पिछले कुछ सप्ताहों से राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज रही कि केंद्र सरकार संसद को पुनः आहूत करने की तैयारी में है। उल्लेखनीय है कि संसद के मानसून सत्र का सत्रावसान (prorogation) जानबूझकर नहीं किया गया था, ताकि आवश्यकता पड़ने पर उसे शीघ्र बुलाया जा सके। आशंका यह थी कि सरकार परिसीमन विधेयक को पारित कराने का प्रयास कर सकती है, जिससे उन राज्यों को स्थायी दो-तिहाई बहुमत प्राप्त हो सके जहाँ सत्तारूढ़ दल सशक्त है। फिलहाल ऐसा होता नहीं दिख रहा। इसके दो संभावित कारण माने जा रहे हैं: या तो सरकार को आवश्यक संख्या बल पर पूर्ण विश्वास नहीं है, या फिर उसे यह भय है कि वर्तमान वातावरण में संसद का सत्र विपक्ष को निर्वाचन आयोग की कथित अनियमितताओं पर प्रश्न उठाने का एक और मंच दे देगा।
किंतु प्रश्न केवल संसद के सत्र का नहीं है। लेखक का मूल तर्क यह है कि परिसीमन जैसा दूरगामी विषय यदि अंततः संसद में तय भी हो, तो भी यह पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि ऐसा करने से भारतीय संघीय ढाँचे के एक अनिवार्य अंग, अर्थात राज्यों, की उपेक्षा होती है। किसी भी परिसीमन से पूर्व एक व्यापक राष्ट्रीय विमर्श आवश्यक है, जिसमें राज्य सरकारों के दृष्टिकोण को समुचित स्थान मिले। परंतु ऐसा कौन-सा मंच है जहाँ राज्य इस प्रकार के युगांतकारी विषय पर अपनी बात रख सकें? लेखक के अनुसार इसका उत्तर संविधान में पहले से उपस्थित है: अंतर-राज्य परिषद।
अंतर-राज्य परिषद: संवैधानिक आधार और स्थापना
अनुच्छेद 263 की परिकल्पना
संविधान के अनुच्छेद 263 के अंतर्गत अंतर-राज्य परिषद की परिकल्पना संविधान निर्माताओं ने संघवाद को सुदृढ़ करने, अंतर-सरकारी समन्वय को सुगम बनाने तथा संघ और राज्यों के विविध हितों में सामंजस्य स्थापित करने की एक महत्त्वपूर्ण संस्थागत व्यवस्था के रूप में की थी। अनुच्छेद 263 राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि यदि लोकहित में आवश्यक प्रतीत हो, तो वह आदेश द्वारा ऐसी परिषद स्थापित कर सकता है, जिसके तीन संभावित कार्य हैं:
(क) राज्यों के बीच उत्पन्न विवादों की जाँच करना और उन पर परामर्श देना;
(ख) उन विषयों का अन्वेषण और विचार-विमर्श करना जिनमें कुछ या सभी राज्यों, अथवा संघ और एक या अधिक राज्यों का साझा हित हो;
(ग) ऐसे किसी विषय पर सिफारिश करना, विशेषकर नीति और कार्रवाई के बेहतर समन्वय हेतु।
संविधान निर्माता इस तथ्य से भली-भाँति परिचित थे कि वे एक ऐसा संघीय ढाँचा रच रहे हैं जिसमें प्रबल केंद्रीकरण की प्रवृत्ति अंतर्निहित है। इसी कारण अनुच्छेद 263 को जानबूझकर लचीला और व्यापक बनाया गया, ताकि एक असाधारण रूप से विविधतापूर्ण देश में संघ और राज्यों के साझा हितों पर नियमित संवाद हो सके और नीति एवं कार्रवाई में बेहतर समन्वय स्थापित हो।
चार दशकों की निष्क्रियता और 1990 में गठन
