भारत में पर्यावरणीय शासन (Environmental Governance) का विकास स्वतंत्रता के समय मौजूद सीमित संवैधानिक प्रावधानों से आगे बढ़कर एक व्यापक और सुदृढ़ कानूनी व्यवस्था के रूप में हुआ है। इस विकास में संवैधानिक संशोधनों, अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय प्रतिबद्धताओं, विधायी उपायों तथा विशेष रूप से न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
भारतीय सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने पर्यावरण संरक्षण को केवल नीति संबंधी विषय न मानकर इसे संवैधानिक अधिकारों तथा राज्य के दायित्वों से जोड़ते हुए अनेक महत्वपूर्ण न्यायिक सिद्धांत विकसित किए।
हालाँकि, हाल के वर्षों में बड़े बुनियादी ढाँचा (Infrastructure) तथा विकास परियोजनाओं से संबंधित मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण की निरंतरता को लेकर प्रश्न भी उठे हैं। एक ओर न्यायपालिका ने पर्यावरण संरक्षण के लिए अत्यंत प्रगतिशील सिद्धांत विकसित किए हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ मामलों में विकास परियोजनाओं के पक्ष में पर्यावरणीय चिंताओं की न्यायिक जाँच अपेक्षाकृत कम कठोर दिखाई दी है। इसलिए वर्तमान बहस केवल पर्यावरण बनाम विकास की नहीं, बल्कि संवैधानिक पर्यावरणीय दायित्वों और विकासात्मक आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करने की है।
पर्यावरण संरक्षण की संवैधानिक नींव
- मूल संविधान: 1950 के संविधान में ‘पर्यावरण’ शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं था। फिर भी राज्य के कल्याण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े कुछ प्रावधान अप्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण संरक्षण से संबंधित थे।
- अनुच्छेद 48A को राज्य के नीति निदेशक तत्वों (Directive Principles of State Policy) में शामिल किया गया। इसके अनुसार राज्य का दायित्व है कि वह पर्यावरण की रक्षा एवं सुधार करे तथा देश के वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। इस प्रावधान ने पर्यावरण संरक्षण को राज्य की नीतिगत जिम्मेदारी का हिस्सा बनाया।
- स्टॉकहोम सम्मेलन, 1972: संयुक्त राष्ट्र के मानव पर्यावरण सम्मेलन में भारत की भागीदारी के बाद पर्यावरण संरक्षण को संवैधानिक और नीतिगत महत्व मिला। इसके बाद भारत में पर्यावरणीय कानूनों के विकास को गति मिली।
- 42वाँ संविधान संशोधन, 1976: इस संशोधन ने पर्यावरण संरक्षण को स्पष्ट संवैधानिक आधार दिया। अनुच्छेद 48A के तहत राज्य को पर्यावरण, वन और वन्यजीवों की रक्षा का दायित्व मिला तथा अनुच्छेद 51A(g) के तहत नागरिकों का मौलिक कर्तव्य निर्धारित किया गया।

भोपाल गैस त्रासदी और पर्यावरणीय न्यायशास्त्र का नया दौर
- 1984 की भोपाल गैस त्रासदी (Bhopal Gas Tragedy) ने भारत में औद्योगिक सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण तथा कॉर्पोरेट उत्तरदायित्व के प्रश्नों को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया। इस त्रासदी ने यह स्पष्ट किया कि खतरनाक औद्योगिक गतिविधियों से होने वाली क्षति केवल व्यक्तिगत संपत्ति या जीवन की क्षति नहीं होती, बल्कि इसका प्रभाव व्यापक सामाजिक और पर्यावरणीय स्तर पर पड़ सकता है।
