24 अक्टूबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र अपनी स्थापना के 81 वर्ष पूरे कर रहा है। उत्सव का माहौल फीका है, क्योंकि सुरक्षा परिषद अभी तक यह तय नहीं कर पाई है कि नए वर्ष में महासचिव का पद कौन संभालेगा। एंतोनियो गुटेरेस का दूसरा कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को समाप्त हो रहा है।
आज यह संस्था एक नाज़ुक मोड़ पर खड़ी है। एक ओर उसे बीते युग का अवशेष कहकर कोसा जाता है, उसमें तत्काल सुधार की माँग होती है। दूसरी ओर वैश्विक एजेंडे में उसकी केंद्रीय भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस मूल दायित्व के लिए इसका गठन हुआ था, यानी अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना, उसी में यह आज लगातार विफल दिखाई देता है।
संयुक्त राष्ट्र: स्थापना और ढाँचा
- चार्टर पर हस्ताक्षर: 26 जून 1945, सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन में।
- स्थापना: 24 अक्टूबर 1945, जब चार्टर प्रभावी हुआ।
- सदस्यता: प्रारंभ में 51 सदस्य थे, आज 193 सदस्य देश हैं।
- प्रमुख अंग: महासभा, सुरक्षा परिषद, आर्थिक एवं सामाजिक परिषद, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय, सचिवालय और न्यास परिषद। न्यास परिषद 1994 से निष्क्रिय है।
- महासचिव की नियुक्ति: चार्टर के अनुच्छेद 97 के अनुसार सुरक्षा परिषद की सिफ़ारिश पर महासभा नियुक्ति करती है। व्यवहार में परिषद गुप्त ‘स्ट्रॉ पोल’ के ज़रिए उम्मीदवारों का समर्थन परखती है, और किसी भी स्थायी सदस्य का विरोध उम्मीदवारी समाप्त कर सकता है।

आठ दशकों की उपलब्धियाँ:
संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग का मानक ढाँचा (Normative Architecture) खड़ा किया और करोड़ों जीवन बचाए।
मानवीय मोर्चा
- बाल स्वास्थ्य: यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन के संयुक्त अभियानों से पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की वार्षिक मृत्यु 1990 के लगभग 1.2 करोड़ से घटकर 2011 तक 69 लाख रह गई।
- पोलियो: समन्वित टीकाकरण ने इस बीमारी को उन्मूलन की कगार पर पहुँचा दिया है।
- महामारियाँ: इबोला और कोविड जैसे संकटों में संयुक्त राष्ट्र ने समन्वित वैश्विक प्रतिक्रिया का नेतृत्व किया।
- शरणार्थी सहायता: संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (UNHCR) हर वर्ष साढ़े तीन करोड़ से अधिक विस्थापितों की सहायता करता है।
- खाद्य सहायता: विश्व खाद्य कार्यक्रम युद्ध और आपदा से पीड़ित लोगों तक नियमित राहत पहुँचाता है।
विकास और पर्यावरण
सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों (2000 से 2015) ने अत्यधिक गरीबी को आधा किया, करोड़ों बच्चों तक प्राथमिक शिक्षा पहुँचाई और मातृ मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाई। इन्हीं की नींव पर 2015 से 2030 तक के सतत विकास लक्ष्य (SDGs) बने। किंतु अमेरिका में ट्रंप प्रशासन के दूसरे कार्यकाल में हुई धन कटौती से ये बहुपक्षीय प्रतिबद्धताएँ गंभीर संकट में हैं।
पर्यावरण के क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से हुई संधियों ने वैश्विक ज़िम्मेदारी को नई परिभाषा दी:
- मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987): ओज़ोन परत को क्षति पहुँचाने वाले 99 प्रतिशत क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) चरणबद्ध रूप से समाप्त किए गए।
- क्योटो प्रोटोकॉल (1997) और पेरिस समझौता (2015): जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक कार्रवाई के आधार बने।
अधिकार और प्रवासन
- बीजिंग सम्मेलन (1995): महिला अधिकारों को आगे बढ़ाने में मील का पत्थर सिद्ध हुआ।
- प्रवासन पर वैश्विक समझौता (2018): प्रवासन के लिए पहला एकीकृत अंतरराष्ट्रीय ढाँचा बना।
इन पहलों से वैश्विक सामाजिक नीति का दायरा बढ़ा, परंतु आज इनके विरुद्ध प्रतिक्रिया भी तेज़ हो रही है।
शांति और सुरक्षा: सफलता से निष्क्रियता तक
- शांति स्थापना और शांति निर्माण के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र ने लगभग 170 शांति समझौते कराए। उसकी कुछ बड़ी सफलताएँ:
- क्यूबा मिसाइल संकट (1962) और ईरान-इराक युद्ध जैसे विस्फोटक टकरावों को शांत करना।
- जटिल नागरिक संघर्षों को नियंत्रित करना।
- नामीबिया, पूर्वी तिमोर और मोज़ाम्बिक में शांतिपूर्ण संक्रमण को स्थिर करना।
हाल के वर्षों में तस्वीर बदल गई है। यूक्रेन, ईरान, गाज़ा, लीबिया और यमन जैसे संघर्षों में संगठन लगभग प्रभावहीन रहा है और युद्ध बिना रोक-टोक भड़कते रहे। आलोचक दो कारण गिनाते हैं: सुरक्षा परिषद का दीर्घकालिक गतिरोध और महासचिव का चार्टर के सिद्धांतों के पक्ष में खुलकर खड़ा न हो पाना।
सुरक्षा परिषद: 1945 की दुनिया का प्रतिबिंब
यह निर्विवाद है कि सुरक्षा परिषद 1945 की भू-राजनीति को दर्शाती है, 2025 की नहीं। आठ दशकों में दुनिया पूरी तरह बदल गई है:
- विउपनिवेशीकरण: यूरोपीय साम्राज्यों के पतन से दर्जनों जीवंत और स्वतंत्र राष्ट्र उभरे।
- नई शक्तियाँ: क्षेत्रीय और वैश्विक विकास के नए इंजन के रूप में गतिशील अर्थव्यवस्थाएँ उभरी हैं।
- स्थिर संरचना: फिर भी पाँच स्थायी सदस्यों (अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस) की व्यवस्था 1945 की युद्धोत्तर सत्ता-संरचना पर ही टिकी है।
- परिणाम यह है कि अरबों लोग स्थायी प्रतिनिधित्व से वंचित हैं, और भारत जैसे प्रमुख राष्ट्र तथा बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ वैश्विक सुरक्षा के मुख्य निर्णायक मंच से बाहर हैं। वास्तविक प्रासंगिकता और औपचारिक अधिकार के बीच का यह अंतर एक ‘प्रतिनिधित्व घाटा’ (Representational Deficit) पैदा करता है। इससे अंतरराष्ट्रीय विधि के शासन में विश्वास घटता है और अधिक से अधिक देश परिषद के निर्णयों को संदेह से देखने लगे हैं।
- परिषद में अब तक केवल एक बार संरचनात्मक परिवर्तन हुआ है। 1963 के संशोधन (प्रभावी 1965) से सदस्य संख्या 11 से बढ़कर 15 हुई, पर स्थायी सदस्यता अछूती रही।
वीटो: सामूहिक सुरक्षा से रणनीतिक अवरोध तक
- वैधता का संकट वीटो शक्ति से और गहरा होता है, जिसने परिषद को अवरोध के मंच में बदल दिया है।
- जब कोई स्थायी सदस्य वीटो की धमकी देता है, तो वह मानवीय त्रासदियों, आक्रामक युद्धों या संप्रभु सीमाओं के खुले उल्लंघन पर स्वयं को और अपने सहयोगियों को जवाबदेही से बचा लेता है।
- इससे चार्टर का मूल उद्देश्य ही उलट जाता है।
- बार-बार के गतिरोध से राष्ट्र छोटे और स्व-चयनित गठबंधनों, तात्कालिक क्षेत्रीय गुटों और G20 जैसे सीमित मंचों की ओर मुड़ रहे हैं।
