संयुक्त राष्ट्र महासभा के चल रहे अधिवेशन में फ्रांस ने एक ऐसा प्रस्ताव रखा है जिसने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की कार्यप्रणाली को लेकर एक बार फिर बहस को जन्म दे दिया है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने महासभा में यह पक्ष रखा कि मानवीय संकटों, विशेष रूप से नरसंहार जैसी परिस्थितियों में वीटो के उपयोग को नियंत्रित किया जाना चाहिए। यह प्रस्ताव पूर्णतः नया नहीं है, बल्कि दशक भर पुरानी एक पहल का ही विस्तार है। इस विषय पर अंतरराष्ट्रीय संबंधों के दो प्रतिष्ठित विशेषज्ञों के बीच हुई चर्चा से यह स्पष्ट होता है कि सुरक्षा परिषद सुधार का प्रश्न कितना जटिल और बहुआयामी है।
फ्रांसीसी प्रस्ताव की पृष्ठभूमि
फ्रांस लंबे समय से यह मानता रहा है कि वीटो का प्रयोग “विशेषाधिकार” के रूप में नहीं, बल्कि “उत्तरदायित्व” के रूप में होना चाहिए। इस भावना की जड़ें 2015 में शुरू हुई फ्रांस मेक्सिको पहल में हैं, जिसके अंतर्गत सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों से स्वैच्छिक रूप से यह अपील की गई थी कि वे नरसंहार, मानवता के विरुद्ध अपराध और बड़े पैमाने पर युद्ध अपराधों से जुड़े मामलों में वीटो का उपयोग न करें।
इस पहल को अब तक निम्नलिखित समर्थन मिल चुका है:
- लगभग एक सौ अट्ठाईस देश इस घोषणा का समर्थन कर चुके हैं
- हाल ही में जॉर्डन और मेक्सिको भी इसमें सम्मिलित हुए हैं
- स्थायी सदस्यों में से अब तक केवल यूनाइटेड किंगडम और फ्रांस ने ही इस स्वैच्छिक संयम को स्वीकार किया है
- इस चर्चा में शामिल विशेषज्ञों के अनुसार मैक्रों के भाषण ने इस पुरानी पहल को राजनीतिक रूप से नई ऊर्जा दी है, परंतु इसे स्वयं में कोई मौलिक या क्रांतिकारी कदम नहीं कहा जा सकता।
- यह एक आंशिक और वृद्धिशील सुधार प्रस्ताव है जो चार्टर में संशोधन नहीं करता, बल्कि सदस्यों के स्वैच्छिक व्यवहार में परिवर्तन लाने का प्रयास करता है।
तीन भिन्न परंतु परस्पर जुड़े प्रश्न
विशेषज्ञ इस बहस को समझने के लिए तीन अलग अलग स्तरों में विभाजित करने का सुझाव देते हैं, जिन्हें अक्सर आम बहस में एक साथ मिला दिया जाता है।
- पहला स्तर, वीटो के उपयोग का प्रश्न है। यह इस बात से संबंधित है कि किन परिस्थितियों में वीटो का प्रयोग नैतिक रूप से उचित है और किन में नहीं। फ्रांस की पहल इसी स्तर पर केंद्रित है।
- दूसरा स्तर, जवाबदेही का प्रश्न है। यह इस बात से जुड़ा है कि जब कोई स्थायी सदस्य वीटो का उपयोग करता है तो उसे इसकी सफाई किसे और किस मंच पर देनी चाहिए।
- तीसरा और सबसे व्यापक स्तर, सुरक्षा परिषद के संरचनात्मक सुधार का प्रश्न है, जिसमें स्थायी सदस्यता की संख्या बढ़ाने, नए स्थायी सदस्य जोड़ने और परिषद के संगठनात्मक स्वरूप को बदलने जैसे मुद्दे शामिल हैं। मैक्रों की पहल पहले प्रश्न को संबोधित करती है, परंतु व्यवहार में इसका प्रभाव अत्यंत सीमित रहेगा, तीसरे प्रश्न के समाधान के लिए यह किसी भी प्रकार से पर्याप्त नहीं है।
वीटो का उन्मूलन कितना यथार्थवादी है
- विशेषज्ञों की स्पष्ट राय है कि वीटो को समाप्त करना या चार्टर में संशोधन कर उसे सीमित करना अत्यंत कठिन, यदि असंभव नहीं तो, कार्य है।
- इसके पीछे प्रमुख कारण यह है कि विश्व की वास्तविक संरचना संप्रभु समानता के आदर्श सिद्धांत पर आधारित नहीं है, बल्कि शक्ति के असमान वितरण पर आधारित है।
- किसी भी अंतरराष्ट्रीय संगठन के अस्तित्व और उसकी प्रभावशीलता के लिए यह आवश्यक है कि प्रमुख शक्तियां उसके निर्णयों को स्वीकार करें, अन्यथा वह संगठन या तो अप्रभावी हो जाता है या टूट जाता है।
