भारत की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की प्रासंगिकता एक बार फिर चर्चा का विषय बनी हुई है। हाल के विधानसभा चुनावों में क्षेत्रीय दलों को मिली चुनावी चुनौतियों तथा विभिन्न क्षेत्रीय दलों में हुए दलबदल ने इनके भविष्य और राजनीतिक प्रभाव को लेकर प्रश्न खड़े किए हैं। साथ ही, एक राष्ट्र, एक चुनाव (One Nation, One Election) की बहस ने भी यह प्रश्न उठाया है कि क्या क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के बढ़ते प्रभाव के बीच अपनी राजनीतिक पहचान और प्रभाव बनाए रख पाएँगे।

भारत में दलीय व्यवस्था का वर्गीकरण
- भारत में राजनीतिक दल भारतीय नागरिकों का ऐसा संगठन या समूह है जो जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के अंतर्गत निर्वाचन आयोग में पंजीकृत होता है। भारत में बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था (Multi Party System) है, जिसमें केंद्र और राज्यों दोनों स्तरों पर राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय राजनीतिक शक्तियाँ प्रतिस्पर्धा करती हैं।
- निर्वाचन आयोग की औपचारिक व्यवस्था के अनुसार राजनीतिक दलों को मान्यता प्राप्त तथा अमान्यता प्राप्त दलों में विभाजित किया जाता है। मान्यता प्राप्त दलों को आगे राष्ट्रीय दल और राज्य दल के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। राज्य दलों को सामान्यतः क्षेत्रीय दल कहा जाता है क्योंकि उनका राजनीतिक प्रभाव मुख्यतः किसी विशेष राज्य या क्षेत्र में केंद्रित रहता है।
- भारतीय संविधान के मूल पाठ में ‘राजनीतिक दल’ शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं था। राजनीतिक दलों से संबंधित संवैधानिक प्रावधान 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 के माध्यम से दसवीं अनुसूची को जोड़कर दलबदल की समस्या से निपटने के लिए लाए गए।
भारत में क्षेत्रीय दलों के लिए राजनीतिक स्थान क्यों घट रहा है?
- प्रभावशाली राष्ट्रीय दलों का उदय
प्रमुख राष्ट्रीय दलों के चुनावी और संगठनात्मक विस्तार ने क्षेत्रीय दलों के लिए उपलब्ध राजनीतिक स्थान को सीमित किया है। अगस्त 2026 तक क्षेत्रीय दल केवल आंध्र प्रदेश, मेघालय और नागालैंड तथा केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी में स्वतंत्र रूप से सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं। यह संख्या लगभग ढाई दशकों में सबसे कम है। 2015 से 2020 के बीच क्षेत्रीय दल नौ राज्यों में स्वतंत्र सरकारों का नेतृत्व कर रहे थे।
- भारतीय दलीय व्यवस्था का बदलता स्वरूप
भारत की दलीय व्यवस्था को व्यापक रूप से तीन चरणों में समझा जा सकता है:
- 1952 से 1967: एक दल का प्रभुत्व – इस दौर में केंद्र और राज्यों दोनों स्तरों पर एक प्रमुख दल का प्रभुत्व रहा।
- 1967 से 1989: क्षेत्रीय आकांक्षाओं का उदय– इस अवधि में भाषाई, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय पहचानों के आधार पर राजनीतिक शक्तियों का विस्तार हुआ।
- 1989 से 2014: गठबंधन राजनीति– इस दौर में क्षेत्रीय दल सत्ता के निर्णायक सहयोगी (Kingmakers) के रूप में उभरे और उन्होंने भारतीय दलीय व्यवस्था के संघीय चरित्र को मजबूत किया।
हालाँकि, वर्तमान समय में एकल दल के बढ़ते प्रभुत्व के कारण क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय नीति निर्माण की प्रक्रिया में अपेक्षाकृत हाशिए पर जाते दिखाई दे रहे हैं।

प्रथम–स्थान–प्राप्ति प्रणाली का प्रभाव
