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राजनीति और राष्ट्रीय पहचान: Sunil Khilnani

Sunil Khilnani की पुस्तक ‘The Idea of India’ से कुछ महत्वपूर्ण बिंदु

यह लेख आधुनिक भारत की राजनीतिक और वैचारिक संरचना को समझने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। Khilnani का मुख्य तर्क यह है कि भारत में राष्ट्रीय पहचान का निर्माण किसी एक सांस्कृतिक, धार्मिक या ऐतिहासिक आधार पर नहीं हुआ, बल्कि यह एक राजनीतिक परियोजना (political project) का परिणाम है।

  • यूरोप में जहां राष्ट्र-निर्माण अक्सर साझा भाषा, संस्कृति और इतिहास पर आधारित था, वहीं भारत में यह प्रक्रिया अधिक जटिल रही।
  • भारत एक बहुलतावादी समाज है, जहां अनेक धर्म, भाषाएँ, जातियाँ और क्षेत्रीय पहचानें मौजूद हैं। ऐसे में ‘राष्ट्र’ का विचार स्वाभाविक नहीं था, बल्कि इसे राजनीतिक रूप से निर्मित और निरंतर पुनर्निर्मित किया गया

आधुनिक राष्ट्रराज्य की अवधारणा

आधुनिक राष्ट्र-राज्य की अवधारणा यूरोप में विकसित हुई, जहाँ साझा भाषा, संस्कृति और इतिहास ने राष्ट्रवाद को जन्म दिया।

इसके विपरीत, भारत में राष्ट्रवाद का विकास एक अलग मार्ग से हुआ। यहाँ विविधता इतनी गहन है कि एकीकृत राष्ट्रीय पहचान का निर्माण एक स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं थी।

सुनील खिलनानी के अनुसार, भारत का राष्ट्र-निर्माण एक राजनीतिक कल्पना (political imagination) का परिणाम है, जिसे स्वतंत्रता के बाद राज्य और लोकतंत्र के माध्यम से विकसित किया गया।

राष्ट्रीय पहचान को समझने के लिए विभिन्न सिद्धांत

राष्ट्रीय पहचान को समझने के लिए Benedict Anderson, Ernest Gellner और Sunil Khilnani आदि के सिद्धांत है जो न केवल अलग-अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं, बल्कि एक-दूसरे से गहरे रूप में जुड़े हुए भी हैं।

कल्पित समुदाय से राजनीतिक निर्माण तक

  • Benedict Anderson और Ernest Gellner दोनों ही राष्ट्रवाद को एक ‘निर्मित’ (constructed) प्रक्रिया के रूप में देखते हैं, लेकिन उनके दृष्टिकोणों में आधारभूत अंतर है।
  • Anderson के अनुसार राष्ट्र एक ‘Imagined Community’ है, जहाँ लोग एक-दूसरे को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते, फिर भी वे एक साझा भावनात्मक और प्रतीकात्मक समुदाय का हिस्सा महसूस करते हैं। उनके अनुसार यह कल्पना भाषा, प्रिंट-पूंजीवाद और सांस्कृतिक प्रतीकों के माध्यम से निर्मित होती है।
  • इसके विपरीत, Gellner राष्ट्रवाद को मुख्यतः आधुनिक औद्योगिक समाज का परिणाम मानते हैं, जहाँ आर्थिक संरचना, मानकीकृत शिक्षा प्रणाली और राज्य की संस्थाएँ एक समान राष्ट्रीय पहचान को विकसित करती हैं।
  • इस प्रकार Anderson का दृष्टिकोण सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक है, जबकि Gellner का दृष्टिकोण संरचनात्मक और आर्थिक है।

लेकिन Gellner इस विचार को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि:

  • यह ‘कल्पना’ अपने आप नहीं बनती बल्कि यह आधुनिक औद्योगिक समाज की जरूरतों का परिणाम है यहीं Khilnani एक नया आयाम जोड़ते हैं: भारत में न तो पूर्ण औद्योगिकीकरण था न ही एक समान सांस्कृतिक आधार इसलिए भारत में राष्ट्र तो केवल कल्पना (Anderson) ही केवल आधुनिकता (Gellner) है  बल्कि राजनीतिक निर्माण (Political Construction) है

अतः राष्ट्रवाद को ‘कल्पना + संरचना’ के संयोजन के रूप में समझा जा सकता है। इसी synthesis को Sunil Khilnani भारतीय संदर्भ में लागू करते हैं, लेकिन महत्वपूर्ण संशोधनों के साथ। वे इंगित करते हैं कि भारत में न तो एक साझा भाषा थी, न एक समान संस्कृति, और न ही पूर्ण औद्योगिकीकरण, फिर भी भारत एक राष्ट्र के रूप में उभरा।

