समानता आधुनिक राजनीतिक चिंतन का सबसे प्रिय और सबसे विवादित आदर्श है। फ़्रांसीसी क्रांति के नारे “स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व” से लेकर भारतीय संविधान की प्रस्तावना तक, समानता लगभग हर लोकतांत्रिक घोषणा का हिस्सा रही है। किंतु जैसे ही हम पूछते हैं कि “समानता का वास्तविक अर्थ क्या है?”, मतभेद शुरू हो जाते हैं। क्या सबकी आय बराबर होनी चाहिए? क्या सबको बराबर अवसर मिलने चाहिए? या फिर समानता का अर्थ कुछ और ही है?
बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में यह बहस मुख्यतः इस प्रश्न के इर्द-गिर्द घूमती रही कि “किस वस्तु की समानता?” (Equality of What?)। संसाधनों की, कल्याण की, या क्षमताओं की?
अमेरिकी दार्शनिक एलिज़ाबेथ एंडरसन (Elizabeth Anderson) ने 1999 में इस पूरी बहस की दिशा ही बदल दी। उन्होंने कहा कि पहले यह पूछिए कि “समानता का उद्देश्य क्या है?” उनका उत्तर था कि समानता का उद्देश्य वस्तुओं का बराबर बँटवारा नहीं, बल्कि ऐसा समाज बनाना है जिसमें लोग एक-दूसरे के साथ बराबरी के संबंध में रहें, जहाँ न कोई किसी का मालिक हो और न कोई किसी से नीचा माना जाए। इसी विचार को “संबंधपरक समानता” (Relational Equality) कहा जाता है।
यह लेख एंडरसन के प्रसिद्ध निबंध “व्हाट इज़ द पॉइंट ऑफ़ इक्वालिटी?” (What Is the Point of Equality?) का विश्लेषण करता है और साथ ही उस बहस को समझाता है जो इस निबंध से शुरू हुई: “भाग्य समतावाद” (Luck Egalitarianism) बनाम “संबंधपरक समानता”।
एलिज़ाबेथ एंडरसन: परिचय
- एलिज़ाबेथ एंडरसन का जन्म 1959 में अमेरिका में हुआ। वे मिशिगन विश्वविद्यालय (University of Michigan) में दर्शनशास्त्र तथा महिला एवं जेंडर अध्ययन की प्रोफ़ेसर हैं।
- उनका कार्यक्षेत्र नैतिक दर्शन, राजनीतिक दर्शन, नारीवादी ज्ञानमीमांसा और अर्थशास्त्र के दर्शन तक फैला है।
- उनकी पहली प्रमुख पुस्तक “वैल्यू इन एथिक्स एंड इकोनॉमिक्स” (Value in Ethics and Economics, 1993) थी।
- बाद में उन्होंने अमेरिका में नस्लीय अलगाव पर “द इम्पेरेटिव ऑफ़ इंटीग्रेशन” (The Imperative of Integration, 2010) और कार्यस्थल पर मालिकों की सत्ता पर “प्राइवेट गवर्नमेंट” (Private Government, 2017) लिखी।
- 2019 में उन्हें प्रतिष्ठित मैकआर्थर फ़ेलोशिप (MacArthur Fellowship) मिली।
- किंतु उनकी सबसे चर्चित रचना वही निबंध है जो 1999 में अमेरिकी पत्रिका “एथिक्स” (Ethics) में प्रकाशित हुआ, और जिसने समकालीन समतावादी चिंतन में एक नई धारा को जन्म दिया।
बहस की पृष्ठभूमि: “किस वस्तु की समानता?”
