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भारत-चीन सैन्य संबंध आज भी 2020 में क्यों अटके हैं?

भारत और चीन के संबंधों में पिछले कुछ वर्षों में एक विचित्र विरोधाभास उभरा है। कूटनीतिक स्तर पर बर्फ पिघल रही है, शिखर बैठकें हो रही हैं और जनता के बीच आवाजाही फिर से शुरू हो गई है। परंतु जिन दो सेनाओं के बीच अविश्वास सबसे गहरा है और जिनके बीच गलतफहमी सबसे बड़ा खतरा बन सकती है, उनके बीच संवाद का दरवाज़ा अब भी बंद है। प्रश्न यह है कि जब दो सेनाएँ संकट की घड़ी में आमने-सामने खड़ी हों, तब क्या केवल राजनीतिक गर्मजोशी के भरोसे शांति टिक सकती है? और एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि आखिर अमेरिका का रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) आज चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) से भारत की तुलना में अधिक सहजता से बात क्यों कर रहा है?

राजनीतिक गर्माहट बनाम सैन्य मौन

पिछले तीन वर्षों में दोनों देशों के रिश्तों में सामान्यीकरण के कई ठोस संकेत दिखे हैं:

  • शीर्ष स्तर पर संवाद: राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री मोदी तीन बार मिल चुके हैं।
  • धार्मिक यात्राएँ: भारतीय तीर्थयात्री कैलाश लौट आए हैं, जो हिंदुओं और बौद्धों दोनों के लिए पवित्र तिब्बती पर्वत है।
  • हवाई संपर्क: लगभग छह वर्ष बाद सीधी उड़ानें बहाल हुई हैं और एयर चाइना ने भी नई दिल्ली के लिए सेवा फिर शुरू कर दी है।
  • सीमा व्यापार: तीन सीमा व्यापार बिंदु दोबारा खोले गए हैं और द्विपक्षीय व्यापार अब 100 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो चुका है।
  • शी की भारत यात्रा: सितंबर में शी जिनपिंग लगभग सात वर्षों में पहली बार भारत आए। बीजिंग का कहना है कि वह दोनों देशों को “अच्छे पड़ोसी और मित्र” के रूप में देखना चाहता है।

इसी महीने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में शी जिनपिंग की मेज़बानी की। यानी दो राजधानियों ने शी का स्वागत किया, परंतु इनमें से केवल एक, वाशिंगटन, अपनी सेना को चीन की सेना से विधिवत बात करने देता है। स्पष्ट है कि भारत-चीन संबंधों की यह पिघलन हर क्षेत्र तक पहुँची है, सिवाय सेना के। नेता, व्यापारी और तीर्थयात्री हिमालय पार कर रहे हैं, पर सैनिक नहीं।

पृष्ठभूमि: गलवान से विघटन तक

इस गतिरोध को समझने के लिए 2020 की घटनाओं को याद करना ज़रूरी है। अप्रैल-मई 2020 में पूर्वी लद्दाख में चीनी सैनिकों की गतिविधियों से तनाव शुरू हुआ और 15 जून 2020 को गलवान घाटी में हिंसक झड़प हुई। यह 45 वर्षों में सीमा पर पहली घातक भिड़ंत थी। दोनों पक्षों के सैनिक लाठियों और पत्थरों से लड़े, जिसमें 20 भारतीय और 4 चीनी सैनिक मारे गए (चीन ने आधिकारिक तौर पर केवल चार मौतें स्वीकार कीं)।