- भारत की प्रथम–स्थान–प्राप्ति प्रणाली (First Past the Post System) में किसी क्षेत्रीय दल के मत प्रतिशत में मामूली गिरावट भी उसकी सीटों में बहुत बड़ी कमी ला सकती है। इसके विपरीत, यदि किसी दल के मत कुछ महत्वपूर्ण निर्वाचन क्षेत्रों में केंद्रित हों तो मतों में थोड़ी वृद्धि से सीटों में बड़ी बढ़ोतरी हो सकती है। इसलिए केवल सीटों की संख्या में कमी को क्षेत्रीय दल के वास्तविक जनसमर्थन में कमी का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं माना जा सकता।
- संगठनात्मक कमजोरी और परिवारवाद
- कई क्षेत्रीय दलों में आंतरिक लोकतंत्र कमजोर है और उनका संगठन किसी एक प्रभावशाली नेता या राजनीतिक परिवार के आसपास केंद्रित रहता है। इससे नेतृत्व परिवर्तन के समय उत्तराधिकार संकट, गुटबाजी और पार्टी विभाजन जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
- साथ ही, नए नेतृत्व के लिए सीमित अवसर होने के कारण जमीनी स्तर के सक्षम नेता अधिक मजबूत संगठन वाले दलों की ओर आकर्षित हो सकते हैं।
- संसाधनों की असमानता
- चुनावी राजनीति में वित्तीय संसाधनों की असमानता भी क्षेत्रीय दलों के सामने एक बड़ी चुनौती है। बड़े राज्यों में लोकसभा उम्मीदवार के लिए चुनाव व्यय की सीमा 95 लाख रुपये तथा विधानसभा उम्मीदवार के लिए 40 लाख रुपये है। छोटे राज्यों में यह सीमा क्रमशः 75 लाख रुपये और 28 लाख रुपये है।
- हालाँकि राजनीतिक दलों के कुल चुनावी व्यय पर वर्तमान में कोई समग्र सीमा नहीं है। इससे बड़े राष्ट्रीय दलों को क्षेत्रीय दलों की तुलना में वित्तीय और संगठनात्मक बढ़त मिल सकती है।
- दलबदल और संगठनात्मक संकट
- दसवीं अनुसूची और दलबदल विरोधी कानून (Anti Defection Law) भी क्षेत्रीय दलों के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बन गए हैं। विलय संबंधी प्रावधानों के दुरुपयोग, पार्टी विभाजन और दलबदल के कारण कई बार लंबे राजनीतिक तथा न्यायिक विवाद उत्पन्न होते हैं।
- इसके अतिरिक्त केंद्रीय जाँच एजेंसियों के चयनात्मक उपयोग के आरोप, भ्रष्टाचार तथा धनबल का बढ़ता प्रभाव भी क्षेत्रीय दलों की संगठनात्मक स्थिरता और राजनीतिक सौदेबाजी की क्षमता को प्रभावित कर सकता है।
- संघीय स्वायत्तता पर दबाव
- क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक शक्ति मुख्यतः राज्य स्वायत्तता, वित्तीय संघवाद और राज्य–विशिष्ट नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू करने की क्षमता पर निर्भर करती है।
- राज्यपाल की विवेकाधीन भूमिका, राज्य विधेयकों पर स्वीकृति में देरी, शर्तों से जुड़े केंद्रीय प्रायोजित योजनाओं पर बढ़ती निर्भरता तथा विभाज्य कर पूल के बाहर उपकर और अधिभार के बढ़ते प्रयोग से राज्यों के स्वतंत्र वित्तीय संसाधन सीमित हो सकते हैं। इससे क्षेत्रीय सरकारों की राज्य-विशिष्ट कल्याण, आधारभूत संरचना और विकास नीतियाँ बनाने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
- एक राष्ट्र, एक चुनाव की चुनौती
- एक राष्ट्र, एक चुनाव के अंतर्गत लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने से राष्ट्रीय सुरक्षा तथा व्यापक आर्थिक मुद्दे राज्य-विशिष्ट विकास संबंधी मुद्दों पर हावी हो सकते हैं।
- क्षेत्रीय दलों की ताकत मुख्यतः स्थानीय और राज्य-विशिष्ट मुद्दों में होती है। इसलिए एक साथ चुनाव होने की स्थिति में राष्ट्रीय मुद्दों के प्रभाव के कारण बड़े और संसाधन-संपन्न राष्ट्रीय दलों को अपेक्षाकृत लाभ मिल सकता है।
- पहचान की राजनीति से आकांक्षात्मक राजनीति की ओर बदलाव
