in ,

NPT सम्मेलन में सहमति का अभाव: परमाणु राजनीति और अंतरराष्ट्रीय तनाव

Lack of Consensus at the NPT Conference: Nuclear Politics and International Tensions

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र द्वारा आयोजित परमाणु अप्रसार संधि (Nuclear Non-Proliferation Treaty – NPT) की समीक्षा सम्मेलन बिना किसी सर्वसम्मत अंतिम दस्तावेज़ के समाप्त हो गया।

  • इसका मुख्य कारण ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच गहरा कूटनीतिक विवाद रहा।
  • यह लगातार तीसरी बार है जब NPT समीक्षा सम्मेलन किसी साझा निष्कर्ष तक पहुँचने में असफल रहा है, जिससे वैश्विक परमाणु सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं।

सम्मेलन की विफलता के प्रमुख कारण

  • सम्मेलन के दौरान तैयार किए गए मसौदा दस्तावेज़ में यह स्पष्ट उल्लेख किया गया था कि ईरान “कभी भी परमाणु हथियार प्राप्त करने, विकसित करने या हासिल करने का प्रयास नहीं कर सकता।”
  • ईरान ने इस प्रावधान का कड़ा विरोध किया और इसे अपने विरुद्ध पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण बताया। ईरान का तर्क था कि यदि उसके परमाणु कार्यक्रम पर प्रश्न उठाए जा रहे हैं, तो अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरानी परमाणु ठिकानों पर किए गए सैन्य हमलों की भी आलोचना होनी चाहिए।
  • दूसरी ओर, अमेरिका ने आरोप लगाया कि ईरान ने अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) को अपने परमाणु स्थलों तक पहुँच देने से इनकार करके NPT के दायित्वों का उल्लंघन किया है।
  • अमेरिका का मानना है कि ईरान गुप्त रूप से परमाणु हथियार क्षमता विकसित करने की दिशा में कार्य कर रहा है।
  • इन विरोधाभासी दृष्टिकोणों के कारण सदस्य देशों के बीच सहमति नहीं बन सकी और सम्मेलन बिना किसी अंतिम दस्तावेज़ के समाप्त हो गया।

लगातार तीसरी विफलता

  • यह पहली बार नहीं है जब NPT समीक्षा सम्मेलन असफल हुआ हो।
  • 2015 में मध्य-पूर्व को परमाणु हथियार मुक्त क्षेत्र घोषित करने के मुद्दे पर मतभेद उभर आए थे।
  • 2022 में रूस ने यूक्रेन के जापोरिज्जिया परमाणु ऊर्जा संयंत्र पर कब्ज़े से संबंधित भाषा का विरोध करते हुए अंतिम दस्तावेज़ को रोक दिया था।
  • अब 2026 में अमेरिका-ईरान विवाद ने सम्मेलन को विफल कर दिया।
  • इन लगातार असफलताओं से यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान वैश्विक राजनीतिक तनावों ने परमाणु निरस्त्रीकरण की प्रक्रिया को अत्यंत जटिल बना दिया है।

अमेरिकाईरान परमाणु विवाद

अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर लंबे समय से तनाव बना हुआ है।

  • अमेरिका का दृष्टिकोण: अमेरिका का आरोप है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम का उपयोग शांतिपूर्ण उद्देश्यों के बजाय परमाणु हथियार क्षमता विकसित करने के लिए कर सकता है। इसी कारण अमेरिका ने समय-समय पर ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं।
  • ईरान का दृष्टिकोण: ईरान लगातार यह दावा करता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल ऊर्जा उत्पादन और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए है। ईरान का कहना है कि उस पर लगाए गए आरोप राजनीतिक प्रेरित हैं और पश्चिमी देशों द्वारा दोहरे मानदंड अपनाए जा रहे हैं।

ईरान ने यह भी कहा कि इज़राइल स्वयं परमाणु हथियार रखने वाला देश माना जाता है, लेकिन उस पर कोई अंतरराष्ट्रीय दबाव नहीं डाला जाता।

संयुक्त राष्ट्र का दृष्टिकोण

संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने सम्मेलन के दौरान चेतावनी दी कि वर्तमान समय में परमाणु हथियारों से उत्पन्न खतरा अत्यधिक बढ़ गया है।

उन्होंने सभी देशों से अपील की कि वे:

  • कूटनीति और वार्ता का मार्ग अपनाएँ,
  • परमाणु हथियारों की दौड़ को रोकें,
  • तथा वैश्विक शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए सहयोग करें।

संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि यदि परमाणु शक्तियों के बीच अविश्वास बढ़ता रहा, तो यह पूरी मानवता के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

NPT (परमाणु अप्रसार संधि) क्या है?