- इसी पृष्ठभूमि में सर्वोच्च न्यायालय ने पर्यावरणीय मामलों में सक्रिय न्यायिक भूमिका निभाई। न्यायपालिका ने मौजूदा कानूनों की व्याख्या करते हुए ऐसे सिद्धांत विकसित किए जिनके माध्यम से पर्यावरणीय क्षति के लिए उत्तरदायित्व निर्धारित किया जा सके और प्रभावित लोगों को प्रभावी संरक्षण एवं प्रतिकार मिल सके।
- भारतीय पर्यावरणीय न्यायशास्त्र की विशेषता यही रही कि सर्वोच्च न्यायालय ने पर्यावरण संरक्षण को संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित जीवन के अधिकार से जोड़ते हुए उसे एक व्यापक संवैधानिक आयाम प्रदान किया।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विकसित प्रमुख पर्यावरणीय सिद्धांत
पूर्ण दायित्व का सिद्धांत (Doctrine of Absolute Liability): भारतीय पर्यावरणीय न्यायशास्त्र की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है। इसे विशेष रूप से M.C. Mehta v. Union of India, जिसे ओलियम गैस रिसाव मामला (Oleum Gas Leak Case) कहा जाता है, में विकसित किया गया। भोपाल गैस त्रासदी के व्यापक संदर्भ में इस सिद्धांत का महत्व और अधिक स्पष्ट हुआ।
- इस सिद्धांत के अनुसार जो उद्यम स्वभावतः खतरनाक या जोखिमपूर्ण गतिविधियों में संलग्न हैं, उन पर ऐसी गतिविधियों से होने वाली क्षति के लिए पूर्ण दायित्व होता है। उन्हें यह तर्क देकर दायित्व से मुक्त नहीं किया जा सकता कि उन्होंने पर्याप्त सावधानी बरती थी या उनकी कोई प्रत्यक्ष लापरवाही नहीं थी।
- यह सिद्धांत पारंपरिक ‘Strict Liability’ से अधिक कठोर है क्योंकि इसमें खतरनाक गतिविधि संचालित करने वाला उद्यम पर्यावरणीय अथवा मानवीय क्षति के लिए बिना किसी अपवाद के उत्तरदायी माना जाता है।
प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle) का अर्थ है कि पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले व्यक्ति या संस्था को उस नुकसान की भरपाई तथा पर्यावरण की पुनर्स्थापना की लागत वहन करनी चाहिए।
- Indian Council for Enviro-Legal Action v. Union of India में सर्वोच्च न्यायालय ने इस सिद्धांत को प्रभावी रूप से लागू किया। इसका उद्देश्य केवल पीड़ितों को आर्थिक मुआवजा देना नहीं है, बल्कि प्रदूषित पर्यावरण को पूर्व स्थिति में लाने के लिए आवश्यक लागत को भी प्रदूषक से वसूल करना है।
- इस सिद्धांत के पीछे मूल विचार यह है कि पर्यावरणीय क्षति का आर्थिक भार समाज या सरकार पर नहीं डाला जाना चाहिए। जिसने प्रदूषण उत्पन्न किया है, उसे उसके परिणामों की आर्थिक जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी चाहिए।
एहतियाती सिद्धांत (Precautionary Principle) का विकास भारतीय पर्यावरणीय न्यायशास्त्र में विशेष रूप से Vellore Citizens’ Welfare Forum v. Union of India के माध्यम से हुआ।
- इस सिद्धांत के अनुसार यदि किसी गतिविधि से गंभीर या अपरिवर्तनीय पर्यावरणीय क्षति की आशंका है, तो केवल इस आधार पर कार्रवाई को स्थगित नहीं किया जा सकता कि वैज्ञानिक प्रमाण अभी पूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं हैं। राज्य को संभावित पर्यावरणीय नुकसान का पूर्वानुमान लगाकर उसे रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए।