विडंबना यह रही कि स्वतंत्रता के बाद चार दशकों से अधिक समय तक यह प्रावधान निष्क्रिय पड़ा रहा। केंद्र-राज्य संबंधों पर गठित सरकारिया आयोग (1983 से 1988) ने इस निष्क्रिय परिषद को भारत के संघीय संतुलन की “लुप्त कड़ी” के रूप में चिह्नित किया और इसके स्थायी गठन की सिफारिश की। इसी सिफारिश के आधार पर 28 मई 1990 को राष्ट्रपति के आदेश द्वारा अंतर-राज्य परिषद का औपचारिक गठन हुआ।

परिषद की संरचना:
- अध्यक्ष: प्रधानमंत्री
- सदस्य: सभी राज्यों के मुख्यमंत्री
- विधानसभा वाले केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री तथा बिना विधानसभा वाले केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासक
- प्रधानमंत्री द्वारा नामित छह केंद्रीय कैबिनेट मंत्री (गृह मंत्री सहित)
- स्थायी आमंत्रित सदस्य के रूप में अन्य केंद्रीय मंत्री
उल्लेखनीय है कि 1990 के राष्ट्रपति आदेश में परिषद को अनुच्छेद 263 के खंड (ख) और (ग) वाले कार्य ही सौंपे गए, अंतर-राज्यीय विवादों की जाँच का कार्य (खंड क) इसे नहीं दिया गया। आदेश के अनुसार परिषद की बैठक वर्ष में कम से कम तीन बार होनी थी, बैठकें बंद कमरे में होती हैं और निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं। वर्ष 1991 में परिषद सचिवालय और 1996 में केंद्रीय गृह मंत्री की अध्यक्षता में एक स्थायी समिति गठित की गई, जिसका कार्य परिषद की बैठकों हेतु विषयों की तैयारी और सिफारिशों के क्रियान्वयन की निगरानी करना है।
जो सपना था, वह क्यों मुरझा गया?
प्रारंभिक उत्साह और बाद का क्षरण
परिषद की स्थापना को भारतीय लोकतंत्र में एक युगांतरकारी कदम माना गया था। आशा थी कि यह ऐसा परामर्शदात्री मंच बनेगी जहाँ राज्य सरकारें केंद्र की कार्यपालिका से समान स्तर पर संवाद कर सकेंगी। परिषद को अंतर-सरकारी वार्ता, नीतिगत सामंजस्य और राजनीतिक संघर्षों के समाधान का प्रमुख केंद्र बनना था; एक बहुलतावादी व्यवस्था में शक्ति-साझेदारी की जटिलताओं को सुलझाने वाला समर्पित संवैधानिक अंग।
किंतु व्यवहार में परिषद संस्थागत क्षीणता और व्यवस्थागत उपेक्षा का शिकार हो गई। लेखक इसके प्रमुख कारण इस प्रकार गिनाते हैं:
- परिचालन स्वायत्तता का अभाव: परिषद के पास स्वतंत्र रूप से कार्य करने की क्षमता कभी विकसित ही नहीं हो सकी।
- गृह मंत्रालय का उपांग बन जाना: केंद्र और राज्यों के बीच मध्यस्थता करने वाले संवैधानिक मंच के स्थान पर यह गृह मंत्रालय का एक सहायक अंग बनकर रह गई, जो नौकरशाही की प्राथमिकताओं और राजनीतिक अनिवार्यताओं के अधीन है।
- निष्पक्षता पर प्रश्न: केंद्रीय मंत्रालय के भीतर एक छोटे विभाग जैसी स्थिति ने इसकी उस क्षमता को कमजोर किया जिससे यह स्वतंत्र प्रशासनिक इकाई के रूप में निष्पक्ष राष्ट्रीय एजेंडा तय कर सकती।
- नियमित बैठकों के दायित्व की अवहेलना: वर्ष में तीन बैठकों का प्रावधान क्रमिक सरकारों द्वारा बार-बार अनदेखा किया गया। कई-कई वर्षों का अंतराल सामान्य बात हो गया। अब तक परिषद की केवल 11 बैठकें हुई हैं, जिनमें अंतिम बैठक 16 जुलाई 2016 को हुई थी।