  • इस विरोधाभास को समझाने के लिए Khilnani ‘institution-driven imagination’ की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं, जिसमें राज्य और उसकी संस्थाएँ राष्ट्रीय पहचान के निर्माण में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं।
  • इसी संदर्भ में Khilnani का सबसे महत्वपूर्ण योगदान ‘State-Nation’ की अवधारणा है, जो पारंपरिक पश्चिमी मॉडल को चुनौती देती है।
  • Gellner के अनुसार राष्ट्र पहले बनता है और फिर वह राज्य का निर्माण करता है, अर्थात राष्ट्र-राज्य। लेकिन Khilnani इस क्रम को उलट देते हैं और तर्क देते हैं कि भारत में पहले लोकतांत्रिक राज्य का निर्माण हुआ, जिसने बाद में नागरिकता, अधिकारों और संस्थागत ढाँचों के माध्यम से राष्ट्र का निर्माण किया।
  • इस प्रकार भारत में राज्य – राष्ट्र की प्रक्रिया देखने को मिलती है, जिसे वे ‘State-Nation’ कहते हैं। यह दृष्टिकोण Anderson और Gellner दोनों से भिन्न है, क्योंकि Anderson में सामाजिक-सांस्कृतिक कल्पना प्राथमिक है, Gellner में आर्थिक संरचना प्राथमिक है, जबकि Khilnani में राजनीतिक संस्थाएँ और राज्य प्राथमिक भूमिका निभाते हैं।

इसके अतिरिक्त, Khilnani Anderson की ‘imagined community’ की अवधारणा को भी विस्तार देते हैं। जहाँ Anderson राष्ट्र को एक अपेक्षाकृत एकीकृत कल्पना के रूप में देखते हैं, वहीं Khilnani भारतीय पहचान को ‘layered’ या बहु-स्तरीय बताते हैं।

उनके अनुसार एक व्यक्ति एक साथ कई पहचान रख सकता है जैसे वह क्षेत्रीय, धार्मिक और राष्ट्रीय पहचान का धारक हो सकता है। इस प्रकार भारत में ‘imagined community’ एकल नहीं, बल्कि अनेक overlapping communities का समूह है। यह दृष्टिकोण न केवल Anderson के सिद्धांत को विस्तारित करता है, बल्कि भारतीय समाज की जटिलता को भी बेहतर ढंग से अभिव्यक्त करता है।

लोकतंत्र एक साझा वैचारिक सेतु (Conceptual Bridge)

  • Benedict Anderson, Ernest Gellner और Sunil Khilnani तीनों ही राष्ट्रवाद को अलग-अलग दृष्टिकोणों से समझाते हैं, लेकिन लोकतंत्र एक ऐसा तत्व है जो इन तीनों को आपस में जोड़ता है।
  • Anderson जहाँ राष्ट्र को ‘imagined community’ मानते हैं, वहीं Gellner इसे आधुनिक संरचनात्मक आवश्यकताओं से जोड़ते हैं, और Khilnani इसे राजनीतिक प्रक्रिया का परिणाम बताते हैं।
  • इन तीनों दृष्टिकोणों के बीच लोकतंत्र एक सक्रिय सेतु (active bridge) के रूप में कार्य करता है, जो कल्पना, संरचना और राजनीति को एकीकृत करता है।

Anderson के संदर्भ में लोकतंत्र: साझा कल्पना का विस्तार

  • Anderson के अनुसार राष्ट्र एक ऐसी ‘कल्पित इकाई’ है, जिसे लोग मानसिक रूप से अनुभव करते हैं।
  • लोकतंत्र इस कल्पना को मजबूत करता है क्योंकि:
    • यह नागरिकों को राजनीतिक प्रक्रिया में भागीदारी का अवसर देता है
    • चुनाव, मीडिया और सार्वजनिक विमर्श के माध्यम से एक साझा ‘राष्ट्रीय कथा’ (national narrative) बनती है
  • इस प्रकार लोकतंत्र भावनात्मक और प्रतीकात्मक एकता को गहरा करता है और लोगों में ‘हम’ की भावना उत्पन्न करता है।

Gellner के संदर्भ में लोकतंत्र: आधुनिक संरचना की आवश्यकता

  • Gellner राष्ट्रवाद को औद्योगिक समाज की जरूरत मानते हैं, जहाँ एक समान शिक्षा, भाषा और कौशल की आवश्यकता होती है।
  • लोकतंत्र इस संरचना को बनाए रखने के लिए आवश्यक है क्योंकि:
    • यह नागरिकों को राज्य के साथ जोड़ता है
    • संस्थागत वैधता (legitimacy) प्रदान करता है
    • समान अवसर और मानकीकरण को बढ़ावा देता है
  • इस प्रकार लोकतंत्र एक functional necessity बन जाता है, जो आधुनिक राष्ट्र-राज्य की स्थिरता सुनिश्चित करता है।

Khilnani के संदर्भ में लोकतंत्र: पहचान निर्माण का माध्यम

  • Khilnani के अनुसार भारत में लोकतंत्र केवल शासन प्रणाली नहीं, बल्कि पहचान निर्माण का मुख्य उपकरण है।
  • भारत जैसे विविध समाज में लोकतंत्र:
    • विभिन्न सामाजिक समूहों (जाति, धर्म, भाषा) को प्रतिनिधित्व देता है
    • उन्हें राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल करता है
    • राष्ट्रीय पहचान को ‘top-down’ नहीं, बल्कि ‘participatory’ बनाता है
  • इस प्रकार लोकतंत्र भारत में institution-driven identity formation का आधार बनता है।