- इसका मूल दर्शन यह है कि पर्यावरणीय क्षति हो जाने के बाद उसकी भरपाई करने की तुलना में उसे पहले ही रोकना अधिक प्रभावी है। इसलिए पर्यावरणीय नीति में ‘क्षति के बाद उपचार’ की तुलना में ‘क्षति की पूर्व रोकथाम’ को अधिक महत्व दिया जाता है।
सतत विकास (Sustainable Development) भारतीय पर्यावरणीय न्यायशास्त्र का एक केंद्रीय सिद्धांत बन चुका है। इसका उद्देश्य आर्थिक विकास को रोकना नहीं, बल्कि इस प्रकार की विकास प्रक्रिया सुनिश्चित करना है जिसमें वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताएँ पूरी हों और भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को नुकसान न पहुँचे।
- सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास को आवश्यक रूप से एक-दूसरे के विरोधी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वास्तविक चुनौती ऐसी विकास प्रक्रिया तैयार करने की है जिसमें आर्थिक गतिविधियाँ पर्यावरणीय सीमाओं और कानूनी मानकों के भीतर संचालित हों।
- एहतियाती सिद्धांत तथा प्रदूषक भुगतान सिद्धांत सतत विकास की अवधारणा के महत्वपूर्ण घटक हैं। भारतीय न्यायपालिका ने इन सिद्धांतों को अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय कानून के साथ जोड़कर भारतीय कानून के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

सार्वजनिक न्यास सिद्धांत (Public Trust Doctrine) के अनुसार प्राकृतिक संसाधन राज्य की निजी संपत्ति नहीं हैं। राज्य इन संसाधनों का केवल न्यासी (Trustee) है और उसे इनका संरक्षण वर्तमान तथा भविष्य की जनता के हित में करना चाहिए।
- C. Mehta v. Kamal Nath, जिसे सामान्यतः Span Motel Case के रूप में जाना जाता है, में सर्वोच्च न्यायालय ने इस सिद्धांत को प्रमुखता से लागू किया।
- नदियाँ, झीलें, वन, समुद्र तट तथा अन्य महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन सार्वजनिक हित से जुड़े होते हैं। इसलिए सरकार ऐसे संसाधनों का उपयोग इस प्रकार नहीं कर सकती जिससे निजी हितों को लाभ मिले और व्यापक सार्वजनिक हित प्रभावित हो।
- यह सिद्धांत राज्य की पर्यावरणीय शक्ति पर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक एवं न्यायिक सीमा स्थापित करता है।
अंतरपीढ़ीगत समानता (Inter-generational Equity) का अर्थ है कि प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग केवल वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर नहीं किया जाना चाहिए। वर्तमान पीढ़ी की यह जिम्मेदारी है कि वह भविष्य की पीढ़ियों के लिए पर्याप्त प्राकृतिक संसाधन और स्वस्थ पर्यावरण सुरक्षित रखे।
- इस सिद्धांत के अंतर्गत वर्तमान पीढ़ी को प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण स्वामित्व प्राप्त नहीं माना जाता, बल्कि वह भविष्य की पीढ़ियों के लिए इन संसाधनों की संरक्षक मानी जाती है। इसलिए अत्यधिक दोहन, अनियंत्रित प्रदूषण तथा अपरिवर्तनीय पर्यावरणीय क्षति को संवैधानिक दृष्टि से गंभीरता से देखा जाना आवश्यक है।
पर्यावरणीय मामलों में न्यायिक असंगति की उभरती चिंता
- भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक रूप से पर्यावरण संरक्षण के पक्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके बावजूद हाल के समय में कुछ पर्यावरणीय मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण की निरंतरता को लेकर चिंता व्यक्त की गई है।