- मतदाताओं की प्राथमिकताओं में परिवर्तन भी क्षेत्रीय दलों के लिए चुनौती है। अब मतदाता केवल जाति, भाषा और क्षेत्रीय पहचान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आर्थिक विकास, आधारभूत संरचना, रोजगार और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों को भी महत्व दे रहे हैं।
- इसलिए जो क्षेत्रीय दल क्षेत्रीय पहचान को विश्वसनीय शासन और विकास के एजेंडे के साथ नहीं जोड़ पाएँगे, उनके लिए अपना राजनीतिक आधार बनाए रखना कठिन हो सकता है।
भारत के प्रमुख राजनीतिक दल : स्थापना, संस्थापक, राज्य एवं विचारधारा
| दल | स्थापना वर्ष | संस्थापक / प्रमुख संस्थापक | प्रमुख राज्य/क्षेत्र | प्रमुख विचारधारा / राजनीतिक आधार |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) | 1885 | ए. ओ. ह्यूम, दादाभाई नौरोजी, दिनशॉ वाचा आदि | अखिल भारतीय | धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, मिश्रित अर्थव्यवस्था, उदारवाद |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) | 1925 | एम. एन. रॉय, एस. ए. डांगे, मुज़फ्फर अहमद आदि | केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश आदि | मार्क्सवाद, समाजवाद, वर्ग संघर्ष |
| भारतीय जनसंघ (BJS) | 1951 | श्यामा प्रसाद मुखर्जी | उत्तर भारत | सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, राष्ट्रवाद, एकात्मता; बाद में BJP की वैचारिक पूर्ववर्ती |
| बहुजन समाज पार्टी (BSP) | 1984 | कांशीराम | उत्तर प्रदेश, पंजाब आदि | बहुजनवाद, सामाजिक न्याय, दलित सशक्तीकरण |
| भारतीय जनता पार्टी (BJP) | 1980 | अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी आदि | अखिल भारतीय; विशेष रूप से उत्तर भारत | हिंदुत्व, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, राष्ट्रवाद, सुशासन |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [CPI(M)] | 1964 | CPI से अलग हुए मार्क्सवादी नेता | केरल, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा | मार्क्सवाद-लेनिनवाद, समाजवाद, वर्ग राजनीति |
| आम आदमी पार्टी (AAP) | 2012 | अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव आदि | दिल्ली, पंजाब | भ्रष्टाचार विरोध, सुशासन, कल्याणकारी राजनीति |
| नेशनल पीपुल्स पार्टी (NPP) | 2013 | पी. ए. संगमा | मेघालय तथा पूर्वोत्तर भारत | पूर्वोत्तर क्षेत्रीय हित, जनजातीय प्रतिनिधित्व, संघवाद |
नोट: वर्तमान में निर्वाचन आयोग की मान्यता के अनुसार AAP, BSP, BJP, CPI(M), INC और NPP राष्ट्रीय दल हैं।
प्रमुख क्षेत्रीय दल
| दल | स्थापना वर्ष | संस्थापक / प्रमुख नेता | प्रमुख राज्य | विचारधारा / राजनीतिक आधार |
| द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) | 1949 | सी. एन. अन्नादुरई | तमिलनाडु | द्रविड़वाद, सामाजिक न्याय, राज्य स्वायत्तता |
| अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) | 1972 | एम. जी. रामचंद्रन | तमिलनाडु | द्रविड़वाद, कल्याणकारी राजनीति, तमिल क्षेत्रीय हित |
| तृणमूल कांग्रेस (AITC) | 1998 | ममता बनर्जी | पश्चिम बंगाल | क्षेत्रीयतावाद, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद |
| समाजवादी पार्टी (SP) | 1992 | मुलायम सिंह यादव | उत्तर प्रदेश | समाजवाद, सामाजिक न्याय, पिछड़ा वर्ग राजनीति |
| राष्ट्रीय जनता दल (RJD) | 1997 | लालू प्रसाद यादव | बिहार | समाजवाद, सामाजिक न्याय, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व |
| जनता दल (यूनाइटेड) [JD(U)] | 2003 | शरद यादव, नीतीश कुमार आदि | बिहार | समाजवाद, सामाजिक न्याय, संघवाद |
