ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित चाबहार बंदरगाह भारत की क्षेत्रीय संपर्क नीति का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता रहा है। यह बंदरगाह भारत के लिए अफगानिस्तान, मध्य एशिया और उससे आगे यूरोप तक पहुँचने का प्रवेश द्वार है। किंतु पिछले कुछ वर्षों में इस परियोजना के उतार-चढ़ाव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बड़ी बुनियादी ढाँचा परियोजनाएँ केवल पूँजी और इंजीनियरिंग से पूरी नहीं होतीं, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति की दिशा भी उनका भविष्य तय करती है। अमेरिका के प्रतिबंध, अमेरिका-ईरान के बीच दशकों पुराना तनाव और पश्चिम एशिया में बढ़ता संघर्ष, इन सबने भारत की चाबहार महत्वाकांक्षा को लगभग ठहराव की स्थिति में ला दिया है। इसके बावजूद नई दिल्ली रणनीतिक धैर्य के सहारे अपने संपर्क स्वप्न को जीवित रखे हुए है।
चाबहार: भौगोलिक और रणनीतिक परिचय
- चाबहार ईरान का एकमात्र महासागरीय बंदरगाह है। यह ओमान की खाड़ी के निकट स्थित है और सीधे हिंद महासागर की ओर खुलता है।
- ईरान के अन्य प्रमुख बंदरगाह, जैसे बंदर अब्बास, फारस की खाड़ी के भीतर हैं और होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर ही उन तक पहुँचा जा सकता है। चाबहार की यही भौगोलिक स्थिति उसे विशिष्ट बनाती है।

- यह बंदरगाह गुजरात के कांडला बंदरगाह से लगभग 550 समुद्री मील और मुंबई से लगभग 786 समुद्री मील की दूरी पर है।
- चाबहार में दो टर्मिनल हैं: शहीद कलांतरी और शहीद बहिश्ती। भारत ने शहीद बहिश्ती टर्मिनल के विकास में ईरान की सहायता की है।
- यह बंदरगाह ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थित है, जिसकी लंबी और खुली सीमाएँ पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान दोनों से लगती हैं। ज़ाहेदान इस प्रांत की राजधानी है।
भारत-ईरान सहयोग की यात्रा
चाबहार में भारत की रुचि नई नहीं है। इस सहयोग के प्रमुख पड़ाव इस प्रकार हैं:
- 2003: भारत और ईरान ने चाबहार के विकास पर सैद्धांतिक सहमति बनाई, किंतु ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण काम आगे नहीं बढ़ सका।
- 2016: प्रधानमंत्री की ईरान यात्रा के दौरान भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच त्रिपक्षीय पारगमन एवं परिवहन समझौता (चाबहार समझौता) हुआ।
- 2018: भारत की सरकारी कंपनी इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) ने शहीद बहिश्ती टर्मिनल का परिचालन अपने हाथ में लिया।
- 2024: IPGL और ईरान के बंदरगाह एवं समुद्री संगठन के बीच दस वर्ष का दीर्घकालिक अनुबंध हुआ। इसमें लगभग 12 करोड़ डॉलर के निवेश और 25 करोड़ डॉलर की ऋण सुविधा का प्रावधान था। यह पहली बार था जब भारत ने किसी विदेशी बंदरगाह का दीर्घकालिक प्रबंधन संभाला।
चाबहार-ज़ाहेदान रेल संपर्क: उम्मीद और अड़चन
हाल ही में चाबहार और ईरानशहर के बीच एक महत्वपूर्ण रेल खंड का निर्माण पूरा हुआ है। यह खंड उस 630 किलोमीटर लंबी प्रस्तावित रेल लाइन का भाग है, जो अफगान सीमा के निकट ज़ाहेदान तक जाएगी। सामान्य परिस्थितियों में यह भारत के लिए प्रसन्नता का विषय होता, क्योंकि इससे बंदरगाह से अफगानिस्तान तक माल पहुँचाना सरल हो जाता। परंतु चाबहार पर लगे प्रतिबंधों के कारण भारत द्वारा इस रेल संपर्क का उपयोग फिलहाल प्रतीक्षा में है।