एंडरसन के तर्क को समझने के लिए पहले उस बहस को जानना ज़रूरी है जिसके विरुद्ध उन्होंने लिखा।
इस बहस की शुरुआत जॉन रॉल्स (John Rawls) की पुस्तक “अ थ्योरी ऑफ़ जस्टिस” (A Theory of Justice, 1971) से मानी जाती है। रॉल्स ने कहा था कि किसी व्यक्ति को कौन-सी प्राकृतिक प्रतिभाएँ मिलीं और वह किस परिवार में पैदा हुआ, यह “प्राकृतिक लॉटरी” (Natural Lottery) का परिणाम है। ये बातें नैतिक दृष्टि से मनमानी (Morally Arbitrary) हैं, यानी इनके लिए कोई व्यक्ति न श्रेय का पात्र है, न दोष का। इसलिए समाज की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि इन संयोगों का प्रभाव कम हो। इसी आधार पर रॉल्स ने “भेद सिद्धांत” (Difference Principle) दिया, जिसके अनुसार असमानता तभी उचित है जब उससे सबसे कमज़ोर वर्ग को लाभ हो।
1979 में अमर्त्य सेन (Amartya Sen) ने अपने प्रसिद्ध व्याख्यान “इक्वालिटी ऑफ़ व्हाट?” (Equality of What?) में यह प्रश्न खुलकर रखा कि आखिर किस चीज़ को बराबर किया जाए। सेन का उत्तर था: क्षमताओं (Capabilities) को, अर्थात् उन वास्तविक स्वतंत्रताओं को जिनसे व्यक्ति वह बन सके और वह कर सके जिसे वह मूल्यवान मानता है।
रोनाल्ड ड्वॉर्किन (Ronald Dworkin) ने संसाधनों की समानता की बात की, जबकि रिचर्ड आर्नेसन (Richard Arneson) ने कल्याण के लिए समान अवसर की और जी.ए. कोहेन (G.A. Cohen) ने “लाभ तक समान पहुँच” (Equal Access to Advantage) की।
इन सभी विचारकों के बीच मतभेद “वस्तु” को लेकर था, पर एक बात पर लगभग सहमति थी: समानता का प्रश्न मूलतः “वितरण” (Distribution) का प्रश्न है। यानी समाज में कोई अच्छी चीज़ किसे, कितनी और किस आधार पर मिले। इसी साझा मान्यता को एंडरसन ने चुनौती दी।
भाग्य समतावाद क्या है?
1980 और 1990 के दशक में समतावादी चिंतन की एक प्रमुख धारा यह मानने लगी कि समानता का मूल उद्देश्य अनचाहे दुर्भाग्य की भरपाई करना है। इस धारा को एंडरसन ने ही अपने 1999 के निबंध में “भाग्य समतावाद” (Luck Egalitarianism) नाम दिया। आज यह शब्द राजनीतिक दर्शन में इतना प्रचलित है कि लोग अक्सर भूल जाते हैं कि इसे एक आलोचक ने गढ़ा था।
भाग्य समतावाद की नींव रोनाल्ड ड्वॉर्किन द्वारा किए गए एक भेद पर टिकी है। ड्वॉर्किन ने 1981 के अपने लेख “What is Equality? Part 2: Equality of Resources” में दो प्रकार के भाग्य बताए। पहला है “विकल्प भाग्य” (Option Luck), यानी वह परिणाम जो किसी व्यक्ति के अपने सोचे-समझे जोखिम से निकलता है, जैसे शेयर बाज़ार में पैसा लगाना और नुकसान उठाना। दूसरा है “अप्रत्याशित भाग्य” (Brute Luck), यानी वह परिणाम जिस पर व्यक्ति का कोई नियंत्रण नहीं, जैसे जन्म से विकलांगता, अचानक बिजली गिरना या किसी गंभीर बीमारी का होना।
भाग्य समतावाद का मूल सूत्र इसी भेद से निकलता है। अप्रत्याशित भाग्य से होने वाली हानि की भरपाई समाज को करनी चाहिए, क्योंकि उसमें व्यक्ति का कोई दोष नहीं। पर विकल्प भाग्य से होने वाली हानि व्यक्ति को स्वयं उठानी चाहिए, क्योंकि वह उसके अपने चुनाव का परिणाम है।
