दुनिया के दो सबसे पुराने और सबसे बड़े लोकतंत्र, अमेरिका और भारत, आज एक साझा कठिनाई से जूझ रहे हैं। यह कठिनाई केवल संवैधानिक ढांचे में सुधार की तकनीकी बहस तक सीमित नहीं है, बल्कि एक गहरे और मौलिक प्रश्न को जन्म देती है, क्या संवैधानिक डिजाइन अपने आप में लोकतंत्र को उन लोगों से बचा सकता है जो लोकतांत्रिक तरीकों से सत्ता प्राप्त करते हैं और फिर उन्हीं संस्थाओं को कमजोर कर देते हैं जिन्होंने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया।
यह खतरा नया नहीं है। प्लेटो ने सदियों पहले पहचान लिया था कि लोकतंत्र स्वयं अपने विनाशकों को जनमत की वैधता प्रदान कर सकता है। अमेरिकी संविधान निर्माताओं ने इस खतरे को समझा और शक्तियों के पृथक्करण तथा नियंत्रण एवं संतुलन (checks and balances) की विस्तृत व्यवस्था खड़ी की। जेम्स मैडिसन ने भी यह स्वीकार किया था कि संस्थाएं अंततः उन्हीं लोगों पर निर्भर करती हैं जो उन्हें संचालित करते हैं। कोई भी संवैधानिक प्रावधान उन अधिकारियों को पूरी तरह नहीं रोक सकता जो सत्ता का दुरुपयोग करने पर आमादा हों।
ब्रिटेन का मार्ग: संस्थाओं से अधिक परंपराएं
ब्रिटेन लोकतांत्रिक स्थायित्व का एक भिन्न मार्ग प्रस्तुत करता है। इसका लोकतंत्र किसी लिखित संविधान पर नहीं, बल्कि सदियों की संघर्षपूर्ण परंपराओं पर टिका है। मैग्नाकार्टा, चार्ल्स प्रथम का वध, संसदीय सर्वोच्चता की स्थापना और राजतंत्र से जुड़े रीति-रिवाज, ये सभी संप्रभु सत्ता पर अंकुश लगाने की दीर्घकालिक प्रक्रिया के पड़ाव रहे हैं। इनकी शक्ति इसी बात में निहित है कि ये प्रथा में ढल चुके हैं।
फ्रांसीसी विचारक अलेक्सिस डी टोकविल ने इसे “मन की आदतें” (habits of the mind) कहा था, ऐसी आदतें जो नागरिक समाज में गहराई तक रच बस चुकी हों। संविधान को संशोधित या समाप्त किया जा सकता है, परंतु राजनीतिक संघर्ष के माध्यम से अर्जित की गई आदतों को मिटाना कहीं अधिक कठिन होता है। इसका निहितार्थ यह है कि लोकतंत्र की सबसे गहरी सुरक्षा न तो संविधानों में है और न ही संस्थाओं में, बल्कि स्वतंत्रता की एक व्यापक साझा आदत में निहित होती है। लोकतंत्र को केवल फरमान (fiat) से स्थापित नहीं किया जा सकता, जैसा कि पश्चिम एशिया और अफगानिस्तान में अमेरिकी हस्तक्षेपों ने प्रदर्शित किया है। न ही प्रबुद्ध संविधान निर्माता इसे रातों-रात गढ़ सकते हैं। राजनीतिक स्वतंत्रता तभी स्थायी बनती है जब नागरिक स्वयं मनमानी सत्ता के विरुद्ध सहज रूप से प्रतिरोध करने की प्रवृत्ति विकसित कर लें।

अमेरिका और भारत की भिन्न नियति
यह अंतर अमेरिका और भारत की संभावनाओं में भिन्नता को समझने में सहायक है।
अमेरिका का अनुभव
- अमेरिकी लोकतंत्र जन्म से ही पूर्ण उदार नहीं था।
- 1776 की क्रांति ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष थी, जबकि स्वतंत्रता का संवैधानिक वादा दासता और राजनीतिक बहिष्करण के साथ सहअस्तित्व में रहा।
- उदार लोकतंत्र का विस्तार गृहयुद्ध और, बहुत बाद में, नागरिक अधिकार आंदोलन के माध्यम से हुआ।