| जनता दल (सेक्युलर) [JD(S)] | 1999 | एच. डी. देवेगौड़ा आदि | कर्नाटक | समाजवाद, किसान हित, धर्मनिरपेक्षता |
| बीजू जनता दल (BJD) | 1997 | नवीन पटनायक | ओडिशा | ओडिया क्षेत्रीय अस्मिता, विकासवाद, कल्याणकारी राजनीति |
| तेलुगु देशम पार्टी (TDP) | 1982 | एन. टी. रामाराव | आंध्र प्रदेश | तेलुगु क्षेत्रीय अस्मिता, राज्य हित, विकासवाद |
| भारत राष्ट्र समिति (BRS) | 2001 | के. चंद्रशेखर राव | तेलंगाना | तेलंगाना क्षेत्रीय अस्मिता, राज्य अधिकार, संघवाद |
| झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) | 1972 | शिबू सोरेन आदि | झारखंड | आदिवासी अधिकार, झारखंडी अस्मिता, क्षेत्रीय स्वायत्तता |
| शिवसेना | 1966 | बाल ठाकरे | महाराष्ट्र | मराठी अस्मिता, क्षेत्रीय राष्ट्रवाद |
| राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) | 1999 | शरद पवार, पी. ए. संगमा, तारिक अनवर | महाराष्ट्र | धर्मनिरपेक्षता, संघवाद, क्षेत्रीय हित |
| असम गण परिषद (AGP) | 1985 | प्रफुल्ल कुमार महंत आदि | असम | असमिया अस्मिता, क्षेत्रीय स्वायत्तता, अवैध प्रवासन विरोध |
| नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) | 1932 | शेख अब्दुल्ला | जम्मू-कश्मीर | कश्मीरी स्वायत्तता, धर्मनिरपेक्षता, क्षेत्रीय पहचान |
| पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) | 1999 | मुफ्ती मोहम्मद सईद | जम्मू-कश्मीर | क्षेत्रीय स्वायत्तता, कश्मीर केंद्रित राजनीति |
| शिरोमणि अकाली दल (SAD) | 1920 | सिख राजनीतिक नेतृत्व | पंजाब | सिख हित, पंजाबी/पंजाब क्षेत्रीय अस्मिता, संघवाद |
| ऑल इंडिया मजलिस–ए–इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) | 1927 | बहादुर यार जंग आदि | तेलंगाना, महाराष्ट्र आदि | अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व, मुस्लिम राजनीतिक हित |
| मिजो नेशनल फ्रंट (MNF) | 1961 | लालडेंगा | मिजोरम | मिजो पहचान, क्षेत्रीय स्वायत्तता |
| नागा पीपुल्स फ्रंट (NPF) | 2002 | नागा राजनीतिक नेतृत्व | नागालैंड, मणिपुर | नागा पहचान, क्षेत्रीय स्वायत्तता |
निर्वाचन आयोग की हालिया सूचियों में DMK, AIADMK, BJD, TDP, JMM, JD(U), JD(S), NC, PDP, AGP, AIMIM, MNF आदि को राज्य स्तर पर मान्यता प्राप्त दलों में शामिल किया गया है।
क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक मजबूती के प्रमाण
क्षेत्रीय दलों द्वारा स्वतंत्र रूप से कम सरकारें बनाने को उनकी चुनावी प्रासंगिकता में पूर्ण गिरावट का संकेत नहीं माना जा सकता। 2024 के लोकसभा चुनावों में क्षेत्रीय दलों को लगभग 33.52% मत प्राप्त हुए। इसके अतिरिक्त राज्य विधानसभा चुनावों में भी उनका प्रदर्शन मजबूत रहा है।
- स्थिर मत आधार: क्षेत्रीय दलों का लगभग एक तिहाई लोकसभा मत प्राप्त करना यह दर्शाता है कि उनका क्षेत्रीय जनाधार अभी भी मजबूत है।
- विधानसभा चुनावों में मजबूत प्रदर्शन: मतदाता राज्य विधानसभा चुनावों में क्षेत्रीय दलों को अपेक्षाकृत अधिक प्राथमिकता देते हैं। इससे राज्य-विशिष्ट राजनीतिक पहचान और क्षेत्रीय मुद्दों की निरंतर प्रासंगिकता स्पष्ट होती है।
- गठबंधन राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका: क्षेत्रीय दल अभी भी गठबंधन सरकारों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आंध्र प्रदेश, मेघालय, नागालैंड और पुडुचेरी में वे गठबंधन सरकारों के प्रमुख सहयोगी हैं। इसके अतिरिक्त बिहार, उत्तर प्रदेश, असम, गोवा, महाराष्ट्र, त्रिपुरा, झारखंड, जम्मू-कश्मीर और केरल जैसे राज्यों में भी वे गठबंधन सरकारों का हिस्सा हैं।