विल किमलिका (Will Kymlicka) ने ड्वॉर्किन के सिद्धांत को इसी अर्थ में “प्रतिभा के प्रति असंवेदनशील और महत्वाकांक्षा के प्रति संवेदनशील” (Endowment-insensitive, Ambition-sensitive) कहा था। अर्थात् किसी को कम प्रतिभा के कारण पीछे नहीं रहना चाहिए, पर यदि कोई अपनी इच्छा से कम परिश्रम करता है तो उसका परिणाम उसे ही भुगतना चाहिए।
ड्वॉर्किन ने इसे समझाने के लिए एक रोचक कल्पना भी की। मान लीजिए कुछ लोग एक निर्जन द्वीप पर पहुँचते हैं और वहाँ के संसाधनों को बराबर सीपियों (Clamshells) के सहारे नीलामी में बाँटते हैं। नीलामी तब न्यायपूर्ण मानी जाएगी जब कोई भी व्यक्ति दूसरे के हिस्से से ईर्ष्या न करे। इसे “ईर्ष्या परीक्षण” (Envy Test) कहा गया। अप्रत्याशित दुर्भाग्य से बचाव के लिए ड्वॉर्किन ने एक “काल्पनिक बीमा बाज़ार” (Hypothetical Insurance Market) का सुझाव दिया, जिसके आधार पर कराधान और कल्याणकारी योजनाएँ बनाई जा सकें।
जी.ए. कोहेन ने 1989 में इसी पत्रिका “एथिक्स” में प्रकाशित लेख “ऑन द करेंसी ऑफ़ इगैलिटेरियन जस्टिस” (On the Currency of Egalitarian Justice) में भाग्य समतावाद को और स्पष्ट रूप दिया। उनके अनुसार समतावाद का उद्देश्य “अनैच्छिक हानि” (Involuntary Disadvantage) को समाप्त करना है, यानी ऐसी हानि जिसे व्यक्ति ने न चुना हो और जिसके लिए वह ज़िम्मेदार न हो। रिचर्ड आर्नेसन, एरिक राकोव्स्की (Eric Rakowski) और जॉन रोमर (John Roemer) जैसे विचारक भी इसी धारा से जुड़े माने जाते हैं।
पहली नज़र में यह विचार बहुत न्यायपूर्ण लगता है। आखिर यह उचित ही प्रतीत होता है कि जिसकी गलती नहीं, उसकी मदद हो, और जिसने जोखिम स्वयं चुना, वह उसका परिणाम स्वीकार करे। किंतु एंडरसन ने दिखाया कि इस सुंदर लगने वाले विचार के भीतर कई गहरी समस्याएँ छिपी हैं।
एंडरसन का प्रहार: भाग्य समतावाद की आलोचना
एंडरसन ने अपना निबंध एक तीखे प्रश्न से शुरू किया, जिसका भावार्थ है: यदि हाल के समतावादी लेखन को चुपके से रूढ़िवादियों ने लिखा होता, तो क्या उसके निष्कर्ष समतावादियों के लिए इससे अधिक शर्मनाक हो सकते थे? उनका आशय यह था कि भाग्य समतावादी, समानता की रक्षा करने के नाम पर, ऐसे निष्कर्षों तक पहुँच गए हैं जिनका उपयोग समानता के विरोधी आसानी से समानता का मज़ाक उड़ाने में कर सकते हैं। उन्होंने भाग्य समतावाद पर मुख्य रूप से तीन आरोप लगाए।
1. ज़िम्मेदार ठहराए गए पीड़ितों का परित्याग
भाग्य समतावाद का तर्क है कि अपने चुनाव से हुई हानि की भरपाई समाज न करे। एंडरसन पूछती हैं कि इस नियम को ईमानदारी से लागू किया जाए तो क्या होगा। उनका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण उस बीमा-रहित वाहन चालक का है जो अपनी लापरवाही से दुर्घटना कर बैठता है और गंभीर रूप से घायल हो जाता है। चूँकि बीमा न लेना और लापरवाही से गाड़ी चलाना उसका अपना चुनाव था, इसलिए कठोर भाग्य समतावादी तर्क के अनुसार समाज उसका इलाज करने के लिए बाध्य नहीं होगा। उसे सड़क किनारे मरने के लिए छोड़ा जा सकता है।