- इस प्रकार अमेरिका की संस्थाएं केवल संवैधानिक डिजाइन की उपज नहीं, बल्कि स्वतंत्रता के अर्थ को लेकर बार-बार हुए संघर्षों का परिणाम हैं।
- इससे यह आशा बंधती है कि अमेरिकी नागरिक समाज में शक्तिशाली निरंकुश नेताओं का प्रतिरोध करने की पर्याप्त लोकतांत्रिक आदतें अब भी शेष हैं।
भारत की जटिलता
भारत का इतिहास अधिक चिंताजनक प्रतीत होता है। भारतीय संविधान ने एक असाधारण रूप से महत्वाकांक्षी उदार लोकतंत्र की रचना की, परंतु इसकी सामाजिक नींव उतनी सुदृढ़ नहीं रही। स्वयं भीमराव अंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि भारत में लोकतंत्र अब भी “त्वचा जितना गहरा” (skin deep) है। राष्ट्रीय आंदोलन ने लाखों लोगों को संगठित किया, परंतु इसका मुख्य लक्ष्य विदेशी शासन से मुक्ति था, न कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए भारत के भीतर मौजूद सामाजिक और राजनीतिक वर्चस्व की संरचनाओं के विरुद्ध कोई दीर्घकालिक जनांदोलन। उदार मूल्य नेहरू जैसे नेताओं और उन्नीसवीं सदी के प्रबुद्ध वर्ग तक ही दृढ़ता से सीमित रहे, इन्होंने व्यापक नागरिक समाज को उसी अनुपात में प्रभावित नहीं किया। परिणामस्वरूप भारत का लोकतंत्र काफी हद तक ऊपर से आरोपित (constructed from above) रहा।
गांधी बनाम टैगोर: स्वराज की बहस
इस समस्या को गांधी और टैगोर के बीच हुई बहस से बेहतर समझा जा सकता है। दोनों ने ही “स्वराज” की कल्पना केवल अंग्रेजों को बाहर निकालने से कहीं अधिक व्यापक रूप में की थी। स्वयं गांधी ने महत्वपूर्ण सामाजिक सुधारों को आगे बढ़ाया। फिर भी गांधी ने विदेशी शासन से मुक्ति को व्यापक और निरंतर व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संघर्ष पर वरीयता दी।
टैगोर को आशंका थी कि विदेशी शासकों को भारतीय शासकों से बदल देना, जब तक भारतीय स्वयं भीतर से मुक्त न हों, बहुत कम अर्थ रखेगा। उनके अनुसार राजनीतिक संघर्ष को “मन की लड़ाई” बनना आवश्यक था, स्वतंत्रता के लिए एक आंतरिक क्षमता (आत्मशक्ति) चाहिए थी जो शासक विदेशी हो या स्वदेशी, दोनों ही स्थितियों में वर्चस्व का प्रतिरोध कर सके। इतिहास ने टैगोर के इस आकलन को काफी हद तक सही सिद्ध किया।
अंबेडकर और जातिगत असमानता का प्रश्न
- अंबेडकर ने इसी समस्या को एक भिन्न कोण से देखा, गहरे जड़ जमाए जातिगत असमानता के माध्यम से। इस संदर्भ में उत्तर और दक्षिण भारत के भिन्न-भिन्न विकास पथ महत्वपूर्ण संकेत देते हैं।
- अधिकांश दक्षिण भारत में गैर-ब्राह्मण, आत्म-सम्मान (Self-Respect) से जुड़े आंदोलनों ने स्थापित पदानुक्रमों को नीचे से चुनौती दी।
- इन आंदोलनों ने सत्ता प्राप्त करने के लिए चुनावी राजनीति का प्रयोग किया, शिक्षा और आर्थिक अवसर तक पहुंच का विस्तार किया, तथा सामाजिक ढांचे को स्वयं परिवर्तित किया।
- इन्होंने वह कार्य किया जो केवल संवैधानिक घोषणा नहीं कर सकती थी, अधीनस्थ समूहों को समानता का दावा करने और विरासत में मिले वर्चस्व का प्रतिरोध करने के लिए अभ्यस्त बनाना।