इसके बाद लगभग चार वर्षों तक कोर कमांडर स्तर की बीस से अधिक दौर की वार्ताएँ चलीं। गलवान, पैंगोंग त्सो, गोगरा और हॉट स्प्रिंग्स से चरणबद्ध विघटन हुआ और अंततः अक्टूबर 2024 में देपसांग और डेमचोक में गश्त व्यवस्था पर समझौता हुआ। परंतु यह प्रक्रिया अधूरी है। विघटन (disengagement) के बाद तनाव-शमन (de-escalation) और सैनिकों की वापसी (de-induction) के चरण अभी बाकी हैं। दोनों ओर अब भी हज़ारों सैनिक भारी हथियारों के साथ तैनात हैं और कई स्थानों पर बनाए गए “बफर ज़ोन” स्थायी समाधान नहीं, बल्कि अस्थायी व्यवस्था हैं।

यह भी उल्लेखनीय है कि 1993 का शांति और स्थिरता बनाए रखने का समझौता, 1996 का सैन्य क्षेत्र में विश्वास बहाली उपायों का समझौता, 2005 का प्रोटोकॉल और 2013 का सीमा रक्षा सहयोग समझौता (BDCA) जैसी व्यवस्थाएँ दशकों तक सीमा को शांत रखने में सहायक रहीं। गलवान ने इन सभी की सीमाएँ उजागर कर दीं।

टूटा हुआ सैन्य धागा: ‘हैंड-इन-हैंड’ अभ्यास

  • दुनिया की दो सबसे बड़ी सेनाएँ, जो एक विवादित हिमालयी सीमा पर आमने-सामने खड़ी हैं, आज भी 2020 के क्षण में जमी हुई हैं।
  • दोनों सेनाओं ने आखिरी बार दिसंबर 2019 में मेघालय के उमरोई में साथ प्रशिक्षण लिया था। यह “हैंड-इन-हैंड” आतंकवाद-रोधी अभ्यास का आठवाँ दौर था, जिसकी शुरुआत 2007 में चीन के कुनमिंग में हुई थी।
  • इसके छह महीने बाद ही गलवान की घटना घटी।
  • इस वर्ष मई में उमरोई ने ही उद्घाटन “प्रगति” अभ्यास की मेज़बानी की, जिसमें 12 एशियाई देशों के 400 से अधिक सैनिक शामिल हुए। चीन उनमें नहीं था।
  • नई दिल्ली का दृष्टिकोण यह है कि PLA को पहले अपनी वापसी का अधिकार अर्जित करना होगा। यह सहज प्रवृत्ति समझ में आती है, परंतु सावधानी अपने आप में रणनीति नहीं होती। असली प्रश्न यह नहीं है कि भारत चीन पर आँख मूँदकर भरोसा करे या नहीं, बल्कि यह है कि क्या भारत डिफ़ॉल्ट रूप से अविश्वास को लगातार बनाए रखने का खर्च उठा सकता है?

अमेरिका का उदाहरण: जोखिम प्रबंधन के रूप में संवाद

वाशिंगटन इस प्रश्न का उत्तर अपने लिए दे चुका है:

  • पिछले नवंबर में अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ और उनके चीनी समकक्ष डोंग जुन ने टकराव टालने और तनाव घटाने के लिए चैनल बनाने पर सहमति दी।
  • मई में हेगसेथ 1972 के बाद ऐसे पहले अमेरिकी रक्षा प्रमुख बने जो राष्ट्रपति के साथ चीन गए।
  • अंतर दृष्टिकोण का है। पेंटागन PLA से बातचीत को जोखिम प्रबंधन मानता है, जबकि दिल्ली अब भी इसे एक रियायत की तरह देखती है।

क्या भारत अकेला छूट जाएगा?

यह चेतावनी के रूप में पढ़ा जाना बेहतर है, हरी झंडी के रूप में नहीं। यदि दुनिया के दो सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी, अमेरिका और चीन, प्रतिस्पर्धा करते हुए भी अपने जनरलों को आपस में बात करने दे सकते हैं, तो एशिया की दो सबसे प्राचीन सभ्यताएँ भी ऐसा कर सकती हैं। भारत PLA के प्रति पेंटागन से अधिक कठोर रुख रखने का जोखिम नहीं उठा सकता, फिर भी अजीब बात है कि आज स्थिति ठीक ऐसी ही दिखती है।

हॉटलाइन पर्याप्त क्यों नहीं?