एंडरसन बताती हैं कि यह समस्या केवल लापरवाह चालकों तक सीमित नहीं है। अग्निशमन कर्मी, पुलिसकर्मी, मछुआरे और किसान जैसे लोग अपनी इच्छा से जोखिम भरे पेशे चुनते हैं, जबकि समाज उन्हीं पर निर्भर है। जो लोग बाढ़ या भूकंप वाले क्षेत्रों में रहना चुनते हैं, वे भी इसी तर्क से सहायता के पात्र नहीं रहेंगे। सबसे गंभीर उदाहरण उन लोगों का है, अधिकतर महिलाओं का, जो बच्चों, बुज़ुर्गों या बीमारों की देखभाल के लिए वेतन वाला काम छोड़ देती हैं। उनकी आर्थिक निर्भरता और गरीबी उनके “चुनाव” का परिणाम कही जाएगी, जबकि उनका काम पूरे समाज के लिए आवश्यक है। एंडरसन के अनुसार जो सिद्धांत समाज के लिए सबसे उपयोगी लोगों को ही बेसहारा छोड़ दे, वह समानता का सिद्धांत नहीं हो सकता।
2. सहायता के नाम पर अपमान
दूसरी समस्या उन लोगों से जुड़ी है जिन्हें भाग्य समतावाद मदद देना चाहता है, यानी अप्रत्याशित दुर्भाग्य के शिकार। उन्हें सहायता पाने के लिए यह सिद्ध करना होगा कि वे स्वभाव से हीन हैं: कम प्रतिभाशाली, कम आकर्षक, कम सक्षम। एंडरसन इस बात को एक व्यंग्यात्मक कल्पना से समझाती हैं। वे “राज्य समानता बोर्ड” (State Equality Board) की ओर से नागरिकों को भेजे गए काल्पनिक पत्र लिखती हैं। विकलांग व्यक्ति को लिखा जाता है कि आपकी जन्मजात कमियों के कारण आपका जीवन सामान्य लोगों की तुलना में कम जीने योग्य है, इसलिए हम आपको मुआवज़ा दे रहे हैं। कम प्रतिभाशाली व्यक्ति को बताया जाता है कि दुर्भाग्य से दूसरे लोग आपकी योग्यता को अधिक महत्व नहीं देते, इसलिए आपको सहायता दी जा रही है। इसी तरह कम सुंदर या सामाजिक रूप से संकोची लोगों को भी पत्र जाता है।
इन पत्रों के माध्यम से एंडरसन दिखाती हैं कि ऐसी सहायता दया (Pity) पर आधारित है, सम्मान (Respect) पर नहीं। जो व्यक्ति इस प्रकार सहायता लेता है, उस पर सार्वजनिक रूप से “हीन” होने का ठप्पा लग जाता है। इससे समाज में बराबरी नहीं, बल्कि एक नया पदानुक्रम बनता है: एक ओर “सामान्य” और “योग्य” नागरिक, दूसरी ओर दया के पात्र “कमज़ोर” नागरिक।
3. राज्य द्वारा निजी जीवन की जाँच
तीसरी समस्या व्यावहारिक भी है और नैतिक भी। यदि हानि के प्रत्येक मामले में यह तय करना है कि वह चुनाव का परिणाम थी या दुर्भाग्य का, तो राज्य को लोगों के निजी निर्णयों की गहन जाँच करनी होगी। किसने कितना परिश्रम किया, कौन-सी आदतें अपनाईं, कौन-सा जोखिम क्यों लिया, यह सब राज्य को परखना पड़ेगा। एंडरसन के अनुसार यह न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि नागरिकों की निजता और गरिमा में अनुचित हस्तक्षेप भी है। राज्य का यह काम नहीं कि वह नागरिकों के चरित्र और उनकी ज़िम्मेदारी पर फ़ैसले सुनाता फिरे।
इन तीनों आलोचनाओं से एंडरसन एक बुनियादी कसौटी निकालती हैं: कोई भी समतावादी सिद्धांत तभी स्वीकार्य है जब वह सभी नागरिकों के प्रति समान सम्मान और समान चिंता व्यक्त करे, और जिसे नागरिक एक-दूसरे के सामने उचित ठहरा सकें। भाग्य समतावाद इस कसौटी पर विफल होता है, क्योंकि वह कुछ लोगों को लापरवाह कहकर छोड़ देता है और कुछ को हीन बताकर दया दिखाता है।
समानता का वास्तविक उद्देश्य: एंडरसन का उत्तर
आलोचना के बाद एंडरसन अपना सकारात्मक सिद्धांत रखती हैं। वे याद दिलाती हैं कि इतिहास में समानता के लिए जो वास्तविक आंदोलन हुए, जैसे दासता का उन्मूलन, सामंती विशेषाधिकारों का अंत, नस्लभेद और जाति व्यवस्था का विरोध, स्त्रियों के अधिकारों का संघर्ष, वे किसी प्राकृतिक दुर्भाग्य की भरपाई के लिए नहीं लड़े गए थे। वे उन सामाजिक व्यवस्थाओं के विरुद्ध थे जिनमें कुछ लोग दूसरों पर शासन करते थे, उनका शोषण करते थे और उन्हें नीचा मानते थे।