- न्यायमूर्ति गौतम पटेल द्वारा व्यक्त विचारों के अनुसार, न्यायालयों ने सामान्यतः गैर सरकारी संगठनों (NGOs) द्वारा उठाए गए पर्यावरणीय मुद्दों को गंभीरता से लिया है। लेकिन बड़े बुनियादी ढाँचा तथा विकास संबंधी मामलों में पर्यावरणीय दावों की न्यायिक जाँच कभी-कभी उतनी कठोर नहीं दिखाई देती।
- यह स्थिति एक महत्वपूर्ण विरोधाभास उत्पन्न करती है। एक ओर न्यायपालिका एहतियाती सिद्धांत, प्रदूषक भुगतान सिद्धांत, सार्वजनिक न्यास सिद्धांत तथा सतत विकास जैसे मजबूत पर्यावरणीय सिद्धांतों को स्वीकार करती है, जबकि दूसरी ओर कुछ विकास परियोजनाओं के मामलों में उन्हीं सिद्धांतों के अनुप्रयोग को लेकर अपेक्षाकृत उदार दृष्टिकोण दिखाई दे सकता है।
- यदि पर्यावरणीय सिद्धांतों का अनुप्रयोग मामले के आकार, परियोजना के आर्थिक महत्व या राजनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर बदलता हुआ दिखाई दे, तो इससे पर्यावरणीय शासन की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
पर्यावरण और विकास : एक झूठा द्वैत
- पर्यावरण संरक्षण और विकास को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है। किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए बुनियादी ढाँचा, उद्योग, ऊर्जा, परिवहन तथा शहरीकरण आवश्यक हैं, लेकिन इन गतिविधियों को पर्यावरणीय सीमाओं तथा कानूनी मानकों के भीतर संचालित किया जाना चाहिए।
- भारत की संवैधानिक व्यवस्था भी विकास को पूरी तरह पर्यावरण से अलग नहीं करती। सतत विकास का सिद्धांत इसी संतुलन को स्थापित करने का प्रयास करता है।

- इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक विकास परियोजना को पर्यावरणीय कारणों से रोक दिया जाए, बल्कि यह सुनिश्चित किया जाए कि विकास परियोजनाएँ निर्धारित पर्यावरणीय प्रक्रियाओं, प्रभाव आकलन तथा वैधानिक अनुमतियों का पालन करें।
- इसलिए वास्तविक प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि ‘परियोजना विकास के लिए महत्वपूर्ण है या नहीं’, बल्कि यह होना चाहिए कि क्या परियोजना ने सभी आवश्यक पर्यावरणीय एवं वैधानिक मानकों का पालन किया है?
संवैधानिक न्यायालयों की भूमिका
- पर्यावरणीय शासन में संवैधानिक न्यायालयों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। न्यायालयों को एक ओर वास्तविक पर्यावरणीय चिंताओं को प्रभावी संरक्षण देना चाहिए, वहीं दूसरी ओर ऐसी याचिकाओं और जनहित याचिकाओं (PILs) के बीच अंतर करना चाहिए जिनका उद्देश्य केवल विकास परियोजनाओं को अनावश्यक रूप से रोकना हो।
- किसी परियोजना के विरुद्ध बड़ी संख्या में मुकदमे लंबित होना अपने आप में यह सिद्ध नहीं करता कि सभी पर्यावरणीय आपत्तियाँ निराधार हैं। प्रत्येक मामले में परियोजना की वैधानिक स्वीकृतियों, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, पर्यावरणीय शर्तों तथा संबंधित कानूनों के अनुपालन की स्वतंत्र और तथ्यात्मक जाँच आवश्यक है।
- न्यायिक समीक्षा का आधार परियोजना की लोकप्रियता या राजनीतिक तथा आर्थिक महत्व नहीं होना चाहिए। न्यायालय का प्राथमिक प्रश्न यह होना चाहिए कि क्या परियोजना ने पर्यावरण संरक्षण से संबंधित संवैधानिक और वैधानिक आवश्यकताओं का पालन किया है?