अगस्त में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच कुछ अहम सहमतियाँ बनीं:

  • दो नई सैन्य हॉटलाइन जोड़ने पर सहमति
  • वरिष्ठ कमांडरों के लिए दो नए बैठक स्थल
  • सीमा समाधान पर “प्रारंभिक और ठोस” प्रगति का वचन

बीजिंग इसका श्रेय पाने का हकदार है। परंतु हॉटलाइन एक फायर अलार्म की तरह है: वह तभी बजती है जब कुछ पहले से जल रहा हो। कुछ सप्ताह पहले ही अरुणाचल प्रदेश के टकसिंग में आमना-सामना होने की खबरों ने फिर चिंता बढ़ा दी। जो सेनाएँ केवल आपातकाल में बात करती हैं, वे आपातकाल पैदा करती रहेंगी। संकट-प्रबंधन और संबंध-निर्माण दो अलग चीज़ें हैं; पहला दूसरे का विकल्प नहीं हो सकता।

गलवान: संवाद का कारण, बाधा नहीं

क्या सैन्य संवाद गलवान के लिए बीजिंग को पुरस्कृत करना होगा? नहीं। वास्तव में गलवान बात करने का कारण है, उससे बचने का नहीं। वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC), जो एक वास्तविक लेकिन अपरिभाषित सीमा है, पर दोनों सेनाएँ एक-दूसरे की स्थिति आख़िरी तंबू तक जानती थीं, पर एक-दूसरे के मन को नहीं जानती थीं। इस अंतर की कीमत दोनों ओर के सैनिकों ने चुकाई। भौतिक जानकारी और मानसिक समझ के बीच की यही खाई टकराव को जन्म देती है।

आपत्तियाँ भी निराधार नहीं

इस तर्क के विरुद्ध आपत्तियाँ वास्तविक हैं और उन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता:

  • ऑपरेशन सिंदूर में चीन की भूमिका: मई 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच चार दिन चले संघर्ष के दौरान पाकिस्तान को चीन से लाइव इनपुट मिले।
  • पाकिस्तान की सैन्य निर्भरता: पाकिस्तान के हालिया सैन्य हार्डवेयर आयात का 81 प्रतिशत चीनी है।
  • गोपनीयता का डर: यह आशंका भी उठती है कि संवाद से सैन्य रहस्य उजागर हो सकते हैं।

इन आपत्तियों के बावजूद लेख का तर्क यह है कि जोखिमों को प्रबंधित करते हुए संवाद संभव है, और संवाद का अभाव अपने आप में बड़ा जोखिम है।

आगे की राह: क्या किया जाना चाहिए

  • पहला, हैंड-इन-हैंड को पुनर्जीवित करें। 12 वर्षों में आठ दौर तक यह एकमात्र नियमित अवसर था जब दोनों सेनाएँ शत्रु की बजाय पेशेवरों की तरह मिलती थीं।
  • दूसरा, स्टाफ कॉलेजों के दरवाज़े खोलें। वेलिंगटन स्थित भारत का डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज दर्जनों देशों के अधिकारियों को प्रशिक्षित करता है, जबकि नानजिंग का PLA आर्मी कमांड कॉलेज चीन के भावी फील्ड कमांडरों को तैयार करता है। कुछ आदान-प्रदान से दोनों पक्ष एक-दूसरे के सैन्य सिद्धांत को प्रत्यक्ष समझ सकेंगे।
  • क्या इससे रहस्य उजागर होंगे? उतने ही, जितने भारत का दर्जनों अन्य सेनाओं के साथ आदान-प्रदान करता है। और किसी प्रतिद्वंद्वी को मानवीय रूप में देखने के लिए यह जानना काफ़ी है कि वह भी मेस के खाने की शिकायत करता है।
  • तीसरा, हॉटलाइन को राजनीतिक रीढ़ दें। रक्षा मंत्रियों के बीच एक निश्चित तिथि पर वार्षिक संवाद होना चाहिए, सीमा पर माहौल चाहे जैसा भी हो।
  • चौथा, आपदा के लिए साथ प्रशिक्षण लें। 26 अगस्त की सुबह नेपाल-चीन सीमा पर ग्लेशियर-चट्टान के हिमस्खलन से भोटे कोशी नदी में अचानक बाढ़ आ गई। कुछ ही दिनों में भारतीय सैन्यकर्मी और PLA वायुसेना के दो Y-20 परिवहन विमान काठमांडू पहुँच गए। दोनों ने एक ही आपदा पर काम किया, लेकिन अलग-अलग। हिमनदीय बाढ़ सीमाएँ नहीं पहचानती और अगली बाढ़ भारत और चीन के बीच कहीं भी आ सकती है।