वीटो के अंकुश के लिए कुछ प्रयास भी हुए हैं:
‘शांति के लिए एकता’ प्रस्ताव (1950): स्थायी सदस्यों में असहमति से परिषद पंगु हो जाए, तो महासभा मामले पर विचार कर सकती है।
महासभा प्रस्ताव 76/262 (2022): वीटो प्रयोग के दस कार्यदिवसों के भीतर महासभा में बहस अनिवार्य करता है। इससे वीटो पर रोक तो नहीं लगती, पर उसकी राजनीतिक कीमत बढ़ जाती है।
विकल्पों की सीमाएँ: संयुक्त राष्ट्र क्यों अपरिहार्य है
- G20: यह न शांति सैनिक भेज सकता है, न ही इसके पास सार्वभौमिक सदस्यता से उपजा नैतिक अधिकार है।
- क्षेत्रीय और लघुपक्षीय समूह: ये विशिष्ट आर्थिक या रक्षा हितों के लिए उपयोगी हैं, पर इनमें वह वैश्विक समावेशिता और सार्वभौमिक वैधता नहीं है जो केवल संयुक्त राष्ट्र के पास है।
- ‘थ्यूसीडिडियन’ दुनिया का खतरा: प्रभावी सुरक्षा परिषद के अभाव में दुनिया उस प्राचीन यूनानी कथन जैसी हो जाएगी जिसमें शक्तिशाली मनमानी करते हैं और कमज़ोर उसकी कीमत चुकाते हैं। ऐसी व्यवस्था में ताक़त ही न्याय बन जाती है और छोटे देशों के पास कोई संस्थागत सहारा नहीं बचता।
- महासभा की सार्वभौमिक सदस्यता और सुरक्षा परिषद के निर्णयों की बाध्यकारी कानूनी शक्ति ऐसे वैश्विक सार्वजनिक हित (Global Public Goods) हैं जिनका कोई विकल्प नहीं है।
- सुधार: सहमति लक्ष्य पर, असहमति अर्थ पर
- सुधार की आवश्यकता पर सब एकमत हैं, पर उसके अर्थ पर गहरा मतभेद है।
विकसित पश्चिमी देशों की दृष्टि में सुधार का अर्थ है:
- बजट में कटौती
- विभागों का विलय
- अधिदेशों (Mandates) का युक्तिकरण
- कर्मचारियों की संख्या और लागत में कमी
विकासशील देशों की दृष्टि में सुधार का अर्थ है:
- अधिक समावेश और बेहतर प्रतिनिधित्व
- संगठन की प्राथमिकताएँ तय करने में निर्णायक आवाज़
- सुधार का संतुलित स्वरूप ये बातें शामिल कर सकता है:
- स्थायी सीटों का विस्तार, ताकि अल्प-प्रतिनिधित्व वाले क्षेत्र और उभरती शक्तियाँ जगह पा सकें।
- वीटो के प्रयोग को सीमित करने के स्पष्ट मानदंड।
- सुरक्षा परिषद और महासभा के बीच औपचारिक जवाबदेही को गहरा करना।
सुधार की लक्ष्मण रेखा: सुधार उस बिंदु से पहले रुकना चाहिए जहाँ सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली सदस्य संगठन से ही अलग हो जाएँ। राष्ट्र संघ (League of Nations) इसी कारण निष्प्रभावी हुआ था, क्योंकि बड़ी शक्तियाँ या तो उससे बाहर रहीं या निकल गईं। ऐसा हुआ तो संयुक्त राष्ट्र का अंत निश्चित है।
सुधार की राह में संस्थागत अड़चनें
अनुच्छेद 108: चार्टर संशोधन के लिए महासभा में दो-तिहाई बहुमत और फिर पाँचों स्थायी सदस्यों सहित दो-तिहाई सदस्य देशों का अनुसमर्थन आवश्यक है। यानी स्थायी सदस्य अपनी ही शक्ति घटाने वाले संशोधन को रोक सकते हैं।
परस्पर विरोधी गुट:
- G4 (भारत, ब्राज़ील, जर्मनी, जापान) एक-दूसरे की स्थायी सदस्यता का समर्थन करता है।
- ‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ गुट (इटली, पाकिस्तान, अर्जेंटीना आदि) नई स्थायी सीटों का विरोध करता है।
- अफ्रीकी संघ का एज़ुलविनी सहमति मॉडल अफ्रीका के लिए वीटो सहित दो स्थायी सीटें माँगता है।
धीमी प्रक्रिया: 2009 से अंतर-सरकारी वार्ताएँ (IGN) चल रही हैं, पर अब तक कोई ठोस वार्ता-पाठ नहीं बन सका। सितंबर 2024 के ‘भविष्य के लिए समझौते’ (Pact for the Future) में परिषद सुधार की प्रतिबद्धता दोहराई गई।
