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संघवाद: Subrata K. Mitra और Malte Pehl के विचारों पर आधारित

संघवाद: केवल संरचना नहीं, एक राजनीतिक प्रक्रिया

भारतीय संघवाद को केवल “केंद्र और राज्य के बीच शक्ति का बंटवारा’ समझना इसकी वास्तविक गहराई को कम कर देता है। Mitra और Pehl के अनुसार, यह एक जीवित, गतिशील और लगातार विकसित होने वाली राजनीतिक प्रक्रिया है, जो भारत जैसे विशाल और विविध समाज को एक साथ बनाए रखने का कार्य करती है। नीचे संघवाद के प्रमुख पहलुओं को बिंदुओं में लेकिन विस्तारपूर्वक समझाया गया है, ताकि यह परीक्षा और समझ दोनों के लिए उपयोगी हो।

संघवाद: केवल संरचना नहीं, एक राजनीतिक प्रक्रिया

संघवाद को अक्सर संविधान की धाराओं (जैसे सातवीं अनुसूची) के आधार पर समझा जाता है, लेकिन Mitra और Pehl कहते हैं कि यह अधूरा दृष्टिकोण है। वास्तव में संघवाद इस बात से तय होता है कि व्यवहार में केंद्र और राज्य कैसे interact करते हैं
उदाहरण के लिए, एक ही संवैधानिक प्रावधान अलग-अलग समय में अलग तरह से काम कर सकता है कभी केंद्र मजबूत होता है, कभी राज्य। इसलिए संघवाद एक “static system’ नहीं, बल्कि dynamic process है।

“Holding Together Federation’ का अर्थ और महत्व

भारत का संघवाद “coming together’ नहीं है (जैसे अमेरिका), बल्कि “holding together’ है।
इसका मतलब है कि भारत पहले से एक विशाल और विविध देश था, जिसे टूटने से बचाने के लिए संघीय ढांचा अपनाया गया
इसका महत्व यह है कि:

  • संघवाद का उद्देश्य केवल शक्ति बाँटना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता बनाए रखना है
  • इसलिए केंद्र को अधिक शक्तियाँ दी गईं

मजबूत केंद्र: आवश्यकता या खतरा?

भारतीय संघवाद की एक सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें केंद्र को अपेक्षाकृत अधिक शक्तियाँ दी गई हैं। संविधान निर्माताओं ने यह व्यवस्था जानबूझकर बनाई क्योंकि स्वतंत्रता के समय भारत कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा था। जैसे विभाजन, आंतरिक अस्थिरता और क्षेत्रीय विघटन का खतरा। ऐसी स्थिति में यदि केंद्र कमजोर होता, तो देश के टूटने की संभावना बढ़ सकती थी।

इसी कारण केंद्र को आपातकालीन शक्तियाँ, वित्तीय नियंत्रण और राज्यों के ऊपर कुछ हद तक हस्तक्षेप की क्षमता दी गई। लेकिन Mitra और Pehl इस बात की ओर भी ध्यान दिलाते हैं कि यही शक्ति कभी-कभी समस्या बन जाती है।

यदि केंद्र अत्यधिक शक्तिशाली हो जाए, तो राज्यों की स्वायत्तता (autonomy) कम हो सकती है और संघीय संतुलन बिगड़ सकता है। इसलिए भारतीय संघवाद में यह प्रश्न हमेशा बना रहता है कि मजबूत केंद्र स्थिरता देता है या संघवाद को कमजोर करता है।

विविधता का प्रबंधन (Accommodation of Diversity)

भारत एक अत्यंत विविधतापूर्ण समाज है, जहाँ भाषा, धर्म, संस्कृति और क्षेत्रीय पहचान में भारी अंतर है। ऐसी स्थिति में एक एकात्मक (unitary) व्यवस्था इन विविधताओं को दबा सकती थी, जिससे असंतोष और विद्रोह की संभावना बढ़ती।

संघवाद ने इस समस्या का समाधान “समायोजन’ (accommodation) के माध्यम से किया। उदाहरण के लिए, भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया गया, जिससे लोगों को अपनी भाषा और संस्कृति के अनुसार प्रशासन मिला। इसी तरह, पूर्वोत्तर राज्यों को विशेष प्रावधान दिए गए ताकि उनकी विशिष्ट पहचान सुरक्षित रह सके।