भारतीय लोकतंत्र में क्षेत्रीय दलों का महत्व
- सत्ता के केंद्रीकरण पर नियंत्रण: क्षेत्रीय दल केंद्र में अत्यधिक शक्तिशाली सरकार के सामने एक राजनीतिक संतुलन स्थापित करते हैं। वे राज्यों को अधिक प्रशासनिक तथा वित्तीय शक्तियाँ देने की मांग करते हैं और इस प्रकार केंद्रीकरण के विरुद्ध प्रतिरोधक शक्ति (Counterweight) के रूप में कार्य करते हैं।
- चुनावी संघवाद: 1989 से 2014 के गठबंधन राजनीति के दौर में केंद्र सरकारों को क्षेत्रीय सहयोगियों पर काफी निर्भर रहना पड़ा। राष्ट्रीय मोर्चा, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन जैसे गठबंधनों ने भारतीय दलीय व्यवस्था को अधिक संघीय स्वरूप प्रदान किया।
- कल्याणकारी योजनाओं में नवाचार: राज्य सरकारों ने कई अभिनव कल्याणकारी योजनाओं की शुरुआत की, जिन्हें बाद में राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया गया। तमिलनाडु की मध्याह्न भोजन योजना (Mid Day Meal Scheme) इसका प्रमुख उदाहरण है।
- लोकतांत्रिक विकल्पों का विस्तार: क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय दलों के प्रभुत्व को चुनौती देकर चुनावी प्रतिस्पर्धा और राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाते हैं। तमिलनाडु में 2026 विधानसभा चुनावों में 69% मतदान दर्ज किया गया, जो राज्य में अब तक का सर्वाधिक मतदान था।
- क्षेत्रीय मुद्दों को राष्ट्रीय एजेंडे में स्थान: भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में क्षेत्रीय दल भाषाई, जातीय और सांस्कृतिक पहचान को राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रदान करते हैं। अंतरराज्यीय नदी विवाद, विशेष वित्तीय आवश्यकताएँ, कृषि संबंधी समस्याएँ और क्षेत्रीय आधारभूत संरचना जैसे मुद्दों को वे संसद और राष्ट्रीय नीति निर्माण के केंद्र में ला सकते हैं।
क्षेत्रीय दलों को मजबूत करने के उपाय
- चुनावों का राज्य वित्तपोषण: इंद्रजीत गुप्ता समिति, 1998 की सिफारिशों के अनुरूप चुनावों के आंशिक राज्य वित्तपोषण से राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के बीच वित्तीय संसाधनों की असमानता कम की जा सकती है। इससे चुनावी प्रतिस्पर्धा पूंजी की बजाय नीतियों और जनसमर्थन पर अधिक आधारित हो सकती है।
- सामूहिक दलबदल पर रोक: दलबदल कानून में दो तिहाई विधायकों के विलय से संबंधित प्रावधान का दुरुपयोग क्षेत्रीय दलों में विभाजन कराने के लिए किया जा सकता है। इसलिए दसवीं अनुसूची में सुधार कर इस छूट को समाप्त करने या इसके लिए अधिक कठोर मानदंड निर्धारित करने की आवश्यकता है।
- दलबदल संबंधी निर्णय के लिए स्वतंत्र व्यवस्था
- दिनेश गोस्वामी समिति, 1990 ने सिफारिश की थी कि दलबदल के आधार पर अयोग्यता का निर्णय अध्यक्ष या सभापति के स्थान पर राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा निर्वाचन आयोग की सलाह पर लिया जाए।
- विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट, 1999 ने इस शक्ति को एक स्वतंत्र अधिकरण को देने की सिफारिश की। संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग, 2002 ने भी इसी प्रकार की सिफारिश की।
- आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करना: क्षेत्रीय दलों में व्यक्तित्व-केंद्रित राजनीति के स्थान पर संस्थागत नेतृत्व व्यवस्था विकसित करनी चाहिए। दूसरी पीढ़ी के नेतृत्व को विकसित करने से नेतृत्व परिवर्तन के दौरान होने वाले विभाजन और संगठनात्मक संकट को कम किया जा सकता है।