- इसका एक ऐतिहासिक प्रमाण भी है। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना से पहले लीग ऑफ नेशंस का पतन इसी कारण हुआ था कि उसमें प्रमुख शक्तियों के हितों की पर्याप्त गारंटी नहीं थी, जिसके परिणामस्वरूप वे संगठन से बाहर होती चली गईं।
संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 108 के अनुसार चार्टर में किसी भी संशोधन के लिए महासभा के दो तिहाई सदस्यों के समर्थन के साथ साथ सभी पांच स्थायी सदस्यों की सहमति भी अनिवार्य है। इस प्रकार वीटो व्यवस्था स्वयं अपने उन्मूलन को रोकने के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करती है।
वर्तमान गतिरोध, फ्रांस ब्रिटेन बनाम रूस चीन अमेरिका
- इस विषय पर पांच स्थायी सदस्यों की स्थिति एक समान नहीं है। फ्रांस और ब्रिटेन तुलनात्मक रूप से इस विनियमन के पक्ष में झुकाव रखते हैं, परंतु वे भी वास्तविक दृष्टि से इस बात को स्वीकार करते हैं कि केवल यही रुख अपनाना पर्याप्त नहीं होगा।
- चर्चा में यह तर्क दिया गया है कि 2013 का सीरिया रासायनिक हथियार संकट इस विरोधाभास का स्पष्ट उदाहरण है। उस समय फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने वीटो पर एक “आचार संहिता” (कोड ऑफ कंडक्ट) अपनाने का सुझाव दिया था, यही वह पहला अवसर था जब सुरक्षा परिषद के लिए इस प्रकार का प्रस्ताव सामने आया था।
- परंतु इसी दौरान चीन और रूस ने सीरिया की निंदा करने वाले प्रस्ताव को वीटो के माध्यम से रोक दिया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि इस मुद्दे पर स्थायी सदस्यों में गहरा विभाजन बना हुआ है।

दो अंतरराष्ट्रीय पहलों का उल्लेख
चर्चा में सुरक्षा परिषद सुधार से जुड़ी दो ठोस अंतरराष्ट्रीय पहलों का उल्लेख हुआ है, जो उम्मीदवारों के लिए स्मरण रखने योग्य हैं।
- पहली, लिख्टेंश्टाइन पहल है। अगस्त 2022 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक प्रस्ताव अपनाया था जिसके अंतर्गत यह अनिवार्य किया गया कि जब भी सुरक्षा परिषद में कोई स्थायी सदस्य वीटो का प्रयोग करता है, तो इसके दस कार्यदिवसों के भीतर महासभा में इस पर अनिवार्य रूप से चर्चा बुलाई जाएगी। यह प्रस्ताव किसी सदस्य को वीटो प्रयोग करने से नहीं रोकता, बल्कि उसे महासभा के समक्ष अपने निर्णय को स्पष्ट करने के लिए बाध्य करता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह व्यवस्था वास्तविक जवाबदेही की दिशा में बहुत आगे नहीं जाती, क्योंकि महासभा का यह मंच केवल एक अनौपचारिक स्पष्टीकरण की प्रक्रिया है, जिसका परिणाम बाध्यकारी नहीं होता।
- दूसरी पहल, ACT समूह की आचार संहिता पहल है, जो “जवाबदेही, सुसंगति और पारदर्शिता” (Accountability, Coherence and Transparency) नाम से जाना जाता है। यह पहल सुरक्षा परिषद के गैर स्थायी सदस्यों समेत सभी सदस्यों से यह प्रतिबद्धता मांगती है कि वे नरसंहार, मानवता के विरुद्ध अपराध और युद्ध अपराध की स्थितियों को रोकने अथवा समाप्त करने के उद्देश्य से लाए गए किसी भी विश्वसनीय प्रस्ताव के विरुद्ध वीटो का उपयोग न करें।
जवाबदेही का प्रश्न, क्या वीटो केवल राजनीतिक निर्णय है
विशेषज्ञों में इस बात पर सहमति है कि वीटो के प्रयोग के औचित्य की व्याख्या करने की कोई कानूनी बाध्यता किसी भी स्थायी सदस्य पर नहीं है।
यह निर्णय संबंधित देश का राष्ट्रीय हित तय करता है, न कि किसी बाहरी संस्था की अनुमति। तर्क यह दिया गया है कि जब कोई सदस्य अपनी शक्ति का प्रयोग करता है, तो उससे कम से कम इतनी अपेक्षा की जा सकती है कि वह अपने कार्यों की व्याख्या करे और उसके प्रति उत्तरदायी बने, विशेष रूप से तब जब उस निर्णय से नरसंहार या मानवता के विरुद्ध अपराध रोकने की संभावना समाप्त हो जाती हो।
फ्रांसीसी प्रस्ताव पर अंतिम विश्लेषणात्मक मूल्यांकन
