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मृत्युदंड और न्यायिक प्रक्रिया

बचन सिंह से वारिस तक सर्वोच्च न्यायालय की यात्रा

विश्व मृत्युदंड विरोधी दिवस यह परखने का उपयुक्त अवसर है कि 1980 में सर्वोच्च न्यायालय ने जो सुरक्षा उपाय तय किए थे, वे चार दशकों में कितने प्रभावी रहे। मृत्युदंड अपरिवर्तनीय है। इसलिए इसे देने की प्रक्रिया में हुई छोटी चूक भी किसी के जीवन के अधिकार को स्थायी रूप से समाप्त कर सकती है।

बचन सिंह: अपवाद का सिद्धांत

बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980) में संविधान पीठ ने मृत्युदंड की वैधता को बरकरार रखा, किंतु न्यायिक विवेक के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश भी तय किए। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 354(3), जो अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 393(3) है, के विधायी परिवर्तन के बाद स्थिति यह थी:

  • हत्या के मामलों में आजीवन कारावास सामान्य नियम है।
  • मृत्युदंड केवल “विशेष कारणों” से दिया जा सकता है।
  • न्यायालय को अपराध की परिस्थितियों के साथ अपराधी की परिस्थितियों को भी तौलना होगा।
  • मृत्युदंड तभी संभव है, जब आजीवन कारावास का विकल्प निर्विवाद रूप से बंद हो चुका हो।

अपवाद का वास्तविक अर्थ

इस अपवाद का अर्थ यह नहीं है कि मृत्युदंड कितनी कम बार दिया जाता है। इसका आधार मानव जीवन की गरिमा के प्रति गहरी और स्थायी प्रतिबद्धता है। न्यायालय की दृष्टि में यह कसौटी तभी पूरी होती है, जब सजा व्यक्ति केंद्रित हो। यानी दंड उसकी व्यक्तिगत परिस्थितियों पर विचार करने के बाद ही तय हो।

इसी कारण न्यायालय को देखना होता है कि सामाजिक, संरचनात्मक और मनोवैज्ञानिक कारकों ने अभियुक्त की नैतिक दोषसिद्धि को किस तरह प्रभावित किया और क्या उसके सुधार की संभावना सचमुच समाप्त हो चुकी है। यह सिद्ध करने का दायित्व राज्य पर है कि सुधार की संभावना नहीं बची है।

जब अपराध केंद्र में आ गया

गरिमा पर आधारित यह न्यायशास्त्र जल्द ही डगमगाने लगा। इस विचलन के प्रमुख पड़ाव इस प्रकार हैं:

  • मच्छी सिंह बनाम पंजाब राज्य (1983): संगीत बनाम हरियाणा राज्य (2013) में न्यायालय ने बाद में स्वीकार किया कि मच्छी सिंह ने जांच का केंद्र अपराध की ओर मोड़ दिया। प्रश्न यह बन गया कि आजीवन कारावास देने के कारण हैं या नहीं, जबकि बचन सिंह के अनुसार मृत्युदंड के विशेष कारण खोजे जाने चाहिए थे।
  • रवजी बनाम राजस्थान राज्य (दिसंबर 1995): दो न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि दंड निर्धारण में अपराध की प्रकृति और गंभीरता निर्णायक है, अपराधी की परिस्थितियां नहीं।
  • रवजी और सुरजा राम को फांसी: इस निर्णय के आधार पर मृत्युदंड पाए रवजी को मई 1996 में और सुरजा राम को अप्रैल 1997 में फांसी दी गई। दोनों को ऐसे कानून के आधार पर फांसी पर चढ़ाया गया, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने बाद में बाध्यकारी कानून के विपरीत घोषित किया।
  • संतोष बरियार बनाम महाराष्ट्र राज्य (2009): न्यायालय ने माना कि रवजी का निर्णय बचन सिंह की अनदेखी के कारण अनवधानता से (per incuriam) दिया गया था और कम से कम छह अन्य मामलों में इसका अनुसरण हुआ था। बरियार ने यह भी स्पष्ट किया कि आजीवन कारावास तभी “निर्विवाद रूप से बंद” माना जाएगा, जब सुधार का लक्ष्य अप्राप्य हो।
  • 2012 की अपील: 14 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने इन फांसियों को स्वतंत्र भारत में न्याय की सबसे गंभीर ज्ञात चूक बताया।

सुधार को मिली प्रतिष्ठा, व्यवहार नहीं बदला

इसके बाद मृत्युदंड के मामलों में सुधार को एक महत्वपूर्ण लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया गया। 2015 में विधि आयोग की 262वीं रिपोर्ट भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम थी। आयोग ने आतंकवाद संबंधी अपराधों और राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ने को छोड़कर शेष अपराधों में मृत्युदंड समाप्त करने की अनुशंसा की। इससे पहले 1967 की 35वीं रिपोर्ट ने इसे बनाए रखने का पक्ष लिया था, जबकि 262वीं रिपोर्ट पर नौ में से तीन सदस्य असहमत थे।