भारतीय संदर्भ में लोकतंत्र की विशेष भूमिका

  • भारत में लोकतंत्र केवल एक राजनीतिक प्रणाली नहीं, बल्कि एक समावेशी प्रक्रिया (inclusive process) है।
  • यह:
    • विविधताओं को दबाने के बजाय उन्हें अभिव्यक्ति का अवसर देता है
    • अलग-अलग पहचानों को एक साझा राष्ट्रीय ढाँचे में समाहित करता है
  • उदाहरण के रूप में चुनावों में क्षेत्रीय दलों की भागीदारी और सामाजिक न्याय आंदोलनों का उभार
  • इस प्रकार लोकतंत्र विविधता और एकता के बीच संतुलन स्थापित करता है।

लोकतंत्र: एकीकृत और विभाजित करने वाला तत्व

  • लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह एक ओर विभिन्न समूहों को जोड़ता है र दूसरी ओर पहचान-आधारित राजनीति को भी बढ़ावा देता है
  • इसलिए यह एक ‘integrative force’ भी है और एक ‘competitive arena’ भी है

यही द्वैत (duality) भारतीय लोकतंत्र को जटिल लेकिन जीवंत बनाता है।

निष्कर्ष (Conclusion)

उपरोक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय पहचान को किसी एक सिद्धांत के माध्यम से पूर्णतः समझा नहीं जा सकता। Benedict Anderson, Ernest Gellner और Sunil Khilnani तीनों ही राष्ट्र के निर्माण को ‘निर्मित’ प्रक्रिया के रूप में देखते हैं, किंतु उनके दृष्टिकोण अलग-अलग आयामों पर केंद्रित हैं। Anderson राष्ट्र की कल्पनात्मक और सांस्कृतिक प्रकृति को स्पष्ट करते हैं, Gellner उसकी आधुनिक संरचनात्मक और औद्योगिक आधारशिला को रेखांकित करते हैं, जबकि Khilnani इसे राजनीतिक और संस्थागत प्रक्रिया के रूप में समझाते हैं।

भारतीय संदर्भ में इन तीनों दृष्टिकोणों का समेकन आवश्यक हो जाता है, क्योंकि भारत न तो सांस्कृतिक रूप से एकरूप है, न ही पूर्णतः औद्योगिक समाज, फिर भी यह एक सशक्त राष्ट्र-राज्य के रूप में अस्तित्व में है। यही वह बिंदु है जहाँ Khilnani का ‘State-Nation’ का विचार विशेष महत्व प्राप्त करता है, जो यह दर्शाता है कि भारत में राष्ट्र का निर्माण मुख्यतः राज्य और लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से हुआ है।

इस पूरी प्रक्रिया में लोकतंत्र एक केंद्रीय भूमिका निभाता है। यह न केवल विविधताओं को अभिव्यक्ति देता है, बल्कि उन्हें एक साझा राष्ट्रीय ढाँचे में भी समाहित करता है। इस प्रकार लोकतंत्र, Anderson की ‘imagination’, Gellner की ‘structure’ और Khilnani की ‘politics’ का वास्तविक संगम बन जाता है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि भारतीय राष्ट्रीय पहचान एक स्थिर या एकरूप अवधारणा नहीं, बल्कि एक गतिशील, बहु-स्तरीय और निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया है, जो लोकतांत्रिक संवाद, राजनीतिक सहभागिता और संस्थागत व्यवस्थाओं के माध्यम से निरंतर पुनर्निर्मित होती रहती है। यही भारत की विशिष्टता और उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।

Exam Facts

  1. Benedict Anderson के अनुसार राष्ट्र एक ‘कल्पित समुदाय’ (Imagined Community) है।
  2. Ernest Gellner राष्ट्रवाद को आधुनिक औद्योगिक समाज का परिणाम मानते हैं।
  3. Sunil Khilnani के अनुसार भारत में राष्ट्रवाद एक ‘राजनीतिक निर्माण’ है।
  4. भारत को Khilnani ‘State-Nation’ के रूप में परिभाषित करते हैं, जहाँ राज्य राष्ट्र का निर्माण करता है।
  5. भारतीय राष्ट्रीय पहचान बहु-स्तरीय (Layered Identity) और गतिशील है।
  6. लोकतंत्र राष्ट्रीय पहचान निर्माण का प्रमुख माध्यम है।
  7. भारत में विविधता (diversity) राष्ट्र-निर्माण की बाधा नहीं, बल्कि आधार है।
  8. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एकरूप पहचान पर बल देता है, जबकि बहुलतावादी राष्ट्रवाद विविधता को स्वीकार करता है।
  9. लोकतंत्र imagination (Anderson), structure (Gellner) और politics (Khilnani) का संगम है।
  10. भारतीय राष्ट्रवाद एक निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया (ongoing process) है।

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