इसलिए एंडरसन समानता के दो उद्देश्य बताती हैं। उसका नकारात्मक उद्देश्य है “दमन” (Oppression) को समाप्त करना। दमन प्राकृतिक नहीं, बल्कि समाज द्वारा थोपा गया होता है। यह कई रूपों में प्रकट होता है: किसी समूह को हाशिये पर डाल देना, उसका शोषण करना, उस पर प्रभुत्व जमाना, उसे सामाजिक प्रतिष्ठा के निचले पायदान पर रखना, या उसकी संस्कृति को हीन मानकर दूसरों की संस्कृति थोपना। यहाँ एंडरसन स्पष्ट रूप से आइरिस मैरियन यंग (Iris Marion Young) की पुस्तक “जस्टिस एंड द पॉलिटिक्स ऑफ़ डिफ़रेंस” (Justice and the Politics of Difference, 1990) में बताए गए “दमन के पाँच चेहरों” से प्रेरणा लेती हैं। समानता का सकारात्मक उद्देश्य है ऐसे समुदाय का निर्माण जिसमें लोग एक-दूसरे के साथ बराबरी के संबंध में खड़े हों।
यही “संबंधपरक” दृष्टि है। इसमें समानता किसी वस्तु के बँटवारे का पैटर्न नहीं, बल्कि लोगों के बीच के संबंधों का गुण है। प्रश्न यह नहीं कि किसके पास कितना है, बल्कि यह है कि क्या लोग एक-दूसरे को बराबर मानते हैं, क्या कोई किसी के सामने झुकने को मजबूर है, और क्या सबको अपनी बात कहने और दूसरों से अपने दावे स्वीकार करवाने का समान अधिकार है।
लोकतांत्रिक समानता (Democratic Equality)
अपने सिद्धांत को एंडरसन ने “लोकतांत्रिक समानता” (Democratic Equality) नाम दिया। उल्लेखनीय है कि यह शब्द रॉल्स ने भी “अ थ्योरी ऑफ़ जस्टिस” में अपने न्याय सिद्धांत की व्याख्या के लिए प्रयोग किया था। एंडरसन के अनुसार लोकतांत्रिक समानता का अर्थ है कि प्रत्येक नागरिक को वे क्षमताएँ प्राप्त होनी चाहिए जो दमन से बचने और एक लोकतांत्रिक राज्य में बराबर नागरिक के रूप में जीने के लिए आवश्यक हैं।
यहाँ एंडरसन अमर्त्य सेन के क्षमता दृष्टिकोण का सहारा लेती हैं, पर उसे एक विशेष दिशा देती हैं। वे तीन प्रकार की क्षमताओं की बात करती हैं, जो व्यक्ति के तीन रूपों से जुड़ी हैं। पहला रूप है मनुष्य के रूप में जीना, जिसके लिए भोजन, आवास, वस्त्र, स्वास्थ्य सेवा और अपने शरीर पर नियंत्रण जैसी बुनियादी चीज़ें चाहिए। दूसरा रूप है सामाजिक उत्पादन की सहकारी व्यवस्था में सहभागी के रूप में जीना, जिसके लिए शिक्षा, उत्पादन के साधनों तक पहुँच, पेशा चुनने की स्वतंत्रता, श्रम का उचित मूल्य और काम के लिए सामाजिक मान्यता आवश्यक है। तीसरा रूप है लोकतांत्रिक राज्य के नागरिक के रूप में जीना, जिसके लिए राजनीतिक भागीदारी के अधिकार, अभिव्यक्ति और संगठन की स्वतंत्रता, तथा सार्वजनिक स्थानों और नागरिक समाज तक बिना भेदभाव के पहुँच आवश्यक है।
एंडरसन के सिद्धांत की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वह सभी क्षमताओं को पूरी तरह बराबर करने की माँग नहीं करता। वह इतना सुनिश्चित करना चाहता है कि हर व्यक्ति के पास इन क्षमताओं का “पर्याप्त स्तर” (Sufficient Level) हो, ताकि वह समाज में बराबर की हैसियत से खड़ा हो सके। इसी कारण कुछ विद्वान उनके सिद्धांत में “पर्याप्तता” (Sufficiency) का तत्व देखते हैं। साथ ही, यह गारंटी जीवन भर के लिए है और किसी की गलती पर निर्भर नहीं। लापरवाह चालक को भी आपातकालीन चिकित्सा मिलेगी, क्योंकि उसके बिना वह न मनुष्य के रूप में जी सकता है, न नागरिक के रूप में। यही भाग्य समतावाद से उसका सबसे बड़ा अंतर है।