भारत बदले में क्या माँगे?

संवाद एकतरफ़ा उदारता नहीं होना चाहिए। नई दिल्ली को स्पष्ट शर्तें रखनी चाहिए:

  • बफर ज़ोन में संयम
  • सैन्य अभ्यासों की अग्रिम सूचना
  • घटनाओं की संयुक्त जाँच का तंत्र

बीजिंग इन पर सहमत क्यों होगा? क्योंकि शांत हिमालयी मोर्चा उसे अन्य क्षेत्रों, जैसे ताइवान, दक्षिण चीन सागर और अमेरिका के साथ प्रतिस्पर्धा, पर ध्यान केंद्रित करने देता है। साथ ही, जो भारत चीन को छोड़कर सबके साथ अभ्यास करता है, उसे एशिया चीन-विरोधी खेमे में खड़ा मानेगा, और बीजिंग यह धारणा कमज़ोर करना चाहेगा।

व्यापक भू-राजनीतिक संदर्भ

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के इस महीने के अंत में क्वाड (अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत) की बैठक से पहले भारत आने की संभावना है। परंतु एशिया की शांति वाशिंगटन में तय नहीं होगी। भारत की “रणनीतिक स्वायत्तता” की परंपरा भी यही कहती है कि वह अपने सबसे बड़े पड़ोसी के साथ संबंधों का प्रबंधन स्वयं करे, किसी तीसरी शक्ति के भरोसे नहीं।

बीजिंग के लिए इसका अर्थ है पारदर्शिता के साथ मिलना और भारत की आंतरिक राजनीति के प्रति धैर्य रखना, क्योंकि गलवान के बाद भारत में जनमत चीन के प्रति स्वाभाविक रूप से संशयी है। साथ ही, सीमा के दोनों ओर बुनियादी ढाँचे की होड़ (चीन के सीमावर्ती “शियाओकांग” गाँव और भारत का “वाइब्रेंट विलेजेज़ प्रोग्राम”) यह दिखाती है कि प्रतिस्पर्धा जारी रहेगी। ऐसे में संवाद प्रतिस्पर्धा को खत्म नहीं करेगा, लेकिन उसे संघर्ष में बदलने से रोक सकता है।

निष्कर्ष

दोनों देशों के राजनयिक अपना काम कर चुके हैं। अब सैनिकों की बारी है। भारत-चीन संबंधों की असली परीक्षा शिखर बैठकों की तस्वीरों में नहीं, बल्कि LAC की उन ठंडी चौकियों पर होगी जहाँ एक गलत अनुमान बड़े संकट में बदल सकता है। सैन्य संवाद को रियायत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित में किया गया जोखिम प्रबंधन मानना होगा। अविश्वास बनाए रखना आसान है, पर उसकी कीमत 2020 में चुकाई जा चुकी है। उस कीमत को दोबारा चुकाने से बचना ही परिपक्व रणनीति है।


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