- यह इस बात की व्याख्या करने में सहायक हो सकता है कि दक्षिण भारत ने उत्तर से उत्पन्न राजनीतिक परियोजनाओं का प्रतिरोध क्यों किया है।
- दूसरी ओर, उत्तर भारत में इस तरह के गहन सामाजिक सुधार आंदोलनों की तीव्रता अपेक्षाकृत कम रही, जिससे वहां लोकतांत्रिक आदतें कम गहराई तक स्थापित हो सकीं।
आपातकाल: भारतीय लोकतंत्र की परीक्षा
- आपातकाल (1975-77) स्वयं भारत की लोकतांत्रिक संस्कृति की नाजुकता को उजागर करता है। इसकी पराजय (1977 का चुनाव) प्रायः जनता के लोकतंत्र के प्रति सहज लगाव के प्रमाण के रूप में व्याख्यायित की जाती है। वास्तविकता कहीं अधिक जटिल थी।
- विपक्ष को अपनी शक्ति कई भिन्न स्रोतों से मिली, जिनमें ऐसे संगठन भी शामिल थे जिनकी उदार मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता संदिग्ध थी।
- इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि संस्थागत और व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं के क्षरण ने उतना व्यापक और स्थायी प्रतिरोध उत्पन्न नहीं किया जितना अपेक्षित था।
- संवैधानिक नियंत्रण एवं संतुलन की व्यवस्था भारत में अमेरिका की तुलना में संरचनात्मक रूप से कमजोर है, कार्यपालिका और विधायिका यहां अधिक निकटता से जुड़ी हुई हैं।
- प्रमुख संस्थाओं में नियुक्तियां कार्यपालिका के प्रभाव के प्रति संवेदनशील हैं।
- भारतीय संघवाद भी केंद्रीय सत्ता के विरुद्ध अपेक्षाकृत कमजोर प्रतिकार प्रदान करता है।
संविधान बनाम नागरिक समाज: निष्कर्ष
- निश्चित रूप से संविधान का महत्व है। नियंत्रण एवं संतुलन, स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र प्रेस और वास्तविक रूप से प्रतिस्पर्धी चुनाव, ये सभी अनिवार्य तत्व हैं। परंतु ये रक्षात्मक दीवारें (defensive walls) हैं, लोकतंत्र की नींव नहीं। यदि इन्हें बचाने के लिए कोई तैयार न हो, तो ये दीवारें ढह भी सकती हैं।
- भारत का अधूरा लोकतांत्रिक कार्य इसलिए संवैधानिक सुधार से कहीं अधिक गहरा है। स्वतंत्रता संग्राम विदेशी शासन को समाप्त करने में शानदार रूप से सफल रहा, परंतु राजनीतिक स्वतंत्रता (independence) और मानवीय स्वतंत्रता (freedom) एक समान नहीं हैं।
- टैगोर की “मन की स्वतंत्रता” (freedom of the mind) और अंबेडकर का सामाजिक पदानुक्रम के विरुद्ध संघर्ष, टोकविल की लोकतांत्रिक “मन की आदतों” के साथ मिलकर एक ही अंतर्दृष्टि पर पहुंचते हैं, स्वतंत्रता को जीवित रहने के लिए नागरिक समाज में गहराई तक रचा-बसा होना आवश्यक है।
- भारत को शायद, एक रूपक अर्थ में परंतु गहन दृष्टि से, एक और स्वतंत्रता संघर्ष की आवश्यकता है, यह संघर्ष मनमानी सत्ता की स्वीकृति के विरुद्ध होगा। इसका उद्देश्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता, कानून के समक्ष समानता और नागरिकता की आदतों में क्षरण के प्रतिरोध को सुनिश्चित करना होगा। लोकतंत्र की अंतिम सुरक्षा कांच के डिब्बे में रखा संविधान नहीं, बल्कि ऐसा समाज है जिसने स्वतंत्रता की गहरी आदत अर्जित कर ली हो।
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