बड़े तेल निर्यातकों में से एक होने के कारण इसके पास संसाधनों की प्रचुरता है।
  • परंतु इसे ईरान और हूती विद्रोहियों की ओर से गंभीर सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

तुर्की

  • इसका सैन्य औद्योगिक आधार तेज़ी से विस्तारित हो रहा है, विशेषकर उन्नत ड्रोन उत्पादन क्षमता में यह अग्रणी बन चुका है।
  • परंतु अपने पड़ोस में इज़राइल के बढ़ते सैन्यवाद को लेकर तुर्की चिंतित है।

सऊदी अरब की अमेरिका पर घटती निर्भरता

  • सऊदी अरब 1940 के दशक के अंत से ही अमेरिका का घनिष्ठ सहयोगी रहा है। यह संबंध एक सरल सिद्धांत पर आधारित था, अमेरिका सऊदी अरब की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा और बदले में सऊदी अरब निर्बाध तेल प्रवाह सुनिश्चित करेगा। परंतु हाल के वर्षों में यह नींव हिल गई है।
  • पूर्वी एशिया में चीन के उभार का सामना करते हुए अमेरिका ने पश्चिम एशिया को प्राथमिकता सूची में नीचे खिसका दिया है।
  • 2019 में जब ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी तेल प्रतिष्ठानों पर हमला किया, तब अमेरिका की प्रतिक्रिया अत्यंत सीमित रही, जिससे रियाद को अमेरिकी सुरक्षा छतरी से परे विकल्प तलाशने की प्रेरणा मिली।
  • 2023 में चीन की मध्यस्थता से सऊदी अरब और ईरान के बीच संबंधों को सामान्य बनाने का समझौता हुआ, जो स्वयं इस बात का प्रमाण है कि खाड़ी देश अब क्षेत्रीय समस्याओं के समाधान के लिए अमेरिका से परे भी देख रहे हैं।
  • 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले के बाद इज़राइल द्वारा छेड़े गए मिनी क्षेत्रीय युद्ध से सऊदी अरब की सुरक्षा चिंताएं और गहरी हुईं। इसके बाद 28 फरवरी 2026 को जब अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर युद्ध छेड़ा, तो तेहरान ने बार-बार सऊदी अरब सहित खाड़ी के अन्य देशों पर हमले किए। इससे रियाद को यह विश्वास हो गया कि अमेरिकी सुरक्षा गारंटियां अब पहले जैसी ठोस नहीं रह गई हैं।

तुर्की की महत्वाकांक्षा और इज़राइल संबंधी चिंता

तुर्की लंबे समय से पश्चिम एशिया में, जो कभी कॉन्स्टेंटिनोपल की जागीर थी, बड़ी भूमिका निभाने की आकांक्षा रखता है। उसने कतर के साथ मज़बूत संबंध विकसित किए हैं और वहां अपनी सैन्य उपस्थिति भी बनाए रखी है। सऊदी अरब के साथ गठबंधन अंकारा को क्षेत्र में अधिक रणनीतिक स्थान प्रदान करता है।

तुर्की की अपनी सुरक्षा चिंताएं भी हैं। इज़राइल की बढ़ती सैन्यवादी प्रवृत्ति, जो हवाई हमलों और सैन्य घुसपैठ के माध्यम से अपने क्षेत्र का विस्तार कर रही है, को देखते हुए अंकारा भविष्य में संभावित संघर्षों के लिए तैयार रहना चाहता है। यद्यपि तुर्की नाटो का सदस्य है, परंतु अमेरिका के सबसे करीबी सहयोगी इज़राइल के साथ किसी संभावित संघर्ष की स्थिति में नाटो की सामूहिक सुरक्षा गारंटी कारगर होगी या नहीं, इस पर अंकारा को संदेह है।

बदलते समीकरण: व्यावहारिक सीमाएं और महत्व

  • यह त्रिपक्षीय गठबंधन और इसका सामूहिक सुरक्षा प्रावधान आवश्यक रूप से इसका अर्थ नहीं है कि पाकिस्तान ईरान या हूतियों के विरुद्ध युद्ध में उतरेगा, या तुर्की भारत-पाकिस्तान संघर्ष में सम्मिलित होगा। इसके व्यावहारिक प्रमाण भी मिलते हैं।
  • सितंबर 2025 में सऊदी-पाकिस्तान समझौते के बाद पाकिस्तान का तालिबान शासित अफगानिस्तान के साथ कई बार टकराव हुआ, जबकि सऊदी अरब पर ईरान और हूतियों की ओर से लगातार हमले होते रहे। फिर भी किसी भी देश ने दूसरे की ओर से सैन्य हस्तक्षेप नहीं किया।
  • इससे यह स्पष्ट होता है कि इस गठबंधन की सामूहिक रक्षा प्रतिबद्धता का व्यावहारिक दायरा अभी भी प्रश्नों के घेरे में है। इसके बावजूद यह समझौता महत्वपूर्ण है क्योंकि यह तीन प्रमुख शक्तियों को एक साझा सुरक्षा ढांचे में एक साथ लाता है।
  • जब अमेरिका की क्षेत्रीय शक्ति अपनी सीमाओं का सामना कर रही है, ऐसे समय में इन देशों के बीच रक्षा साझेदारी और सैन्य अंतर-संचालन क्षमता (military interoperability) का विस्तार हो सकता है।
  • यह गठबंधन तुर्की और पाकिस्तान को पश्चिम एशिया में अधिक रणनीतिक स्थान प्रदान करता है।
  • क्षेत्र के अन्य छोटे देश भी इस गठबंधन से जुड़ने के लिए प्रेरित हो सकते हैं, जबकि भारत, संयुक्त अरब अमीरात, इज़राइल और ईरान जैसे देश, जिनके इस गठबंधन के सदस्यों के साथ जटिल संबंध हैं, अपने स्वयं के प्रतिसंतुलन (counterbalancing) प्रबंध तलाश सकते हैं।

निष्कर्ष

इस प्रकार पश्चिम एशिया की सुरक्षा वास्तुकला में एक गहरा परिवर्तन आ सकता है, जो क्षेत्र के उत्तर-अमेरिकी संक्रमण (post-American transition) की प्रक्रिया को और तेज़ करेगा। यह ध्यान देने योग्य है कि सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान, तीनों देशों ने अपनी-अपनी सुरक्षा चिंताओं का समाधान अमेरिका पर निर्भरता कम करके, आपस में सहयोग बढ़ाकर तलाशने का प्रयास किया है। यह प्रवृत्ति यह संकेत देती है कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के उभार के साथ क्षेत्रीय शक्तियां अपने स्वयं के गठबंधन बनाकर सुरक्षा शून्य को भरने का प्रयास कर रही हैं।


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