- एकपक्षीय नीति-निर्माण की प्रवृत्ति: परिषद का यह निष्क्रिय होना इस बात का द्योतक है कि केंद्र ने संस्थागत संवाद के स्थान पर एकपक्षीय निर्णयों या अनौपचारिक वार्ताओं को प्राथमिकता दी।
- प्रतिष्ठा और प्रभाव का अभाव: परिषद कभी वह प्रतिष्ठा अर्जित नहीं कर सकी जिसके बल पर वह राज्यों के अधिकारों, राजस्व या परिसीमन जैसे संवैधानिक प्रश्नों से जुड़ी विधायी पहलों को प्रभावित कर पाती।
क्षरण का परिणाम: विश्वास का संकट
इस निष्क्रियता का सबसे गंभीर परिणाम केंद्र और राज्यों, विशेषकर विपक्ष-शासित राज्यों, के बीच विश्वास का क्षरण है। समकालीन शासन की लगभग हर बड़ी चुनौती अधिकार-क्षेत्रों की सीमाओं को लाँघती है:
- आर्थिक और कर सुधार
- पारिस्थितिकी संरक्षण और जलवायु संकट
- सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदाएँ
- आंतरिक सुरक्षा
जब परिषद जैसा मंच निष्क्रिय रहता है, तब केंद्रीय नीतियाँ राज्यों के मुख्यमंत्रियों से सार्थक परामर्श के बिना बनती हैं। यह ऊपर से नीचे थोपा जाने वाला दृष्टिकोण अनिवार्यतः राजनीतिक तनाव, प्रशासनिक प्रतिरोध और संवैधानिक विवाद को जन्म देता है। परिसीमन के प्रश्न पर ऐसा विवाद होना लगभग तय है।
परिसीमन: क्यों आवश्यक है राज्यों की भागीदारी?
परिसीमन का प्रश्न इस बहस को और प्रासंगिक बनाता है। अनुच्छेद 82 और 170 के अंतर्गत प्रत्येक जनगणना के पश्चात लोकसभा और विधानसभा सीटों का पुनर्निर्धारण होना है। भारत में अब तक 1952, 1963, 1973 और 2002 के अधिनियमों के अंतर्गत परिसीमन आयोग गठित हुए हैं। 42वें संविधान संशोधन (1976) ने लोकसभा सीटों की संख्या 1971 की जनगणना के आधार पर 2000 तक स्थिर कर दी थी, और 84वें संशोधन (2001) ने इस रोक को 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ा दिया।
अब जबकि नई जनगणना की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है, परिसीमन की संभावना वास्तविक हो गई है। दक्षिण भारत के राज्यों सहित वे राज्य, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता पाई, आशंकित हैं कि जनसंख्या आधारित पुनर्निर्धारण से संसद में उनका प्रतिनिधित्व सापेक्ष रूप से घट जाएगा। ऐसे में यह विषय केवल तकनीकी नहीं, बल्कि संघीय संतुलन और राजनीतिक न्याय का प्रश्न है, जिसका समाधान राज्यों की सहमति के बिना स्थायी नहीं हो सकता।
सुधार के सुझाव और अन्य आयोगों की दृष्टि
सुझाए गए पुनर्निर्माण के उपाय
लेखक का स्पष्ट मत है कि परिषद को ठंडे बस्ते से निकालकर एक वास्तविक स्वायत्त निकाय के रूप में पुनर्गठित किया जाए:
- स्वतंत्र सचिवालय: परिषद का सचिवालय एक स्वतंत्र संस्थागत प्राधिकरण हो, जिसमें विविध पृष्ठभूमि के सिविल सेवक और तकनीकी विशेषज्ञ नियुक्त हों।
- संस्थागत बैठक-कार्यक्रम: प्रधानमंत्री, प्रमुख कैबिनेट मंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्री नियमित और पूर्वनिर्धारित अंतराल पर साझा राष्ट्रीय महत्त्व के विषयों पर विचार करें।