- ऐसा दृष्टिकोण पर्यावरण संरक्षण तथा विकास दोनों को विधि के शासन (Rule of Law) के अधीन रखता है और संवैधानिक उत्तरदायित्व को मजबूत करता है।
भारतीय पर्यावरणीय न्यायशास्त्र की व्यापक महत्ता
- भारत में पर्यावरणीय न्यायशास्त्र का महत्व केवल पर्यावरण कानून तक सीमित नहीं है। इसने संविधान की व्याख्या के स्वरूप को भी व्यापक बनाया है। अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार की व्याख्या करते हुए न्यायपालिका ने स्वस्थ और स्वच्छ पर्यावरण को मानव गरिमा तथा जीवन की गुणवत्ता से जोड़ा है।
- इसी प्रकार अनुच्छेद 48A और अनुच्छेद 51A(g) ने राज्य तथा नागरिकों दोनों को पर्यावरण संरक्षण के संवैधानिक दायित्व से जोड़ा। न्यायपालिका द्वारा विकसित सिद्धांतों ने इन संवैधानिक मूल्यों को व्यवहारिक कानूनी मानकों में परिवर्तित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- भारतीय मॉडल की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि पर्यावरणीय कानून का विकास केवल संसद द्वारा बनाए गए कानूनों से नहीं हुआ, बल्कि न्यायिक व्याख्या, अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय सिद्धांतों तथा संवैधानिक मूल्यों के परस्पर प्रभाव से हुआ है।
Environment Protection: International Conferences & Summits
| वर्ष | सम्मेलन / शिखर सम्मेलन | स्थान | प्रमुख परिणाम / महत्व | परीक्षा हेतु Keyword |
| 1968 | UNESCO Biosphere Conference / Early UN Environmental Initiatives | Paris | वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय समस्याओं पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग को गति मिली। | Early Environmental Governance |
| 1972 | UN Conference on Human Environment | Stockholm, Sweden | पहला बड़ा वैश्विक पर्यावरण सम्मेलन; Stockholm Declaration और Action Plan अपनाए गए तथा UNEP की स्थापना हुई। | Stockholm + UNEP |
| 1972 | Stockholm Declaration | Stockholm | पर्यावरण संरक्षण के लिए 26 Principles स्वीकार किए गए। | 26 Principles |
| 1977 | Intergovernmental Conference on Environmental Education | Tbilisi, Georgia | पर्यावरण शिक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय दिशा और सिद्धांत विकसित किए गए। | Tbilisi Declaration |
| 1982 | Stockholm +10 / Nairobi Conference | Nairobi, Kenya | Stockholm Conference की प्रगति की समीक्षा और वैश्विक पर्यावरणीय सहयोग को मजबूत करने पर जोर। | Stockholm +10 |
| 1987 | Brundtland Report | UN, New York | Our Common Future रिपोर्ट ने Sustainable Development को लोकप्रिय बनाया। | Sustainable Development |
| 1987 | Montreal Protocol | Montreal, Canada | ओजोन परत को नुकसान पहुँचाने वाले Ozone Depleting Substances को नियंत्रित करने के लिए ऐतिहासिक समझौता। | Ozone Layer |
| 1992 | Earth Summit / UNCED | Rio de Janeiro, Brazil | Rio Declaration, Agenda 21, Forest Principles तथा UNFCCC और CBD सामने आए। | Rio + Agenda 21 |
| 1992 | Rio Declaration | Rio de Janeiro | पर्यावरण और विकास से जुड़े 27 Principles स्वीकार किए गए। | 27 Principles |
| 1992 | UNFCCC | Rio de Janeiro | जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वैश्विक Framework Convention स्थापित हुआ। | Climate Change |
| 1992 | Convention on Biological Diversity (CBD) | Rio de Janeiro | जैव विविधता संरक्षण, उसके सतत उपयोग तथा आनुवंशिक संसाधनों के लाभों के न्यायसंगत वितरण पर जोर। | Biodiversity |