एंडरसन श्रम विभाजन (Division of Labour) के आधार पर भी अपना तर्क रखती हैं। आधुनिक अर्थव्यवस्था एक विशाल सहकारी व्यवस्था है, जिसमें सफ़ाई कर्मी से लेकर वैज्ञानिक तक सबका योगदान मिलकर ही उत्पादन संभव बनाता है। इसलिए जो व्यक्ति कम वेतन वाला, कठिन या कम प्रतिष्ठित काम करता है, वह भी इस साझा उत्पादन में बराबर का भागीदार है। वह दया का नहीं, बल्कि अपने योगदान के आधार पर सम्मानजनक जीवन का अधिकारी है। इस प्रकार लोकतांत्रिक समानता में सहायता दया से नहीं, बल्कि पारस्परिक सम्मान और सहयोग से निकलती है।

संक्षेप में, भाग्य समतावाद पूछता है कि “किसे कितना मिलना चाहिए?”, जबकि संबंधपरक समानता पूछती है कि “लोग एक-दूसरे से कैसे संबंधित हैं?” पहली दृष्टि के केंद्र में वस्तुएँ हैं, दूसरी के केंद्र में मनुष्य और उनके संबंध।
भाग्य समतावादियों का उत्तर
एंडरसन के निबंध के बाद भाग्य समतावादियों ने भी अपना पक्ष रखा। रिचर्ड आर्नेसन ने 2000 में “एथिक्स” पत्रिका में ही उत्तर दिया और कहा कि भाग्य समतावाद को “प्राथमिकतावाद” (Prioritarianism) के साथ जोड़ा जा सकता है, यानी सबसे वंचित लोगों के कल्याण को अधिक महत्व देकर कठोर निष्कर्षों से बचा जा सकता है। अन्य विद्वानों ने तर्क दिया कि भाग्य समतावाद न्याय का केवल एक मूल्य है; करुणा या बुनियादी आवश्यकताओं जैसे दूसरे मूल्य भी साथ में काम कर सकते हैं, और इस तरह लापरवाह चालक को भी इलाज मिल सकता है। जी.ए. कोहेन ने अपनी बाद की पुस्तक “व्हाई नॉट सोशलिज़्म?” (Why Not Socialism?, 2009) में भाग्य समतावाद के साथ “समुदाय” (Community) के मूल्य को भी आवश्यक माना। भाग्य समतावादियों का एक और तर्क यह है कि एंडरसन ने उनके सिद्धांत के सबसे कठोर रूप को निशाना बनाया है, जबकि एक संतुलित रूप उतना कठोर नहीं है।
संबंधपरक समानता की आलोचना
एंडरसन का सिद्धांत भी आलोचना से मुक्त नहीं रहा।
- पहली आलोचना यह है कि “बराबरी के संबंध” की अवधारणा अस्पष्ट है। कब दो लोग बराबर संबंध में हैं और कब नहीं, इसका कोई निश्चित मापदंड नहीं दिया गया।
- दूसरी आलोचना पर्याप्तता के तत्व से जुड़ी है। यदि सबके पास बुनियादी क्षमताओं का पर्याप्त स्तर हो, तो क्या उसके ऊपर कितनी भी आर्थिक असमानता स्वीकार्य होगी? पाउला कसाल (Paula Casal) जैसे विद्वानों ने 2007 के अपने लेख “व्हाई सफ़िशिएंसी इज़ नॉट इनफ़” (Why Sufficiency Is Not Enough) में पर्याप्तता आधारित दृष्टि की इसी कमज़ोरी पर प्रश्न उठाया।अन्य आलोचकों का कहना है कि अत्यधिक आर्थिक असमानता स्वयं संबंधों को बिगाड़ देती है, इसलिए वितरण के प्रश्न को पूरी तरह पीछे नहीं छोड़ा जा सकता।
- तीसरी आलोचना यह है कि संबंधपरक समानता मुख्यतः एक ही राज्य के नागरिकों के बीच संबंधों पर केंद्रित है, जिससे वैश्विक असमानता का प्रश्न अपेक्षाकृत उपेक्षित रह जाता है।