इस रेल परियोजना से जुड़े प्रमुख तथ्य:
- इसका निर्माण भी लंबे विलंब का शिकार रहा है। प्रारंभ में भारत की इरकॉन कंपनी को इसमें भागीदारी करनी थी, किंतु वित्तपोषण और प्रतिबंधों की अनिश्चितता के चलते ईरान ने इसे अपने संसाधनों से आगे बढ़ाया।
- ईरान के अनुसार पूरी चाबहार-ज़ाहेदान लाइन अगले वर्ष जनवरी तक तैयार हो जाएगी।
- इसकी वार्षिक क्षमता 77 लाख टन माल ढुलाई और 22 लाख यात्रियों की परिकल्पित है।
- एक बार परिचालन शुरू होने पर यह रेल मार्ग क्षेत्रीय संपर्क और व्यापार के लिए निर्णायक परिवर्तन ला सकता है।
ईरान को यह भी आशा है कि यह संपर्क परियोजना सिस्तान-बलूचिस्तान जैसे अल्पविकसित प्रांत में आर्थिक समृद्धि लाएगी। उल्लेखनीय है कि यह प्रांत ईरान के सबसे पिछड़े और अशांत क्षेत्रों में गिना जाता है, जहाँ अलगाववादी और उग्रवादी गतिविधियाँ भी समय-समय पर सामने आती रही हैं। ऐसे में आर्थिक विकास वहाँ स्थिरता का माध्यम भी बन सकता है।
होर्मुज संकट और चाबहार का बढ़ता महत्व
ईरान और अमेरिका-इज़राइल के बीच चल रहे संघर्ष ने होर्मुज जलडमरूमध्य को एक संकरे गतिरोध बिंदु में बदल दिया है। यह जलमार्ग वैश्विक व्यापार, विशेषकर कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। अमेरिका और इज़राइल के सैन्य हमलों के बाद ईरान ने पहले इसकी नाकेबंदी की और जवाबी कार्रवाई में अमेरिका ने भी नौसैनिक नाकेबंदी शुरू कर दी।
इस परिस्थिति में चाबहार का महत्व और बढ़ जाता है:
- चाबहार होर्मुज के बाहर स्थित है, इसलिए यह एक वैकल्पिक व्यापार केंद्र बन सकता है।
- यह स्थल-रुद्ध (लैंडलॉक्ड) अफगानिस्तान, मध्य एशियाई देशों और यहाँ तक कि यूरोप तक पहुँचने के लिए अमूल्य समुद्री मार्ग प्रदान करता है।
- यह भारत को शत्रुतापूर्ण पड़ोसी पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अपने विस्तारित पड़ोस तक पहुँच देता है।
पाकिस्तान फैक्टर: स्थल मार्ग का अभाव
निकट भविष्य में पाकिस्तान द्वारा भारत को पारगमन अधिकार दिए जाने की संभावना लगभग शून्य है। अफगानिस्तान तक भारत का सबसे छोटा स्थल मार्ग पाकिस्तान से होकर गुजरता है, जो राजनीतिक कारणों से बंद है। इसी कारण चाबहार अफगानिस्तान और उससे आगे पहुँचने का व्यावहारिक विकल्प बनता है।

पाकिस्तान द्वारा पारगमन अधिकार न दिए जाने का अप्रत्यक्ष उल्लेख एक वरिष्ठ भारतीय राजनयिक ने हाल ही में किया। वे शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के राष्ट्रीय समन्वयकों की बैठक में भाग लेने इस्लामाबाद गए थे और वहाँ उन्होंने क्षेत्रीय संपर्क की आवश्यकता पर विशेष बल दिया। यह संकेत था कि भारत संपर्क के प्रश्न को बहुपक्षीय मंचों पर भी उठाता रहेगा।
अमेरिकी प्रतिबंध: सबसे बड़ी बाधा
चाबहार परियोजना की राह में सबसे बड़ी रुकावट अमेरिका के एकतरफा प्रतिबंध हैं।
छूट का इतिहास
- 2018 में अमेरिका ने ईरान पर “अधिकतम दबाव” की नीति के तहत कड़े प्रतिबंध लगाए, किंतु अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण और मानवीय सहायता के तर्क पर चाबहार को इनसे छूट दी गई।