फिर भी दंड निर्धारण का व्यवहार, विशेषकर निचली अदालतों में, बहुत नहीं बदला। 2018 से 2020 के बीच दिए गए 306 मृत्युदंडों के राष्ट्रव्यापी अध्ययन से यह चित्र सामने आया:

  • 36.1 प्रतिशत मामलों में सजा दोषसिद्धि के दिन ही सुना दी गई।
  • 18.4 प्रतिशत मामलों में सजा अगले ही दिन सुनाई गई।
  • अधिकांश मामलों में बचाव पक्ष ने न तो शमनकारी परिस्थितियों पर बहस की और न ही साक्ष्य रखे।
  • प्रक्रिया की ओर निर्णायक मोड़

अपराध केंद्रित व्यवहार की इस पृष्ठभूमि में सर्वोच्च न्यायालय ने हाल के वर्षों में दंड प्रक्रिया की निष्पक्षता पर ध्यान केंद्रित किया।

मनोज बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2022)

न्यायालय ने शमनकारी सामग्री जुटाने को व्यावहारिक रूप देने के लिए तीन दायित्व तय किए। राज्य को ये सामग्री प्रस्तुत करनी होगी:

  • मानसिक स्वास्थ्य का मूल्यांकन
  • अभिरक्षा के दौरान अभियुक्त के आचरण की रिपोर्ट
  • परिवीक्षा अधिकारी की रिपोर्ट

स्वतः संज्ञान याचिका

  • एक स्वतः संज्ञान याचिका में न्यायालय ने कहा कि बचाव पक्ष को सजा से जुड़ी सामग्री रखने का वास्तविक और सार्थक अवसर मिलना चाहिए। 19 सितंबर 2022 को समान दंड निर्धारण ढांचा और मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन की विधि तय करने का प्रश्न संविधान पीठ को सौंपा गया।

वसंत संपत दुपारे बनाम भारत संघ (2025)

  • सजा की सुनवाई का अधिकार अनुच्छेद 14 और 21 से उत्पन्न होता है।
  • इसके बिना दिया गया मृत्युदंड असंवैधानिक है।
  • ऐसे मामले को अंतिम हो जाने के बाद भी दोबारा खोला जा सकता है।
  • 25 अगस्त 2025 के इस निर्णय में न्यायालय ने अनुच्छेद 32 के तहत यह मार्ग खोला। साथ ही इसे सुरक्षा उपायों के स्पष्ट और विशिष्ट उल्लंघन तक सीमित रखा, ताकि मुकदमों की बाढ़ न आए।

वारिस बनाम मध्य प्रदेश राज्य (सितंबर 2026)

न्यायालय ने बच्ची के बलात्कार और हत्या के मामले में दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन मृत्युदंड को बदल दिया, क्योंकि राज्य सुधार की संभावना को नकारने वाला कोई साक्ष्य नहीं दे सका। अदालत ने दोहराया कि अपराध चाहे जितना भयावह हो, उसकी गंभीरता मात्र से यह सिद्ध नहीं होता कि आजीवन कारावास का विकल्प बंद हो चुका है। अब दोषी को शेष प्राकृतिक जीवन कारावास में, बिना किसी छूट के बिताना होगा।

अधूरा वचन: आंकड़ों की गवाही

जहां इन सुरक्षा उपायों की सबसे अधिक आवश्यकता है, वहीं वे लागू नहीं हो पा रहे। 2025 में निचली अदालतों ने 128 लोगों को मृत्युदंड दिया। जिन मामलों में अनुपालन का आकलन संभव था, उनमें से 95.18 प्रतिशत में मनोज में तय प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ।

निचली और उच्च अदालतों की खाई इन तथ्यों में भी दिखती है:

  • 2016 से 2025 के बीच सत्र न्यायालयों ने देशभर में 1,310 मृत्युदंड दिए।
  • 31 दिसंबर 2025 तक मृत्युदंड पाए कैदियों की संख्या 574 थी।
  • 2023 से 2025 तक सर्वोच्च न्यायालय ने एक भी मृत्युदंड की पुष्टि नहीं की।

इससे भी गंभीर प्रश्न: दोष सिद्ध भी हुआ या नहीं

सबसे गंभीर चिंता केवल सजा के चरण तक सीमित नहीं है। पिछले एक दशक में उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निपटाए गए मृत्युदंड के मामलों में लगभग एक तिहाई का अंत दोषमुक्ति में हुआ। 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने मृत्युदंड के 19 में से 10 मामलों में अभियुक्तों को बरी कर दिया, जो जांच और अभियोजन की गंभीर खामियों की ओर संकेत करता है।

दुपारे में भी न्यायालय ने स्वीकार किया कि जांच अक्सर अपारदर्शी ढंग से लिए गए इकबालिया बयानों और संदिग्ध गुणवत्ता वाली फोरेंसिक सामग्री पर टिकी होती है। जो व्यवस्था इतनी त्रुटिप्रवण हो, वह केवल अपराध के आधार पर अपरिवर्तनीय दंड का सुरक्षित निर्णय नहीं कर सकती।