फिर भी इस सिद्धांत को व्यापक समर्थन मिला। सैमुअल शेफ़लर (Samuel Scheffler) ने 2003 में “व्हाट इज़ इगैलिटेरियनिज़्म?” (What Is Egalitarianism?) में कहा कि समानता मूलतः एक “सामाजिक और राजनीतिक आदर्श” है, न कि केवल वितरण का नियम।
हाल के वर्षों में निको कोलोडनी (Niko Kolodny) ने “द पेकिंग ऑर्डर” (The Pecking Order, 2023) में सामाजिक पदानुक्रम को दार्शनिक समस्या के रूप में विस्तार से जाँचा। इस प्रकार संबंधपरक समानता आज समकालीन राजनीतिक दर्शन की एक स्थापित धारा बन चुकी है।
भारतीय संदर्भ: आंबेडकर और संबंधपरक समानता
भारतीय संदर्भ में एंडरसन का सिद्धांत विशेष रूप से परिचित लगता है, क्योंकि डॉ. भीमराव आंबेडकर का संपूर्ण चिंतन इसी प्रकार की समानता पर केंद्रित था। आंबेडकर ने जाति व्यवस्था को “श्रेणीबद्ध असमानता” (Graded Inequality) कहा, जिसमें हर जाति किसी से ऊपर और किसी से नीचे होती है। यह असमानता मूलतः संसाधनों की नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों की थी: कौन किसके साथ भोजन कर सकता है, कौन किस कुएँ से पानी ले सकता है, कौन किस मंदिर में प्रवेश कर सकता है। अपने प्रसिद्ध भाषण “जाति का उन्मूलन” (Annihilation of Caste, 1936) में आंबेडकर ने इसी सामाजिक पदानुक्रम पर प्रहार किया।
25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में आंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि 26 जनवरी 1950 को भारत विरोधाभासों के जीवन में प्रवेश करेगा: राजनीति में हम “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” का सिद्धांत मानेंगे, पर सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता बनी रहेगी। उन्होंने कहा कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक टिक नहीं सकता जब तक उसके आधार में सामाजिक लोकतंत्र न हो, और सामाजिक लोकतंत्र का अर्थ है स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को जीवन के सिद्धांत के रूप में स्वीकार करना।
भारतीय संविधान में भी संबंधपरक समानता के स्पष्ट प्रावधान मिलते हैं। अनुच्छेद 15(2) दुकानों, सार्वजनिक भोजनालयों, कुओं, तालाबों और सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच में भेदभाव का निषेध करता है। अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का उन्मूलन करता है और उसके किसी भी रूप में आचरण को दंडनीय अपराध घोषित करता है। प्रस्तावना में “व्यक्ति की गरिमा” सुनिश्चित करने वाले “बंधुत्व” का उल्लेख है। ये सभी प्रावधान केवल संसाधनों के बँटवारे की बात नहीं करते, बल्कि यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि कोई नागरिक किसी दूसरे के सामने नीचा न समझा जाए। इस अर्थ में एंडरसन का सिद्धांत भारतीय संवैधानिक दृष्टि के बहुत निकट है।
निष्कर्ष
एलिज़ाबेथ एंडरसन का निबंध “What Is the Point of Equality?” समकालीन राजनीतिक दर्शन में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। उसने समतावादी बहस का प्रश्न बदल दिया: “किस वस्तु की समानता?” के स्थान पर “समानता किस लिए?”। उनके अनुसार भाग्य समतावाद, अपनी सद्भावना के बावजूद, कुछ लोगों को लापरवाह कहकर छोड़ देता है, कुछ को हीन बताकर अपमानित करता है, और राज्य को नागरिकों के निजी जीवन का न्यायाधीश बना देता है। इसके विपरीत लोकतांत्रिक समानता का लक्ष्य दमन का अंत और ऐसे समुदाय का निर्माण है जहाँ हर व्यक्ति मनुष्य, उत्पादक और नागरिक के रूप में बराबर की हैसियत से जी सके।