- भारत ने इस छूट का सदुपयोग किया और चाबहार के रास्ते अफगानिस्तान को गेहूँ, दवाइयाँ और अन्य मानवीय सहायता पहुँचाई। कोविड काल में भी यह मार्ग सहायता भेजने में उपयोगी रहा।
- बाद में अमेरिका ने इस छूट को समाप्त करने की घोषणा की। भारत को उपयोग जारी रखने के लिए जो अस्थायी छूट मिली थी, वह इस वर्ष 26 अप्रैल को समाप्त हो गई और ट्रंप प्रशासन ने इसे आगे नहीं बढ़ाया।
भारतीय हितों पर दबाव
ट्रंप प्रशासन कई मोर्चों पर भारतीय हितों की अनदेखी करता रहा है। रूसी तेल की खरीद के लिए भारत पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने की धमकी इसका एक उदाहरण है। चाबहार छूट का विस्तार न करना इसी व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है।
शहीद बहिश्ती टर्मिनल से वापसी
अमेरिकी प्रतिबंधों के भय से भारत को जल्दबाज़ी में शहीद बहिश्ती टर्मिनल के परिचालन से पीछे हटना पड़ा। यह भारत की क्षेत्रीय संपर्क महत्वाकांक्षा के लिए बड़ा झटका है। अमेरिका-ईरान तनाव जिस स्तर पर है, उसे देखते हुए निकट भविष्य में नई छूट मिलने की संभावना भी कम दिखती है।
ईरान की अपेक्षा और भारत की विवशता
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान ने पिछले महीने अपनी भारत यात्रा के दौरान नई दिल्ली से चाबहार में निवेश बढ़ाने और ईरान के साथ आर्थिक संबंधों को गहरा करने का आग्रह किया। किंतु अमेरिकी प्रतिबंध ऐसी किसी पहल की संभावना को फिलहाल रोक देते हैं। चाबहार पर जारी प्रतिबंध उस अमेरिकी रणनीति का अंग हैं, जिसके तहत वह ऐसे प्रतिद्वंद्वी पर अधिकतम दबाव बनाना चाहता है, जो दशकों से वॉशिंगटन के दबाव के आगे झुकने से इनकार करता रहा है।
ग्वादर बनाम चाबहार: रणनीतिक संतुलन
- व्यापारिक पहुँच से आगे बढ़कर चाबहार भारत के लिए पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह का रणनीतिक प्रतिसंतुलन भी है।
- ग्वादर चाबहार से मात्र लगभग 140 किलोमीटर दूर है।
- इसका निर्माण चीन की सहायता से हुआ है और यह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का अंतिम छोर है, जो चीन की बेल्ट एंड रोड पहल का प्रमुख हिस्सा है।

- भारत की यह आशंका उचित है कि चीन ग्वादर को सैन्य चौकी के रूप में सक्रिय रूप से इस्तेमाल कर सकता है।
- अरब सागर में चीन की बढ़ती उपस्थिति भारत की समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति मार्गों के लिए चिंता का विषय है। चाबहार इस क्षेत्र में भारत की रणनीतिक उपस्थिति सुनिश्चित करता है।
INSTC: दीर्घकालिक दृष्टि
दीर्घकाल में भारत चाबहार को अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) का समुद्री आधार बनाना चाहता है। यह एक बहु-माध्यमी परिवहन नेटवर्क है, जो भारत को उसके विस्तारित पड़ोस से होते हुए रूस के सेंट पीटर्सबर्ग और उससे आगे तक जोड़ने की परिकल्पना करता है।
INSTC की प्रमुख विशेषताएँ:
- भारत, ईरान और रूस ने वर्ष 2000 में सेंट पीटर्सबर्ग में इस गलियारे के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। बाद में अज़रबैजान, आर्मेनिया, कज़ाखस्तान, तुर्की समेत कई अन्य देश इससे जुड़े।