| 1994 | Convention to Combat Desertification (UNCCD) | Paris | मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखे से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग। | Desertification |
| 1997 | Rio +5 | New York | Rio Earth Summit और Agenda 21 के कार्यान्वयन की समीक्षा की गई। | Review of Rio |
| 1997 | Kyoto Protocol | Kyoto, Japan | विकसित देशों के लिए बाध्यकारी Greenhouse Gas Emission Reduction Targets निर्धारित किए गए। | Kyoto + Emission Targets |
| 2000 | Millennium Summit | New York | Millennium Development Goals (MDGs) स्वीकार किए गए, जिनमें पर्यावरणीय स्थिरता भी शामिल थी। | MDGs |
| 2002 | World Summit on Sustainable Development | Johannesburg, South Africa | Rio के बाद Sustainable Development के कार्यान्वयन पर जोर; Johannesburg Plan of Implementation प्रमुख परिणाम रहा। | Johannesburg + Implementation |
| 2005 | World Summit | New York | Sustainable Development और वैश्विक विकास एजेंडा की समीक्षा। | Global Development |
| 2007 | Bali Climate Conference, COP13 | Bali, Indonesia | Kyoto Protocol के बाद भविष्य की जलवायु वार्ताओं के लिए Bali Action Plan महत्वपूर्ण रहा। | Bali Action Plan |
| 2009 | Copenhagen Climate Conference, COP15 | Copenhagen, Denmark | वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित करने तथा विकसित और विकासशील देशों के बीच जलवायु वित्त पर महत्वपूर्ण वार्ता। | Copenhagen Accord |
| 2010 | Nagoya Conference, CBD COP10 | Nagoya, Japan | Nagoya Protocol तथा जैव विविधता के लिए Aichi Biodiversity Targets महत्वपूर्ण परिणाम रहे। | Aichi Targets |
| 2010 | Cancún Climate Conference, COP16 | Cancún, Mexico | जलवायु वित्त, adaptation तथा developing countries के लिए institutional mechanisms को मजबूत किया गया। | Cancún Agreements |
| 2011 | Durban Climate Conference, COP17 | Durban, South Africa | भविष्य के व्यापक जलवायु समझौते के लिए Durban Platform की शुरुआत हुई। | Durban Platform |
| 2012 | Rio +20: UN Conference on Sustainable Development | Rio de Janeiro, Brazil | The Future We Want दस्तावेज अपनाया गया और Sustainable Development Goals की दिशा में प्रक्रिया आगे बढ़ी। | Rio +20 |
| 2012 | UNEP के Governing Council का Universal Membership | Nairobi / UN System | UNEP के पर्यावरणीय शासन को अधिक व्यापक वैश्विक प्रतिनिधित्व मिला तथा बाद में UN Environment Assembly (UNEA) के विकास का आधार मजबूत हुआ। | UNEA |
| 2015 | UN Sustainable Development Summit | New York | 2030 Agenda for Sustainable Development और 17 SDGs स्वीकार किए गए। | SDGs + Agenda 2030 |
| 2015 | Paris Climate Conference, COP21 | Paris, France | Paris Agreement अपनाया गया। वैश्विक तापमान वृद्धि को 2°C से काफी नीचे रखने तथा 1.5°C के प्रयास का लक्ष्य निर्धारित किया गया। | Paris Agreement |
| 2016 | Kigali Amendment | Kigali, Rwanda | HFCs को चरणबद्ध रूप से कम करने के लिए Montreal Protocol में महत्वपूर्ण संशोधन। | HFCs |
| 2018 | Katowice Climate Conference, COP24 | Katowice, Poland | Paris Agreement के कार्यान्वयन के लिए Katowice Climate Package विकसित किया गया। | Paris Rulebook |