- एक राष्ट्र, एक चुनाव का पुनर्मूल्यांकन: एक राष्ट्र, एक चुनाव चुनावी लागत कम करने का प्रयास हो सकता है, लेकिन एक साथ चुनाव कराने की स्थिति में राष्ट्रीय मुद्दे राज्य-विशिष्ट मुद्दों पर हावी हो सकते हैं। इसलिए इसके किसी भी क्रियान्वयन में राज्यों के राजनीतिक हितों और क्षेत्रीय मुद्दों की संवैधानिक सुरक्षा आवश्यक है।
- परिसीमन में संतुलन: आगामी परिसीमन प्रक्रिया को अत्यंत सावधानी से लागू करने की आवश्यकता है ताकि दक्षिणी राज्यों को उनकी जनसंख्या नियंत्रण की सफलता के कारण राजनीतिक रूप से नुकसान न हो।
- विकासपरक क्षेत्रवाद: क्षेत्रीय दलों को केवल जाति, भाषा या अन्य प्राथमिक पहचान आधारित राजनीति तक सीमित रहने के बजाय विकासपरक क्षेत्रवाद (Developmental Regionalism) को अपनाना चाहिए।
उन्हें आधारभूत संरचना, स्वास्थ्य, रोजगार, शिक्षा और वित्तीय अनुशासन पर आधारित विश्वसनीय राज्य-विशिष्ट शासन मॉडल प्रस्तुत करना चाहिए।
निष्कर्ष
क्षेत्रीय दलों की प्रासंगिकता समाप्त नहीं हुई है, बल्कि वे वर्तमान समय में एक गंभीर राजनीतिक दबाव परीक्षण (Stress Test) से गुजर रहे हैं। स्वतंत्र रूप से सरकार बनाने की उनकी क्षमता में कमी आई है, लेकिन उनका मत आधार, राज्य स्तर पर उनका प्रभाव और गठबंधन राजनीति में उनकी भूमिका अभी भी महत्वपूर्ण है।
भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता में निहित है। इसलिए मजबूत क्षेत्रीय दल केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के लिए ही नहीं, बल्कि संघवाद, राज्य स्वायत्तता, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक संतुलन के लिए भी आवश्यक हैं।
महत्वपूर्ण MCQ
प्रश्न 1. भारत में राजनीतिक दलों को औपचारिक रूप से राष्ट्रीय दल और राज्य दल के रूप में किस संस्था द्वारा मान्यता दी जाती है?
- संसद
B. निर्वाचन आयोग
C. सर्वोच्च न्यायालय
D. विधि आयोग
उत्तर: B. निर्वाचन आयोग
प्रश्न 2. निम्नलिखित में से कौन सा क्षेत्रीय दलों की भारतीय लोकतंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका को सर्वाधिक उचित रूप से दर्शाता है?
- राजनीतिक केंद्रीकरण को बढ़ावा देना
B. राज्यों की स्वायत्तता और क्षेत्रीय हितों को राष्ट्रीय राजनीति में प्रस्तुत करना
C. केवल राष्ट्रीय चुनावों में भाग लेना
D. एकदलीय व्यवस्था को मजबूत करना
उत्तर: B. राज्यों की स्वायत्तता और क्षेत्रीय हितों को राष्ट्रीय राजनीति में प्रस्तुत करना
प्रश्न 3. भारत में क्षेत्रीय दलों के लिए वर्तमान राजनीतिक चुनौती के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन सा कारक महत्वपूर्ण है?
- राष्ट्रीय दलों का बढ़ता प्रभाव
- संगठनात्मक कमजोरी और परिवारवाद
- संसाधनों की असमानता
- पहचान की राजनीति से आकांक्षात्मक राजनीति की ओर बदलाव
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- केवल 1 और 2
B. केवल 2 और 3
C. केवल 1, 2 और 3
D. 1, 2, 3 और 4
उत्तर: D. 1, 2, 3 और 4
प्रश्न 4. निम्नलिखित में से किस समिति ने दलबदल संबंधी निर्णय राष्ट्रपति/राज्यपाल द्वारा निर्वाचन आयोग की सलाह पर लिए जाने की सिफारिश की थी?
- सरकारिया आयोग
B. दिनेश गोस्वामी समिति
C. इंद्रजीत गुप्ता समिति
D. मंडल आयोग
उत्तर: B. दिनेश गोस्वामी समिति
प्रश्न 5. 2024 के लोकसभा चुनावों में क्षेत्रीय दलों को लगभग कितने प्रतिशत मत प्राप्त हुए?
- 18.52%
B. 25.67%
C. 33.52%
D. 42.75%
उत्तर: C. 33.52%
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