  • परमाणु अप्रसार संधि (NPT) विश्व की सबसे महत्वपूर्ण परमाणु नियंत्रण संधियों में से एक है।
  • इसे 12 जून 1968 को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा स्वीकृत किया गया। यह 5 मार्च 1970 से लागू हुई।

यह संधि तीन मुख्य स्तंभों पर आधारित है:

  1. परमाणु अप्रसार (Non-Proliferation): गैर-परमाणु देशों को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना।
  2. शांतिपूर्ण उपयोग (Peaceful Use of Nuclear Energy): सभी देशों को परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए उपयोग करने का अधिकार देना।
  3. परमाणु निरस्त्रीकरण (Disarmament): परमाणु हथियार संपन्न देशों को धीरे-धीरे अपने हथियार कम करने के लिए प्रेरित करना।

परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र (NWS)

  • NPT केवल उन देशों को आधिकारिक परमाणु शक्ति के रूप में मान्यता देता है जिनके पास 1 जनवरी 1967 से पहले परमाणु हथियार थे। ये देश हैं: अमेरिका, रूस (पूर्व सोवियत संघ), यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस चीन इन देशों को Nuclear Weapon States (NWS) कहा जाता है।

IAEA की भूमिका

  • अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) NPT के अनुपालन की निगरानी करती है।
  • इसके मुख्य कार्य हैं परमाणु कार्यक्रमों का निरीक्षण, परमाणु सामग्री के दुरुपयोग को रोकना, तथा शांतिपूर्ण परमाणु तकनीक को बढ़ावा देना।
  • यदि कोई देश नियमों का उल्लंघन करता है, तो IAEA उसकी रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को भेज सकती है।

भारत का दृष्टिकोण

  • भारत ने कभी भी NPT पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। भारत का मानना है कि यह संधि भेदभावपूर्ण है क्योंकि यह केवल पाँच देशों को स्थायी परमाणु शक्ति का दर्जा देती है जबकि अन्य देशों पर प्रतिबंध लगाती है।
  • भारत का कहना है कि वैश्विक परमाणु निरस्त्रीकरण सभी देशों पर समान रूप से लागू होना चाहिए।

भारत की प्रमुख परमाणु नीति

  • No First Use (NFU) – भारत पहले परमाणु हमला नहीं करेगा।
  • न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखना।
  • सार्वभौमिक एवं सत्यापन योग्य परमाणु निरस्त्रीकरण का समर्थन करना।

 

भारत ने जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में अपनी छवि बनाए रखी है और अंतरराष्ट्रीय नियमों का सम्मान किया है।

सम्मेलन की विफलता का वैश्विक प्रभाव

  • इस सम्मेलन की विफलता के कई गंभीर प्रभाव हो सकते हैं:
  • परमाणु हथियार नियंत्रण प्रणाली कमजोर हो सकती है।
  • देशों के बीच अविश्वास बढ़ सकता है।
  • परमाणु हथियारों की नई दौड़ शुरू हो सकती है।
  • पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ सकता है।
  • वैश्विक शांति और सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि NPT जैसी व्यवस्थाएँ कमजोर होती हैं, तो भविष्य में परमाणु प्रसार को रोकना और कठिन हो जाएगा।

निष्कर्ष

NPT समीक्षा सम्मेलन की विफलता यह दर्शाती है कि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सहयोग की तुलना में प्रतिस्पर्धा और अविश्वास अधिक बढ़ गया है। अमेरिका-ईरान विवाद, रूस-यूक्रेन संघर्ष तथा वैश्विक शक्ति संतुलन में परिवर्तन ने परमाणु निरस्त्रीकरण की प्रक्रिया को कमजोर किया है।

ऐसी स्थिति में विश्व समुदाय को संवाद, कूटनीति और पारदर्शिता के माध्यम से विश्वास बहाली का प्रयास करना होगा, अन्यथा परमाणु हथियारों से जुड़ा खतरा आने वाले समय में और अधिक गंभीर हो सकता है।


Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

What do you think?

जॉन स्टुअर्ट मिल (1806-1873): Liberty, Utilitarianism और Democracy