| 2019 | UN Climate Action Summit | New York | जलवायु कार्रवाई, उत्सर्जन में कमी और वैश्विक climate ambition बढ़ाने पर जोर। | Climate Action |
| 2021 | Glasgow Climate Conference, COP26 | Glasgow, UK | Glasgow Climate Pact अपनाया गया तथा 1.5°C लक्ष्य को बनाए रखने पर जोर दिया गया। | Glasgow Pact |
| 2022 | Stockholm +50 | Stockholm, Sweden | 1972 के Stockholm Conference के 50 वर्ष पूरे होने पर वैश्विक पर्यावरणीय कार्रवाई की समीक्षा और मजबूत करने का प्रयास। | Stockholm +50 |
| 2022 | Kunming Montreal Global Biodiversity Framework, CBD COP15 | Montreal, Canada | 2030 तक जैव विविधता संरक्षण के लिए Kunming Montreal Global Biodiversity Framework स्वीकार किया गया। | 30 × 30 |
| 2022 | Sharm el Sheikh Climate Conference, COP27 | Egypt | विकासशील देशों के लिए Loss and Damage Fund स्थापित करने पर ऐतिहासिक सहमति बनी। | Loss & Damage |
| 2023 | Dubai Climate Conference, COP28 | Dubai, UAE | पहली Global Stocktake प्रक्रिया का प्रमुख परिणाम; जीवाश्म ईंधनों से संक्रमण की दिशा में महत्वपूर्ण भाषा अपनाई गई। | Global Stocktake |
| 2023 | UN Water Conference | New York | वैश्विक जल संकट और SDG 6 की दिशा में अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर जोर। | Water Security |
| 2024 | Baku Climate Conference, COP29 | Baku, Azerbaijan | जलवायु वित्त के लिए नया New Collective Quantified Goal (NCQG) प्रमुख परिणाम रहा। | Climate Finance |
| 2024 | CBD COP16 | Cali, Colombia | जैव विविधता संरक्षण, संसाधन जुटाने और genetic resources से जुड़े लाभों के बंटवारे पर महत्वपूर्ण चर्चा। | Biodiversity Finance |
| 2025 | Belém Climate Conference, COP30 | Belém, Brazil | Paris Agreement के कार्यान्वयन, climate finance और बढ़ती climate ambition पर वैश्विक वार्ता का महत्वपूर्ण चरण। | COP30 + Climate Action |
International Environmental Agreements
| वर्ष | Agreement / Convention | मुख्य विषय | याद रखने की Trick |
| 1971 | Ramsar Convention | Wetlands संरक्षण | Ramsar = Wetlands |
| 1972 | Stockholm Declaration | Environment | Stockholm = Environment |
| 1973 | CITES | Endangered Species Trade | CITES = Wildlife Trade |
| 1985 | Vienna Convention | Ozone Layer | Vienna = Ozone Framework |
| 1987 | Montreal Protocol | Ozone Depleting Substances | Montreal = Ozone Protection |
| 1989 | Basel Convention | Hazardous Waste | Basel = Hazardous Waste |
| 1992 | UNFCCC | Climate Change | UNFCCC = Climate |
| 1992 | CBD | Biodiversity | CBD = Biodiversity |
| 1994 | UNCCD | Desertification | UNCCD = Land/Desertification |
| 1997 | Kyoto Protocol | GHG Emissions | Kyoto = Emission Targets |
| 1998 | Rotterdam Convention | Hazardous Chemicals & Pesticides | Rotterdam = Prior Informed Consent |
| 2000 | Cartagena Protocol | Biosafety | Cartagena = Biosafety |
| 2001 | Stockholm Convention | Persistent Organic Pollutants | Stockholm = POPs |
| 2010 | Nagoya Protocol | Genetic Resources & Benefit Sharing | Nagoya = Benefit Sharing |
| 2015 | Paris Agreement | Climate Change | Paris = 1.5°C / 2°C |
| 2016 | Kigali Amendment | HFC Reduction | Kigali = HFCs |
| 2022 | Kunming Montreal GBF | Biodiversity | 30 × 30 |
निष्कर्ष