इस प्रकार, भारतीय संघवाद का मूल सिद्धांत यह है कि विविधता को समाप्त नहीं किया जाए, बल्कि उसे मान्यता देकर एकता में बदला जाए।

केंद्रराज्य संबंध: सहयोग और संघर्ष दोनों

भारतीय संघवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें केवल सहयोग ही नहीं, बल्कि संघर्ष भी होता है। कई बार केंद्र और राज्य मिलकर काम करते हैं जैसे विकास योजनाओं में, आर्थिक नीतियों में, या GST परिषद जैसे संस्थानों के माध्यम से। यह “cooperative federalism’ का उदाहरण है।

लेकिन दूसरी ओर, राजनीतिक मतभेद, संसाधनों के बंटवारे और सत्ता के संघर्ष के कारण टकराव भी होता है। उदाहरण के लिए, अलग-अलग दलों की सरकारें होने पर केंद्र और राज्यों के बीच तनाव बढ़ सकता है।

इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय संघवाद एक सरल या स्थिर व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह लगातार बातचीत (negotiation) और संतुलन (balance) पर आधारित है।

क्षेत्रीय दलों का प्रभाव

1990 के दशक के बाद भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का उदय एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। पहले जहाँ राष्ट्रीय दलों का वर्चस्व था, वहीं अब राज्यों के अपने राजनीतिक दल मजबूत होकर सामने आए।

इसका संघवाद पर गहरा प्रभाव पड़ा। क्षेत्रीय दलों ने अपने-अपने राज्यों के हितों को राष्ट्रीय राजनीति में मजबूती से उठाया, जिससे केंद्र को उनकी मांगों को ध्यान में रखना पड़ा। गठबंधन सरकारों के दौर में तो केंद्र को राज्यों के साथ समझौता करना अनिवार्य हो गया।

इससे संघवाद अधिक संतुलित और सहभागी (inclusive) बना, क्योंकि अब निर्णय केवल केंद्र द्वारा नहीं, बल्कि विभिन्न राज्यों के सहयोग से लिए जाने लगे।

बहुस्तरीय शासन (Multi-level Governance)

भारतीय संघवाद समय के साथ और अधिक जटिल और व्यापक हो गया है। पहले यह केवल केंद्र और राज्यों तक सीमित था, लेकिन 73वें और 74वें संविधान संशोधन के बाद इसमें स्थानीय सरकारों पंचायत और नगरपालिकाओं को भी शामिल किया गया।

इसका महत्व यह है कि अब शासन केवल ऊपर से नीचे नहीं आता, बल्कि नीचे से भी ऊपर की ओर जाता है। स्थानीय स्तर पर लोगों को निर्णय लेने का अधिकार मिलने से लोकतंत्र अधिक गहरा हुआ है।

इस प्रकार, भारतीय संघवाद अब एक three-tier system बन गया है, जिसमें केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर तीनों मिलकर शासन करते हैं।

संघवाद और लोकतंत्र का संबंध

संघवाद और लोकतंत्र एक-दूसरे के पूरक हैं। संघवाद सत्ता के विकेंद्रीकरण (decentralization) को बढ़ावा देता है, जिससे अधिक लोगों को निर्णय प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर मिलता है।

यदि सारी शक्ति केंद्र में केंद्रित हो जाए, तो लोकतंत्र केवल औपचारिक रह सकता है। लेकिन जब राज्य और स्थानीय सरकारें भी शक्तिशाली होती हैं, तो नागरिकों की भागीदारी बढ़ती है और उनकी समस्याओं का समाधान अधिक प्रभावी ढंग से होता है।

इसलिए कहा जा सकता है कि संघवाद लोकतंत्र को केवल बनाए नहीं रखता, बल्कि उसे गहरा (deep) और व्यापक (inclusive) बनाता है।

संघवाद की चुनौतियाँ

हालांकि भारतीय संघवाद काफी सफल रहा है, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियाँ भी हैं।

पहली चुनौती है केंद्र का प्रभुत्व, जो कभी-कभी राज्यों की स्वतंत्रता को सीमित कर देता है। दूसरी, अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग, जिसके माध्यम से केंद्र ने कई बार राजनीतिक कारणों से राज्य सरकारों को बर्खास्त किया।