- इसकी कुल लंबाई लगभग 7,200 किलोमीटर है, जिसमें समुद्र, रेल और सड़क तीनों माध्यम शामिल हैं।
- स्वेज़ नहर के पारंपरिक मार्ग की तुलना में इससे माल ढुलाई की लागत में लगभग 30 प्रतिशत और समय में लगभग 40 प्रतिशत की कमी का अनुमान है।

INSTC के सामने चुनौतियाँ
- भारत, ईरान और रूस के समर्थन के बावजूद यह परियोजना वर्तमान भू-राजनीतिक उथल-पुथल में कठिन बनी हुई है।
- रूस-यूक्रेन युद्ध और उसके कारण रूस के यूरोपीय देशों से बिगड़ते संबंधों ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना को और पीछे धकेला है।
- रूस और ईरान दोनों पर पश्चिमी प्रतिबंध होने से वित्तीय लेन-देन, बीमा और निवेश जुटाना कठिन हो गया है।
- कई खंडों में बुनियादी ढाँचा अधूरा है, जैसे ईरान में रश्त-अस्तारा रेल खंड, जिसके लिए रूस ने वित्तीय सहायता देने का समझौता किया है।
भारत के लिए चाबहार का समग्र महत्व
चाबहार का महत्व केवल एक बंदरगाह तक सीमित नहीं है। इसके बहुआयामी लाभ इस प्रकार हैं:
- आर्थिक: मध्य एशिया के ऊर्जा और खनिज संसाधनों तक पहुँच तथा भारतीय उत्पादों के लिए नए बाज़ार।
- रणनीतिक: ग्वादर और CPEC के माध्यम से बढ़ते चीनी प्रभाव का संतुलन।
- कूटनीतिक: अफगानिस्तान और मध्य एशिया में भारत की उपस्थिति और “कनेक्ट सेंट्रल एशिया” नीति को बल।
- मानवीय: अफगानिस्तान को सहायता पहुँचाने का भरोसेमंद मार्ग।
- ऊर्जा सुरक्षा: होर्मुज जैसे संवेदनशील मार्गों पर निर्भरता घटाने की संभावना।
आगे की राह
- भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अमेरिका के साथ अपनी व्यापक रणनीतिक साझेदारी और ईरान के साथ अपने ऐतिहासिक व भौगोलिक हितों के बीच संतुलन कैसे बनाए। इस दिशा में कुछ संभावित कदम हो सकते हैं:
- अमेरिका के साथ कूटनीतिक संवाद जारी रखना और चाबहार के मानवीय तथा अफगान स्थिरता से जुड़े पक्ष को रेखांकित करना।
- रूस, मध्य एशियाई देशों और अन्य INSTC भागीदारों के साथ मिलकर बहुपक्षीय समर्थन जुटाना।
- प्रतिबंधों से बचते हुए भुगतान के वैकल्पिक तंत्र, जैसे रुपये में व्यापार, पर विचार करना।
- भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) जैसे वैकल्पिक संपर्क मार्गों पर भी समानांतर काम करना, ताकि किसी एक मार्ग पर पूर्ण निर्भरता न रहे।
परिस्थितियाँ अनुकूल होते ही परियोजना को तेज़ी से आगे बढ़ाने के लिए अपनी संस्थागत तैयारी बनाए रखना।
निष्कर्ष
इन तमाम कठिन बाधाओं के बावजूद भारत ने चाबहार के प्रति रणनीतिक धैर्य का परिचय दिया है। नई दिल्ली ने अपने दीर्घकालिक निवेश को बनाए रखा है, इस उम्मीद में कि बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियाँ एक दिन इस परियोजना को उसकी पूर्ण क्षमता तक पहुँचने देंगी। चाबहार की कहानी इस सच्चाई को रेखांकित करती है कि आज की दुनिया में आर्थिक संपर्क परियोजनाएँ महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा से अलग नहीं रह सकतीं। भारत के लिए यह बंदरगाह केवल व्यापार का साधन नहीं, बल्कि उसकी क्षेत्रीय आकांक्षाओं और सामरिक स्वायत्तता की परीक्षा भी है। फिलहाल भारत प्रतीक्षा की मुद्रा में है और आशा कर रहा है कि भू-राजनीति की हवा जल्द ही उसके अनुकूल बहेगी।
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