भारत में पर्यावरणीय न्यायशास्त्र का विकास एक क्रमिक संवैधानिक और न्यायिक प्रक्रिया का परिणाम है। प्रारंभिक संविधान में पर्यावरण का स्पष्ट उल्लेख न होने के बावजूद 42वें संविधान संशोधन ने पर्यावरण संरक्षण को राज्य और नागरिक दोनों की संवैधानिक जिम्मेदारी बनाया। इसके बाद भोपाल गैस त्रासदी तथा अन्य महत्वपूर्ण मामलों ने न्यायपालिका को पर्यावरणीय उत्तरदायित्व और संरक्षण के नए सिद्धांत विकसित करने के लिए प्रेरित किया।
पूर्ण दायित्व, प्रदूषक भुगतान, एहतियाती सिद्धांत, सतत विकास, सार्वजनिक न्यास सिद्धांत तथा अंतरपीढ़ीगत समानता ने भारतीय पर्यावरणीय कानून को एक मजबूत वैचारिक आधार प्रदान किया है। इन सिद्धांतों ने यह स्थापित किया कि आर्थिक विकास पर्यावरणीय विनाश की कीमत पर नहीं हो सकता।
आगे की चुनौती इन सिद्धांतों का संगत, पारदर्शी और समान अनुप्रयोग सुनिश्चित करना है। पर्यावरण संरक्षण और विकास को परस्पर विरोधी मानने के बजाय न्यायपालिका तथा कार्यपालिका को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विकास परियोजनाएँ संवैधानिक मूल्यों और पर्यावरणीय कानूनों के अनुरूप आगे बढ़ें। अंततः भारत में सतत विकास की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि आर्थिक विकास को पर्यावरणीय उत्तरदायित्व, विधि के शासन और भविष्य की पीढ़ियों के हितों के साथ किस प्रकार संतुलित किया जाता है।
PYQ
- निम्नलिखित में से किस मामले का संबंध Public Trust Doctrine से है?
- Indian Council for Enviro Legal Action v. Union of India
B. Vellore Citizens Welfare Forum v. Union of India
C. M.C. Mehta v. Kamal Nath
D. Rural Litigation and Entitlement Kendra v. State of U.P.
उत्तर: C. M.C. Mehta v. Kamal Nath
- निम्नलिखित मामलों और पर्यावरणीय सिद्धांतों का सही मिलान कीजिए:
| मामला | सिद्धांत |
| (a) Rylands v. Fletcher | (i) Public Trust |
| (b) Indian Council for Enviro Legal Action v. Union of India | (ii) Precautionary Principle |
| (c) Vellore Citizens Welfare Forum v. Union of India | (iii) Polluter Pays |
| (d) M.C. Mehta v. Kamal Nath | (iv) Strict Liability |
सही कूट चुनिए:
- (a) iv, (b) iii, (c) ii, (d) i
B. (a) i, (b) ii, (c) iv, (d) iii
C. (a) ii, (b) iv, (c) iii, (d) i
D. (a) iii, (b) iv, (c) i, (d) ii
उत्तर: A. (a) iv, (b) iii, (c) ii, (d) i
- निम्नलिखित में से कौन सा कथन सतत विकास (Sustainable Development) के संबंध में सही है?
- यह केवल आर्थिक विकास पर बल देता है।
B. यह केवल पर्यावरण संरक्षण पर बल देता है।
C. यह पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन स्थापित करता है।
D. यह सभी औद्योगिक परियोजनाओं पर प्रतिबंध लगाता है।
उत्तर: C. यह पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन स्थापित करता है।
- निम्नलिखित में से किस सिद्धांत का अर्थ है कि पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले व्यक्ति या संस्था को पर्यावरणीय क्षति और पुनर्स्थापना की लागत वहन करनी चाहिए?
- Public Trust Doctrine
B. Polluter Pays Principle
C. Precautionary Principle
D. Inter-generational Equity
उत्तर: B. Polluter Pays Principle
- निम्नलिखित में से कौन सा सिद्धांत Vellore Citizens’ Welfare Forum v. Union of India मामले से प्रमुख रूप से संबंधित है?
- Doctrine of Pleasure
B. Precautionary Principle
C. Doctrine of Separation of Powers
D. Rule of Natural Justice
उत्तर: B. Precautionary Principle
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