तीसरी चुनौती आर्थिक असमानता है कुछ राज्य बहुत विकसित हैं, जबकि कुछ पिछड़े हुए हैं, जिससे असंतुलन पैदा होता है। चौथी, क्षेत्रीय असंतोष और अलगाववादी आंदोलन, जो यह दर्शाते हैं कि संघवाद हर समस्या का पूर्ण समाधान नहीं है।

इन सभी चुनौतियों से स्पष्ट होता है कि संघवाद एक “perfect system’ नहीं, बल्कि लगातार सुधार और समायोजन की प्रक्रिया है।

बदलता हुआ संघवाद (New Federalism)

समकालीन भारत में संघवाद का स्वरूप लगातार बदल रहा है। आज हम “New Federalism’ या “Cooperative Federalism’ की बात करते हैं, जहाँ केंद्र और राज्य मिलकर नीति निर्माण करते हैं।

GST परिषद इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जहाँ केंद्र और राज्य मिलकर कर नीति तय करते हैं। इसी तरह, नीति आयोग राज्यों को विकास प्रक्रिया में भागीदार बनाता है।

इसके साथ-साथ राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी है जिसे “competitive federalism’ कहा जाता है जहाँ राज्य निवेश और विकास के लिए एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं।

इस प्रकार, आधुनिक भारतीय संघवाद अधिक लचीला, सहभागी और परिणाम-उन्मुख बनता जा रहा है।

निष्कर्ष

भारतीय संघवाद को समझने का सबसे सही तरीका यह है कि इसे एक स्थिर ढांचे के रूप में नहीं, बल्कि एक लगातार विकसित होने वाली संतुलन प्रक्रिया के रूप में देखा जाए।

यह व्यवस्था एक ओर राष्ट्रीय एकता को बनाए रखती है, तो दूसरी ओर विविधता को भी सम्मान देती है। केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति का संतुलन, सहयोग और संघर्ष ये सभी मिलकर भारतीय संघवाद को एक जीवंत और प्रभावी प्रणाली बनाते हैं। इसलिए, भारतीय संघवाद केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि
भारत की एकता, स्थिरता और लोकतांत्रिक विकास की आधारशिला है।

भारतीय संघवाद (Mitra & Pehl) – 10 महत्वपूर्ण परीक्षा तथ्य

  1. संघवाद एक गतिशील प्रक्रिया है
    भारतीय संघवाद स्थिर संरचना नहीं, बल्कि समय के साथ बदलने वाली राजनीतिक प्रक्रिया है।
  2. “Holding Together Federation’
    भारत का संघवाद राज्यों के मिलकर बनने से नहीं, बल्कि देश को एकजुट बनाए रखने के लिए विकसित हुआ
  3. मजबूत केंद्र की व्यवस्था
    संविधान ने केंद्र को अधिक शक्तियाँ दीं ताकि राष्ट्रीय एकता और स्थिरता सुनिश्चित की जा सके
  4. Quasi-Federal प्रकृति
    भारत पूर्ण संघीय नहीं, बल्कि अर्धसंघीय (quasi-federal) व्यवस्था है जिसमें केंद्र अधिक शक्तिशाली है।
  5. विविधता का समायोजन (Accommodation)
    संघवाद का मुख्य उद्देश्य भाषाई, धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को समायोजित करना है।
  6. Cooperative और Competitive Federalism
    भारत में संघवाद सहयोग (cooperation) और प्रतिस्पर्धा (competition) दोनों पर आधारित है।
  7. क्षेत्रीय दलों की भूमिका
    1990 के बाद क्षेत्रीय दलों ने राज्यों की शक्ति और संघवाद को मजबूत किया
  8. Multi-level Governance
    73वें और 74वें संशोधन के बाद संघवाद तीन स्तरों (केंद्र, राज्य, स्थानीय) में विकसित हुआ।
  9. संघवाद और लोकतंत्र का संबंध
    संघवाद विकेंद्रीकरण के माध्यम से लोकतंत्र को गहरा और मजबूत बनाता है
  10. मुख्य चुनौतियाँ
    केंद्र का प्रभुत्व, आर्थिक असमानता, अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग और क्षेत्रीय असंतोष संघवाद की प्रमुख समस्याएँ हैं।

 

 


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