UN80 पहल: मार्च 2025 में महासचिव ने यह पहल शुरू की, जिसका लक्ष्य दक्षता, अधिदेशों की समीक्षा और संरचनात्मक पुनर्गठन है।
भारत का दृष्टिकोण
- भारत 1945 में चार्टर पर हस्ताक्षर करने वाला मूल सदस्य है, जबकि तब वह स्वतंत्र भी नहीं था।
- भारत आठ बार अस्थायी सदस्य रहा है, सबसे हाल में 2021-22 में।
- संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में भारत ऐतिहासिक रूप से सबसे बड़े सैन्य योगदानकर्ताओं में शामिल है।
- भारत ‘सुधारित बहुपक्षवाद’ (Reformed Multilateralism) का पक्षधर है और विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या, पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था तथा ग्लोबल साउथ की आवाज़ के रूप में स्थायी सदस्यता का दावा करता है।
निष्कर्ष
संयुक्त राष्ट्र इसलिए आवश्यक है क्योंकि वैश्विक शासन को एक ऐसे आधार की ज़रूरत है जो सार्वभौमिकता और व्यापक वैधता पर टिका हो। अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में यह युद्धोत्तर व्यवस्था के मूल विचार का प्रतीक है: बहुपक्षवाद एक ‘झटका अवशोषक’ (Shock Absorber) बन सकता है। यह एक ऐसा स्थायी मंच है जहाँ विरोधी आमने-सामने बैठ सकते हैं, तनाव कम कर सकते हैं और भीषण टकराव के क्षणों में भी बंद दरवाज़ों के पीछे वार्ता कर सकते हैं।
इसलिए समाधान संगठन को छोड़ देना नहीं, बल्कि उसका पुनर्निर्माण है। 81 वर्षों का अनुभव यह बताने के लिए पर्याप्त है कि यह प्रयास सार्थक है।
वन लाइनर फैक्ट्स फॉर रिवीजन
- संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 24 अक्टूबर 1945 को हुई; 2026 में यह 81 वर्ष का हो गया।
- संयुक्त राष्ट्र चार्टर पर 26 जून 1945 को सैन फ्रांसिस्को में हस्ताक्षर हुए।
- वर्तमान सदस्य संख्या 193 है; मूल सदस्य 51 थे।
- महासचिव की नियुक्ति अनुच्छेद 97 के तहत सुरक्षा परिषद की सिफ़ारिश पर महासभा करती है।
- एंतोनियो गुटेरेस का दूसरा कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को समाप्त होगा।
- बाल मृत्यु 1990 के लगभग 1.2 करोड़ से घटकर 2011 में 69 लाख रह गई।
- UNHCR प्रतिवर्ष साढ़े तीन करोड़ से अधिक विस्थापितों की सहायता करता है।
- सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों की अवधि 2000 से 2015 थी; सतत विकास लक्ष्यों की अवधि 2015 से 2030 है।
- मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल से 99 प्रतिशत ओज़ोन-क्षयकारी CFCs समाप्त हुए।
- प्रवासन पर वैश्विक समझौता 2018 में अपनाया गया।
- संयुक्त राष्ट्र ने लगभग 170 शांति समझौतों में मध्यस्थता की है।
- सुरक्षा परिषद का विस्तार 1965 में 11 से 15 सदस्यों तक हुआ।
- ‘शांति के लिए एकता’ प्रस्ताव 1950 में पारित हुआ था।
- महासभा प्रस्ताव 76/262 (2022) वीटो के बाद महासभा में बहस अनिवार्य करता है।
- चार्टर संशोधन की प्रक्रिया अनुच्छेद 108 में है।
- G4 में भारत, ब्राज़ील, जर्मनी और जापान शामिल हैं।
- UN80 पहल मार्च 2025 में शुरू हुई।
- भारत आठ बार सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य रहा है, अंतिम बार 2021-22 में।
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