चर्चा के अंत में यह स्पष्ट विश्लेषणात्मक निष्कर्ष प्रस्तुत किया गया है कि मैक्रों का प्रस्ताव व्यावहारिक है, क्रांतिकारी नहीं। इसके पीछे तर्क यह है कि सुरक्षा परिषद के चार्टर में औपचारिक संशोधन के लिए स्थायी सदस्यों की सहमति आवश्यक होती है, जो वीटो शक्ति को समाप्त करने के मामले में स्वयं में असंभव जैसी शर्त बन जाती है। इसलिए फ्रांस जैसी वृद्धिशील और स्वैच्छिक पहल ही यथार्थ की दृष्टि से संभव मार्ग बचता है।
व्यापक ढांचागत सुधार और नए स्थायी सदस्यों का प्रश्न
- चर्चा में यह भी संकेत दिया गया है कि पांच स्थायी सदस्यों में से दो ने अनौपचारिक रूप से सुधार की दिशा में समर्थन दिखाया है, परंतु इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि यह प्रवृत्ति शीघ्र किसी बड़े परिवर्तन में परिवर्तित हो जाएगी।
- नए स्थायी सदस्यों को शामिल करने के मामले में वीटो का प्रश्न पुनः महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि नए स्थायी सदस्यों को वीटो प्राप्त होता है, तो प्रश्न यह उठता है कि क्या वे भी वीटो के उपयोग में संयम बरतेंगे और मानवाधिकार उल्लंघन रोकने के प्रति उत्तरदायी होंगे।
- इस विषय पर G4 समूह जिसमें भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील शामिल हैं, तथा अफ्रीकी संघ की एजेजुविनी सहमति जैसी पहलों की चर्चा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बरसों से होती रही है, परंतु किसी ठोस परिणाम तक अभी नहीं पहुंचा जा सका है।
गाजा जैसे मामलों से जुड़ी व्यापक विश्वसनीयता की समस्या
चर्चा के अंतिम भाग में यह बताया गया कि सुरक्षा परिषद सुधार की मांग केवल संस्थागत नहीं, बल्कि विश्वसनीयता से भी जुड़ी है। जब सुरक्षा परिषद गाजा पट्टी जैसे संघर्षों में असमान रूप से या पक्षपातपूर्ण ढंग से कार्य करती प्रतीत होती है, तो इससे संपूर्ण अंतरराष्ट्रीय कानून व्यवस्था की निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार समस्या केवल यह नहीं है कि विभिन्न पक्ष कानून की भिन्न भिन्न व्याख्या करते हैं, बल्कि यह भी है कि किन मामलों में सुरक्षा परिषद हस्तक्षेप करती है और किन में नहीं, इसमें व्यापक असंगति दिखती है।
भारत की दृष्टि से महत्व
यूपीएससी अभ्यर्थियों के लिए यह उल्लेखनीय है कि भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद के विस्तार और वीटो व्यवस्था में सुधार का पक्षधर रहा है। भारत यह मानता है कि सुरक्षा परिषद की वर्तमान संरचना, जो सत्तर वर्ष से अधिक पुरानी है, समकालीन भू राजनीतिक वास्तविकताओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती। भारत की मांग है कि उसे स्थायी सदस्यता दी जाए, साथ ही वीटो के उपयोग को अधिक जवाबदेह और पारदर्शी बनाया जाए। इसी संदर्भ में भारत L69 समूह और G4 जैसे मंचों के माध्यम से अंतरसरकारी वार्ता प्रक्रिया (IGN) में सक्रिय रूप से भाग लेता रहा है।
निष्कर्ष
अंततः यह स्पष्ट होता है कि सुरक्षा परिषद और वीटो सुधार का प्रश्न किसी एक झटके में हल होने वाली समस्या नहीं है।
वीटो का पूर्ण उन्मूलन चार्टर की संरचनात्मक बाधाओं के कारण निकट भविष्य में असंभव प्रतीत होता है, जबकि इसके उपयोग को नैतिक और स्वैच्छिक रूप से सीमित करने की पहलें, जैसे फ्रांस मेक्सिको पहल, लिख्टेंश्टाइन पहल और ACT आचार संहिता, धीरे धीरे एक सामूहिक मानक तैयार कर रही हैं।
यह वास्तविक और औपचारिक सुधार के बीच का अंतर ही आज संयुक्त राष्ट्र प्रणाली की सबसे बड़ी चुनौती है। इतिहास बताता है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय संगठन की स्थिरता प्रमुख शक्तियों की सहभागिता पर निर्भर करती है, इसलिए सुधार की दिशा वृद्धिशील और यथार्थवादी होनी चाहिए, न कि आदर्शवादी और अव्यावहारिक।
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