इस बहस का सार यह है कि समानता केवल गणित का प्रश्न नहीं, बल्कि गरिमा का प्रश्न है। किसी समाज को केवल इस आधार पर समान नहीं कहा जा सकता कि उसमें संसाधनों का बँटवारा कैसा है; उसे इस आधार पर भी परखना होगा कि उसमें लोग एक-दूसरे को कैसे देखते और कैसे व्यवहार करते हैं। आंबेडकर के बंधुत्व से लेकर एंडरसन की लोकतांत्रिक समानता तक, यही संदेश बार-बार सामने आता है कि सच्चा लोकतंत्र वही है जिसमें कोई किसी का स्वामी न हो और कोई किसी के सामने झुकने को विवश न हो।
परीक्षा उपयोगी तथ्य
- “What Is the Point of Equality?” एलिज़ाबेथ एंडरसन का निबंध है, जो 1999 में “Ethics” पत्रिका में प्रकाशित हुआ।
- एंडरसन मिशिगन विश्वविद्यालय से जुड़ी अमेरिकी दार्शनिक हैं; उन्हें 2019 में मैकआर्थर फ़ेलोशिप मिली।
- “भाग्य समतावाद” (Luck Egalitarianism) शब्द एंडरसन ने अपने 1999 के निबंध में दिया।
- एंडरसन के सिद्धांत को “संबंधपरक समानता” और स्वयं उनके शब्दों में “लोकतांत्रिक समानता” (Democratic Equality) कहा जाता है।
- “लोकतांत्रिक समानता” शब्द रॉल्स की “A Theory of Justice” (1971) में भी मिलता है।
- “विकल्प भाग्य” (Option Luck) और “अप्रत्याशित भाग्य” (Brute Luck) का भेद रोनाल्ड ड्वॉर्किन ने किया।
- ड्वॉर्किन से जुड़ी अवधारणाएँ: संसाधनों की समानता, निर्जन द्वीप की नीलामी, ईर्ष्या परीक्षण और काल्पनिक बीमा बाज़ार।
- “Endowment-insensitive, Ambition-sensitive” की व्याख्या विल किमलिका से जुड़ी है।
- “लाभ तक समान पहुँच” (Equal Access to Advantage) जी.ए. कोहेन की अवधारणा है।
- “कल्याण के लिए समान अवसर” (Equal Opportunity for Welfare) रिचर्ड आर्नेसन की अवधारणा है।
- “Equality of What?” अमर्त्य सेन का 1979 का टैनर व्याख्यान (Tanner Lecture) है।
- एंडरसन के तीन प्रमुख आरोप: ज़िम्मेदार ठहराए गए पीड़ितों का परित्याग, दया पर आधारित अपमानजनक सहायता, और राज्य द्वारा निजी जीवन की जाँच।
- “राज्य समानता बोर्ड” के काल्पनिक पत्र एंडरसन के निबंध का प्रसिद्ध व्यंग्यात्मक उदाहरण हैं।
- समानता का नकारात्मक उद्देश्य दमन का अंत, और सकारात्मक उद्देश्य बराबरी के संबंधों वाले समुदाय का निर्माण है।
- तीन क्षमताएँ: मनुष्य के रूप में, सहकारी उत्पादन में सहभागी के रूप में, और लोकतांत्रिक राज्य के नागरिक के रूप में।
- एंडरसन क्षमताओं के “पर्याप्त स्तर” की गारंटी चाहती हैं, सभी क्षमताओं की पूर्ण बराबरी नहीं।
- “दमन के पाँच चेहरे” आइरिस मैरियन यंग की “Justice and the Politics of Difference” (1990) से हैं।
- “What Is Egalitarianism?” (2003) सैमुअल शेफ़लर का लेख है।
- “Why Sufficiency Is Not Enough” (2007) पाउला कसाल का लेख है।
- “श्रेणीबद्ध असमानता” (Graded Inequality) आंबेडकर की अवधारणा है; “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” उनके 25 नवंबर 1949 के भाषण से है।
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