- प्रमुख नीतिगत मंच: परिषद बड़े नीतिगत सुधारों पर विमर्श, राष्ट्रीय योजनाओं के स्थानीय प्रभाव के मूल्यांकन तथा संसाधन बँटवारे, अवसंरचना, पर्यावरण प्रबंधन और संवैधानिक परिवर्तन से जुड़े अंतर-राज्यीय विवादों की मध्यस्थता का केंद्र बने।
अन्य आयोगों की सिफारिशें
- सरकारिया आयोग (1988): स्थायी अंतर-राज्य परिषद के गठन की सिफारिश की और इसे अनुच्छेद 263 के अंतर्गत स्थापित करने को कहा।
- संविधान समीक्षा राष्ट्रीय आयोग (2002): परिषद को अधिक प्रभावी बनाने पर बल दिया।
- पुंछी आयोग (2010): सुझाव दिया कि परिषद वर्ष में कम से कम तीन बार बैठे, इसका एजेंडा प्रधानमंत्री के परामर्श से तय हो तथा इसे विशेषज्ञता और अंतर-सरकारी विवाद समाधान की क्षमता से युक्त एक जीवंत मंच बनाया जाए।
अन्य संघीय मंचों से तुलना
भारत में सहकारी संघवाद के कुछ अन्य मंच भी हैं:
- क्षेत्रीय परिषदें: राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के अंतर्गत गठित वैधानिक निकाय।
- नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल: 2015 से कार्यरत, किंतु इसकी प्रकृति मुख्यतः विकास-योजना संबंधी है।
- जीएसटी परिषद (अनुच्छेद 279A): 101वें संविधान संशोधन (2016) से गठित, जिसने दिखाया है कि केंद्र और राज्य एक साझा मंच पर नियमित रूप से बैठकर जटिल विषयों पर निर्णय ले सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऑस्ट्रेलिया की “नेशनल कैबिनेट” (2020) और कनाडा की “फर्स्ट मिनिस्टर्स मीटिंग” जैसे उदाहरण बताते हैं कि संघीय देशों में शीर्ष नेतृत्व का नियमित संवाद शासन की गुणवत्ता बढ़ाता है।
सशक्त परिषद: एक अनिवार्यता, विलासिता नहीं
एक सशक्त अंतर-राज्य परिषद भारतीय शासन की दिशा मौलिक रूप से बदल सकती है। स्थायी और समावेशी संवाद का मंच प्रदान करके यह केंद्र के विधायी अधिकार और राज्यों के प्रशासनिक क्रियान्वयन के बीच की संरचनात्मक खाई को पाट सकती है। यह केंद्र-राज्य संबंधों को अनिश्चित और टकरावपूर्ण चक्र से निकालकर पारस्परिक सम्मान और संवैधानिक वैधता पर आधारित सहयोगात्मक साझेदारी में परिवर्तित कर सकती है। सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि इससे राष्ट्रीय नीतियाँ लागू होने से पहले राज्यों के विचारों को वास्तविक महत्त्व मिल सकेगा। विशाल सामाजिक-आर्थिक विविधता और जटिल संघीय गतिशीलता वाले राष्ट्र में एक पूर्णतः क्रियाशील और स्वतंत्र अंतर-राज्य परिषद विलासिता नहीं, बल्कि संरचनात्मक अनिवार्यता है।
निष्कर्ष: “सहकारी संघवाद” को मंच की प्रतीक्षा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “सहकारी संघवाद” की अवधारणा को लोकप्रिय बनाया, किंतु लेखक के अनुसार यह बिना किसी ठोस मंच के एक शब्दाडंबर बनकर रह गया है। अब उनके पास इसे वास्तविक अर्थ देने का अवसर है, और इसके लिए किसी नए कानून की भी आवश्यकता नहीं, क्योंकि अंतर-राज्य परिषद पहले से संविधान में विद्यमान है। आवश्यकता केवल इसे जीवंत करने की है। भारत को राज्यों के साथ साझा विचार-विमर्श और परामर्श की एक सतत, व्यवस्थित प्रक्रिया चाहिए; संविधान ने हमें इसका माध्यम दे दिया है, अब समय है कि हम इसे ठंडे बस्ते से बाहर निकालें।