मृत्युदंड पर व्यापक बहस

समर्थन के तर्क

  • जघन्य अपराधों पर कठोरतम दंड से समाज की न्याय की अपेक्षा पूरी होती है।
  • इससे पीड़ित परिवारों को न्याय का बोध मिलता है।
  • आतंकवाद जैसे मामलों में राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से इसे आवश्यक माना जाता है।

विरोध के तर्क

  • गलत निर्णय को बाद में सुधारा नहीं जा सकता।
  • यह सिद्ध नहीं है कि मृत्युदंड आजीवन कारावास की तुलना में अपराध को अधिक रोकता है।
  • इस व्यवस्था का बोझ कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि वाले अभियुक्तों पर अधिक पड़ सकता है, जिनके पास सशक्त कानूनी प्रतिनिधित्व नहीं होता।

संवैधानिक और अंतरराष्ट्रीय आयाम

संविधान के अनुच्छेद 72 और 161 क्षमादान की शक्ति देते हैं, जो न्यायिक प्रक्रिया के बाद अंतिम संवैधानिक सुरक्षा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विधि आयोग ने दर्ज किया था कि भारत ने महासभा के स्थगन संबंधी पांचों प्रस्तावों का विरोध किया। यानी भारत ने इस मुद्दे पर अपने संप्रभु कानूनी ढांचे को प्राथमिकता दी है।

आगे की राह

  • निचली अदालतों में अनुपालन: मनोज और दुपारे के मानकों को सत्र न्यायालयों में अनिवार्य और निगरानी योग्य बनाया जाए।
  • अलग और पर्याप्त सुनवाई: दोषसिद्धि और सजा के बीच शमनकारी सामग्री जुटाने का वास्तविक समय मिले।
  • कानूनी सहायता: अभियुक्तों को प्रशिक्षित वकील और शमन विशेषज्ञों की सहायता मिले।
  • जांच सुधार: फोरेंसिक गुणवत्ता और पूछताछ की पारदर्शिता बढ़ाई जाए।
  • न्यायिक प्रशिक्षण: न्यायाधीशों को व्यक्ति केंद्रित दंड निर्धारण का नियमित प्रशिक्षण मिले।
  • नीतिगत विमर्श: विधि आयोग की अनुशंसाओं पर संसद में गंभीर चर्चा हो।

निष्कर्ष

बचन सिंह की चेतावनी थी कि न्यायाधीशों को कभी रक्तपिपासु नहीं होना चाहिए। क्रूर अपराधों पर उठने वाली पीड़ा वास्तविक है और कोई इससे अछूता नहीं रह सकता। किंतु रवजी का प्रकरण बताता है कि जब यह पीड़ा कानूनी तर्क पर हावी हो जाती है, तो परिणाम कितने भयावह हो सकते हैं। बचन सिंह से दुपारे तक विकसित सुरक्षा उपाय न्याय की राह की बाधाएं नहीं हैं। मृत्युदंड की संवैधानिकता इन्हीं शर्तों पर टिकी है। प्रक्रिया के प्रति निष्ठा दया नहीं है, यह संविधान का आदेश है।

रिवीजन के लिए वन लाइनर तथ्य

  • विश्व मृत्युदंड विरोधी दिवस: 10 अक्टूबर
  • बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य: 1980, संविधान पीठ
  • CrPC की धारा 354(3) का वर्तमान रूप: BNSS की धारा 393(3)
  • मृत्युदंड के लिए अनिवार्य शर्त: “विशेष कारण”
  • मच्छी सिंह निर्णय: 1983
  • मच्छी सिंह से जांच के अपराध की ओर मुड़ने की स्वीकृति: संगीत (2013)
  • रवजी निर्णय: दिसंबर 1995, दो न्यायाधीशों की पीठ
  • रवजी को फांसी: मई 1996; सुरजा राम को फांसी: अप्रैल 1997
  • रवजी को अनवधानता से दिया गया निर्णय बताने वाला मामला: संतोष बरियार (2009)
  • 14 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की अपील: 2012
  • मृत्युदंड पर विधि आयोग की रिपोर्ट: 35वीं (1967) और 262वीं (2015)
  • 306 मृत्युदंडों के अध्ययन में उसी दिन सजा: 36.1 प्रतिशत; अगले दिन सजा: 18.4 प्रतिशत
  • मनोज निर्णय: 2022
  • दुपारे निर्णय: अगस्त 2025, अनुच्छेद 14, 21 और 32 से संबद्ध
  • वारिस निर्णय: सितंबर 2026
  • 2025 में निचली अदालतों के मृत्युदंड: 128
  • मनोज की प्रक्रिया का गैर-अनुपालन (जहां आकलन संभव था): 95.18 प्रतिशत
  • 2025 में सर्वोच्च न्यायालय में दोषमुक्ति: 19 में से 10 मामले
  • 31 दिसंबर 2025 तक मृत्युदंड पाए कैदी: 574

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