वन लाइनर फैक्ट्स फॉर रिवीजन
- अंतर-राज्य परिषद का संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 263
- परिषद की स्थापना: राष्ट्रपति के आदेश द्वारा, 28 मई 1990
- स्थापना की सिफारिश: सरकारिया आयोग (रिपोर्ट 1988)
- परिषद के अध्यक्ष: प्रधानमंत्री
- स्थायी समिति (1996) के अध्यक्ष: केंद्रीय गृह मंत्री
- परिषद में नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री: छह
- आदेश के अनुसार न्यूनतम बैठकें: वर्ष में तीन
- अनुच्छेद 263 का खंड (क), अर्थात विवादों की जाँच, परिषद को नहीं सौंपा गया
- परिषद की प्रथम बैठक: 10 अक्टूबर 1990
- परिषद की अंतिम (11वीं) बैठक: 16 जुलाई 2016
- परिषद सचिवालय की स्थापना: 1991
- पुंछी आयोग की रिपोर्ट: 2010
- लोकसभा सीटों पर रोक 2026 के बाद पहली जनगणना तक: 84वाँ संशोधन (2001)
- क्षेत्रीय परिषदें: राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956
- जीएसटी परिषद: अनुच्छेद 279A, 101वाँ संशोधन (2016)
अभ्यास प्रश्न
1. अंतर-राज्य परिषद के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- इसका गठन संसद के अधिनियम द्वारा किया गया था।
- इसकी स्थापना सरकारिया आयोग की सिफारिश पर की गई थी।
- प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष होते हैं।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
(a) केवल 1 और 2 (b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3 (d) 1, 2 और 3
2. अनुच्छेद 263 में उल्लिखित निम्नलिखित में से कौन-सा कार्य 1990 के राष्ट्रपति आदेश द्वारा अंतर-राज्य परिषद को नहीं सौंपा गया?
(a) साझा हित के विषयों का अन्वेषण और विचार-विमर्श
(b) नीति और कार्रवाई के बेहतर समन्वय हेतु सिफारिश
(c) राज्यों के बीच विवादों की जाँच और परामर्श
(d) उपर्युक्त सभी सौंपे गए
3. अंतर-राज्य परिषद की स्थायी समिति की अध्यक्षता कौन करता है?
(a) प्रधानमंत्री (b) केंद्रीय गृह मंत्री
(c) केंद्रीय वित्त मंत्री (d) कैबिनेट सचिव
4. लोकसभा में राज्यों के बीच सीटों के आवंटन पर रोक को 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक किस संविधान संशोधन द्वारा बढ़ाया गया?
(a) 42वाँ संशोधन
(b) 61वाँ संशोधन
(c) 84वाँ संशोधन
(d) 87वाँ संशोधन
5. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
- क्षेत्रीय परिषद : राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956
- जीएसटी परिषद : अनुच्छेद 279A
- अंतर-राज्य परिषद : अनुच्छेद 262
उपर्युक्त में से कितने युग्म सही सुमेलित हैं?
(a) केवल एक (b) केवल दो
(c) सभी तीन (d) कोई नहीं
उत्तर
1. (b) 2. (c) 3. (b) 4. (c) 5. (b)
Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services
Subscribe to get the latest posts sent to your email.

